Monday, January 30, 2017

अतिबला (खिरैटी) के रोग नाशक अद्भुत गुण amazing properties of Atibla (Kirati) defeating the diseases





   अतिबला जिसे खिरैटी भी कहते हैं, यह जड़ी-बूटी वाजीकारक एवं पौष्टिक गुण के साथ ही अन्य गुण एवं प्रभाव भी रखती है अतः यौन दौर्बल्य, धातु क्षीणता, नपुंसकता तथा शारीरिक दुर्बलता दूर करने के अलावा अन्य व्याधियों को भी दूर करने की अच्छी क्षमता रखती है।अतिबला (खरैटी) को विभिन्न भाषाओं निम्न नामो से जाना जाता हैं :
संस्कृत : वला, वाट्यालिका, वाट्या, वाट्यालक
हिंदी : खरैटी, वरयारी, वरियार 

तेलगू : मुपिढी 
लैटिन : सिडकार्सि फोलिया
अंग्रेजी : हॉर्नडिएमव्ड सिडा।
बंगाली : श्वेतवेडेला
मराठी : लघुचिकणा, खिरहंटी
गुजराती : खपाट बलदाना 

अतिबला का सामान्य परिचय :
    अतिबला जिसे  खिरैटी भी कहा जाता है , पौष्टिक गुणों से भरपूर है |यह  आयुर्वेद में बाजीकरण के रूप में भी प्रयुक्त की जाती है धातु सम्बंधित रोग में इसका प्रयोग कारगर है ,यौन दौर्बल्य-धातु क्षीणता- नपुंसकता तथा शारीरिक दुर्बलता दूर करने के अलावा अन्य व्याधियों को भी दूर करने की अच्छी औषीधी है।
इसकी और भी कई जातियां हैं पर बला, अतिबला, नागबला और महाबला ये चार जातियां ही ज्यादा प्रचलित हैं बला चार प्रकार की होती है चारों प्रकार की बला शीतवीर्य, मधुर रसयुक्त, बलकारक, कान्ति, वर्द्धक, वात रक्त पित्त, रक्त विकार और व्रण को दूर करने वाली होती है इसके जड़ और बीज को उपयोग में लिया जाता है।
अतिबला (खरैटी) से होने वाले अद्भुत फायदे :
मसूढ़ों की सूजन : 
अतिबला (कंघी) के पत्तों का काढ़ा बनाकर प्रतिदिन 3 से 4 बार कुल्ला करें। रोजाना प्रयोग करने से मसूढ़ों की सूजन व मसूढ़ों का ढीलापन खत्म होता है।
*. नपुंसकता (नामर्दी)




अतिबला के बीज 4 से 8 ग्राम सुबह-शाम मिश्री मिले गर्म दूध के साथ खाने से नामर्दी में पूरा लाभ होता है।
* दस्त : अतिबला (कंघी) के पत्तों को देशी घी में मिलाकर दिन में 2 बार पीने से पित्त के उत्पन्न दस्त में लाभ होता है।
* पेशाब के साथ खून आना : 
अतिबला की जड़ का काढ़ा 40 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह-शाम पीने से पेशाब में खून का आना बंद हो जाता है।
* बवासीर : 
अतिबला (कंघी) के पत्तों को पानी में उबालकर उसे अच्छी तरह से मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े में उचित मात्रा में ताड़ का गुड़ मिलाकर पीयें। इससे बवासीर में लाभ होता है।
*. रक्तप्रदर :
       खिरैंटी और कुशा की जड़ के चूर्ण को चावलों के साथ पीने से रक्तप्रदर में फायदा होता है।
* खिरेंटी के जड़ का मिश्रण (कल्क) बनाकर उसे दूध में डालकर गर्म करके पीने से रक्त प्रदर में लाभ होता है।
* रक्तप्रदर में अतिबला (कंघी) की जड़ का चूर्ण 6 ग्राम से 10 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम चीनी और शहद के साथ देने से लाभ मिलता है।1. पेशाब का बार-बार आना : खरैटी की जड़ की छाल का चूर्ण यदि चीनी के साथ सेवन करें तो पेशाब के बार-बार आने की बीमारी से छुटकारा मिलता है।
* प्रमेह (वीर्य प्रमेह) : 
अतिबला के बारीक चूर्ण को यदि दूध और मिश्री के साथ सेवन किया जाए तो यह प्रमेह को नष्ट करती है। महावला मूत्रकृच्छू को नष्ट करती है।
* गीली खांसी : 
अतिबला, कंटकारी, बृहती, वासा (अड़ूसा) के पत्ते और अंगूर को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लेते हैं। इसे 14 से 28 मिलीमीटर की मात्रा में 5 ग्राम शर्करा के साथ मिलाकर दिन में दो बार लेने से गीली खांसी ठीक हो जाती है।
* अतिबला की जड़ का चूर्ण 1-3 ग्राम, 100-250 मिलीलीटर दूध के साथ सुबह-शाम सेवन करने से रक्तप्रदर में लाभ मिलता है।
*
श्वेतप्रदर : 
अतिबला की जड़ को पीसकर चूर्ण बनाकर शहद के साथ 3 ग्राम की मात्रा में दूध में मिलाकर सेवन करने से श्वेतप्रदर में लाभ प्राप्त होता है।




* खिरैटी की जड़ की राख दूध के साथ देने से प्रदर में आराम मिलता है।”
* दर्द व सूजन में : दर्द भरे स्थानों पर अतिबला से सेंकना फायदेमंद होता है।
* पित्त ज्वर : 
खिरेटी की जड़ का शर्बत बनाकर पीने से बुखार की गर्मी और घबराहट दूर हो जाती है।
* महिला को श्वेत प्रदर( Leukorrhea ) रोग हो तो बला के बीजों का बारीक पिसा और छना चूर्ण एक एक चम्मच सुबह-शाम शहद में मिलाकर कर दे और फिर ऊपर से मीठा दूध हल्का गर्म पी लें।
* शरीरिक कमजोरी के लिए आधा चम्मच की मात्रा में इसकी जड़ का महीन पिसा हुआ चूर्ण सुबह-शाम मीठे हल्के गर्म दूध के साथ लेने और भोजन में दूध-चावल की खीर शामिल कर खाने से शरीर का दुबलापन दूर होता है शरीर सुडौल बनता है सातों धातुएं पुष्ट व बलवान होती हैं तथा बल वीर्य तथा ओज बढ़ता है।
* खरैटी के बीज और छाल समान मात्रा में लेकर कूट-पीस-छानकर महीन चूर्ण कर लें तथा एक चम्मच चूर्ण घी-शकर के साथ सुबह-शाम लेने से वस्ति और मूत्रनलिका की उग्रता दूर होती है और मूत्रातिसार होना बंद हो जाता है।
* बवासीर के रोगी को मल के साथ रक्त भी गिरे तो इसे रक्तार्श यानी खूनी बवासीर कहते हैं बवासीर रोग का मुख्य कारण खानपान की बदपरहेजी के कारण कब्ज बना रहना होता है बला के पंचांग को मोटा-मोटा कूटकर डिब्बे में भरकर रख लें और प्रतिदिन सुबह एक गिलास पानी में दो चम्मच यानी कि लगभग 10 ग्राम यह जौकुट चूर्ण डालकर उबालें और जब चौथाई भाग पानी बचे तब उतारकर छान लें फिर ठण्डा करके एक कप दूध मिलाकर पी पाएं- इस उपाय से बवासीर का खून गिरना बंद हो जाता है।
* अतिबला की जड़ का काढ़ा 40 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह-शाम पीने से पेशाब में खून का आना बंद हो जाता है।
* अतिबला के पत्तों का काढ़ा बनाकर प्रतिदिन तीन से चार बार कुल्ला करें ये प्रयोग रोजाना करने से मसूढ़ों की सूजन व मसूढ़ों का ढीलापन खत्म होता है।
* जिनको मासिक धर्म रुक जाता है या अनियमित आता है उनको खिरैटी+ चीनी+मुलहठी+ बड़ के अंकुर+ नागकेसर+ पीले फूल की कटेरी की जड़ की छाल लेकर इनको दूध में पीसकर घी और शहद में मिलाकर कम से कम 15 दिनों तक लगातार पिलाना चाहिए। इससे मासिक स्राव (रजोदर्शन) आने लगता है।
* अतिबला+कंटकारी+बृहती+वासा (अड़ूसा) के पत्ते और अंगूर को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लेते हैं फिर इसे 15 से 30 मिलीमीटर की मात्रा में 5 ग्राम शर्करा के साथ मिलाकर दिन में दो बार लेने से गीली खांसी ठीक हो जाती है।
* अतिबला (खिरैटी) के साथ नागकेसर को पीसकर ऋतुस्नान के बाद दूध के साथ सेवन करने से लम्बी आयु वाला (दीर्घजीवी) पुत्र उत्पन्न होता है।

* रुका हुआ मासिक-धर्म : 
खिरैटी, चीनी, मुलहठी, बड़ के अंकुर, नागकेसर, पीले फूल की कटेरी की जड़ की छाल इनको दूध में पीसकर घी और शहद मिलाकर कम से कम 15 दिनों तक लगातार पिलाना चाहिए। इससे मासिकस्राव (रजोदर्शन) आने लगता है।
* पेट दर्द 
 खिरैंटी, पृश्नपर्णी, कटेरी, लाख और सोंठ को मिलाकर दूध के साथ पीने से `पित्तोदर´ यानी पित्त के कारण होने वाले पेट के दर्द में लाभ होगा।
* मूत्ररोग : 
अतिबला के पत्तों या जड़ का काढ़ा लेने से मूत्रकृच्छ (सुजाक) रोग दूर होता है। सुबह-शाम 40 मिलीलीटर लें। इसके बीज अगर 4 से 8 ग्राम रोज लें तो लाभ होता है।
* खिरैटी के पत्ते घोटकर छान लें, इसमें मिश्री मिलाकर पीने से पेशाब खुलकर आता है।
* खिरैटी के बीजों के चूर्ण में मिश्री मिलाकर दूध के साथ लेने से मूत्रकृच्छ मिट जाती है।”
* फोड़ा (सिर का फोड़ा) : 
अतिबला या कंघी के फूलों और पत्तों का लेप फोड़ों पर करने से लाभ मिलता है।
* शरीर को शक्तिशाली बनाना : :शरीर में कम ताकत होने पर खिरैंटी के बीजों को पकाकर खाने से शरीर में ताकत बढ़ जाती है।
* खिरैंटी की जड़ की छाल को पीसकर दूध में उबालें। इसमें घी मिलाकर पीने से शरीर में शक्ति का विकास होता है।
* शुक्रमेह: के लिए खरैटी की ताजी जड़ का एक छोटा टुकड़ा लगभग 5-6 ग्राम एक कप पानी के साथ कूट-पीस और घोंट-छानकर सुबह खाली पेट पीने से कुछ दिनों में शुक्र धातु गाढ़ी हो जाती है और शुक्रमेह होना बंद हो जाता है।
*सीने में घाव (उर:क्षत) :
 बलामूल का चूर्ण, अश्वगंधा, शतावरी, पुनर्नवा और गंभारी का फल समान मात्रा में लेकर चूर्ण तैयार लेते हैं। इसे 1 से 3 ग्राम की मात्रा में 100 से 250 मिलीलीटर दूध के साथ दिन में 2 बार सेवन करने से उर:क्षत नष्ट हो जाता है।
* मलाशय का गिरना : 
अतिबला (खिरेंटी) की पत्तियों को एरंडी के तेल में भूनकर मलाशय पर रखकर पट्टी बांध दें।
* बांझपन दूर करना : 
अतिबला के साथ नागकेसर को पीसकर ऋतुस्नान (मासिक-धर्म) के बाद, दूध के साथ सेवन करने से लम्बी आयु वाला (दीर्घजीवी) पुत्र उत्पन्न होता है।



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Saturday, January 28, 2017

कत्था ( खदिर, खैर ) के गुण,लाभ,उपयोग: Benefits of Catechu (Khadir)


    


परिचय :  इसे खदिर (संस्कृत), खैर (हिन्दी), खयेर (बंगाली), काथ (मराठी), खेर (गुजराती) कचुकट्टि (तमिल), पोडलमानु (तेलुगु) तथा एकेशिया कटेचू (लैटिन) कहते हैं।
खैर सूखे वायुमण्डल में अधिक होता है। हिमालय में 5 हजार फुट की ऊँचाई तक, पश्चिमोत्तर प्रदेश, बम्बई आदि प्रान्तों में पाया जाता है।
    अगर आप पान खाने के शौकीन हैं तो कत्‍थे के बारे में भी जरुर जानते होंगे। कत्‍थई रंग के दिखने वाले इस कत्‍थे के बिना, पान कभी स्‍वाद नहीं दे सकता। पान में लगाए जाने वाले लाल रंग के कत्थे से तो आप भलीभांति परिचि‍त होंगे। यही कत्था पान खाते वक्त आपके होंठो को लाल करता है। लेकिन इसके अलावा कत्थे की एक और प्रजाति‍ होती है जिसे सफेद कत्थे के रूप में जाना जाता है। इसे औषधि‍ के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। इसके औषधीय उपयोग के बारे मे बताते हैं-
कत्‍था, खैर के वृक्ष की लकड़ी से निकाला जाता है। आयुर्वेद के अनुसार कत्‍था, ठंडा, कडुवा, तीखा व कसैला होता है। यह कुष्‍ठ रोग, मुख रोग, मोटापा, खांसी, चोट, घाव, रक्‍त पित्‍त आदि को दूर करता है।

खैर के वृक्ष की छाल से ‘खदिर-सार’ तैयार किया जाता है। यह काले कत्थई रंग का जमाया हुआ पदार्थ ही कत्था है।
रासायनिक संघटन :
 इसमें खदिरसार (कत्था) 35 प्रतिशत तथा टैनिन द्रव्य 57 प्रतिशत मिलता है। इसमें कैटेचीन नामक सत्व मिलता है।
कत्था के गुण :




 यह स्वाद में कडुआ, कसैला, पचने पर कटु, हल्का तथा सूक्ष्म है। इसका मुख्य प्रभाव त्वचा-ज्ञानेन्द्रिय पर कुष्ठध्न (कुष्ठ आदि चर्मरोगों का नाश करनेवाला) रूप में पड़ता है। यह रक्त का स्तम्भक, वर्धक, शोधक, दन्त्य (दाँत) तथा मुखरोगहर), रंग को ठीक करनेवाला, व्रण-शोधक (घाव-शोधक), स्तम्भक (दस्त बन्द करनेवाला) मेदशोषक, गर्भाशय-शिथिलताहर तथा शुक्रशोधक है।मगर हां, कत्‍थे का अधिक सेवन करने से नपुंसकता भी हो सकती है। इसके अलावा कत्‍थे के अधिक सेवन से किड़नी स्‍टोन भी बनता है। इसलिये कत्‍थे का चूर्ण 1 से 3 ग्राम तक ही प्रयोग करें। 
मलेरिया -
 मलेरिया बुखार होने पर कत्था एक बेहतर औषधि के रूप में काम करता है। जी हां, समय-समय पर इसकी समान मात्रा में गोली बनाकर चूसने से मलेरिया से बचाव किया जा सकता है। 
दस्त - 
पेट खराब होने या दस्त लगने की समस्या में कत्थे का इस्तेमाल करना फायदेमं होता है। कत्थे को पकाकर या पानी में उबालकर लेने से दस्त में राहत मिलती है। इसके अलावा पाचन संबंधी समस्याओं में भी कत्था लाभप्रद है|
दांत की समस्या -
 दांत संबंधी किसी भी प्रकार की समस्या में कत्थे के चूर्ण को मंजन में मिलाकर प्रयोग करने से लाभ होता है। इस के अलावा कत्थे के चूर्ण को सरसों के तेल के साथ मिलाकर मंजन करने से भी बहुत लाभ होता है|
खांसी -
 अगर आप लगातार खांसी से परेशान हैं, तो कत्थे को हल्दी और मिश्री के साथ एक-एक ग्राम की मात्रा में मिलाकर गोलियां बना लें। अब इन गोलियों को चूसते रहें। इस प्रयोग को करने से खांसी दूर हो जाती है।
गले की खराश - 




गले में खराश होने पर 300 मिलीग्राम कत्‍थे को पीसकर चूर्ण बना लें और इसे समय-समयपर मुंह में रखकर चूसते रहें। दिनभर में 5 से 6 बार इस प्रयोग को करने से गला बैठना, खराश और छाले होने की समस्या खत्म हो जाती है।
    सफेद कत्‍था औषधि और लाल कत्‍था पान में प्रयोग किया जाता है। पान में लगाया जाने वाला कत्‍था बीमारियों को दूर करने के लिये पय्रोग ना करें।
प्रदर रोग :
 कत्थे और बांस के पत्तों को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें और इसमें 6 ग्राम शहद की मात्रा लेकर पेस्ट बनाकर खाएं। इस प्रयोग को करने से लाभ मिलता है।
दमा रोग : 
सांस संबंधी समस्याओं के लिए भी कत्था बहुत अच्छी औषधि है। इसे हल्दी और शहद के साथ मिलाकर दिन में दो से चार बार एक चम्मच की मात्रा में लेने से काफी लाभ होता है।
दांतों की बीमारी :
 कत्थे को मंजन में मिला कर दांतों व मसूढ़ों पर रोज सुबह शाम मलने से दांत के सारे रोग दूर होते हैं।
दांतों के कीड़े-
कत्‍थे को सरसों के तेल में घोल कर रोजाना 3 से 3 बार मसूढ़ों पर मलें। इससे खून आना तथा बदबू आनी दूर हो जाएगी।
खट्टी डकार :
 300 से 700 मिली ग्राम कत्था का सुबह शाम सेवन करने से खट्टी डकार बंद हो जाती है।
कान दर्द :
 सफेद कत्थे को पीस कर गुनगुने पानी में मिला कर कानों में डालने से कान दर्द दूर होता है।
कुष्ठ रोग : 




कत्थे के काढ़े को पानी में मिलाकर प्रति दिन नहाने से कुष्ठ रोग ठीक होता है।
योनि की जलन और खुजली :
 5 ग्राम की मात्रा में कत्था, विण्डग और हल्दी ले कर पानी के साथ पीस कर योनि पर लगाएं। इससे खुजली और जलन दोनों ठीक हो जाएगी।
घाव - 
किस प्रकार की चोट लगने पर घाव हो जाए, तो उसमें कत्थे को बारीक पीसकर इस चूर्ण को डाल दें। लगातार ऐसा करने पर घाव जल्दी भर जाता है और खून का निकलन भी बंद हो जाता है।  
बवासीर-
सफेद कत्‍था, बड़ी सुपारी और नीलाथोथा बराबर मात्रा में लें। पहले सुपारी व नीलाथोथा को आग पर भून लें और फिर इस में कत्‍थे को मिला कर पीस कर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को मक्‍खन में मिला कर पेस्‍ट बनाएं। इस पेस्‍ट को रोज सुबह-शाम शौच के बाद 8 से 10 दिन तक मस्‍सों प लगाने से मस्‍से सूख जाते हैं।
सावधान रहें-
गर्भवती स्त्रियों को कत्थे का सेवन नहीं करना चाहिए, और पुरुषों में इसका अत्यधिक सेवन नपुंसकता का कारण बन सकता है। इसके अलावा कत्‍थे के अधिक सेवन से किडनी स्टोन भी हो सकता है। इसलिये कत्‍थे का चूर्ण1 से 3 ग्राम तक ही प्रयोग करें।  




Friday, January 27, 2017

स्नायु संस्थान की कमज़ोरी के नुस्खे:Easy Tips to weakness of Nervous System

   


    पूरे शरीर को नियंत्रित और निर्देशित करने वाला तंत्रिका-तंत्र या नर्वस सिस्टम यूं तो बेहद सफाई से बना होता है और अपना काम करता है, फिर भी कभी-कभी गड़बड़ियां हो जाती हैं. हमारे डीएनए की कुछ विकृतियां इन गड़बड़ियों या कहें तो बीमारियों के लिए जिम्मेदार होती है. इनमें से कुछ को दवाओं से ठीक किया जा सकता है लेकिन कुछ पर दवाएं बेअसर होती हैं. यदि कोई गड़बड़ी न्यूरॉन (विशेष रूप से दिमाग में पाई जानेवाली वे कोशिकाएं जो इलेक्ट्रिक सिग्नल के जरिए संकेत प्राप्त करके या भेजकर शरीर को नियंत्रित करती हैं) से संबंधित है तब ज्यादा संभावना होती है कि दवाएं कम असर करें.
स्नायु संस्थान जिसे अंग्रेजी भाषा में (Nervous System) भी कहा जाता है। स्नायु संस्थान की कमज़ोरी का कारण चाहे कुछ भी हो लेकिन इसकी कमज़ोरी से चक्कर, उल्टी, और शरीर शिथिल हो जाता है। स्नायु संस्थान की कमज़ोरी के कारण व्यक्ति ठीक तरह से खड़ा नहीं हो पता और न ही कोई काम कर सकता है।



इससे ग्रसित व्यक्ति को बिस्तर पर लंबे समय तक आराम करना पड़ता है। इसलिए हम स्नायु संतान की कमज़ोरी से ग्रसित व्यक्ति के लिए लाये है आयुर्वेद की गोद से पक्का, आसान और पूरी तरह से प्राकृतिक तरीका जिससे स्नायु संस्थान की कमज़ोरी दूर हो जाएगी।
स्नायु संस्थान (Nervous System) की कमज़ोरी का प्राकृतिक इलाज़ –
बनारसी ऑवले का मुरब्बा एक नग अथवा नीचे लिखी विधि से बनाया गया बारह ग्राम (बच्चों के लिए आधी मात्रा) लें। प्रातः खाली पेट खूब चबा-चबाकर खाने और उसके एक घंटे बाद तक कुछ भी न लेने से मस्तिष्क के ज्ञान तन्तुओं को बल मिलता है और स्नायु संस्थान (Nervous System) शक्तिशाली बनता है।
विशेष- गर्मियों के मौसम में इसका सेवन अधिक लाभकारी है। इस मुरब्बे को यदि चाँदी के बर्क में लपेटकर खाया जाय तो दाह, कमजोरी तथा चक्कर आने की शिकायत दूर होती है। वैसे भी ऑवला का मुरब्बा शीतल और तर होता है और नेत्रों के लिए हितकारी, रक्तशोधक, दाहशामक तथा हृदय, मस्तिष्क, यकृत, आंतें, आमाशय को शक्ति प्रदान करने वाला होता है। इसके सेवन से स्मरणशक्ति तेज होती है। मानसिक एकाग्रता बढ़ती है।
    मानसिक दुर्बलता के कारण चक्कर आने की शिकायत दूर होती है। सवेरे उठते ही सिरदर्द चालू हो जाता है और चक्कर भी आते हो तो भी इससे लाभ होता है। आजकल शुद्ध चाँदी के वर्क आसानी से नहीं मिलते अतः नकली चाँदी के वर्क का इस्तेमाल न करना ही अच्छा है। चाय-बिस्कुट की जगह इसका नाश्ता लेने से न केवल पेट ही साफ रहेगा बल्कि शारीरिक शक्ति, स्फूर्ति एवं कान्ति में भी वृद्धि होगी। निम्न विधि से निर्मित आँवला मुरब्बा को यदि गर्भवती स्त्री सेवन करे तो स्वयं भी स्वस्थ रहेगी और उसकी संतान भी स्वस्थ होगी।



   अॉवले के मुरब्बे के सेवन से रंग भी निखरता है। निषेध-मधुमेह को रोगी इसे न लें।
अाँवला मुरब्बा बनाने की सर्वोत्तम विधि- 500 ग्राम स्वच्छ हरे आँवला कडूकस करके उनका गूदा किसी काँच के मर्तबान में डाल दें और गुठली निकाल कर फेंक दें। अब इस गूदे पर इतना शहद डालें कि गूदा शहद में तर हो जाये। तत्पश्चात् उस काँच के पात्र को ढक्कन से ढ़क कर उसे दस दिन तक रोजाना चार-पाँच घंटे धूप में रखे। इस प्रकार प्राकृतिक तरीके से मुरब्बा बन जायेगा।
   बस, दो दिन बाद इसे खाने के काम में लाया जा सकता है। इस विधि से तैयार किया गया मुरब्बा स्वास्थ्य की दृष्टि से श्रेष्ठ है क्योंकि आग की बजाय सूर्य की किरणों द्वारा निर्मित होने के कारण इसके गुण-धर्म नष्ट नहीं होते और शहद में रखने से इसकी शक्ति बहुत बढ़ जाती है। सेवन विधि–प्रतिदिनं प्रातः खाली पेट 10 ग्राम (दो चम्मच भर) मुरब्बा लगातार तीन-चार सप्ताह तक नाश्ते के रूप में लें, विशेषकर गर्मियों में। चाहें तो
इसके लेने के पन्द्रह मिनट बाद गुनगुना दूध भी पिया जा सकता है। चेत्र या क्वार मास में इसका सेवन करना विशेष लाभप्रद है।
    ऐसा मुरब्बा विद्यार्थियों और दिमागी काम करने वालों की मस्तिष्क की शक्ति और कार्यक्षमता बढ़ाने और चिड़चिड़ापन दूर करने के लिए अमृत तुल्य है। इसमें विटामिन सी’, ‘ए’, कैलशियम, लोहा का अनूठा संगम है। 100 ग्राम ऑवले के गूदे में 720 मिलीग्राम विटामिन ‘सी’, 15 आइ.यू.विटामिन ‘ए’, 50 ग्राम कैलशियम, 1.2 ग्राम लोहा पाया जाता है। अॉवला ही एक ऐसा फल है जिसे पकाने या सुखाने पर भी इसके विटामिन नष्ट नहीं होते।
   यदि उपरोक्त विधि से मुरब्बा बनाना सम्भव न हो तो केवल हरे ऑवले के बारीक टुकड़े करके या कडूकस करके शहद के साथ सेवन करना भी लाभप्रद है। इससे पुराने कब्ज व पेट के रोगों में भी अभूतपूर्व लाभ होता है।




    स्नायु संस्थान का काम शरीर से जु़डी हुई सभी संवेदनाओं को इकटा कर मस्तिष्क तक पहुंचाना होता है। जिस वक्त हमारा स्नायु संस्थान काम करना बंद कर देता है या उसमें कोई दोष आता है तो लकवा आदि बीमारियों से व्यक्ति ग्रसित हो जाता है।
    यदि इस तंत्र में दुर्बलता आती है, व्यक्ति में निम्न लक्षण देखने को मिलते हैं - वह जल्दी थकता है, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करता है, चक्कर आते हैं, दिल की ध़ाडकन बढ़ती है और अपने शरीर की शक्ति से अधिक शारीरिक श्रम करना और अधिक मानसिक श्रम करने से यह रोग हो जाता है। ऎसे में व्यक्ति की याददाश्त भी बहुत कम हो जाती है।
    इसके ईलाज के लिए काली मिर्च, अदरक, पिस्ता, बादाम, किशमिश और अदरक को बराबर मात्रा में मिलाकर इसका एक पेस्ट बना लें। जिसे सुबह-शाम खाने से इस रोग में कमी आती है।
   अदरक को छाँव में सुखाकर उसकी सोंठ बना लें। इस सोंठ में थो़डा जीरा और शहद मिलाकर सुबह-शाम चाट लें। त्रिफला और अदरक का रस दोनों को शहद में मिलाकर पीने से स्नायु दुर्बलता में आराम आता है



Wednesday, January 25, 2017

अच्छी सेहत के लिए अनुपम नुस्खे :Unique prescription for good health

    

   हमारे जीने का ढंग  दिनों दिन बदलता जा रहा है। घर की बजाए बाहर का खाना हमें ज्यादा रुचिकर  लगता हैं नतीजा कभी गला खराब तो कभी खांसी लेकिन हर बार दवाई लेने से बेहतर हैं कि हम कुछ घरेलू नुस्खों को अपनाएं और जल्द राहत पाएं।भारतीय रसोई में आपको हर मर्ज की दवा मिलेगी। 
* नींबू और शहद
यह वजन कम करने का जबरदस्त नुस्खा है। बस एक ग्लास गर्म पानी में 1 नींबू का रस और 2 चम्मच शहद मिलाकर पिएं और मोटापे को कम करें।
* पका केला
दस्त में बस एक केला आराम देता और कॉन्स्टिपेशन में 2-3 केले असर दिखाते हैं। इसे सौंदर्य के लिए फेस मास्क के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है।




* गर्म दूध और हल्‍दी
हल्दी सिर्फ दाल-सब्जी में ही डाले जाने वाला मसाला ही नहीं हैं। इसमें कई औषधीय गुण भी हैं। सौंदर्य से ले कर त्‍वचा,पेट और सर्दी आदि के लिए भी हल्‍दी उपयोगी होती है। सर्दी जुखाम हो या चोट लगी हो हल्दी वाला गर्म दूध पीने से तुरंत राहत मिलती है।
* अजवाइन और नमक
नमक-अजवाइन के परांठे तो सबको अच्छे लगते हैं लेकिन जब पेट खराब या बदहज़मी हो, तो बस आधा चम्मचअजवाइन एक चुटकी नमक के साथ फांके और बदहज़मी दूर हो जाएगी।
* पानी मे भिगोये  बादाम
बादाम रातभर भिगोकर और छिलका निकालकर खाना चाहिए। ये आंखों की रोशनी बढ़ाते हैं। इससे याद्दाश्त तेज होती है।
* सरसों का तेल
सरसों का तेल भी लाभकारी होता है। ज़रा सा गर्म कर के जोड़ों में लगाया जाए तो दर्द में आराम मिलता है इससे खुश्की भी खत्म होती है।
* एक कटोरी दही
दूध और दही भारतीय रसोई में ढेरों तरह से इस्तेमाल होते हैं। अगर बालों में सिकरी हो, तो बस दही हल्के हाथों से बालों में दही लगाएं और मसाज करें। रूसी तो हटेगी ही साथ ही बालों में चमक भी आएगी।




* तुलसी और काली मिर्च
तुलसी सबके घरों में आम होती हैं क्योंकि लोग इसकी पूजा करते हैं लेकिन आपको बता दें कि यह हमें बीमारियों से भी दूर रखती हैं। 10-15 तुलसी के पत्ते और 8-10 काली मिर्च के दानों की चाय बनाकर पीने से खांसी, सर्दी और बुखार में आराम मिलता है।
* अदरक की चाय
अदरक कड़वी जरूर होती हैं लेकिन इसका स्वाद अच्छा लगता हैं अदरक वाली चाय सर्दी जुकाम से तुरंत राहत दिलाती हैं और माइग्रेन के लिए भी फायदेंमंद होती है।
* एक चम्मच चीनी
चीनी सिर्फ़ चाय और दूध में मिठास के लिए नहीं बल्कि दवा के रूप में भी इस्तेमाल होती है जब हिचकी आए और आप परेशान हो जाए तो बस एक चम्मच चीनी मुँह में डालें और धीरे-धीरे चबाएं।



Sunday, January 22, 2017

चर्म रोग दूर करने के घरेलू उपाय:Domestic measures to remove skin diseases

   

  चर्म रोग कई प्रकार के होते हैं। जैसे कि- दाद, खाज, खुजली, छाछन, छाले, खसरा, फोड़े, फुंसी आदि। बहुत से मामलों में हम आयुवेदिक व घरेलू उपचार से रोग को ठीक कर सकते हैं, पर कई मामलो में एक अच्छे dermatologist से सलाह लेना उचित होता है। Skin disease में बहुत से लोगों को होमियोपैथी की दवाओं से भी काफी लाभ मिलता है।

चर्म रोग होने के कारण -
चर्म रोग होने के कई कारण हो सकते हैं|खुजली का रोग ज़्यादातर शरीर में खून की खराबी के कारण उत्पन्न होता है।
गरम और तीखीं चिज़े खाने पर फुंसी और फोड़े निकल आ सकते हैं।
आहार ग्रहण करने के तुरंत बाद व्यायाम करने से भी चर्म रोग होने की संभावना रहती है।
उल्टी, छींक, डकार, वाहर (Fart), पिशाब, और टट्टी इन सब आवेगों को रोकने से चर्म रोग होने का खतरा रहता है।
शरीर पर लंबे समय तक धूल मिट्टी और पसीना जमें रहने से भी चर्म रोग हो सकता है।
और भोजन के बाद विपरीत प्रकृति का भोजन खाने से कोढ़ का रोग होता है। (उदाहरण – आम का रस और छाछ साथ पीना)।
अधिक कसे हुए कपड़े पहेनने पर और नाइलोन के वस्त्र पहनने पर भी चमड़ी के विकार ग्रस्त होने का खतरा होता है।
नहाने के साबुन में अधिक मात्रा में सोडा होने से भी यह रोग हो सकता है।
अधिकतर समय धूप में बिताने वाले लोगों को चर्म रोग होने का खतरा ज्यादा होता है।
किसी एंटीबायोटिक दवा के खाने से साइड एफेट्स होने पर भी त्वचा रोग हो सकता है।
महिलाओं में मासिक चक्र अनियमितता की समस्या हो जाने पर भी उन्हे चर्म रोग होने की संभावना अधिक बढ़ जाती है।
शरीर में ज़्यादा गैस जमा होने से खुश्की का रोग हो सकता है।
त्वचा रोग के लक्षण- 
दाद-खाज होने पर चमड़ी एकदम सूख जाती है, और उस जगह पर खुजलाने पर छोटे छोटे दाने निकल आते हैं। समान्यतः किसी भी प्रकार के चर्म रोग में जलन, खुजली और दर्द होने की शिकायत  रहती है। शरीर में तेजा गरमी इकट्ठा होने पर चमड़ी पर सफ़ेद या भूरे दाग दिखने लगते हैं या फोड़े और फुंसी निकल आते हैं और समय पर इसका उपचार ना होने पर इनमें पीप भी निकलनें लगता है।
त्वचा रोग होने पर भोजन में परहेज़-

* भोजन में अचार, नींबू, नमक, मिर्च, टमाटर तैली वस्तुएं, आदि चीज़ों का सेवन बिलकुल बंद कर देना चाहिए। (चर्म रोग में कोई भी खट्टी चीज़ खाने से रोग तेज़ी से पूरे शरीर में फ़ेल जाता है।)।
*अगर खाना पचने में परेशानी रहती हों, या पेट में गैस जमा होती हों तो उसका उपचार तुरंत करना चाहिए। और जब यह परेशानी ठीक हो जाए तब कुछ दिनों तक हल्का भोजन खाना चाहिए।
*बाजरे और ज्वार की रोटी बिलकुल ना खाएं। शरीर की शुद्धता का खास खयाल रक्खे।
त्वचा रोग हो जाने पर, समय पर सोना, समय पर उठना, रोज़ नहाना, और धूप की सीधी किरणों के संपर्क से दूर रहेना अत्यंत आवश्यक है।



*खराब पाचनतत्र वाले व्यक्ति को चर्म रोग होने के अधिक chances होते हैं।
*त्वचा की किसी भी प्रकार की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को हररोज़ रात को सोने से पूर्व एक गिलास हल्के गुनगुने गरम दूध में, एक चम्मच हल्दी मिला कर दूध पीना चाहिए।
*त्वचा रोग होने पर बीड़ी, सिगरेट, शराब, बीयर, खैनी, चाय, कॉफी, भांग, गांजा या अन्य किसी भी दूसरे नशीले पदार्थों का सेवन ना करें।
त्वचा रोग में  घरेलू उपचार- 
*पिसा हुआ पोदीना लेप बना कर चहेरे पर लगाया जाए और फिर थोड़ी देर के बाद चहेरे को ठंडे पानी से धो लिया जाए तो चहेरे की गरमी दूर हो जाती है, तथा स्किन चमकदार बनती है।

*अजवायन को पानी में उबाल कर जख्म धोने से उसमे आराम मिल जाता है।
गर्म पानी में पिसे हुए अजवायन मिला कर, उसका लेप दाद, खाज, खुजली, और फुंसी पर लगाने से फौरन आराम मिल जाता है।
*नमक मिले गर्म पानी से त्वचा को धोने या सेक करने से हाथ-पैर और ऐडियों की दरारें दूर होती हैं और दर्द में फौरन आराम मिल जाता है।
*गरम पानी में नमक मिला कर नहाने से सर्दी के मौसम में होने वाले त्वचा रोगों के सामने रक्षण मिलता है। और अगर रोग हो गए हों तो इस प्रयोग के करने से रोग समाप्त हो जाते हैं।
*नहाते समय नीम के पत्तों को पानी के साथ गरम कर के, फिर उस पानी को नहाने के पानी के साथ मिला कर नहाने से चर्म रोग से मुक्ति मिलती है।
*नीम की कोपलों (नए हरे पत्ते) को सुबह खाली पेट खाने से भी त्वचा रोग दूर हो जाते हैं।
त्वचा के घाव ठीक करने के लिए नीम के पत्तों का रस निकाल कर घाव पर लगा कर उस पर पट्टी बांध लेने से घाव मिट जाते हैं। (पट्टी समय समय पर बदलते रहना चाहिए)।
*मूली के पत्तों का रस त्वचा पर लगाने से किसी भी प्रकार के त्वचा रोग में राहत हो जाती है।
*प्रति दिन तिल और मूली खाने से त्वचा के भीतर जमा हुआ पानी सूख जाता है, और सूजन खत्म खत्म हो जाती है।
*मूली का गंधकीय तत्व त्वचा रोगों से मुक्ति दिलाता है।
*मूली में क्लोरीन और सोडियम तत्व होते है, यह दोनों तत्व पेट में मल जमने नहीं देते हैं और इस कारण गैस या अपचा नहीं होता है।
*मूली में मेग्नेशियम की मात्रा भी मौजूद होती है, यह तत्व पाचन क्रिया नियमन में सहायक होता है। जब पेट साफ होगा तो चमड़ी के रोग होने की नौबत ही नहीं होगी।
हर रोज़ मूली खाने से चहरे पर हुए दाग, धब्बे, झाईयां, और मुहासे ठीक हो जाते हैं।
*त्वचा रोग में सेब के रस को लगाने से उसमें राहत मिलती है। प्रति दिन एक या दो सेब खाने से चर्म रोग दूर हो जाते हैं। त्वचा का तैलीयपन दूर करने के लिए एक सेब को अच्छी तरह से पीस कर उसका लेप पूरे चहरे पर लगा कर दस मिनट के बाद चहरे को हल्के गरम पानी से धो लेने पर “तैलीय त्वचा” की परेशानी से मुक्ति मिलती है।
*सूखी चमड़ी की शिकायत रहती हों तो सरसों के तैल में हल्दी मिश्रित कर के उससे त्वचा पर हल्की मालिश करने से त्वचा का सूखापन दूर हो जाता है।
*हल्दी को पीस कर तिल के तैल में मिला कर उससे शरीर पर मालिश करने से चर्म रोग जड़ से खत्म होते हैं।
*चेहरे के काले दाग और धब्बे दूर करने के लिए हल्दी की गांठों को शुद्ध जल में घिस कर, उस के लेप को, चेहरे पर लगाने से दाग-धब्बे दूर हो जाते हैं।
*करेले के फल का रस पीने से शरीर का खून शुद्ध होता है। दिन में सुबह के समय बिना कुछ खाये खाली पेट एक ग्राम का चौथा भाग “करेले के फल का रस” पीने से त्वचा रोग दूर होते हैं।
*दाद, खाज और खुजली जैसे रोग, दूर करने के लिए त्वचा पर करेले का रस लगाना चाहिए।
*रुई के फाये से गाजर का रस थोड़ा थोड़ा कर के चहेरे और गरदन पर लगा कर उसके सूखने के बाद ठंडे पानी से चहेरे को धो लेने से स्किन साफ और चमकीली बन जाती है।
*प्रति दिन सुबह एक कप गाजर का रस पीने से हर प्रकार के त्वचा रोग दूर होते हैं। सर्दियों में त्वचा सूखने की समस्या कई लोगों को होती है, गाजर में विटामिन A भरपूर मात्रा में होता है, इस लिए रोज़ गाजर खाने से त्वचा का सूखापन दूर होता है।
*पालक और गाजर का रस समान मात्रा में मिला कर उसमें दो चम्मच शहद मिला कर पीने से, सभी प्रकार के चर्म रोग नाश होते हैं।
*गाजर का रस संक्रमण दूर करने वाला और किटाणु नाशक होता है, गाजर खून को भी साफ करता है, इस लिए रोज़ गाजर खाने वाले व्यक्ति को फोड़े फुंसी, मुहासे और अन्य चर्म रोग नहीं होते हैं।
*काली मिट्टी में थोड़ा सा शहद मिला कर फोड़े और फुंसी वाली जगह पर लगाया जाए तो तुरंत राहत हो जाती है।
*फुंसी पर खाज,शहद लगाने से फौरन राहत हो जाती है।
*शहद में पानी मिला कर पीने से फोड़े, फुंसी, और हल्के दाग दूर हो जाते हैं।
*सेंधा नमक, दूध, हरड़, चकबड़ और वन तुलसी को समान मात्रा में ले कर, कांजी के साथ मिला कर पीस लें। तैयार किए हुए इस चूर्ण को दाद, खाज और खुजली वाली जगहों पर लगा लेने से फौरन आराम मिल जाता है।
*हरड़ और चकबड़ को कांजी के साथ कूट कर, तैयार किए हुए लेप को दाद पर लगाने से दाद फौरन मीट जाता है।
*पीपल की छाल का चूर्ण लगा नें पर मवाद निकलने वाला फोड़ा ठीक हो जाता है। चार से पाँच पीपल की कोपलों को नित्य सुबह में खाने से एक्ज़िमा रोग दूर हो जाता है। (यह प्रयोग सात दिन तक लगातार करना चाहिए)।



*नीम की छाल, सहजन की छाल, पुरानी खल, पीपल, हरड़ और सरसों को समान मात्रा में मिला कर उन्हे पीस कर उसका चूर्ण बना लें। और फिर इस चूर्ण को गौमूत्र में मिश्रित कर के त्वचा पर लगाने से समस्त प्रकार के जटिल त्वचा रोग दूर हो जाते हैं।
*अरण्डी, सौंठ, रास्ना, बालछड़, देवदारु, और बिजौरे की छड़ इन सभी को बीस-बीस ग्राम ले कर एक साथ पीस लें। उसके बाद इन्हे पानी में मिला कर लेप तैयार कर लें और फिर उस लेप को त्वचा पर लगा लें। इस प्रयोग से समस्त प्रकार के चर्म रोग दूर हो जाते हैं।
*खीरा खाने से चमड़ी के रोग में राहत मिलती है। ककड़ी के रस को चमड़ी पर लगाने से त्वचा से मैल दूर होता है, और चेहरा glow करता है। ककड़ी का रस पीने से भी शरीर को लाभ होता है।
*प्याज को आग में भून कर फोड़ों और फुंसियों और गाठों पर बांध देने से वह तुरंत फुट जाती हैं। अगर उनमें मवाद भरा हों तो वह भी बाहर आ निकलता है। हर प्रकार की जलन, सूजन और दर्द इस प्रयोग से ठीक हो जाता है। इस प्रयोग से infection का जख्म भी ठीक हो जाता है। प्याच को कच्चा या पक्का खाने से त्वचा में निखार आता है।
*प्रति दिन प्याज खाने वाले व्यक्ति को लू (Heat stroke) कभी नहीं लगती है।
*पोदीने और हल्दी का रस समान मात्रा में मिश्रित कर के दाद खाज खुजली वाली जगहों पर लगाया जाए तो फौरन राहत मिल जाती है।
*खाज और खुजली की समस्या में ताज़ा सुबह का गौमूत्र त्वचा पर लगाने से आराम मिलता है।
*जहां भी फोड़े और फुंसी हुए हों, वहाँ पर लहसुन का रस लगाने से फौरन आराम मिल जाता है।
*लहसुन और सूरजमुखी को एक साथ पीस कर पोटली बना कर गले की गांठ पर (कण्ठमाला की गील्टियों पर) बांध देने से लाभ मिलता है।
*सरसों के तेल में लहसुन की कुछ कलीयों को डाल कर उसे गर्म कर के, (हल्का गर्म) उसे त्वचा पर लगाया जाए तो खुजली और खाज की समस्या दूर हो जाती है।
एक्जिमा रोग से पीड़ित व्यक्ति का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-
एक्जिमा रोग को ठीक करने के लिए नाड़ी शोधन, भस्त्रिका, प्राणायाम क्रिया करना भी लाभदायक है। लेकिन इस क्रिया को करने के साथ-साथ रोगी व्यक्ति को प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार भी करना चाहिए तभी एक्जिमा रोग पूरी तरह से ठीक हो सकता है।
एक्जिमा रोग से पीड़ित रोगी को प्राकृतिक चिकित्सा से इलाज कराने के साथ-साथ कुछ खाने पीने की चीजों जैसे- चाय, कॉफी तथा उत्तेजक पदार्थों का परहेज भी करना चाहिए तभी यह रोग पूरी तरह से ठीक हो सकता है।
*एक्जिमा रोग को ठीक करने के लिए हरे रंग की बोतल के सर्यूतप्त नारियल के तेल से पूरे शरीर की मालिश करनी चाहिए और धूप में बैठकर या लेटकर शरीर की सिंकाई करनी चाहिए। इससे एक्जिमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*इस रोग से पीड़ित रोगी को आसमानी रंग की बोतल का सूर्यतप्त जल 28 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन कम से कम 8 बार पीना चाहिए तथा रोगग्रस्त भाग पर हरे रंग का प्रकाश कम से कम 25 मिनट तक डालना चाहिए। इस प्रकार से कुछ दिनों तक उपचार करने से एक्जिमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*औषधियों के द्वारा एक्जिमा रोग का कोई स्थायी इलाज नहीं हैं, लेकिन प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा एक्जिमा रोग पूरी तरह से ठीक हो सकता है।
*एक्जिमा रोग में सबसे पहले रोगी व्यक्ति को गाजर का रस, सब्जी का सूप, पालक का रस तथा अन्य रसाहार या पानी पीकर 3-10 दिन तक उपवास रखना चाहिए। फिर इसके बाद 15 दिनों तक फलों का सेवन करना चाहिए और इसके बाद 2 सप्ताह तक साधारण भोजन करना चाहिए। इस प्रकार से भोजन का सेवन करने की क्रिया उस समय तक दोहराते रहना चाहिए जब तक कि एक्जिमा रोग पूरी तरह से ठीक न हो जाए।
*इस रोग से पीड़ित रोगी को फल, हरी सब्जी तथा सलाद पर्याप्त मात्रा में सेवन करना चाहिए तथा 2-3 लीटर पानी प्रतिदिन पीना चाहिए।
*एक्जिमा रोग से पीड़ित रोगी को नमक, चीनी, चाय, कॉफी, साफ्ट-ड्रिंक, शराब आदि पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
*प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार एक्जिमा रोग से पीड़ित रोगी को शाम के समय में लगभग 15 मिनट तक कटिस्नान करना चाहिए। इसके बाद पीड़ित रोगी को नीम की पत्ती के उबाले हुए पानी से स्नान करना चाहिए। इस पानी से रोगी को एनिमा क्रिया भी करनी चाहिए जिससे एक्जिमा रोग ठीक होने लगता है।



*प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार सूत्रनेति, कुंजल तथा जलनेति करना भी ज्यादा लाभदायक है। इन क्रियाओं को करने के फलस्वरूप एक्जिमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में उपचार करने के साथ-साथ हलासन, मत्स्यासन, धनुरासन, मण्डूकासन, पश्चिमोत्तानासन तथा जानुशीर्षसन क्रिया करनी चाहिए। इससे उसका एक्जिमा रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
*सुबह के समय में रोगी व्यक्ति को खुली हवा में धूप लेकर शरीर की सिंकाई करनी चाहिए तथा शरीर के एक्जिमा ग्रस्त भाग पर कम से कम 2-3 बार स्थानीय मिट्टी की पट्टी का लेप करना चाहिए। जब रोगी के रोग ग्रस्त भाग पर अधिक तनाव या दर्द हो रहा हो तो उस भाग पर भाप तथा गर्म-ठंडा सेंक करना चाहिए।
*प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार एक्जिमा रोग से पीड़ित रोगी को सप्ताह में 1-2 दिन भापस्नान तथा गीली चादर लपेट स्नान करना चाहिए। स्नान करने के बाद रोगग्रस्त भाग की कपूर को नारियल के तेल में मिलाकर मालिश करनी चाहिए या फिर सूर्य की किरणों के द्वारा तैयार हरा तेल लगाना चाहिए। रोगी व्यक्ति को इस उपचार के साथ-साथ सूर्यतप्त हरी बोतल का पानी भी पीना चाहिए।
*नीम की पत्तियों को पीसकर फिर पानी में मिलाकर सुबह के समय में खाली पेट पीना चाहिए जिसके फलस्वरूप एक्जिमा रोग धीरे-धीरे ठीक होने लगता है।
चरम रोग नुस्खे -
*गर्मी की घमौरियों पर बर्फ का टुकड़ा मलने से घमौरियां मुरझा जाती है और राहत मिलती है.
-तुलसी का अर्क लगाने से सभी तरह के चरम रोग चले जाते है .
- लहसुन पिस क्र उसमे पानी मिलकर लगाने से भी ठीक होता है .
-हाथ पाँव में जलन की शिकायत होने पर सौंफ के साथ बराबर मात्रा में धनिया व मिश्री मिलाकर पीस कर छान ले. खाना खाने के बाद 5-6 ग्राम की मात्रा में यह चूर्ण लेने से राहत मिलती है.
-नीम की पत्तियों को पीसकर हाथ पेरों पर लेप करने से जलन शांत होती है.
-चर्म रोगों में फिटकरी बड़ी गुणकारी होती है. जिस स्थान पर चर्म रोग हुआ हो उस स्थान को बार -बार फिटकरी के पानी से धोने से लाभ होता है.
-बादाम का तेल चहरे पर विशेषकर आँखों के आसपास मलने से झुर्रियां नहीं पड़ती.
-जड़ सहित तुलसी का हरा भरा पौधा लेकर धो लें, इसे पीसकर इसका रस निकालें। आधा लीटर पानी- आधा लीटर तेल डालकर हल्की
20 ग्राम शहद ठंडे पानी में मिलाकर चार पांच महीने तक रोज सुबह पीवे |
-प्रतिदिन 10 ग्राम सौंफ बिना मीठा मिलाये वैसे ही चबा -चबा कर नियमित कुछ दिनों तक खाने से रक्त शुद्ध होता है और त्वचा का रंग साफ़ होता है.
-गर्मी के दिनों में नींबू का शरबत पीये. इससे खून साफ़ होता है और ठंडक भी मिलती है.
-नीम के पत्ते डाल कर उबाले गए पानी से स्नान करने से चर्म रोग मिटते है.
-दाद, खाज, फुंसी, फोड़े इत्यादि चर्म रोगों में ताजे संतरे के छिलके पीस कर लगाने से लाभ होता है.
-सर्दी के दिनों में तिल का शुद्ध तेल शरीर पर मलने से शरीर में गर्मी आती है. रक्त की गति तीव्र होती है और त्वचा का रूखापन भी समाप्त होता है.

Friday, January 20, 2017

प्रसव पीड़ा का सामना कैसे करें?: How to deal with labor pains?


  आप नौ महीने तक इस कीमती पल का इंतज़ार करते हैं। और यदि आपकी निर्धारित तारीख आने वाली है तो आप और भी अधिक अधीर हो जाते हालाँकि इस स्थिति से आप आसानी से और धैर्य से निपट सकते हैं। कभी कभी गर्भवती महिला अस्पताल पहुँचने से पहले प्रसव पीड़ा प्रेरित करने के लिए कई घरेलू उपचार लेती है।
    अगर आपको पता हो कि प्रसव के दौरान अपनी मदद के लिए आप क्या कर सकती हैं, तो यह आपके प्रसव अनुभव को सकारात्मक बनाने में मददगार हो सकता है। नीचे दी गईं हमारी तकनीकें भी आपको प्रसव पीड़ा का सामना करने में मदद करेंगी।
प्रसव का अनुभव दर्दभरा होता है। मगर, इस अनुभव को थोड़ा आसान बनाने के लिए आप काफी कुछ कर सकती हैं। देखें कि आप इस स्थिति में खुद को यथासंभव सहज कैसे रख सकती हैं, ताकि आप हर संकुचन का पूरा फायदा उठा सकें और अपने प्रसव को और आगे बढ़ा सकें।
*प्रसव के साथी
प्रसव के दौरान अपने साथ ऐसे व्यक्ति को रखें जिन पर आप स्नेह और विश्वास रखती हैं। यह व्यक्ति आपके पति, माँ या सास हो सकती हैं। ये आपकी हिम्मत को बढ़ा सकते हैं और आपको सहयोग कर सकते हैं। ये आपकी बात को डॉक्टर या नर्स तक पहुंचाने का काम भी कर सकते हैं।

*सही मुद्रा चुनें
आप प्रसव के दौरान किस मुद्रा में हैं, इससे आपको होने वाले दर्द और प्रसव की अवधि पर काफी असर पड़ता है। माना जाता है कि सीधे खड़े रहने से प्रसव में तेजी आती है और गुरुत्वाकर्षण बल आपके शिशु के जन्म को और आसान बनाता है। पीठ के बल लेटे रहने से आपका रक्त प्रवाह सीमित हो जाता है और आपके शिशु का जन्म हो पाना मुश्किल बना देता है। यह आपके पीठ के दर्द को भी और बढ़ा सकता है।
इसलिए, अगर आप बिस्तर पर हैं, तो अपनी पीठ के पीछे तकिये लगा लें, ताकि आप बैठी हुई स्थिति में आ जाएं। अगर, आपकी डॉक्टर अनुमति दें, तो आप खड़े होने या पलंग या दीवार को पकड़कर आगे की तुरफ झुकने का प्रयास कर सकती हैं।
*संकुचनों के बीच चहलकदमी
यह साबित हो चुका है कि संकुचनों के बीच चहलकदमी करना, आपके प्रसव की समयावधि घटा देता है। अपने पति या माँ को अपने साथ चलने के लिए कहें, ताकि आप संकुचन के दौरान उनका सहारा ले सकें।
*जीरे की चाय पियें: 

जीरे का उपयोग पाचन सम्बन्धी परेशानियों के लिए किया जा सकता है और यह मासिकधर्म की शुरुआत कराने और गैस में राहत दिलाने के लिए भी उपयोग किया जा सकता है |जीरे की एक कप चाय का उपयोग करते हुए प्रसव लायें |
चाय की कडवाहट को दूर करने के लिए थोड़ी चीनी या शहद मिलाएं |
*निप्पल को उत्तेजित करना-
यदि आप बिना किसी जटिलताओं के एक सुरक्षित और आरामदायक गर्भावस्था से गुज़र रहे हैं तो प्रसव पीड़ा को प्रेरित करने का यह एक उत्तम तरीका है। निप्पल को उत्तेजित करना बहुत आसान है तथा तथा इसके कारण प्रसव पीड़ा प्रेरित होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है क्योंकि इसके कारण ऑक्सीटोसिन नामक हार्मोन का स्त्राव होता है जिसके कारण गर्भाशय में संकुचन होता है। यदि आप 40 सप्ताह से अधिक समय से गर्भवती हैं तो यह पद्धति काफी प्रभावी होती है। आपको इसे दिन में तीन बार एक एक घंटे करना होगा। परंतु ध्यान रहे कि इसे हल्के हाथों से करें। असके अलावा ऐसी गर्भावस्था जिसमें अधिक खतरा हो जैसे गर्भावस्था में मधुमेह, प्रीक्लाम्पसिया या उच्च रक्तदाब आदि

*प्रसव के दौरान श्वसन व्यायाम-
लयबद्ध तरीके से सांस लेने से आपको ऊर्जा संरक्षण में मदद कर सकता है। यह ऊर्जा आपको प्रसव से बेहतर तरीके से निपटने में मदद कर सकती हैं। इससे आपके शिशु को भी पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती है, ताकि वह भी जन्म के तनाव का सामना बेहतर ढंग से कर सके।
*मुलहटी खाएं: 
काली मुलहटी (ब्लैक लिकोरिस) के बारे में कहा जाता है कि यह प्रसव को प्रेरित करती है | प्राकृतिक मुलहटी का उपयोग करें जिसमे शर्करा कम मात्रा में पाई जाती है | आप इसे पिल्स के रूप में भी ले सकती हैं | मुलहटी अपने लेक्सेटिव (laxative) प्रभाव के द्वारा आँतों में ऐंठन उत्पन्न कर सकती है | आँतों की ऐंठन से गर्भाशय की ऐंठन को प्रेरित करने में मदद मिल सकती है
*आरामदायक स्नान करें- 

गरम पानी से नहायें और आपकी प्रसव पीड़ा प्रारंभ हो जायेगी। आपकी भावनात्मक स्थिति भी आपके गर्भाशय में संकुचन उत्पन्न करने में सहायक होती है। सावधान रहें, पानी बहुत ज़्यादा गरम न हो क्योंकि इसके कारण आपके बच्चे को तनाव हो सकता है क्योंकि वह आपके शरीर के अंदर हैं जहाँ पहले से ही तापमान अधिक होता है। नहाने के इस पानी में आप लैवेंडर तेल की 1-2 बूंदे भी डाल सकते हैं इससे आपके शरीर को भी आराम मिलेगा तथा आपका मूड भी अच्छा हो जाएगा
*प्रसव के दौरान खान-पान-
कई महिलाओं को प्रसव के दौरान भूख व प्यास लगती है। ऐसा होना संभव है, क्योंकि अगर यह आपका पहला बच्चा है, तो आपका प्रसव लंबा चल सकता है। ऐसे भोजन खाएं, जो आपको लंबे समय के लिए ऊर्जा प्रदान करें, जैसे कि केले या एनर्जी बार। जितनी बार आपको प्यास लगे, आप पानी पीएं।
*अनानास-
अनानास भी प्रसव पीड़ा को उत्तेजित करने में सहायक है क्योंकि इसमें ब्रोमेलैन नामक एंजाइम होता है जो गर्भाशय को नरम करता है और उसे पकता है। यदि आपकी गर्भावस्था के 40 महीने पूरे हो चुके हैं तो आप ताज़े अनानास खाकर भी स्वयं की सहायता कर सकते हैं। परंतु आपको सावधान रहने की आवश्यकता है क्योंकि इसे अधिक मात्रा में खाने से डायरिया हो सकता है और निश्चित रूप से जब आप प्रसव पीड़ा से गुज़र रहे हों तब आप यह नहीं चाहेंगे कि आपका पेट ख़राब हो। अनानास का जूस न पीयें क्योंकि जूस में ब्रोमेलैन नामक तत्व समाप्त हो जाता है।
*प्रसव के दौरान आराम-
प्रसव के दौरान आराम करना वास्तव में आसान नहीं है, मगर ऐसी कई तकनीक हैं जो आपकी इस काम में मदद कर सकती हैं। आराम करने से आप अपनी ऊर्जा का संरक्षण कर सकती हैं, ताकि आपको अपने संकुचन मजबूत करने या शिशु को जन्म देने में व्यवधान की जरुरत न पड़े|
*मसालेदार खाना खाएं-
अधिकाँश महिलाएं मसालेदार खाना खाना पसंद करती हैं विशेष रूप से गर्भावस्था के दौरान क्योंकि उनकी स्वादेन्द्रियाँ मसालेदार और स्वादिष्ट खाने की मांग करती हैं। अत: मसालेदार खाना भी प्रसव पीड़ा को उत्तेजित करता है। हालाँकि यह पूर्ण रूप से सिद्ध नहीं हुआ है। प्रसव पीड़ा को उत्तेजित करने में लहसुन एक बड़ी भूमिका निभाता है। यह आपके मल निष्कासन को उत्तेजित करता है तथा परिणामस्वरूप आपका मल पतला हो जाता है। इससे आपका गर्भाशय उत्तेजित हो जाता है तथा परिणामस्वरूप गर्भाशय में संकुचन प्रारंभ हो जाता है। इसके अलावा इसके द्वारा बच्चे को नीचे की ओर आने में सहायता मिलती है। इससे आपके बच्चे को बाहर आने में सहायता मिलती है।

*प्रसव के दौरान मालिश-
प्रसव के दौरान मालिश आपको आराम दे सकती है, क्योंकि इससे आपके शरीर में अच्छा महसूस करने वाले हॉर्मोन पैदा होते हैं। ये हॉर्मोन आपको आराम करने में मदद करेंगे। हालांकि, सभी महिलाओं को प्रसव के दौरान मालिश करना पसंद नहीं आता है। अपने प्रसव के सहयोगी को बताएं कि आप क्या चाहती हैं।
*कैस्टर ऑइल (एरंड का तेल)-
एरंड का तेल बहुत अधिक रेचक है तथा कुछ मामलों में यह प्रसव पीड़ा को उत्तेजित कर सकता है। अपने डॉक्टर से सलाह लेने के बाद ही इसकी कुछ मात्रा (114 मिली.) संतरे के रस में मिलकर लें। एरंड के तेल की चिकनाई पेट को उत्तेजित करती है जिसके कर्ण आपका मल पतला हो जाता है जिसके कारण गर्भाशय में संकुचन आना प्रारंभ हो जाते हैं। याद रखें इसकी थोड़ी मात्रा लेने से भी आपको मितली आ सकती है। आप प्रसव पीड़ा उत्तेजित करने के लिए पूर्ण रूप से इस पद्धति पर निर्भर नहीं रह सकते क्योंकि कभी कभी इसका उपयोग कोई असर नहीं करता। एरंड का तेल केवल पेट ख़राब करता है। इसके कारण मां या बच्चे को कोई नुकसान नहीं पहुंचता।

Thursday, January 19, 2017

तुलसी से करें मधुमेह का पक्का इलाज

  

 मधुमेह के साथ लोगों को हर दिन स्वास्थ्य समस्याओं के साथ सौदा करना पड़ता है. मधुमेह खराब खान-पान और अनियंत्रित आदतों की वजह से बढ़ जाता है. मधुमेह का कोई ऐसा इलाज नहीं है जिससे उससे पूरी तरह से खत्म किया जा सके इसलिए लोग अक्सर उसे अनुपचारित छोड़ देते है. यह अंधापन, गुर्दे की बीमारी, रक्त वाहिनियों को नुकसान, संक्रमण, हृदय रोग, तंत्रिका क्षति, उच्च रक्तचाप, स्ट्रोक, अंग विच्छेदन और कोमा आदि बीमारियों को पैदा कर सकता है. वैसे तो बाजार में मधुमेह का इलाज इन्सुलिन और मेडिसिन्स द्वारा उपलब्ध है
   लेकिन  हम आपको कुछ ऐसे देसी इलाज बताएंगे जो आप घर बैठे कर सकते है.



*प्राकृतिक कच्चा भोजन सभी प्रकार के रोगों के लिए सबसे अच्छी दवा है. कच्चा भोजन शरीर के एंजाइमों में मिल जाता है. ऐसे खाद्य पदार्थ जिन्हें कच्चा खाया जा सकता है उन्हें कच्चा भोजन बोलते है जैसे की स्प्राउट्स, फल, जूस, नट आदि.
*ऐसा आहार जो सब्जियों और फलों का एक परफेक्ट मिक्स हो जिसमें सभी विटामिन्स और मिनरल्स हो जोकि शरीर के लिए एंटीऑक्सीडेंट के रूप में शरीर को अनचाहे रोगों से बचाए और ब्लड शुगर के हाई लेवल को कम करके शुगर को संतुलन में रखे.
*ऐसा कच्चा भोजन जिनमें फाइबर अधिक अधिक होता यही वो धीरे-धीरे शुगर लेवल को शरीर से खींच लेते है और इससे शरीर में ब्लड शुगर का लेवल संतुलित रहता है. फाइबर ब्लड शुगर के लेवल को स्थिर रखने का सबसे अच्छा काम करता है. सेब, खुमानी, चुकंदर, जामुन, गाजर, खट्टे फल आदि फाइबर से भरपूर होते है.
*तुलसी के पत्तों में ब्लड शुगर के स्तर को कम करने की शक्ति है. तुलसी के पत्तों में शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट होता है जो की ब्लड शुगर को कंट्रोल करके एक्स्ट्रा शुगर कंटेंट को शरीर से निकलने में मदद करता है.





स्त्रियों के प्रमुख योन रोग, कारण,लक्षण,और उपचार: Main women sexual diseases, causes, symptoms, and treatment

    अधिकांश महिला व पुरुष ऐसे होते हैं, जो संक्रमण के कारण इन रोगों की चपेट में आते हैं। सर्दियों की शुरुआत से ही ऐसे मरीजों की संख्या अचानक से बढ़ जाती है। सर्दियों में लोग शरीर की सफाई ठीक से नहीं रखते। कपड़े कई दिनों तक नहीं बदले जाते हैं। लोग नहाने से परहेज करते हैं। नहाने से परहेज करने और कपड़ों के लगातार न बदलने के कारण संक्रमण से फैलने वाले गुप्त रोगों की संभावना बढ़ जाती है।सर्दियों में शरीर की सफाई न रखने और नहाने से परहेज करने के कारण लोगों में गुप्त रोग की संभावना बढ़ जाती हैं।



स्त्रियों के गुप्त रोगों की चिकित्सा
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सफेद कपड़ा, लाल कपड़ा प्रतिमास दो-चार बार होना, पेट में तकलीफ होना तथा कमर में दर्द बढ़ जाना आदि के उपचार में कच्चा पुदीना एक कट्टा लेकर दो गिलास पानी में उबालकर एक कप जूस में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर सुबह (निराहार) एक बार और रात में सोते समय दूसरी बार पी लेना चाहिए। इस प्रकार 40 दिनों तक करते रहें। पथ्य में अचार, बैंगन, मुर्गी, अंडे तथा मछली आदि का प्रयोग न करें।
मासिक धर्म का रुक जाना-
:तीन-तीन महीने तक मासिक धर्म का न होना तथा पेट में पीड़ा होना आदि के लिए एक कप गर्म पानी में आधा चम्मच कलौंजी का तेल और दो चम्मच शहद मिलाकर सुबह निराहार पेट रात में भोजनोपरांत सोते समय पी लेना चाहिए। इस प्रकार सेवन एक महीने तक करते रहें। आलू तथा बैंगन वर्जित हैं।
पेशाब में जलन-
मूत्र नलियों में रक्त संचार सुचारू रूप से न होना और पेशाब से रक्त का जाना आदि में एक कप मौसम्मी का जूस लेकर उसमें आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर उसका सेवन करें। सुबह एक बार और दूसरी बार रात में सोने से पूर्व। दस दिन तक इस इलाज को जारी रखिए। खाने में गर्मी पैदा करने वाली वस्तुएं, मिर्च और खट्टी वस्तुओं का उपयोग कम करना चाहिए।
बवासीर का मस्सा-
एक चम्मच सिरके में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में दो बार मस्से की जगह पर लगाएं।
*तेल चुपड़ी रोटी शनिवार को कुत्ते को खिलाएं।
*एक कटोरी केसर पानी में घोलकर मरीज के कमरे में रख दें।
क्या सावधानी रखें गुप्त रोग होने पर-
* नहाने से परहेज न करें।



*प्रतिदिन अंत: वस्त्र व अन्य कपड़ों को बदलें।

*शौच के बाद शरीर के अंदरुनी अंगों को ठीक से साफ करें।
*पूर्व में संक्रमण से पीड़ित या एलर्जी वाले लोगों को अधिक सतर्क होने की है जरूरत।
*किसी भी प्रकार की समस्या होने पर उसे छुपाने की बजाय चिकित्सक से संपर्क करें।
खुजली के लिए आयुर्वेदिक उपचार-
जब त्वचा की सतह पर जलन का एहसास होता है और त्वचा को खरोंचने का मन करता है तो उस बोध को खुजली कहते हैं। खुजली के कई कारण होते हैं जैसे कि तनाव और चिंता, शुष्क त्वचा, अधिक समय तक धूप में रहना, औषधि की विपरीत प्रतिक्रिया, मच्छर या किसी और जंतु का दंश, फंफुदीय संक्रमण, अवैध यौन संबंध के कारण, संक्रमित रोग की वजह से, या त्वचा पर फुंसियाँ, सिर या शरीर के अन्य हिस्सों में जुओं की मौजूदगी इत्यादि से।
*खुजली वाली जगह पर चन्दन का तेल लगाने से काफी राहत मिलती है।
*दशांग लेप, जो आयुर्वेद की 10 जड़ी बूटियों से तैयार किया गया है, खुजली से काफी हद तक आराम दिलाता है।

डेंगू बुखार से न घबराएँ, करें ये उपाय



  डेंगू बुखार मच्छरों द्वारा फैलाई जाने वाली बीमारी है. एडीज मच्छर (प्रजाति) के काटने से डेंगू वायरस फैलता है. बुखार के दौरान प्लेटलेट्स कम होना इसका मुख्य लक्षण हैं. यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलता. बुखार के साथ सबसे सामान्य लक्षण है सिरदर्द, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द और त्वचा का खराब हो जाना|
1)बुखार होने पर रोगी को लगातार पानी पिलाते रहें|,अगर सादा पानी ना पीया जाए तो नारियल पानी,शिकंजी,शरबत आदि पीते रहे,सबसे अधिक प्रयास बुखार उतारने का करें |पानी की पट्टियां बदते रहें|
2)अगर डेंगू का टेस्ट पोसिटिव भी आया है तो घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है |अगर लगातार पानी पीया जा रहा है और रोगी दो तीन घंटे में पेशाब कर रहा है तो तनिक भी घबराने की आवश्यकता नहीं है| बिना दवा के भी ,,डेंगू और अन्य वाइरल बुखार एक से डेढ़ हफ्ते में ठीक हो जाते है बशर्ते रोगी लगातार पानी पीता रहे |
3) डेंगू में आम तौर पर खतरनाक स्थिति तब नहीं बनती जब तक रोगी को बुखार रहता है| असली ख़तरा बुखार उतरने के बाद बढ़ता है जब रोगी लापरवाही से शारीरिक श्रम करने लगता है|सावधानी रखें ,पूर्ण विश्राम करें और पानी लगातार पीते रहे अगर बुखार के बाद रोगी उठने तक में असमर्थ अनुभव कर रहा है जोड़ों में भयानक दर्द अनुभव कर रहा है तो फिर तुरंत चिकित्सक से सलाह लें |



4)अगर उच्च और निम्न रक्तचाप में 40 से अधिक का अंतर आये ,लगातार पेट में दर्द बना रहे ,शरीर पर लाल चकत्ते बन रहे हो तब चिकित्सक से अवश्य परामर्श करें,लेकिन उस अवस्था में भी अगर रोगी लगातार पानी पी रहा है और घंटे दो घंटे में पेशाब करने जा रहा है तो घबराने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है|

5) गिलोय का आयुर्वेद में बहुत महत्व है. यह मेटाबॉलिक रेट बढ़ाने, प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत रखने और बॉडी को इंफेक्शन से बचाने में मदद करती है. गिलोय की बेल का लगभग 8 इंच का टुकडा एक गिलास पानी में उबाले ,आधा रहने पर रोगी को पिलायें अगर पीने में असुविधा हो रही हो तो उसे शरबत में मिला कर पिला दें इसमें तुलसी के पत्ते भी डाले जा सकते हैं|,लाभ अवश्य होगा|
6)एक बात जान लें कि डेंगू की कोई वेक्सीन नहीं बनी है इसलिए किसी लालची डॉ के पास धन और समय की बर्बादी ना करें |अगर बुखार उतारने के लिए कोई अंगरेजी दवा लेनी ही हो तो केवल पेरासीटामोल ही लें ,अन्य कोई भी दवा किसी भी हालत में ना लें|
7)यदि किसी को डेगूँ या साधारण बुखार के कारण प्लेटलेट्स कम हो गयी है तो एक होम्योपैथिक दवा है-
यूपेटर पर्फ़ 3x
   इस दवा की डायलुशन की 3 या 4 बूँदें प्रत्येक 2-2 घँटें में साधारण पानी में ड़ाल कर मात्र 2 दिन पिलायें । प्लेटलेट्स कम नहीं होगीं।








Wednesday, January 18, 2017

Homoeopathic Leucoderma Treatment – सफेद दाग का इलाज


सफेद दाग के कारण
यह रोग त्वचा द्वार ‘मिलेनिन’ नामक पदार्थ (जो कि त्वचा का रंग निर्धारित करता है) का बनना बंद हो जाने के कारण होता है, लेकिन त्वचा ग्रंथियों एवं कोशिकाओं में ऐसी कौन-सी खराबी आ जाती है कि मिलेनिन का बनना रुक जाता है, यह अभी तक अबूझ पहेली ही है। यह अण्डाकार अथवा छितरे हए धब्बों के रूप में शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है। इसमें किसी प्रकार की खुजली अथवा अन्य कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। अब    वैज्ञानिक यह मानने लगे हैं कि संभवतया मानसिक दबाव के साथ-साथ थायराइड ग्रंथि से संबंधित बीमारियों में शरीर के ऊतकों में किसी वजह से कठोरता एवं सिकुड़ाव आ जाने के कारण,गंजापन होने के कारण एवं खून की कमी होने पर सफेद दाग के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। सिफिलिस रोग की वजह से भी सफेद दाग बन सकता है।
सफेद दाग का होमियोपैथिक इलाज



वैसे, व्यक्ति के हाव-भाव, आचार-विचार, पूर्व इतिहास, खान-पान आदि को देखते हुए समान लक्षणों के आधार पर कोई भी दवा दी जा सकती है, किन्तु निम्न दवाएं उपयोगी हैं- 
‘एल्युमिना’,
 ‘आर्सेनिक एल्बम’,
 ‘नेट्रमम्यूर’,
 ‘सीपिया’,
 ‘साइलेशिया’,
 ‘सल्फर’,
 ‘कैल्केरिया कार्ब’,
 ‘काबोंएनीमेलिस’,
 ‘मरक्यूरियस’,
 ‘एसिडफास’, 
‘माइका’,
 ‘हाइड्रोकोटाइल’, 
‘क्यूप्रम आर्स’,
 ‘कालमेघ
 ‘चेलीडोनियम’।
    सम्पूर्ण बातें रोगी से जानने के बाद एक व्यवस्थित मानसिक एवं शारीरिक आधार पर खोजी गई दवा अत्यन्त उपयोगी है, जिसे होमियोपैथी की भाषा में कान्सटीट्यूशनल रेमेडी कहते हैं। फिर बीमारी के कारणों के आधार पर दवा देते हैं, 
जैसे किसी रोग में ताम्र धातु का अभाव परिलक्षित होने पर ‘क्यूप्रम आर्स’ 3 × दवा, यकृत संबंधी परेशानियों के साथ सफेद दाग होने पर ‘कालमेघ’, ‘चेलीडोनियम’ दवाओं का अर्क,
 पेट की गड़बड़ी के साथ सफेद दाग होने पर ‘वेरवोनिया’ दवा का अर्क एवं ‘क्यूप्रम आक्स नाइग्रम’ दवा,
 सिफिलिस रोग होने पर ‘सिफिलाइनम’ नामक दवा दी जा सकती है।
त्वचा मोटी एवं पपड़ीदार होने पर ‘हाइड्रोकोटाइल’ दवा का अर्क अत्यंत कारगर है। बेचैनी, रात में डर, ठंड लगना, जाड़े में अधिकतर परेशानियों का बढ़ना, जल्दी-जल्दी ठंड का असर पड़ना, खुली हवा में घूमने से परेशानी बढ़ना, बहुत कमजोरी एवं हर वक्त लेटे रहने की इच्छा, सीधी करवट लेटने पर अन्य सभी परेशानियों का बढ़ जाना, जलन, सूखी त्वचा खुजलाने पर जलन बढ़ जाना, घुटने में पीड़ा, छाती में सुइयों की चुभन एवं सांस लेन में तकलीफ होने पर ‘आर्ससल्फफ्लेवम’ 3 × अत्यधिक कारगर पाई गई है। 
लगभग 6 माह से लेकर तीन वर्ष तक लगातार दवा के सेवन से यह रोग पूर्णरूपेण ठीक हो जाता है।
 रात में परेशानियों का बढ़ जाना एवं शरीर में जगह-जगह घाव होने पर ‘सिफिलाइनम’ भी दी जा सकती है।‘माइक-30′ नामक दवा भी सफेद दाग के रोगियों में अत्यंत कारगर पाई गई है। 



आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में भी ‘अभ्रक’ के नाम से इस दवा के अनेकानेक गुण ‘भावप्रकाश’ नामक ग्रंथ में वर्णित हैं, किन्तु इसके साथ भी ‘ट्यूबरकुलाइनम’, ‘सोराइनम’, ‘बेसिलाइनम’ अथवा ‘सिफिलाइनम’ जैसी कान्सटीट्यूशनल दवाएं दिया जाना आवश्यक है।

चिकित्सावधि में खट्टी वस्तुएं, खट्टे फल, विटामिन सी (एस्कार्विक एसिड), मैदा आदि पदार्थों का सेवन सीमित मात्रा में ही होना चाहिए। कुछ समय के लिए ऐसे खाद्य पदार्थ खाना बंद कर दें, तो ज्यादा बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं।

सफेद दाग ठीक हो सकता है
कुछ रोगी, जिनका शरीर 30 प्रतिशत से अधिक सफेद हो गया है या उनके होंठ, उंगलियों के पोर, हथेली, जननेन्द्रिय आदि से प्रभावित रोगियों का विशेष रक्त-परीक्षण करवाया गया है, जिसमें लोहा, तांबा, रांगा का प्रतिशत जरूरत से ज्यादा या कम पाया गया। रक्त की सफेद कोशिकाओं, जिसे ‘लिम्फोसाइट’ कहा जाता है, में टी और बी का प्रतिशत कम पाया गया।
• यदि स्त्रियों में रोने की प्रवृत्ति हो, तो ‘नेट्रमम्यूर’ दवा 1000 शक्ति की एक खुराक देकर अगले दिन से ‘आर्ससल्फफ्लेवम’ 3 × में खिलानी चाहिए। पंद्रह दिन बाद ‘नेट्रमम्यूर’ की एक खुराक और ले लें इसके पंद्रह दिन बाद’बेसीलाइनम’ 1000 की एक खुराक लें।









Tuesday, January 17, 2017

जड़ी बूटियों से करें प्राकृतिक उपचार

     दवाओं की तुलना में उनका हर्बल उपचार करना ज्यादा बेहतर होता है। सैकड़ों वर्षों से हमारे देश में आयुर्वेद के अनुसार इलाज होता आ रहा है। एक अध्ययन के अनुसार आयुर्वेदिक उपचार ज्यादा सुरक्षित और प्रभावी होते हैं इनका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। हम आपको कुछ हर्ब्स के बारे में बता रहे हैं जिनका आप रोज सेवन करेंगे तो आप छोटी मोटी स्वास्थ्य समस्याओं से बचे रहेंगे।
लहसुन
डायरिया, कब्ज, जुकाम, खांसी और साइनस में फायदेमंद, ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है।
उपयोग करने का तरीका:
प्रतिदिन 2-3 ताजा कली खाएं, लहसुन में एलिसिन मौजूद होता है इसके बाजार में कैप्सूल उपलब्ध हैं जिन्हें आप खा सकते हैं।
अदरक
फायदे:
जी मिचलाना, उल्टी, पेट की बीमारियों में फायदेमंद, सर्दी और फ्लू से निजात दिलाता है।
उपयोग करने का तरीका:
अदरक की चाय बनाकर पियें।
नुकसान:
ज्यादा मात्रा में अदरक का सेवन करने पर सीने में जलन की समस्या होने लगती है। गर्भवती महिलाओं को एक दिन में इसकी 1500 मिग्रा से अधिक मात्रा नहीं लेनी चाहिए।
अश्वगंधा
फायदे:
त्वचा चमकदार बनती है, दर्द निवारक के रुप में इस्तेमाल होता है, तनाव को कम करता है, वजन बढ़ाने में सहायक, रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ावा देता है
उपयोग करने का तरीका:
आप अश्वगंधा की चाय बनाकर पी सकते हैं। इसके लिए एक कप पानी या दूध में एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण या एक उसकी जड़ के साथ उबाल लें इसे दिन में दो बार पियें। आजकल बाजार में अश्वगंधा कैप्सूल भी उपलब्ध हैं।
नुकसान:



अश्वगंधा के ज्यादा सेवन से नींद आती है, थायराइड हार्मोन को उत्तेजित कर देता है, शरीर की गर्मी बढ़ जाती है।

एल्डरबेरी
फायदे:
एल्डरबेरी के फूलों का इस्तेमाल सर्दी, जुकाम, फ्लू के इलाज के लिए होता है और इसमें जीवाणुरोधी गुण भी होता है।
उपयोग करने का तरीका:
दो चम्मच एल्डरबेरी के फूल की पत्तियां को एक कप पानी में उबालकर काढ़ा बनाएं और इसे दिन में 2-3 बार पियें।
क्रैनबेरी

फायदे:
मूत्राशय के संक्रमण, प्रोस्टेंट ग्रंथि में होने वाला संक्रमण, सूजन प्रोस्टेटाइटिस को रोकने में उपयोग करने का तरीका:
प्रतिदिन आधा या तिहाई कप क्रैनबेरी का जूस पिएं। बाजार में उपलब्ध क्रैनबेरी कैप्सूल भी आप दिन में दो बार ले सकते हैं।



सेज


फायदे:
गले में खराश, खांसी और जुकाम में आराम मिलता है, जिन्हें ज्यादा पसीना आता है और रात में सोते वक्त पसीना आता है उनके लिए भी फायदेमंद है।
उपयोग करने का तरीका:
1 कप पानी में सेज की पत्तियां डालकर उबालें और ठंडा होने पर पियें। एक गले में खराश होने पर कुल्ला या गरारा करें।
सुझाव:
महिलायें गर्भावस्था के दौरान इसका उपयोग न करें।
गुड़हल

फायदे:
ब्लड प्रेशर को कम करता है, गले की बीमारियों और जुकाम को ठीक करने में फायदेमंद
उपयोग करने का तरीका:
1-2 चम्मच गुड़हल की पत्तियों को 10 मिनट तक पानी में उबालकर पियें।
मार्शमैलो

फायदे:



मार्शमैलो की जड़ या पत्ती एसिडिटी, गले में खराश और पेट की सूजन में फायदेमंद है।

उपयोग करने का तरीका:
एक चम्मच सूखी कटी हुई जड़ या पत्तियों को 2 कप पानी में उबालें और ठंडा होने पर इसे पियें।
सुझाव:
यदि मार्शमैलो के साथ कोई अन्य दवाओं का सेवन कर रहे हैं तो इनके बीच कम से कम एक घंटे का गैप रखें क्योंकि तुरंत लेने पर मार्शमैलो उनके प्रभाव को कम कर सकता है।
कैटनिप

फायदे:
पेट ठीक रखता है, चिंता और तनाव को कम करता है
उपयोग करने का तरीका:
एक कप पानी में 4 से 5 ताजी या सूखी पत्तियों को डालकर 5 मिनट तक उबालें। इस काढें में आप चाहें तो स्वाद के लिए चीनी भी मिला सकते हैं। इसे दिन में कम से कम दो बार पियें।








पिलपिले टमाटरों को फिर से ताजा करें


    टमाटर हर सब्जी की शान होते है, ये हर सब्जी के स्वाद को बढाने के काम आता है|इस सादा, जूस, सलाद, सब्जी में और अन्य तरीकों से इस्तेमाल किया जाता है. यही नहीं इसमें अनेक ऐसे तत्व भी होते है जिनके कारण इसका आयुर्वेद में भी अहम स्थान है.|गुणों की खान कही जाने वाली इस सब्जी की इतनी सारी खासियत है कि आप सोच भी नहीं पाओगे. जिस तरह इसका रंग लाल है वैसा ही रंग इसका इस्तेमाल करने वालों का हो जाता है|कहने का तात्पर्य है कि ये शरीर में खून बनाता है और चेहरे पर लाली लाता है|
   टमाटर हर मौसम में उपलब्ध होता है किन्तु गर्मियाँ हर सब्जी पर अपना प्रभाव डालती है और सब्जियों को सडाना आरम्भ कर देती है|इसीलिए आपने देखा भी होगा कि सर्दियों में तो हम सब्जियों को कही भी रख देते है फिर भी वे कई दिनों तक वैसी ही ताज़ी बनी रहती है|किन्तु गर्मियों में अगर किसी सब्जी को कुछ घंटों के लिए भी बाहर सामान्य तापमान पर रख दिया जाए तो वे गलने लगती है|टमाटर तो इतने पिलपिले हो जाते है कि आप उन्हें छूना तक पसंद ना करें|इसीलिए गर्मियों में फ्रीज का इस्तेमाल अधिक किया जाता है ताकि फल सब्जियां उसमें ताज़ी बनी रहें|
   

लेकिन अगर कभी आप अपने टमाटरों को फ्रीज में रखना भूल गयी हो और वे पिलपिले हो गए हो तो उन्हें बाहर फेंकने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योकि आज हम आपको एक ऐसे घरेलू नुस्खे से अवगत कराने जा रहे है जिनकी मदद से आप पिलपिले हुए टमाटरों को फिर से ताजा कर सकते हो. ये तरीका बहुत आसान और सरल है तो आओ इस नुस्खे के बारे में जानते है|
सामग्री ( Material Required ) :
* 1 बर्तन
*ठंडा पानी
* 1 चम्मच नमक
· विधि :
   सबसे पहले तो आपको एक बर्तन ( कटोरा ) लेना है, अब उसमें आप ठंडा पानी भर दें. साथ ही इसमें 1 चम्मच नमक भी डाल दें. अब इसमें पिलपिले हुए सारे टमाटर डालें और फिर करीब 3 – 4 घंटों के लिए भीगने के लिए छोड़ दें|कुछ समय बाद आप देखोगे कि उन पिलपिले टमाटरों की ताजगी फिर से लौट आई है|वे फिर से गोल मटोल हो गये है और पहले की तरह लाल लाल दिख रहे है.\    लाल टमाटर बड़ा ही स्वादिष्ट होता है इसे लोग बड़े चाव से खाते है. इसके बारे में बहुत से लोग अलग अलग राय देते है| कुछ लोग इसे फल बताते है तो कुछ लोग इसे सब्जी भी कहते है| चाहे जो भी हो इसके स्वाद ने सभी को दीवाना बना रखा है. इसके अनेको गुणों के कारण इसके प्रति लोगो की दीवानगी और भी बढती है|
एक अध्ययन के अनुसार जोकि यूरोप में हुआ था उससे पता चला है जो व्यक्ति भोजन करते समय भोजन में लाइकोपीन की मात्रा का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करते है वे ह्रदय घात के खतरे से बचे रहते है| उनको हृदयघात आने की सम्भावना कम हो जाती है.|यह सिर्फ टमाटर खाने से ही हो सकता है क्योकि टमाटर में ही लाइकोपीन नामक तत्व पाया जाता है| वह अध्ययन जिन लोगो पर किया गया था उन लोगो में ज्यादातर प्रोढ़ावस्था के थे| और उनमे से जिन लोगो को दिल का दौरा पड़ चूका था उनकी संख्या थी 662. अध्ययन में शरीर में इस तत्व की, जो कि टमाटर में होता है| उपस्थिति की मात्रा की भी जांच की गयी थी. यह अध्ययन 1379 लोगो पर किया गया थ||



उदाहरण के लिए हम आपको बताते है कि एक प्रकार का पदार्थ जिसे हम कोलेस्ट्रोलिमोआ कहते है वो हमारी धमनियों में जम जाता है और इससे  हमें एक आघात होने का खतरा बना रहता है. इसके बाद ये जेनेटिक परिवर्तन करते है और कैंसर को उत्पन्न कर सकते है| फ्री रेडिक्ल से हमें ऐसा कैंसर हो सकता है जो सूर्य के प्रकाश के कारण होता है अथवा ऐसी बीमारियाँ हो सकती है जैसे कि ओजोन के प्रदुषण में सांस लेने से हो सकती है|
   अगर हमें प्रदुषण भरे वातावरण से बचना है तो टमाटर का खूब इस्तेमाल करना होगा क्योंकि इसके इस्तेमाल से ही हम कोलेस्ट्राल जैसी बीमारी से बच सकते है और हृदय सम्बन्धी रोगों को भी अपने से दूर रख सकते है और स्वस्थ जीवन का भरपूर आनंद ले सकते है 
   तो अब हम कह सकते है टमाटर अपने इन्ही गुणों के कारण इतना महत्वपूर्ण हो गया है की असाधारण होते हुए भी कई रोगों से निजात दिलाने में सहायक है| और इसके इस्तेमाल पर खर्च भी ज्यादा नहीं होता. यह तो हमारे आस पास ही आसानी से और कम दामो पर उपलब्ध रहता है. तो अब आप टमाटर को खूब खाइए और अपने शरीर को रोगों से दूर बनाये रखिये|

Sunday, January 15, 2017

एक्ज़ीमा का होम्योपैथिक इलाज



    एक्जिमा के लक्षणों में त्वचा में खुजली, लालिमा और छोटे उभार या फफोले शामिल हैं। अगर इन लक्षणों का इलाज नहीं किया जाए, तो त्वचा मोटी, खुरदुरी, और शुष्क हो सकती है। जिसके साथ कुछ ऐसे क्षेत्र उत्पन्न हो सकते हैं जहाँ के बाल झड़ जाते हैं और रंग में परिवर्तन आ जाता है। लंबी अवधि के एक्जिमा से प्रभावित त्वचा, बैक्टीरिया जनित अग्रिम संक्रमण के लिए आमतौर पर अधिक संवेदनशील हो जाती है।
एक्जिमा कई प्रकार का होता है, लेकिन एक्जिमा के लक्षणों को सामान्‍य करके देखा जा सकता है। चाहे कारण कुछ भी हों, कम या ज्‍यादा एक्जिमा के लक्षण आमतौर पर इस प्रकार के होते हैं-संक्रमित त्‍वचा में खुजली और लालिमा
शुष्‍क और पपड़ीदार त्‍वचा। और खुजली करने पर त्‍वचा के उस हिस्‍से का मोटा हो जाता।
प्रभावित क्षेत्र में गांठ पड़ जाना
छाले नमी भरी त्‍वचा
एक्जीमा त्वचा का दीर्घजीवी रोग हैं। होमियोपैथिक फिलॉसफी के अनुसार  यह रोग सोरा दोष के कारण होते हैं। यदि मनुष्य की प्रकृति में ‘सोरा’ दोष के तत्त्व नहीं होंगे, तो एक्जीमा होगा ही नहीं। वास्तव में ‘सोरा’ हमारी भौतिकवादी प्रवृत्ति एवं मानसिक और वैचारिक विषाक्तता का ही परिणाम है। वैसे भी ‘सोरा’ शब्द का उदभव ‘सोरेट’ से हुआ है जिसका हिंदी रूपान्तर ‘खुजली’ होता है।
एक्जीमा : इसे हिन्दी में अकौता, छाजन और पामा भी  कहते हैं। यह रोग ज्यादातर पैर के टखनों के पास या पिण्डलियों में, जोड़ों में, कान के पीछे गर्दन पर, हाथों में और जननांग प्रदेश में होता पाया जाता है। वैसे, यह शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है। इस रोग में तीव्र खुजली होती है। जननांग प्रदेश में इस रोग का होना सबसे ज्यादा कष्टदायक होता है।
एक्जिमा के कारण
यह रोग अनुचित आहार-विहार करने, अजीर्ण बने रहने, मांसाहार करने, डायबिटीज रोग होने और त्वचा को ज्यादा रगड़ लगने आदि कारणों से भी होता है।
होमियोपैथिक फिलॉसफी के अनुसार ‘सोरा’ दोष का होना आवश्यक है।
• जीवाणुओं, फफूंद एवं परजीवी (जैसे साटकोप्ट्स-स्केबियाई) आदि सूक्षम जीवों द्वारा भी यह रोग होता है।
एक्जिमा के लक्षण एवं उपचार
सूखा एक्जीमा – सूखा एक्जीमा होने पर निम्नलिखित औषधियों में से,जिस औषधि के सर्वाधिक लक्षण रोगी में पाए जाएं, उस औषधि का सेवन रोगी को करना चाहिए।
एलुमिना : त्वचा का बेहद खुश्क, रूखा, सूखा और सख्त हो जाना, दरारें पड़ जाना और बेहद तेज खुजली होना और खुजाने पर फुसियां उठ आना विशेष लक्षण है। कब्ज रहना, बिस्तर में पहुंचकर गरमाई मिलने के बाद अत्यधिक खुजलाहट, सुबह उठने पर और गर्मी से परेशानी बढ़ना और खुली हवा में एवं ठंडे पानी से आराम मिलना आदि लक्षणों के आधार पर उक्त दवा 30 एवं 200 शक्ति में अत्यंत कारगर है।





कैल्केरिया सल्फ : यह बच्चों के खुश्क एक्जीमा की उत्तम औषधिहै। सिर पर छोटी-छोटी पुंसियां हो जाएं, जिन्हें खुजाने पर खून निकलने लगे, मुख्य लक्षण हैं। 3 × से 12 x शक्ति की दवा फायदेमंद रहती है।
सल्फर : रोगी मैला और गंदा हो, शरीर से दुर्गध आती हो, फिर भी अपने को राजा महसूस करें, रोगी शरीर में गर्मी का अनुभव करता हो, पैरों में जलन होती हो, मीठा खाने की प्रबल इच्छा, अत्यधिक खुजली, किन्तु खुजाने पर आराम मिलता है और अधिक खुजाने पर खून निकलने लगे, बिस्तर की गर्मी से परेशानी बढ़ना, खड़े रहना दुष्कर, सुबह के वक्त अधिक परेशानी, किन्तु सूखे एवं गर्म मौसम में बेहतर महसूस करें। इन लक्षणों के आधार पर ‘सल्फर’ की 30 एवं 200 शक्ति की दवा की एक-दो खुराक ही चमत्कारिक असर दिखाती हैं। इस दवा के रोगी की एक अन्य विशेषता यह है कि शरीर के सारे छिद्र-यथा नाक, कान, गुदा अत्यधिक लाल रहते हैं, अत्यधिक खुजली एवं जलन रहती है। साथ ही पहले कभी एक्जीमा वगैरह होने पर अंग्रेजी दवाओं के लेप से उन्हें ठीक कर लेना और उसके बाद कोई अंदरूनी परेशानी लगातार महसूस करते रहना इसका मुख्य लक्षण है।
रसवेनेनेटा : किसी भी प्रकार का खुश्क एक्जीमा, जिसमें त्वचा पर दाने की पुंसियां हों और तेज खुजली होती हो ,श्रेष्ठ दवा है। रात में अधिक खुजली, गर्म पानी से धोने पर आराम मिलना, त्वचा में लाली, त्वचा की ऊपरी सतह (एपिडर्मिस) में ‘वेसाइकिल’ बन जाना आदि लक्षणों के आधार पर 200 एवं 1000 शक्ति की दवा की दो-तीन खुराकें ही पर्याप्त होती हैं।

गीला एक्जीमा (वीपिंग एक्जीमा) –
ग्रेफाइटिस : गीले एक्जीमा को ठीक करने के लिए यह दवा बहुत कारगर रही है। अस्वस्थ त्वचा, जरा-से घाव से मवाद का स्राव, गाढ़ा, शहद जैसा मवाद, गर्मी में तथा रात के समय कष्ट बढ़ना, रगड़ने से दर्द होना, ग्रंथियों की सूजन, त्वचा अत्यंत खुश्क, खुश्की की वजह से स्तनों पर, हाथ-पैरों पर, गर्दन की त्वचा में दरारें पड़ जाना आदि लक्षणों के मिलने पर 30 शक्ति में एवं रोग अधिक पुराना हो, तो 200 शक्ति में अत्यंत लाभप्रद है।
स्थान विशेष का एक्जीमा
पेट्रोलियम : स्थान विशेष पर बार-बार एक्जीमा हो, गीला, जलन, रात में अधिक खुजली, जरा-सी खरोंच लगने के बाद मवाद पड़ जाना, लाली, माथे पर, कानों के पीछे, अण्डकोषों की त्वचा पर, गुदा पर, हाथ-पैरों पर इस प्रकार का एक्जीमा होना एवं मुख्य बात यह है कि एक्जीमा के लक्षण जाड़े के मौसम में ही प्रकट होते हैं। सिर्फ इसी लक्षण के आधार पर ‘पेट्रोलियम’ 200 शक्ति में दी जाए, तो मरीज दो-तीन खुराक खाने के बाद ही ठीक हो जाता है।
मेजेरियम : यह सिर के एक्जीमा की खास औषधि है। सिर पर, हाथों पर, पैरों पर पपड़ी जमे एवं उसके नीचे से बदबूदार मवाद निकले, जिसमें कृमि हों, सिर पर बालों के गुच्छे बन जाएं, ‘वेसाइकिल’ बन जाएं, हड्डियां भी प्रभावित हों, छूने से एवं रात्रि में अधिक दर्द एवं खुजली, जलन, खुली हवा में आराम मिलने पर उक्त दवा की 5-6 खुराक 30 अथवा 200 शक्ति में फायदेमंद रहती है।




एकजीमा रोगी के परहेज और आहार
लेने योग्य आहार
कच्चे फल जैसे कि सेब, नाशपाती, केले आदि।
ताज़ी सब्जियाँ।
तेल या घी बिना गर्म किया हुआ।
बच्चों के लिये स्तन दुग्ध।
इनसे परहेज करे
एसिड उत्पन्न करने वाले आहार जैसे कि माँस, चिकन, सूअर का माँस।
डेरी उत्पाद।
मक्के की चिप्स, पेस्ट्री, सफ़ेद चावल और मैदे का पास्ता (शक्कर की उच्च मात्रा)।
खमीर युक्त ब्रेड।
कृत्रिम मीठे तत्व।
सोया
अंडे
मेवे