Tuesday, August 15, 2017

हाई और लो ब्लड प्रेशर के घरेलु आयुर्वेदिक उपचार //Home and Ayurvedic Remedies for High and Low Blood Pressure



उच्च रक्तचाप की बीमारी ठीक करने के लिए घर में उपलब्ध कुछ आयुर्वेदिक दवाईया है जो आप ले सकते है । जैसे एक बहुत अच्छी दवा आप के घर में है वो है दालचीनी जो मसाले के रूप में उपयोग होता है वो आप पत्थर में पिस कर पावडर बनाके आधा चम्मच रोज सुबह खाली पेट गरम पानी के साथ खाइए ; अगर थोडा खर्च कर सकते है तो दालचीनी को शहद के साथ लीजिये (आधा चम्मच शहद आधा चम्मच दालचीनी) गरम पानी के साथ, ये हाई BP के लिए बहुत अच्छी दवा है । और एक अच्छी दवा है जो आप ले सकते है पर दोनों में से कोई एक । दूसरी दवा है मेथी दाना, मेथी दाना आधा चम्मच लीजिये एक ग्लास गरम पानी में और रात को भिगो दीजिये, रात भर पड़ा रहने दीजिये पानी में और सुबह उठ कर पानी को पि लीजिये और मेथी दाने को चबा के खा लीजिये । ये बहुत जल्दी आपकी हाई BP कम कर देगा, देड से दो महीने में एकदम स्वाभाविक कर देगा ।


और एक तीसरी दवा है हाई BP के लिए वो है अर्जुन की छाल । अर्जुन एक वृक्ष होती है उसकी छाल को धुप में सुखा कर पत्थर में पिस के इसका पावडर बना लीजिये । आधा चम्मच पावडर, आधा ग्लास गरम पानी में मिलाकर उबाल ले, और खूब उबालने के बाद इसको चाय की तरह पि ले । ये हाई BP को ठीक करेगा, कोलेस्ट्रोल को ठीक करेगा, ट्राईग्लिसाराईड को ठीक करेगा, मोटापा कम करता है , हार्ट में अर्टेरिस में अगर कोई ब्लोकेज है तो वो ब्लोकेज को भी निकाल देता है ये अर्जुन की छाल । डॉक्टर अक्सर ये कहते है न की दिल कमजोर है आपका; अगर दिल कमजोर है तो आप जरुर अर्जुन की छाल लीजिये हरदिन , दिल बहुत मजबूत हो जायेगा आपका; आपका ESR ठीक होगा, ejection fraction भी ठीक हो जायेगा; बहुत अच्छी दवा है ये अर्जुन की छाल 




और एक अच्छी दवा है हमारे घर में वो है लौकी का रस । एक कप लौकी का रस रोज पीना सबेरे खाली पेट नास्ता करने से एक घंटे पहले ; और इस लौकी की रस में पांच धनिया पतपांच पुदीना पत्ता, पांच तुलसी पत्ता मिलाके, तिन चार कलि मिर्च पिस के ये सब डाल के पीना .. ये बहुत अच्छा आपके BP ठीक करेगा और ये ह्रदय को भी बहुत व्यवस्थित कर देता है , कोलेस्ट्रोल को ठीक रखेगा, डाईबेटिस में भी काम आता है ।और एक मुफ्त की दवा है , बेल पत्र की पत्ते – ये उच्च रक्तचाप में बहुत काम आते है । पांच बेल पत्र ले कर पत्थर में पिस कर उसकी चटनी बनाइये अब इस चटनी को एक ग्लास पानी में डाल कर खूब गरम कर लीजिये , इतना गरम करिए के पानी आधा हो जाये , फिर उसको ठंडा करके पि लीजिये । ये सबसे जल्दी उच्च रक्तचाप को ठीक करता है और ये बेलपत्र आपके सुगर को भी सामान्य कर देगा । जिनको उच्च रक्तचाप और सुगर दोनों है उनके लिए बेल पत्र सबसे अच्छी दवा है ।

और एक मुफ्त की दवा है हाई BP के लिए – देशी गाय की मूत्र पीये आधा कप रोज सुबह खाली पेट ये बहुत जल्दी हाई BP को ठीक कर देता है । और ये गोमूत्र बहुत अद्भूत है , ये हाई BP को भी ठीक करता है और लो BP को भी ठीक कर देता है – दोनों में काम आता है और येही गोमूत्र डाईबेटिस को भी ठीक कर देता है , Arthritis , Gout (गठिया) दोनों ठीक होते है । अगर आप गोमूत्र लगातार पि रहे है तो दमा भी ठीक होता है अस्थमा भी ठीक होता है, Tuberculosis भी ठीक हो जाती है । इसमें दो सावधानिया ध्यान रखने की है के गाय सुद्धरूप से देशी हो और वो गर्भावस्था में न हो ।
निम्न रक्तचाप की बीमारी के लिए दवा 

निम्न रक्तचाप की बीमारी के लिए सबसे अच्छी दवा है गुड । ये गुड पानी में मिलाके, नमक डालके, नीबू का रस मिलाके पि लो । एक ग्लास पानी में 25 ग्राम गुड, थोडा नमक नीबू का रस मिलाके दिन में दो तिन बार पिने से लो BP सबसे जल्दी ठीक होगा ।



और एक अच्छी दवा है ,अगर आपके पास थोड़े पैसे है तो रोज अनार का रस पियो नमक डालकर इससे बहुत जल्दी लो BP ठीक हो जाती है , गन्ने का रस पीये नमक डालकर ये भी लो BP ठीक कर देता है, संतरे का रस नमक डाल के पियो ये भी लो BP ठीक कर देता है , अनन्नास का रस पीये नमक डाल कर ये भी लो BP ठीक कर देता है ।

    लो BP के लिए और एक बढ़िया दवा है मिसरी और मखन मिलाके खाओ – ये लो BP की सबसे अच्छी दवा है 
लो BP के लिए और एक बढ़िया दवा है दूध में घी मिलाके पियो , एक ग्लास देशी गाय का दूध और एक चम्मच देशी गाय की घी मिलाके रातको पिने से लो BP बहुत अछे से ठीक होगा ।
और एक अच्छी दवा है लो BP की और सबसे सस्ता भी वो है नमक का पानी पियो दिन में दो तिन बार , जो गरीब लोग है ये उनके लिए सबसे अच्छा है ।







Sunday, August 13, 2017

शीघ्र पतन की सरल चिकित्सा: How to treat premature ejeculation?


संभोगरत पुरुष का वीर्य उसकी इच्छा के विरुद्ध शीघ्र स्खलित हो जाने को शीघ्र पतन या जल्दी छूट की व्याधि कहा जाता है। पुरुष अपने वीर्य के छूटने के आवेग को नियंत्रित नहीं रख पाता है। ऐसे पुरुष स्त्री को संतुष्ट नहीं कर पाते है। यह स्थिति हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी जरूर आती है। ४० वर्ष से कम उम्र के पुरुषों मे यह रोग अधिकतर पाया जाता है। संभोग क्रिया के समय लिंग का कडा या कठोर नहीं पडना बहुत गंभीर दोष है क्योंकि सुस्त और ढीले लिंग से संभोग क्रिया संपन्न करना बेहद मुश्किल का काम है। संभोग में कितने समय तक वीर्य पात नहीं होना चाहिये, इसका कोई वैज्ञानिक मापदंड नही है। लेकिन शीघ्रपतन की सबसे खराब स्थिति में इंद्री प्रविष्ट करते ही वीर्य छूट जाता है। कुछ पुरुष तो  कामेंद्रीय  यौनि में प्रविष्ट भी  नहीं कर पाते और वीर्य स्खलन हो जाता है। शीघ्र पतन रोगी संभोग के दौरान चाह कर भी वीर्य छूटना नहीं रोक सकता है। सेक्स में लगने वाला समय प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक स्थिति के अनुसार लंबा या छोटा हो सकता है।संभोग शुरू करने पर ६० सेकंड्स याने एक मिनिट से कम समय में पुरुष खारीज हो जाता है तो यह शीघ्र पतन का रोग माना जाता है। शीघ्र पतन रोगी को हम नपुंसक की श्रेणी में नहीं रख सकते हैं, क्योंकि अधिकांश शीघ्र पतन रोगी सेक्स के जरिये स्त्री को गर्भवती करने में सफ़ल होते हैं। फ़िर भी शीघ्र पतन रोगी अपने पार्टनर को संभोग से संतुष्ट नही कर पाता है। गृहस्थि जीवन मे आनंद का अभाव पसरने लगता है।


शीघ्र पतन के लक्षण-
१) शीघ्र पतन रोगी की  इंद्री  बहुत जल्द उत्तेजना में आजाती   है और पर्याप्त कठोरता न आने के बावजूद वीर्यपात हो जाता है। कामेन्द्रीय   में कडापन नहीं आने से कभी -कभी तो  यौनि में प्रविष्ट करने में भी मुश्किल होती है।
२) रोगी व्यक्ति अश्लील चित्र देखते हैं या नदी तालाब मे नहाती कम वस्त्र स्त्रियों को देखता है तो उत्तेजना होकर वीर्य निकल जाता है।
३) संभोग के दौरान स्त्री चरम उत्तेजना पर नहीं पहुंच पाती और स्त्री के खारीज होने के पहिले ही मर्द खारीज हो जाता है। पुरुष का  जननेन्द्रीय  एकदम सुस्त पड जाता है। स्त्री मन मसोस कर रह जाती है।
४) शीघ्र पतन रोगी का वीर्य पतला पड जाता है।
५) पेशाब या शौच निवृत्त होते वक्त जोर लगाने से वीर्य की बूंदे निकल जाती है।
इस विषम स्थिति से निजात पाने के लिये मैं कुछ उपचारों का उल्लेख कर रहा हूं जिनके समुचित प्रयोग से पुरुष भरपूर सेक्स का आनंद लेने के काबिल हो जाता है--
१) तालमखाना के बीज ५० ग्राम लेकर अदरक के रस में आधा घंटे भिगोएं,फ़िर सुखाएं। आपको ऐसा तीन बार करना है। अब इनका चूर्ण बनालें। अब इस चूर्ण को २०० ग्राम शहद में अच्छी तरह मिश्रण करके शीशी में भर ले शीघ्र पतन की दवा तैयार है। १० ग्राम औषधि सुबह-शाम गाय के दूध के साथ लेने से जल्दी छूट होने की व्याधि में लाभ होता है।
२) सतावर का चूर्ण ३ ग्राम मीठे दूध( मिश्री मिला दूध) के साथ लेते रहने से शीघ्र पतन रोग नष्ट होता है।
३) तुलसी के पांच पत्ते और ३ ग्राम बीज(तुलसी के) नागर वेल के पान में रखकर चबाकर खाएं । शीघ्र पतन की अच्छा उपचार है।
४) असगंध और सतावर चूर्ण ३-३ ग्राम दूध के साथ सुबह -शाम लेते रहने से शीघ्र पतन रोग काबू में आ जाता ह।
५) शिलाजीत इस रोग की महान औषधि मानी गई है। विश्वसनीय निर्माता का ही शिलाजित खरीदें। वर्ना धोखा हो सकता है।
६) गाजर का रस २०० मिलि में लहसुन के रस की १० बूंदे डालकर पीना स्तंभन बढाने वाला होता है।
उडद की दाल २० ग्राम पानी में ३ घंटे भिगोएं फ़िर पीसलें इसमें घी और शहद १०-१० ग्राम मिश्रित कर चाट लें और ऊपर से एक गिलास मिश्री मिला दूध पी जाएं। संभोग शक्ति वर्धक उपचार है।
7) शीघ्र पतन की समस्या से निजात पाने के लिये एक बहुत ही कारगर उपचार लिख देता हूं,जरूर लाभ उठावें--
देशी घी २०० ग्राम,शहद १०० ग्राम ,मुलहठी १०० ग्राम और बंग भस्म २० ग्राम लेकर भली प्रकार मिश्रण बनाएं। यह दवा एक चम्मच सुबह और एक चम्मच शाम को लेते रहने से कई पुरुष लाभान्वित हुए हैं।



८) पांव के तलवे पर दस मिनट तक ठंडे जल की धार लगाने से शीघ्र पतन में लाभ होता है।
९) ७ नग बादाम,३ नग काली मिर्च और ३ ग्राम मिश्री मिलाकर चूर्ण करलें गरम दूध के साथ पीते रहने से जल्दी छूट नहीं होगी।
१० ) रात को सोते वक्त पेडू और जननेंद्रिय पर मिट्टी की पटी लगाना चाहिये। कुछ ही दिन में फ़र्क नजर आयेगा।
११) शीघ्र पतन रोगी को कब्ज रहती हो तो सुबह -शाम कुन कुने पानी से एनीमा करना चाहिये। इससे कब्ज भी ठीक होगी और शरीर के दूषित पदार्थ बाहर निकलेंगे।
१२) शीघ्र पतन रोगी को २४ घंटे में ४ लिटर पानी पीने की आदत डालना चाहिये।
१३) नीली बोतल का सूर्य तप्त जल २५ मिलि की मात्रा मे दिन में आठ बार पीने से शीघ्र पतन रोग नष्ट होता है|
१४) शीघ्र पतन की समस्या निवारण के लिये दो सेक्स सत्र के बीच की अवधि कम रखें। ज्यादा दिन बाद सेक्स करेंगे तो वीर्य पात जल्दी होगा।



१५) हस्तमैथुन की आदत हो तो तुरंत त्याग दें। अश्लील चित्र ,फ़िल्म न देखें
१६) तालमखाना २०० ग्राम,सफ़ेद मूसली १०० ग्राम, गोखरू २५० ग्राम और मिश्री ६०० ग्राम लेकर चूर्ण बनालें। एक चम्मच सुबह -शाम लेते रहने से कामेन्द्रीय पुष्ट होगा और जल्दी छूट से छुटकारा मिलेगा।
१७) संभोग के एक सत्र (सेशन) में करीब ४०० से ५०० केलोरी उर्जा खर्च होती है इसलिये संभोग के दौरान तुरंत उर्जा प्रप्त करने के लिये ग्लुकोस,दूध,जुस आदि का उपयोग करना उचित है। इस अवधि में हल्की फ़ुल्की बात चीत करते रहने से संभोग का समय बढाया जा सकता है।
18) होम्योपैथी चिकित्सा में शीघ्र पतन ठीक करने के लिये चमत्कारिक औषधिया हैं। महत्वपूर्ण रेमेडीज ये हैं--
टर्नेरा डेमियाना,कोनियम, एसीड फ़ास, सेलिक्स नाईग्रा, केलेडियम, सेलेनियम, विथानिया सोम्निफ़ेरा(अस्वगंधा) योहिम्बनम, लायकोपोडियम, बुफ़ो राना आदि । ये औषधियां लक्षणों की समानता के आधार पर चुनी जाती है। मेटेरिया मेडिका से ज्ञान बढाना चाहिये। ज्यादा माथा पच्ची न करना हो तो इनमें से कोई सात दवाएं मिलाकर प्रयोग करके लाभ उठाया जा सकता है।









Saturday, August 12, 2017

पुरुष ग्रंथि के बढ़ने के आयुर्वेदिक घरेलु उपचार (Prostate gland enlargement)


प्रोस्टेट पुरुषों में पाई जाने वाली एक ग्रंथि है, जो वास्‍तव में कई छोटी ग्रंथियों से मिलकर बनी होती है। यह ग्रंथि पेशाब के रास्‍ते को घेर कर रखती है और उम्र बढ़ने के साथ प्रोस्टेट ग्रंथि के ऊतकों में गैर-नुकसानदेह ग्रंथिकाएं विकसित हो जाती है। जिसके कारण धीरे-धीरे ग्रंथि के आकार में वृद्धि होने लगती है, और समस्या तब उत्पन्न होती है जब प्रोस्टेट का आकार इतना बढ़ जाता है कि मूत्रमार्ग पर दबाव पड़ने लगता है।यह रोग पुरुषों में ही होता है क्योंकि पुरुष ग्रंथि स्त्रियों में नहीं होती है केवल पुरुषों में होती है। पुरुष में यह ग्रंथि मूत्राशय की ग्रीवा तथा मूत्रमार्ग के ऊपरी भाग को चारों तरफ से घेरकर रखती है। इस ग्रंथि के द्वारा सफेद, लिसलिसा तथा गाढ़ा स्राव निकलता है। जब पुरुष उत्तेजित होता है तो उस समय शुक्राणु प्रोस्टेट में पहुंच जाते हैं। यह लिसलिसा पदार्थ इन शुक्राणुओं को जीवित रखने और बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब यह ग्रंथि अधिक बढ़ जाती है तो मूत्राशय तथा मूत्रमार्ग की क्रियाओं में बाधा उत्पन्न होती है।


पुरुष ग्रंथि का अधिक बढ़ने का लक्षण:-

इस रोग से पीड़ित रोगी को रात के समय में कई बार पेशाब करने के लिए उठना पड़ता है।
रोगी को एक बार में पेशाब पूरा नहीं आता इसलिए उसे पेशाब बार-बार करने जाना पड़ता है। रोगी व्यक्ति का पेशाब बूंद-बूंद करके आने लगता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी पेशाब तथा शौच को रोकने में असमर्थ होता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को सिर में दर्द, घबराहट, थकान, चिड़चिड़ापन, लिंग का ढीला हो जाना तथा अधिक कमजोरी महसूस होना आदि परेशानियां होने लगती हैं।
जब पुरुषों की पुरुष ग्रंथि बढ़ जाती है तो उस रोगी के पेशाब की धार पतली हो जाती है तथा पेशाब कम और रुक-रुक कर आता है।
पुरुष ग्रंथि के अधिक बढ़ने के कारण:-
*नशीले पदार्थों का अधिक सेवन करने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
*पेट में कब्ज बनने के कारण भी पुरुष ग्रंथि बढ़ जाती है।
*मूत्र तथा शौच की गति को रोकने के कारण भी पुरुष ग्रंथि अधिक बढ़ सकती है।
गलत तरीके के खान-पान तथा दूषित भोजन का सेवन करने से पुरुष ग्रंथि के अधिक बढ़ने का रोग हो जाता है।
मानसिक तनाव अधिक होने, अधिक चिंता करने तथा क्रोध करने के कारण पुरुष ग्रंथि का अधिक बढ़ने का रोग हो सकता है।
*लगातार लम्बे समय तक बैठने का कार्य करने से व्यक्ति के बस्ति प्रदेश पर बोझ पड़ता है जिसके कारण इस ग्रंथि में सूजन हो जाती है और यह रोग व्यक्ति को हो जाता है।
सर्दियों में समस्‍या का बढ़ना
सर्दियों में कम पानी पीने के कारण प्रोस्‍टेट ग्रंथि की समस्‍या बढ़ जाती है। सर्दियों में पानी कम पीने के कारण यूरीन की थैली में एकत्र यूरीन की मात्रा बढ़ जाती है। इसके कारण यूरीन की नली में संक्रमण या यूरीन रुकने  की  समस्‍या हो जाती है।
किडनी पर असरप्रोस्टेट ग्रंथि के बढ़ने पर अगर यूरीन मूत्राशय के अंदर देर तक रुका रहता है तो कुछ समय के बाद किडनी पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने लगता है। इसके कारण किडनी की यूरीन बनाने की क्षमता कम होने लगती है और किडनी यूरिया को पूरी तरह शरीर के बाहर निकाल नहीं पाती। इन सब के कारण ब्‍लड में यूरिया बढ़ने लगता है, जो शरीर के लिए नुकसानदेह होता है।


दवाओं से इलाज

प्रोस्टेट ग्रंथि के बढ़ने पर मरीज को चिकित्सकीय उपचार की आवश्यकता होती है। यूरीन की थैली के लगातार भरे रहने से किडनी पर दबाव बढ़ जाता है, जिससे किडनी के खराब होने का खतरा पैदा हो जाता है। रोग की प्रारंभिक अवस्था में दवाओं द्वारा ग्रंथि को बढ़ने से रोकने का प्रयास किया जाता है।
पुरुष ग्रंथि के अधिक बढ़ने पर प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:-
इस रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले इस रोग के होने के कारणों को दूर करना चाहिए और इसके बाद इसका उपचार प्राकृतिक चिकित्सा से करना चाहिए।
पुरुष ग्रंथि के बढ़ने के रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को 2 दिन उपवास रखने के बाद लगभग 10 दिनों तक फलों तथा सब्जियों का हल्का भोजन लेना चाहिए।
पालक और कुलथी को बराबर मात्रा में लेकर पानी में डालकर अच्छी तरह से उबालकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को सुबह-शाम सेवन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।



2 अंजीर को प्रतिदिन पानी में भिगोकर रख दें। इनको सुबह तथा शाम को खाकर इस पानी पी लें। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से यह रोग ठीक हो जाता है।

बन्दगोभी, तरबूज, खीरा, सफेद पेठा, गाजर, अनन्नास आदि का रस पीना भी बहुत लाभदायक होता है।
इस रोग से पीड़ित रोगी को दूषित भोजन, उत्तेजक खाद्य पदार्थ, मिठाई, घी, तली हुई चीजें बिल्कुल भी सेवन नहीं करनी चाहिए।
यदि रोगी व्यक्ति को कब्ज बन रही हो तो सबसे पहले कब्ज को दूर करना चाहिए तथा इसके बाद इस रोग का उपचार करना चाहिए।
इस रोग से पीड़ित रोगी को अधिक मात्रा में पानी तथा नींबू का पानी पीना चाहिए। धनिये के पानी तथा कच्चे नारियल के पानी को भी पीना लाभदायक है।
 विशिष्ट परामर्श-

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ने मे हर्बल औषधि सर्वाधिक कारगर साबित हुई हैं| यहाँ तक कि लंबे समय से केथेटर नली लगी हुई मरीज को भी केथेटर मुक्त होकर स्वाभाविक तौर पर खुलकर पेशाब आने लगता है| प्रोस्टेट ग्रंथि के अन्य विकारों मे भी हितकारी है|आपरेशन की जरूरत नहीं होती. जड़ी -बूटियों से निर्मित औषधि हेतु वैध्य श्री दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क कर सकते हैं|

Tuesday, August 8, 2017

गोरखमुंडी के विविध प्रयोग -अनेक रोग की एक औषधि



गोरखमुण्डी एक सुलभप्राप्य वनस्पति है।इसके छोटे-छोटे पौधे गेहूं,जौ,रब्बी आदि के खेतों में बहुतायत से पाये जाते हैं।प्रायः जाड़े में स्वतः उत्पन्न होने वाले ये बड़े घासनुमा पौधे गर्मी आते-आते परिपक्व होजाते हैं।दो-तीन ईंच लम्बी दांतेदार पत्तियों के ऊपरी भाग में, गुच्छों में छोटे-छोटे घुण्डीदार फल लगते हैं,जो वस्तुतः फूल के ही सघन परिवर्तित रुप हैं।ये पौधे यदाकदा जलाशयों के जल सूखजाने के बाद वहाँ भी स्वतः उत्पन्न हो जाते हैं।आयुर्वेद में रक्तशोधक औषधी के रुप में इसका उपयोग होता है।


भारतीय वनौषधियों में गोरखमुंडी का विशेष महत्‍व है। सर्दी के मौसम में इसमें फूल और फल लगते हैं। इस पौधे की जड़, फूल और पत्‍ते कई रोगों के लिए फायदेमंद होते हैं। गोरखमुण्डी भारत के प्रायः सभी प्रान्तों में पाई जाती है। संस्कृत में इसकी श्रावणी महामुण्डी अरुणा, तपस्विनी तथा नीलकदम्बिका आदि कई नाम हैं। यह अजीर्ण, टीबी, छाती में जलन, पागलपन, अतिसार, वमन, मिर्गी, दमा, पेट में कीड़े, कुष्ठरोग, विष विकार आदि में तो लाभदायक होती ही है, इसे बुद्धिवर्द्धक भी माना जाता है। गोरखमुंडी की गंध बहुत तीखी होती है।
गोरखमुंडी तथा सौंठ दोनों का चूर्ण बराबर-बराबर मात्रा में गर्म पानी से लेने से आम वात की पीड़ा दूर हो जाती है। गोरखमुंडी चूर्ण, घी, शहद को मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से वात रोग समाप्‍त होते हैं। कुष्‍ठ रोग होने पर गोरखमुंडी का चूर्ण और नीम की छाल मिलाकर काढ़ा तैयार कीजिए, सुबह-शा‍म इस काढ़े का सेवन करने से कुष्‍ठ रोग ठीक हो जाता है। गले के लिए यह बहुत फायदेमंद है, यह आवाज को मीठा करती है। गोरखमुंडी का सुजाक, प्रमेह आदि धातु रोग में सर्वाधिक सफल प्रयोग किया गया है।
गर्भाशय, योनि सम्बन्धी अन्य बीमारियों पथरी-पित्त सिर की आधाशीशी आदि में भी यह अत्यन्त लाभकारी औषधि है। गोरखमुंडी के चार ताजे फल तोड़कर भली प्रकार चबायें और दो घूंट पानी के साथ इसे पेट में उतार लें तो एक वर्ष तक न तो आंख आएगी और न ही आंखों की रोशनी कमजोर होगी। गोरखमुंडी की एक घुंडी प्रतिदिन साबुत निगलने कई सालों तक
आंख लाल नहीं होगी। इसके पत्ते पीस कर मलहम की तरह लेप करने से नारू रोग (इसे बाला रोग भी कहते हैं, यह रोग गंदा पानी पीने से होता है) नष्ट हो जाते हैं।
योनि में दर्द हो, फोड़े-फुन्सी या खुजली हो तो गोरखमुंडी के बीजों को पीसकर उसमें समान मात्रा में शक्कर मिलाकर रख लें और एक बार प्रतिदिन दो चम्मच ठंडे पानी से लेने से इन बीमांरियों में फायदा होता है। इस चूर्ण को लेने से शरीर में स्‍फूर्ति भी बढ़ती है। गोरखमुडी का सेवन करने से बाल सफेद नही होतेहैं। गोरखमुंडी के पौधे उखाड़कर उनकी सफाई करके छाये में सुखा लें। सूख जाने पर उसे पीस लीजिए और घी चीनी के साथ हलुआ बनाकर खाइए, इससे इससे दिल, दिमाग, लीवर को बहुत शक्ति मिलती है। गोरखमुडी का काढ़ा बनाकर प्रयोग करने से पथरी की समस्‍या दूर होती है।
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गोरखमुंडी का प्रयोग बवासीर में भी बहुत लाभदायक माना गया है। गोरखमुंडी की जड़ की छाल निकालकर उसे सुखाकर चूर्ण बनाकर हर रोज एक चम्मच चूर्ण लेकर ऊपर से मट्ठे का सेवन किया जाये तो बवासीर पूरी तरह समाप्त हो जाती है। जड़ को सिल पर पीस कर उसे बवासीर के मस्सों में तथा कण्ठमाल की गाठों में लगाने से बहुत लाभ होता है। पेट के कीड़ों में भी इस की जड़ का पूर्ण प्रयोग किया जाता है, उससे निश्चित लाभ मिलता है।गोरखमुण्डी के ताजे स्वरस को शरीर पर लेप करने से ताजगी और स्फूर्ति आती है।त्वचा की सुन्दरता बढ़ती है।
गोरखमुण्डी के चूर्ण को जौ के आटे में मिलाकर(चार-एक की मात्रा में),रोटी बनाकर,गोघृत चुपड़ कर खाने से बल-वीर्य की बृद्धि होकर वुढ़ापे की झुर्रियां मिटती हैं।शरीर कान्तिवान होता है।
गोरखमुण्डी का सेवन दूषित रक्त को स्वच्छ करता है।विभिन्न रक्तविकारों में इसे सेवन करना चाहिए।
उक्त सभी प्रयोग सामान्य औषधि के रुप में भी किये जा सकते हैं,किन्तु तान्त्रिक विधान से ग्रहण करके,साधित करके उपयोग में लाया जाय तो लाभ अधिक होगा यह निश्चित है।
पीलिया के मरीजों के लिए भी यह फायदेमंद औषधि है। गोरखमुंडी के पत्ते तथा इसकी जड़ को पीस कर गाय के दूध के साथ लिया जाये तो इससे यौन शक्ति बढ़ती है। यदि इसकी जड़ का चूर्ण बनाकर कोई व्यक्ति लगातार दो वर्ष तक दूध के साथ सेवन करता है तो उसका शरीर मजबूत हो जाता है। गोरखमुंडी का सेवन शहद, दूध मट्ठे के साथ किया जा सकता है।




Wednesday, August 2, 2017

प्रसव पीड़ा को दूर करते है यह घरेलु उपाय//Measures to reduce labor pain


प्रसव पीड़ा को दूर करते है यह घरेलु उपाय 
लेबर पेन को दूर के लिए आयुर्वेदिक घरेलु उपाय
पहला प्रयोगः प्रसूति के समय ताजे गोबर (1-2 घण्टे के भीतर का) को कपड़े में निचोड़कर एक चम्मच रस पिला देने से प्रसूति शीघ्र हो जाती है।
दूसरा प्रयोगः तुलसी का 20 से 50 मि.ली. रस पिलाने से प्रसूति सरलता से हो जाती है।
तीसरा प्रयोगः पाँच तोला आँवले को 20 तोला पानी में खूब उबालिये। जब पानी 8 तोला रह जाये तब उसमें 10 ग्राम शहद मिलाकर देने से बिना किसी प्रसव पीड़ा के शिशु का जन्म होता है।
चौथा प्रयोगः नीम अथवा बिजौरे की जड़ कमर में बाँधने से प्रसव सरलता से हो जाता है। प्रसूति के बाद जड़ छोड़ दें।
मंत्रः -
ॐ कौंरा देव्यै नमः। ॐ नमो आदेश गुरु का…. कौंरा वीरा का बैठी हात… सब दिराह मज्ञाक साथ…. फिर बसे नाति विरति…. मेरी भक्ति… गुरु की शक्ति…. कौंरा देवी की आज्ञा।
प्रसव के समय कष्ट उठा रही स्त्री को इस मंत्र से अभिमंत्रित किया हुआ जल पिलाने से वह स्त्री बिना पीड़ा के बच्चे को जन्म देती है।
औषधियों से उपचार-
1. लोध्र: 
लोध्र का लेप करने से प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) को प्रसव के समय हुए योनिक्षत पर लगाने से लाभ होता है।
2 .जायफल: 
प्रसव यानी डिलीवरी के समय होने वाले कमर दर्द में जायफल घिसकर लेप करने से लाभ होता है।
३ . पीपरामूल: 
प्रसव के समय पीपरा मूल, दालचीनी का चूर्ण लगभग 1.20 ग्राम में थोड़ी सी भांग के साथ प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) को पिलाने से प्रसव यानी बच्चे का जन्म आराम से होता है।
४.कलिहारी: 
सुख से प्रसव के लिए कलिहारी की  जड़ पीसकर नाभि के नीचे लगाने से लाभ होता है।
5. कपास: 
डिलीवरी के बाद में कपास की छाल का काढ़ा प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) को पिलाने से गर्भाशय जल्दी ही ठीक हो जाता है।
6.  सरपत: 
प्सूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) आसपास वातावरण साफ करने के लिये सरपत की धूनी जला कर धुंआ करें।
7.  हींग: 
हींग और बाजरे को गुड़ में रखकर निगल जाएं। दो घूंट से ज्यादा पानी न पियें। यह करने से बच्चा देने के समय दर्द नहीं होगा।
8. कपूर: 
पके केले में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग कपूर मिलाकर खाने से बच्चे का जन्म (चाइल्ड बर्थ) आराम से होता है।
9.  पान: 
पान को योनि में रखने तथा पान का सेंक व लेप करने से सूजन नष्ट हो जाती है और औरत का दूध साफ होकर निकलता है।
10. . कसौंदी: 
कसौंदी के पत्तों का रस देने से प्रसव (चाइल्ड बर्थ) जल्दी होता है।
11.  कुला: 
कुचला की मज्जा (बीच के हिस्से) को पानी में घिसकर नाभि पर लगायें।
12.. तेजपात: 
तेजपत्ते के पत्तों की धूनी देने से बच्चा सुख से उत्पन्न हो जाता है।
13. कंगुनी: 
प्रसव पीड़ा को कम करने के लिये कंगुनी के चूर्ण को दूध में बुझाकर, मिश्री को मिलाकर खाने से लाभ होता है। अगर पहले से ही लिया जाये तो दर्द कम रहता है।
14.  काफी: 
शरीर में स्फूर्ति पैदा करने के लिए काफी के बीज भूनकर, अच्छी तरह से पीसकर पानी में उबालकर पीने से लाभ होता है।
15. अजाझाड़े: 
अजाझाड़े की जड़ कमर में बांधने से प्रसव सुखपूर्वक होता है।
14. बादाम :
आखिरी महीने में प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) को 2 बादाम और 10-15 मुनक्का के दाने पानी में भिगोकर पीसकर खिलाने से लाभ होगा।
15. तुलसी: 
महिला को प्रसव (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) के समय 2 चम्मच तुलसी का रस पिलाने से प्रसव का दर्द कम हो जाता है।
16. बथुए: 
बथुए के 20 ग्राम बीजों को पानी में उबालकर, छानकर बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री को पिलाने से पीड़ा कम होगी।
17. हल्दी: 
बच्चा होने के आखिरी माह में एक चम्मच पिसी हुई हल्दी गर्म दूध के साथ सुबह-शाम पिलाएं।
18. नींबू: गर्भ के आखिरी महीने में पानी में नींबू का रस डालकर रोज पीने से लाभ होता है।
19. लौकी:
 लौकी को बिना पानी के साथ उबालकर उसका रस 30 ग्राम की मात्रा में निकालकर प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) को पिला देने से दर्द में आराम मिलता है।
20. हींग: 
चुटकी भर हींग लेकर, 10 ग्राम गुड़ में मिलाकर खाकर, ऊपर से आधा कप पानी या गाय का दूध पियें।
21. अंजीर: 
प्रसव के समय में 15-20 दिन तक रोज दो अंजीर दूध के साथ खाने से लाभ होता है।
22. लालघुंघची: 



लाल घुंघची के दाने लेकर इसे बारीक पीस लें, फिर इसे पुराने गुड़ के साथ खायें इससे प्रसव के समय दर्द नहीं होता है।

23. जंगली पुदीना: 
जंगली पुदीना और हंसराज दोनों को थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें। फिर इसमें थोड़ी सी मिश्री मिलाकर सेवन करने से दर्द में लाभ होता है।
24. कलिहारी: 
कलिहारी की जड़ हाथ-पैरों में थोड़ी-थोड़ी बांध लें। कुछ देर बाद प्रसव के समय स्त्री को बिना अधिक पीड़ा के डिलीवरी हो जायेगी।
25. पोई: 
पोई की जड़ लेकर उसका काढ़ा बनाकर 4-5 चम्मच में 2 चम्मच तिल्ली का तेल मिलाकर स्त्री के पेट पर धीरे-धीरे लेप करने से प्रसव (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) शीघ्र और बिना दर्द के हो जाता है।
26. बिजौरा:
 बिजौरा की जड़ 10 ग्राम और महुआ 10 ग्राम दोनों को घी में पीस लें, फिर उसमें 2 चम्मच लेकर हर 1 घंटे बाद पिलाते रहें। इससे प्रसव यानी डिलिवरी में तकलीफ कम होती है।
27. अपामार्ग: अपामार्ग की जड़ और कलिहारी की जड़ को लेकर एक पोटली में रखें। फिर स्त्री की कमर से पोटली को बांधने प्रसव यानी डिलीवरी आसानी से हो जाती है।
28. एरण्ड: 
एरण्ड का तेल गर्म दूध में 50 मिलीलीटर की मात्रा में मिलाकर पिलाने से अगर प्रसव में दर्द हो तो दर्द तेज होकर बंद हो जायेगा।
29.  सोंठ: 
10 ग्राम सोंठ का चूर्ण लगभग 500 मिलीलीटर दूध में अच्छी तरह पकाकर लेने से 15 मिनट के अन्दर-अन्दर बच्चा बाहर आ जायेगा।
30. केला:
 केले की जड़ लाकर प्रसूता (बच्चे को जन्म देने वाली स्त्री) के बांयी जांघ पर बांधे। इससे जल्द लाभ होगा।
 केले के ऊपर कपूर का चूर्ण डालकर खाने से प्रसव यानी डिलीवरी में दर्द नहीं होता है।
31.  पीपल लता: 
पीपल लता की गांठदार जड़ को पीपला मूल कहते हैं। कुछ पंसारी लोग पीपल लता की मोटी शाखाओं के टुकड़े कर बेचते हैं। अत: सावधानी से ही लें। प्रसव में ज्यादा देर होने पर पीपलामूल, ईश्वर मूल और हींग, पान के साथ खिलाने से प्रसव यानी डिलीवरी का दर्द बढ़कर प्रसव हो जाता है। प्रसव के तुरन्त बाद इसके बारीक चूर्ण का घोल देने से लाभ होता है।





नजला जुकाम के घरेलु आयुर्वेदिक उपचार



     नजला-जुकाम एक बहुत ही आम और हमेशा परेशान करने वाला रोग है। वास्तव में यह रोग नहीं, शरीर की एक सांवेदनिक प्रतिक्रिया है, जो मौसम बदलने, नाक में धूल कण जाने आदि से उत्पन्न होती है। पूरे विश्व के लोग कभी न कभी, इसके शिकार होते ही हैं। नज़ला-जुकाम शीत के कारण होने वाला एक ऐसा रोग है, जिसमें नाक से पानी बहने लगता है। मामूली- सा दिखने वाला यह रोग, कफ की अधिकता के कारण अधिक कष्टदायक हो जाता है। यों तो ऋतु आदि के प्रभाव से दोष संचय काल में संचित हो कर अपने प्रकोप काल में ही कुपित होते हैं, परंतु दोषों के प्रकोपक कारणों की अधिकता, या प्रबलता के कारण तत्काल भी कुपित हो जाते हैं, जिससे जुकाम हो जाता है; अर्थात नज़ला-जुकाम शीत काल के अतिरिक्त भी हो सकता है।
आयुर्वेद में नजला-जुकाम 6 प्रकार के बताये गये हैं। आचार्य चरक ने इसके चार प्रकार बताये हैं, जबकि आचार्य सुश्रुत ने पांच प्रकार माने हैं।
वायुजन्य (वातज) : 
वायु से उत्पन्न जुकाम में नाक में वेदना, सुंई चुभने जैसी पीड़ा, छींक आना, नाक से पतला स्राव आना, गला, तालु और होठों का सूख जाना, सिर दर्द और आवाज बैठ जाना आदि लक्षण होते हैं।
पित्तजन्य (पित्तज) : 
नाक से गर्म और पीले रंग का स्राव आना, नाक का अगला भाग पक जाना, ज्वर, मुख शुष्क हो जाना, बार-बार प्यास लगना, शरीर दुबला और त्वचा चमकरहित होना इसके लक्षण हैं। नाक से धुंआ निकलता महसूस होता है।
कफजन्य (कफज) : 
आंखों में सूजन, सिर में भारीपन, खांसी, अरुचि, नाक द्वारा कफ का स्राव, लाला स्राव और नाक के भीतर, गले और तालु में 'खुजली होती है।
त्रिदोषज : 
उपर्युक्त तीनों दोषों से उत्पन्न जुकाम बार-बार हो जाता हैे। साथ ही तीनों दोषों के मिलेजुले लक्षण दिखाई देते हैं। शरीर में अत्यधिक पीड़ा होती है।




रक्तजन्य (रक्तज) :
 नाक से लाल रंग का स्राव होता है। रोगी की आंखें लाल हो जाती हैं। मुंह से बदबू आती है। सीने में दर्द, गंध का ठीक तरह से पता न चलना आदि लक्षण होते हैं।
दूषित : नजला-जुकाम के सभी दोषों की अत्यंत वृद्धि हो जाने से बार-बार नाक बहना, सांस में दुर्गंध, नाक का बार-बार बंद होना-खुलना, सुंगंध-दुर्गंध पता न चलना आदि लक्षण होते हैं।
नजला-जुकाम के प्रमुख कारण : नजला-जुकाम मस्तिष्कजन्य रोग होते हुए भी इस रोग का मूल कारण अग्नि है; अर्थात जब जठराग्नि मंद होती है, तो इसमें अजीर्ण हो जाता है। पाचन क्रिया बिगड़ जाती है और भोजन ठीक से पच नहीं पाता एवं कब्ज हो जाने के कारण उपचय पदार्थ का विसर्जन नही होता, जिसके कारण जुकाम की उत्पत्ति होती है क्योंकि शरीर में एकत्रित विजातीय तत्व जब अन्य रास्तों से बाहर नहीं निकल पाते, तो वे जुकाम के रूप में नाक से निकलने लगते हैं। यह जुकाम अत्यधिक कष्टदायक होता है। इससे सिर, नाक, कान, गला तथा नेत्र के विकार उत्पन्न होने लगते हैं।
जुकाम का कारण मानसिक गड़बड़ी भी देखा गया है। इसके अतिरिक्त अन्य कारण हैं। मल, मूत्र, छींक, खांसी आदि वेगों को रोकना, नाक में धूल कण का प्रवेश होना, अधिक बोलना, क्रोध करना, अधिक सोना, अधिक जागरण करना, शीतल जल और ठंडे पेय पीना, अति मैथुन करना, रोना, धुएं आदि से मस्तिष्क में कफ जम जाना। साथ ही साथ मस्तिष्क में वायु की वृद्धि हो जाती है। तब ये दोनों दोष मिल कर नजला-जुकाम व्याधि उत्पन्न करते हैं।
जुकाम को साधारण रोग मान कर उसकी उपेक्षा करने से यह अति तकलीफदह हो जाता है; साथ ही अन्य विकार भी उत्पन्न होने लगते हैं। जुकाम बिगड़ने पर वह नजले का रूप धारण कर लेता है।
नजला हो जाने पर नाक में श्वास का अवरोध, नाक से हमेशा पानी बहना, नाक पक जाना, बाहरी गंध का ज्ञान न होना, मुख की दुर्गंध आदि विकार उत्पन्न हो जाते हैं।
कष्टदायी है जुकाम का बिगड़ना : जुकाम के बिगड़ जाने की अवस्था के बाद मस्तिष्क की अनेक व्याधियां होती हैं, जो कष्टदायी हो जाती हैं। इस रोग के कारण बहरापन, कान के पर्दे में छेद तथा कान, नाक, तालु, श्वास नलिका में कैंसर होने की संभावना रहती है। अंधापन भी उत्पन्न हो जाता है। कहा जाता है कि नजले ने शरीर के जिस अंग में अपना आश्रय बना लिया, वही अंग वह खा गया। दांतों में घुस गया, तो दांत गये, कान में गया, तो कान गये, आंखों में गया, तो आंखे गयी, छाती में जमा हो, तो दमा और कैंसर जैसी व्याधियां उत्पन्न कर देता है। सिर पर गया, तो बाल गये।



चिकित्सा : 

सबसे पहले रोग को उत्पन्न करने वाले कारणों को दूर करें। कफवर्द्धक, मधुर, शीतल, पचने में भारी पदार्थ न खाएं। दिन में सोने, ठंडी हवा का झोंका सीधे शरीर पर आने देने, अति मैथुन आदि से दूर रहें। पचने में हल्का, गर्म और रूखा आहार लें। सौंठ, तुलसी, अदरक, बैंगन, दूध, तोरई, हल्दी, मेथी दाना, लहसुन, प्याज आदि सेवनीय चीजें हैं। सोंठ के एक चम्मच को चार कप पानी में पका कर बनाया गया काढ़ा दिन में 3 -4 बार पीना लाभदायक है।
घरेलू उपचार :-
दो ग्राम मुलहठी चूर्ण को शहद के साथ दिन में 3 बार चाटने से जुकाम ठीक होता है।
सुहागे को तवे पर फुला कर चूर्ण बना लें। नजला-जुकाम होने पर गर्म पानी के साथ दिन में तीन बार लेने से पहले ही दिन, या ज्यादा से ज्यादा तीन दिनों में जुकाम ठीक हो जाएगा।
गर्म दूध के साथ सौंठ का चूर्ण सुबह-शाम सेवन करें।
काली मिर्च और बताशे पाव भर जल में पकावें। चौथाई रहने पर इसे गरमागरम पी लें। प्रातः खाली पेट और रात को सोते समय तीन दिन उपयोग करें। नजला-जुकाम से राहत मिलेगी।
षडबिंदु तेल की 4-4 बूंदे दोनों नथुनों में टपकाने से शीघ्र ही सिर के विकार नष्ट हो जाते हैं।
5 ग्राम अदरक के रस में 5 ग्राम तुलसी का रस मिला कर 10 ग्राम शहद से लें।
काली मिर्च को दूध में पका कर सुबह-शाम पीएं।
अमरूद के पत्ते चाय की तरह उबाल कर पीएं।
दिन में 2 बार अनार, या संतरे के छिलकों को उबाल कर उसका काढ़ा पीने से जुकाम ठीक हो जाता है।
चूने के पानी में गुड़ घोल कर पीने से जुकाम ठीक हो जाता है।

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Monday, July 31, 2017

पेट की गेस के आयुर्वेदिक घरेलु उपाय / Ayurvedic home remedies of stomach gas/



भाग दौड़ भरी इस जिन्दगी में शायद ही कोई व्यक्ति हो, जिसे पेट की गैस की परेशानी का अनुभव न हुआ हो। यह एक ऐसी बीमारी है, जो हर किसी को आसानी से जकड़ लेती है और बहुत परेशान भी करती है।
पेट की गैस क्यों बनती है?
गैस बनने के कई कारण होते हैं, जिनमें असंयमित होकर अनियमित आहार खाना , अधिक खट्टे, तीखे, मिर्च मसालेदार, बादी बढ़ाने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन , देर रात तक जागना , भोजन में सलाद का अभाव, पानी कम पीना, चना, उड्द, मटर, मूग, आलू, मसूर, गोभी चावल आदि का अधिक सेवन करना, क्रोध शोक, चिंता जैसे मानसिक कारण, परिश्रम न करना, यकृत रोग की उपस्थिति, मांसाहार का सेवन आदि।
पेट की गैस का घरेलू उपचार -
*प्रतिदिन 3 छोटी हरड मुंह में डालकर चूसते रहने से भी पेट की गैस की समस्या दूर हो जाती है|
*गाजर का रस पीने से रक्त की अशुद्धि और पेट की गैस दूर होती है।
*थोड़ा-सा सेंधा नमक तथा कालीमिर्च और लौंग 4-4 पीसकर आधी कटोरी पानी में उबालकर पीने से पेट की गैस में आराम मिलता है।
*पेट की गेस में पुदीना बेहद फायदेमंद है|
*पांच ग्राम अजवायन, 10 कालीमिर्च और 2 पीपल के पत्तो को शाम के समय पानी में भिगो दें और प्रात: समय इसे पीसकर शहद में मिलाकर 250 मि.ली. पानी के साथ सेवन करने से पेट की गैस का दर्द मिट जाता है।
*भुनी हुई हींग पीसकर सब्जी में डालकर खाने से पेट की गैस मिट जाती है।
*‘हिंगाटक चूर्ण’ पानी के साथ सेवन करने से पेट के सभी प्रकार के वायु विकार मिट जाते हैं।
गैस की रामबाण दवा – छिलका रहित लहसुन 10 ग्राम, जीरा, शुद्ध गंधक, सोंठ, सैंधा नमक, कालीमिर्च, *पिप्पली और घी में भुनी हुई हींग प्रत्येक 5-5 ग्राम लेकर सभी को पीसकर उसमे थोडा सा नीबू रस डालकर चने के आकार की गोलियां बनाकर सुरक्षित रख लें। यह 1-2 गोली भोजनोपरांत सेवन करते रहने से अपच, अजीर्ण , गैस की बीमारी ठीक हो जाती है |
*एक सेब छीलकर इसके इर्द-गिर्द जितनी भी लौंगें आ सकें उन्हें चुभो दें। फिर उस सेब को 40 दिन तक किसी सुरक्षित स्थान पर रखे दें। उसके बाद इन लौंगों को निकालकर किसी साफ-स्वच्छ शीशी में रख ले। भोजनोपरांत दिन में 2 बार 1-1 लौंग चूसने से पेट के सभी रोगों और पेट की गैस से भी मुक्ति मिल जाती है | यह पेट की गैस का रामबाण इलाज है |
*3 ग्राम कालीमिर्च और 6 ग्राम मिश्री पीसकर लेने से अफारा मिट जाता है। परंतु ऊपर से पानी न पिएं। यह भी एक अच्छी गैस की दवा है |




*पेट की गैस हो जाने पर पिसी हुई हल्दी 1 ग्राम में पिसा हुआ नमक 1 ग्राम मिलाकर गर्म पानी के साथ सेवन करने से गैस निकलकर पेट हल्का हो जाता है।

*एक चम्मच अजवाइन के साथ चुटकी भर काला नमक भोजन करने के बाद चबाकर खाने से पेट की गैस शीघ्र ही निकल जाती है।
*अदरक और नींबू का रस एक-एक चम्मच की मात्रा में लेकर उसमें थोड़ा-सा काला नमक मिलाकर भोजन के बाद दोनों समय सेवन करने से गैस की सारी तकलीफें दूर हो जाती हैं और खाना भी ठीक से हजम हो जाता है |
*भोजन करते समय बीच-बीच में लहसुन, हींग थोड़ी मात्रा में खाते रहने से गैस की समस्या से छुटकारा मिलता है |
*हरड, सोंठ का पाउडर आधा-आधा चम्मच की मात्रा में लेकर उसमें थोड़ा-सा सेंधा नमक मिलाकर भोजन के बाद पानी से सेवन करने से पाचन ठीक होता है और पेट की गैस की समस्या से भी छुटकारा मिलता है |
*नीबू का रस व मूली खाने से गैस की तकलीफ नहीं होती और पाचन क्रिया सुधरती है।
इसके अतिरिक्त सिर्फ अजवायन के चूर्ण को गर्म पानी के साथ सेवन करने से अफारा, पेट का तनाव, बदहजमी आदि रोगों में लाभ होता है। आवश्यकतानुसार 1-2 सप्ताह तक लगातार प्रयोग करें। इससे पेट की गैस की समस्या से छुटकारा मिलता है |
*125 ग्राम दही के मट्ठे में अजवायन 2 ग्राम और आधा ग्राम काला नमक (पीसकर व मिलाकर) भोजनोपरांत सेवन करने से पेट की गैस, अफारा, कब्ज आदि में बहुत लाभ होता है। आवश्यकतानुसार 1-2 सप्ताह तक प्रयोग करें।
*लहसुन की 1-2 कली छीलकर, बीज निकाली हुई मुनक्का में लपेटकर भोजनोपरांत थोडा सा चबाकर निगल लें यह पेट की गैस की अचूक दवा है |
*अदरक का रस, नीबू का रस और शहद प्रत्येक 6-6 ग्राम दिन में 3 बार सेवन करने से पेट की गैस की समस्या से छुटकारा मिलता है |
*प्याज के रस में काला नमक और हींग पीसकर व मिलाकर पीने से पेट की गैस और गैस का दर्द ठीक हो जाता है
*गुड़ और मैथीदाना को उबालकर पीने से पेट की गैस की समस्या से छुटकारा मिलता है।
नोट – जिन लोगों को गर्म तासीर वाली वस्तुएं हजम न होती हो या जिनके शरीर में जलन अनुभव होता हो, उन्हें भी मैथीदाना का प्रयोग नहीं करना चाहिए या जो लोग कमजोर हों अथवा चक्कर आते हों, उन्हें भी मैथीदाने का निरंतर प्रयोग नहीं करना चाहिए।
*काली हरड (इसको छोटी हरड, बाल हरड़, आदि नामों से भी जाना जाता है) को पानी से भली-भांति धोकर किसी साफ-स्वच्छ कपड़े से पोंछकर साफ करके सुरक्षित रख लें। भोजनोपरांत दिन में 2 बार 1 हरड को मुंह में रखकर चूसने से गैस व कब्ज में लाभ होता है। हरड भी पेट की गैस की रामबाण दवा होती है


*पेट के आसन करने से भी पेट के रोगों में लाभ मिलता है।
*शराब, चाय, कॉफी, तम्बाकू, गुटखा, सिगरेट जैसे व्यसन से बचें।
प्राकृतिक वेगों को रोके रखने की आदत छोड़े। दिन में सोना छोड़ दें और रात्रि को मानसिक परिश्रम और तनाव से बचें।
*मानसिक तनाव, अशांति, भय, चिंता, क्रोध, के कारण पाचन अगों के आवश्यक पाचक रसों का स्राव कम हो जाता है, जिससे अजीर्ण की तकलीफ हो जाती है और अजीर्ण का विकृत रूप पेट की गैस की बीमारी पैदा करता है।
*भोजन में मूंग , चना, मसूर, मटर अरहर, आलू, सेम फली , चावल तथा तेज मिर्च मसाले युक्त आहार अधिक मात्रा में सेवन न करें। शीघ्र पचने वाले आहार जैसे सब्जियां, खिचड़ी, चोकर सहित बनी आटे की रोटी, मट्ठा, दूध, तोरई, कददू , पालक, टिंडा, शलजम, अदरक, आंवला (Amla), नीबू (Lemon)आदि का सेवन अधिक करना चाहिए।
*भोजन खूब चबा-चबाकर आराम से खाना चाहिए। बीच-बीच में अधिक पानी न पिएं। भोजन के दो घंटे बाद एक-दो गिलास पानी पिएं, थोड़ी भूख शेष रह जाए, उतना ही भोजन करें।
*दोनों समय के मुख्य भोजन के बीच हल्का नाश्ता फल आदि अवश्य खाएं। तले, गरिष्ठ भोजन से परहेज करें।
भोजन सादा, सात्विक और प्राकृतिक अवस्था में सेवन करने का प्रयत्न करें। ठंडा और बासी भोजन करने से बचें।
*दिन भर में 8-10 गिलास पानी का सेवन अवश्य करें। प्रतिदिन कोई न कोई व्यायाम करने की आदत बनाएं। शाम को घूमने जाएं। समय निकाल कर प्रात: भ्रमण करना श्रेष्ठ होता है






Friday, July 28, 2017

यकृत (लीवर) के रोग के घरेलु उपचार / Home remedies for liver disease


   लिवर को हिंदी में जिगर कहा जाता है. यह शरीर की सबसे महत्वपूर्ण और बड़ी ग्रंथी है. यह पेट के दाहिनी ओर नीचे की तरफ होता है. लिवर शरीर की बहुत सी क्रियाओं को नियंत्रित करता है. लिवर खराब होने पर शरीर की कार्य करने की क्षमता न के बराबर हो जाती है और लिवर डैमेज का सही समय पर इलाज कराना भी जरूरी होता है नहीं तो यह गंभीर समस्या बन सकती है. गलत आदतों की वजह से लीवर खराब होने की आशंका सबसे ज्यादा होती है. जैसे शराब का अधिक सेवन करना, धूम्रपान अधिक करना, खट्टा ज्यादा खाना, अधिक नमक सेवन आदि. सबसे पहले लिवर खराब होने के लक्षणों को जानना जरूरी है. जिससे समय रहते आपको पता रहे और इलाज सही समय पर हो सके.
लिवर के रोगों के कारण-
*मलेरिया, टायफायड से पीडित होना.
* रंग लगी हुई मिठाइयों और डिं्रक का प्रयोग करना.
* सौंदर्य वाले कास्मेटिक्स का अधिक इस्तेमाल करना.
*. चाय, काफी, जंक फूड आदि का प्रयोग अधिक करना.
* दूषित मांस खाना, गंदा पानी पीना, मिर्च मसालेदार और चटपटे खाने का अधिक सेवन करना.
*पीने वाले पानी में क्लोरीन की मात्रा का अधिक होना.
* शरीर में विटामिन बी की कमी होना.
* एंटीबायोटिक दवाईयों का अधिक मात्रा में सेवन करना.
*. घर की सफाई पर उचित ध्यान न देना.
*लिवर खराब होने से शरीर पर ये लक्षण दिखाई देने लगते हैं.


*लीवर बड़ा हो जाता है तो पेट में सूजन आने लगती है , जिसको आप अक्सर मोटापा समझने की भूल कर बैठते हैं.

* मुंह का स्वाद खराब होना आदि
* लिवर वाली जगह पर दबाने से दर्द होना.

* भूख न लगने की समस्या, बदहजमी होना, पेट में गैस बनना.
*शरीर में आलसपन और कमजोरी का होना.
प्राकृतिक चिकित्सा के द्वारा लिवर को ठीक करने के उपाय. इन उपायों के द्वारा लिवर के सभी तरह के कार्य पूर्ण रूप से सही कार्य करने लगते हैं. लिवर को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है टाॅक्सिंस वायरस. इसलिए लिवर का उपचार करने से पहले रोगी का खून साफ होना जरूरी है ताकी लिवर पर जमें दूषित दोष नष्ट हो सके और लीवर का भार कम हो सके. इसलिए रोगी को अतरिक्त विश्राम की जरूरत होती है.


प्राकृतिक चिकित्सा कैसे करें?

सुबह उठकर खुली हवा में गहरी सांसे ले. प्रातःकाल उठकर कुछ कदम पैदल चलें और चलते चलते ही खुली हवा की गहरी सांसे लें. आपको लाभ मिलेगा.
सप्ताह में सरसों की तेल की मालिश पूरे शरीर में करें. मिट्टी का लेप सप्ताह में एक बार पूरे शरीर पर जरूर लगाएं. आप सप्ताह में एक बार वाष्प का स्नान भी लें. सन बाथ भी आप कर सकते हो.
आहार चिकित्सा
लिवर संबंधी बीमारी को दूर करने में आहार चिकित्सा भी जरूरी है. यानि क्या खाएं और कितनी मात्रा में खायें यह जानना भी जरूरी हैं. लिवर की बीमारी से परेशान रोगीयों के लिए ये आहार महत्वपूर्ण होते हैं.
लिवर की बीमारी में जूस का सेवन महत्वपूर्ण माना जाता है. लिवर के रोगी को नारियल पानी, शुद्ध गन्ने का रस, या फिर मूली का जूस अपने आहार में शामिल करना चाहिए. पालक, तोरई, लौकी, शलजम, गाजर, पेठा का भी जूस आप ले सकते हो.
दिन में 3 से 4 बार आप नींबू पानी का सेवन करें. सब्जियों का सूप पीएं, अमरूद, तरबूज, नाशपाती, मौसमी, अनार, सेब, पपीता, आलूबुखारा आदि फलों का सेवन करें.
सब्जियों में पालक, बथुआ, घीया, टिंडा, तोरई, शलजम, अंवला आदि का सेवन अपने भोजन में अधिक से अधिक से करें. सलाद, अंकुरित दाल को भी अधिक से अधिक लें. भाप में पके हुए या फिर उबले हुए पदार्थ का सेवन करें.लिवर की बीमारी को दूर करने के लिए आप इन चीजों का सेवन अधिक से अधिक करें.


जामुन लिवर की बीमारी को दूर करने में सहायक होता है. प्रतिदिन 100 ग्राम तक जामुन का सेवन करें. सेब का सेवन करने से भी लिवर को ताकत मिलती है. सेब का सेवन भी अधिक से अधिक करें. गाजर का सूप भी लिवर की बीमारियों को दूर करने में सहायक होता है. यदि लिवर में सूजन है तो खरबूजे का प्रयोग अधिक से अधिक करें. पपीता भी लिवर को शक्ति देता है.

आंवला विटामिन सी के स्रोतों में से एक है और इसका सेवन करने से लीवर बेहतर तरीके से काम करने लगता है . लीवर के स्वास्थ्य के लिए आपको दिन में 4-5 कच्चे आंवले खाने चाहिए. एक शोध साबित किया है कि आंवला में लीवर को सुरक्षित रखने वाले सभी तत्व मौजूद हैं.
लीवर की बीमारियों के इलाज के लिए मुलेठी एक कारगर वैदिक औषधि है . मुलेठी की जड़ को पीसकर पाउडर बनाकर इसे उबलते पानी में डालें. फिर ठंड़ा होने पर साफ कपड़े से छान लें. इस चाय रुपी पानी को दिन में एक या दो बार पिएं.
पालक और गाजर का रस का मिश्रण लीवर सिरोसिस के लिए काफी फायदेमंद घरेलू उपाय है. गाजर के रस और पालक का रस को बराबर भाग में मिलाकर पिएं. लीवर को ठीक रखने के लिए इस प्राकृतिक रस को रोजाना कम से कम एक बार जरूर पिएं
सेब और पत्तेदार सब्जियों में मौजूद पेक्टिन पाचन तंत्र में जमे विष से लीवर की रक्षा करता है.कैसे करें लिवर का बचाव
लिवर (Liver) का बचाव करने के लिए आपको बस इन आसान कामों को करना है और पूरे नियम से करना है. क्योंकि लिवर शरीर का महत्वपूर्ण हिस्सा है इसलिए आपको अपने जीवनशैली में थोड़ा सा परिवर्तन लाना होगा. ताकि आप लिवर की बीमारी से बच सकें.
जब भी आप सुबह उठें तो 3 से 4 गिलास पानी का सेवन जरूर करें. उसके बाद आप पार्क में टहलें. दिन में हो सके तो 2 से 3 बार नींबू पानी का सेवन करें. लिवर को स्वस्थ रखने के लिए शारीरिक काम भी करते रहें. कभी भी भोजन करते समय पानी का सेवन न करें और खाने के 1 घंटे बाद ही पानी का सेवन करें. चाय, काफी आदि से दूर रहें. किसी भी तरह के नशीली चीजों का सेवन न करें. तले हुए खाने से दूर ही रहें. साथ ही जंक फूड, पैकेज्ड खाने का सेवन न करें.
अनुलोम विलोम प्राणायाम, भस्त्रिका प्राणायाम को प्रातः जरूर करें. इन सभी बातों को ध्यान में यदि आप रखेगें तो आप लिवर की बीमारी से बचे रहेगें.
लीवर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने के लिए सेब के सिरके का इस्तेमाल करें. खाना खाने से पहले सेब का सिरका पीने से चर्बी कम होती है. एक चम्मच सेब का सिरका एक गिलास पानी में मिलाएं और इसमें एक चम्मच शहद भी मिलाएं. इस मिश्रण को दिन में दो या तीन बार तक पींए.
आंवला भी लिवर की बीमारी को ठीक करता है. इसलिए लिवर को स्वस्थ रखने के लिए दिन में 4 से 5 कच्चे आंवले खाने चाहिए





Thursday, July 27, 2017

कलर थेरेपी के उपयोग और फायदे/Uses and Benefits of Color Therapy


आप ऊर्जा की कमी महसूस करते हैं, आत्मविश्वास में कमी पाते हैं, सोच स्पष्ट नहीं हो पाती तो रंग चिकित्सा आपकी सहायता कर सकती है। 

रंग चिकित्सा के उपयोग और फायदे-
रंगों का हमारे मन-मस्तिष्क पर गहरा असर पड़ता है। रंगों की इस ताकत ने उपचार के लिए भी उपयोगी बना दिया। कई सारी बीमारियां हैं, जिनके उपचार के लिए रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। इन खूबियों के कारण इसे कलर थेरेपी यानी रंग चिकित्सा का नाम दिया गया है।
बढ़ रही है लोकप्रियता-
भारत में यह चिकित्सा अभी लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाई है, लेकिन यूट्यूब पर इससे संबंधित लगभग डेढ़ लाख वीडियो मौजूद हैं। इनमें काफी भारतीयों से संबंधित भी हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह अब भारत में भी लोकप्रिय हो रहा है।
कैसे आया प्रचालन में -
रंगों और इंसानी व्यवहार को देखते हुए तमाम लोगों ने इसपर शोध किए। इनमें से एक नाम जर्मनी के नामी लेखक, कलाकार व दार्शनिक गोथ का भी है। उन्होंने यह साबित करने की कोशिश की कि रंगों का हमारी भावनाओं पर सीधा असर पड़ता है। कुछ ऐसे ही शोधों से यह विचार आया कि क्यूं न रंगों का इस्तेमाल इंसान के मूड से जुड़ी दिक्कतों को दूर करने में किया जाए।

हर रंग कुछ कहता है-

हमारी आंखें रंग को देखती हैं, वो दिमाग को मैसेज भेजती हैं और हमारा दिमाग ऐसे रसायन पैदा करता है, जो हमें नाक-मुंह सिकोड़ने या स्माइल करने का सिग्नल देते हैं। किसी कपड़े की दुकान पर दो युवतियों को कपड़े पसंद करते हुए देखकर आप इसका अंदाजा लगा सकते हैं।
कैसे काम करती है यह कलर थैरेपी
इसके दो तरीके हैं। इसमें सबसे ज्यादा इस्तेमाल में लायी जाती है रोशनी। सूरज की रोशनी को अपनी जरूरत के हिसाब के रंग में से गुजारते हुए शरीर के किसी खास हिस्से पर फेंका जाता है। लैंप जैसी मशीन के जरिए भी रोशनी फेंकी जाती है। इसके अलावा शरीर पर सीधे-सीधे पेंट भी किया जाता है। ये रंग हर्बल होते हैं। अलग-अलग परेशानियों के लिए अलग-अलग रंगों का इस्तेमाल किया जाता है।
एक बार आजमाएं-
अगर कभी सर्दी व कफ हो जाए तो लाल रंग की रोशनी को छाती के ऊपर पांच से सात मिनट तक डाले रखें। आपको जरूर लाभ होगा।
सावधानी भी है जरूरी
लाल: 5 से 10 मिनट, सिर, चेहरे पर कभी नहीं।
संतरी: 5 से 10 मिनट
पीला: 15 मिनट
हरा: 10 से 25 मिनट
नीला: 10 मिनट तक, सिर के आसपास ज्यादा देर तक नहीं।
रंग और उसका असर
लाल रंग : हिम्मत, जोश और ऊर्जा




लाल रंग से हीमोग्लोबीन बढ़ता है, जो शरीर में ऊर्जा पैदा करता है। आयरन की कमी और खून से जुड़ी दिक्कतों में इस रंग का इस्तेमाल बड़े काम का साबित होता है।

संतरी: खुशी, आत्मविश्वास और संपूर्णता
ये रंग आपको दिनभर खुशमिजाज रख सकता है। ये रंग जीवन के लिए भूख पैदा करता है। ये हमें हमारी भावनाओं से जोड़ता है और हमें स्वतंत्र व सामाजिक बनाता है।
पीला: समझदारी और स्पष्ट सोच
इस रंग का सबसे ज्यादा असर हमारे दिमाग और बुद्धि पर पड़ता है। कहते हैं कि आंतों और पेट से जुड़ी गड़बड़ियों को दुरुस्त करने में भी ये रंग काम आता है।
हरा: प्यार, आत्म नियंत्रण और संतुलन
हरे रंग में घावों को भरने की शक्ति होती है। इंद्रधनुष के रंगों के बीच में हरा पड़ता है। इस रंग में आध्यात्मिक और शारीरिक दोनों तरह के प्रभाव डालने की क्षमता होती है। ये मसल्स को आराम देता है।
इंडिगो: दिमागी संतुलन, समझदारी
इस रंग को पवित्रता की किरण माना जाता है। यह रक्त की सफाई और दिमागी समस्याओं के निदान में बड़ा कारगर है। यह भी कहा जाता है कि इस रंग का संबंध हमारी आत्मा से होता है। आंखों और कानों से जुड़ी दिक्कतों को दूर करने में इसका इस्तेमाल किया जाता है।
जामुनी: सुंदरता और रचनात्मकता
यह रंग सिर्फ आत्मिक स्तर पर काम करता है। लियोनाडरे द विंची ने एक बार कहा था कि आप जामुनी रोशनी के बीच योग करें तो आपकी योग करने की शक्ति दस गुना तक बढ़ सकती है। यह रंग हमारे विचारों को शुद्ध करता है। इंसान को भीतर से मजबूत करने के साथ-साथ कलात्मक सोच को बढ़ावा देता है।
सफेद: शांति
सफेद अपने आप में एक पूर्ण रंग है। अगर सभी रंगों को एक चक्र पर बनाकर उसे तेजी से घुमाएं तो आपको सिर्फ सफेद रंग ही नजर आएगा। यह रंग शांति देता है और घावों को भरने में मदद देता है।
इस थेरेपी का इस्तेमाल
फिलहाल इस थेरेपी का इस्तेमाल ऐसे क्लीनिक में किया जा रहा है जो योग, आयुर्वेद व चेचुरोपैथी के जरिए रोगों के दिना में जुटे हैं। दिल्ली-एनसीआर में ऐसे सेंटर हैं, जो कलर थैरेपी की सुविधा मुहैया कराते हैं। इसकी फीस एक सिटिंग की हजार से 1200 रुपये के बीच होती है। फिलहाल रंग चिकित्सा का इस्तेमाल तनाव, आत्मविश्वास की कमी, उदासी और अशांत मन को दुरुस्त करने के लिए किया जा रहा है।
कुछ प्रमुख केन्द्र
– एन 2 इमेजिंग, ए-5, ग्रीन पार्क
– चक्र अ क्यूपंक्चर वेलनेस सेंटर, वशिष्ट पार्क, पंखा रोग, सागरपुर
– अक्यूप्रेशर हेल्थ केयर होम सविर्सेस, बलजीत विहार, नांगलोई
– महर्षि आयुर्वेद हॉस्पिटल, वेस्ट शालीमार बाग
– आयुष नेचर केयर, मानसरोवर पार्क, शाहदरा
क्रोमो थेरेपी टॉर्च भी है मौजूद
आप खुद भी कलर थेरेपी का लाभ प्राप्त कर सकता है। इसके लिए बाजार में उपकरण भी मिलने लगे हैं। ऐसा ही एक उपकरण है कलर टॉर्च। यह टॉर्च अलग-अलग रंगों की डिस्क के साथ आती है। जिस भी रंग की जरूरत हो, लगाएं और इस्तेमाल करें। वैसे कलर थेरेपी के उपकरण के साथ उन्हें इस्तेमाल करने के लिए छोटी सी किताब भी दी जाती है








Wednesday, July 26, 2017

आंतों के रोग के कारण ,लक्षण व उपचार //Treatment of intestinal disease



आंतों के रोग का कारण व लक्षण
बिना चबाए भोजन निगलनेवालों,लगातार कुछ-न-कुछ खाते रहनेवालों, पानी कम पीनेवालों, चिकनाई का कम सेवन करनेवालों का आतों के रोग की चपेट में आना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। ज्यादा गरिष्ठ भोजन आंतों की कार्यप्रणाली को बिगाड़ देता है। रोग गंभीर होने पर ऑपरेशन भी करवाना पड़ सकता है। आतों में कई प्रकार के रोग हो सकते हैं-जैसे आंतों में जलन, जख्म, सूजन, पीड़ा व आंत्र ज्वर।
आंतों के रोग का उपचार
*. मौसमीः
आत्रज्वर में मौसमी का सेवन लाभदायक होता है।
* केलाः
आत्रज्वर के रोगियों को केला काफी मात्रा में खाना चाहिए। इससे बहुत लाभ होता है। इससे आंतों की सूजन भी समाप्त हो जाती है।
* सेवः
सेव खाने से आतों के जख्म ठीक हो जाते हैं व सूजन मिट जाती है। सेव का रस पीने से आतों के घावों में आराम मिलता है।
* बेरः
बेर ठंडा व रक्तशोधक फल है। इसके सेवन से आतों के घाव ठीक हो जाते हैं।
3. संतराः
आंत के रोगियों को नित्य एक गिलास संतरे का रस पीना चाहिए।
* बेलः
पेट के भीतर की बड़ी आंतों में सूजन आ गई हो तो बेलपत्र का रस तथा बेलगिरी का हलवा साथ में लीजिए। पहले रस पी जाइए फिर पके हुए बेल का गूदा या हलवा खा जाइए। बेलपत्र का रस सूजन व घावों का इलाज करेगा तथा गूदे का हलवा सब कुछ पूर्ववत बना देगा।
* चुकंदर व गाजर का रसः
बड़ी आंत की सूजन में 185 ग्राम गाजर का रस 150 ग्राम चुकंदर का रस व लगभग 160 ग्राम खीरे का रस मिलाकर पीने से काफी आराम मिलता है।



* नारंगीः

नारंगी गर्मी शांत करनेवाली होती है। आत्रज्वर के रोगी को दूध में नारंगी का रस मिलाकर पिलाएं या फिर दूध पिलाकर नारंगी खिलाएं दिन में कई बार नारंगी खिलाएं। इससे आत्रज्वर में काफी राहत मिलती है।
* अनारः
अनार खाने से आतों के विभिन्न रोगों में लाभ होता है।
धनिया।
एक चम्मच साबुत बिना पिसा हुआ धनिया एक चम्मच बूरा खांड(चीनी) दोनों चबा चबाकर खाए और अंत में पानी से निगल जाएँ। दस्त पेट के रोगो में लाभ होगा।
रात को धनिया पानी में भिगोकर प्रात : पानी छानकर बूरा खांड(चीनी) या शक्कर मिलाकर नित्य पियें। ये प्रयोग अनेक लोगो पर सफलता पूर्वक आज़माया हुआ हैं।अजवायन
* साधारण जल से इसे खाने से बदहजमी, अरुचि व् मंदाग्नि मिटती है।
*गुनगुने पानी के साथ केवल अजवायन का चूर्ण खाने से बदहजमी, खांसी, पेट का तनाव, गुल्म (ट्यूमर), तिल्ली, कफ की खराबी, कफ और वायु की बहुत प्रकार की खराबियां दूर होती है। पेट के छोटे- बड़े केंचुए नष्ट हो जाते है। इन सब शिकायतों में आवश्यकता अनुसार सप्ताह- दो सप्ताह तक ले।
* अकेली अजवायन में चिरायते का कटुपोष्टिक, हींग का वायुनाशक और काली मिर्च का अग्निदीपक गुण समाया हुआ है। “एक यवानी शतमन्नपाचिका” अर्थात अकेली अजवायन सैकड़ो प्रकार के अन्न को पचाने वाली होती है। पेट दर्द, अफारा, वायुगोला, कफ, वात, शूल, वमन, कृमि, बवासीर, व् संक्रमण रोगो में यह बहुत ही लाभकारी है।
*अमृतधारा की दो-तीन बुँदे बताशे या खांड या पानी में डालकर लेने से पेट दर्द मिटता है। यदि एक बार में न मिटे तो आधा घंटे बाद फिर एक ऐसी खुराक लेने से आराम हो जाता है।
*तीन चम्मच ठंडे पानी में दो-तीन बुँदे अमृतधारा, सुबह शाम भोजन के बाद लेने से दस्त, आंव के दस्त, मरोड़, पेचिस, अतिसार, हैजा, खट्टी डकार, तेज प्यास, अधिक प्यास, पेट फूलना, पेट दर्द, खाना खाते ही उलटी या दस्त होना, मंदाग्नि, बादी, बदहजमी, आदि रोग मिटते है।



इसबगोल

इसबगोल इरिटेबल बाउल सिंड्रोम में बहुत लाभकारी हैं। इसबगोल फाइबर का बहुत अच्छा स्त्रोत हैं। ये मल को बांधकर रखता हैं। और इस रोग में तो ये रामबाण हैं। भोजन के १५ मिनट पहले एक चम्मच इसबगोल का छिलका ठन्डे पानी के साथ लेना चाहिए।
हल्दी
इस रोग में हल्दी बहुत लाभ करती हैं। भोजन के एक घंटा पहले या बाद में आधा चम्मच पिसी हल्दी की फंकी ठन्डे पानी से नित्य लीजिये। आंतो के रोगो में हल्दी बहुत गुणकारी हैं।
बेल, धनिया, मिश्री, सौंफ
अमीबोबायसिस, इरिटेबल बाउल सिंड्रोम, कई बार दस्त जाना, आंव, पेचिश, आदि पाचन तंत्र के रोग, चाहे नया रोग हो चाहे पुराना हो इनमे ये निम्नलिखित प्रयोग बहुत सफल हैं।
पिसा हुआ धनिया, मिश्री, सौंफ, बेल(बेलगिरी के फल) का चूर्ण इनको 100 – 100 ग्राम की मात्रा में मिलाये। अब इसमें एक चौथाई भाग अर्थात 25 ग्राम पीसी हुई सौंठ मिलाकर इस मिश्रण की दो दो चम्मच खाने से एक घंटा पहले चार बार पानी से फंकी ले।
घर पर बनाये चूर्ण.
सोंठ, नागरमोथा, अतीस और गिलोय ये सभी पंसारी (जो आयुर्वेदिक कच्ची दवा बेचता है) से मिल जाएँगी. इन सब का बराबर चूर्ण लेके मिक्स कर लें। फिर 10gm चूर्ण लेके 400ml पानी मे डाल के उबालिये फिर 100ml बच जाए तो उतार कर छान लीजिये। यह सुबह शाम खली पेट सेवन करना है।






Sunday, July 23, 2017

चेहरे के ब्लेकहेड्स दूर करने के उपचार / Remedies for removing blackheads of the face



चेहरे पर पिंपल्स और मुंहासे ही नहीं बल्कि कई और समस्याएं भी होती है। ब्लैकहेड्स उन समस्याओं में से एक है। ब्लैकहेड्स के कारण हमारा चेहरा बेकार लगने लगता है। बहुत सी लड़कियां इन ब्लैकहेड्स को हटाने की कोशिश में भी लगी रहती हैं और इनको दबाकर निकालने की कोशिश करती हैं। इससे चेहरे पर निशान बन जाते हैं, जो कि आपकी सुंदरता में दाग लगा देते हैं।
आज हम आपको कुछ ऐसे असरदार उपायों के बारे में बताने जा रहें हैं, जो कि आपकी त्वचा में होने वाले ब्लैकहेड्स को मिनटों में गायब कर देंगे।
ग्रीन टी (Green tea)
ग्रीन टी में एंटीऑक्सीडेंट्स के साथ ही विटामिन्स भी होते हैं, जो हमारे चेहरे पर अतिरिक्त ऑयल को जमा नहीं होने देते हैं। आप सूखी ग्रीन टी को एक चम्मच पानी में मिलाकर पेस्ट तैयार कर लें। अब इस पेस्ट को आप ब्लैकहेड्स पर लगाएं। इसे 2 से 3 मिनट तक स्क्रब करें। इसके बाद आप गुनगुने पानी से अपने चेहरे को धो लें। इसके बाद आप एक बेहतरीन मॉइश्चराइजर से अपनी त्वचा को मसाज कर लें।
नींबू का रस (Lemon Juice)
इसे इस्तेमाल करने के लिए आप नींबू के रस में शहद मिला लें। इसके बाद आप इसमें चीनी मिलाएं। अब इस पेस्ट को ब्लैकहेड्स पर लगा लें। इसे 10 मिनट तक रब करें और इसके बाद आपको कुछ ही देर में ब्लैकहेड्स से छुटकारा मिल जाएगा। आप अपने चेहरे में दिन में दो बार इस उपचार को ट्राई कर सकती हैं।
बेकिंग सोडा (Baking Soda)
आप 3 चम्मच बेकिंग सोडा को पानी में मिलाकर एक पेस्ट तैयार कर लें। इस पेस्ट को आप अपने ब्लैकहेड्स पर लगाएं। इसके बाद आप थोड़ी देर ब्लैकहेड्स पर इस पेस्ट से मसाज करें। इसके बाद आप हल्के गर्म पानी से इस जगह को धो लें। ऐसा आप सप्ताह में दो बार करें
दालचीनी (Cinnamon)
दालचीनी पाउडर में नींबू का रस मिला लें। इसके बाद आप चुटकीभर हल्दी पाउडर इसमें मिला लें। इस पेस्ट को आप अपने चेहरे पर 10 से 15 मिनट तक लगाकर रखें। इसके बाद आप अपने चेहरे को धो लें। इससे आपको ब्लैकहेड्स से छुटकारा मिल जाएगा।

ओटमील (Oatmeal)
टमाटर जूस में ओटमील को मिला लें। इसके बाद आप एक चम्मच शहद को इसमें मिलाकर आप इस पेस्ट को ब्लैकहेड्स पर लगाकर स्क्रब करें। 10 मिनट के बाद आप अपने चेहरे को धो लें। इस उपचार का इस्तेमाल आप रोज कर सकती हैं। इससे आपकी त्वचा बिल्कुल साफ हो जाएगी।







कफ दोष के लक्षण और आयुर्वेदिक घरेलु उपचार / Symptoms of cough and Ayurvedic home remedies



कफ  याने बलगम हमारे गले व फेफड़ों में जमने वाली एक श्लेष्मा होती है जो खांसी या खांसने के साथ बाहर आता है। यह फायदेमंद और नुकसानदायक दोनों है। हमारे दैनिक सांस लेने क्रिया के समय जो गन्दगी हमारे शरीर में जाती है। उसे यह अपने में चिपका लेता है जो सुबह के समय नहाते या मुंह धोते समय खांसने से बाहर निकल जाता है। इस तरह ये हमारा फायदा करती है अगर यह ज्यादा हो जाती है तो सांस लेने में तकलीफ पैदा कर देती है। छाती भारी लगती है। यहां पर यह नुकसान करती है।
घरेलु उपचार
*घी : 
बालक की छाती पर गाय का घी धीरे-धीरे मसलने से जमा हुआ कफ (बलगम) निकल जाता है।
*हल्दी :
★ कफ (बलगम) जम जाने के कारण सांस लेने में छाती कांपती हो तो 1-2 बार कपड़े से छानकर गाय के मूत्र में थोड़ी-सी हल्दी मिलाकर पिलाना कफ (बलगम)-खांसी में फायदेमंद होता है।
★ श्लेष्मा, रेशा गिरता हो तो आधा चम्मच हल्दी की फंकी गर्म दूध से सेवन करना चाहिए।
★ कफ (बलगम) के कारण सीने में घबराहट पैदा होती है तो गर्म पानी के साथ नमक घोलकर पिलाना चाहिए।
★ जुकाम, दमा में कफ (बलगम) गिरता हो तो नियमित तीन बार 2 ग्राम हल्दी की फंकी गर्म पानी से लेना चाहिए।
. अदरक : 
अदरक को छीलकर मटर के बराबर उसका टुकड़ा मुख में रखकर चूसने से कफ (बलगम) आसानी से निकल आता है।



*सरसों :

★ सरसों के तेल में नमक मिलाकर मालिश करने से छाती में जमी हुई कफ (बलगम) Cough/balgam की गांठें निकल जाती हैं।
★ सत्यानाशी के पंचाग का पांच सौ ग्राम रस निकालकर उसको आग पर उबालना चाहिए। जब वह रबड़ी की तरह गाढ़ा हो जाए तब उसमें पुराना गुड़ 60 ग्राम और राल 20 ग्राम मिलाकर, खरलकर लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग की गोलियां बना लेनी चाहिए, एक गोली दिन में तीन बार गरम पानी के साथ देने से दमे में लाभ होता है।
★ सरसों के पत्तों के रस का घनक्वाथ बनाकर इसमें बैन्जोइक एसिड समान भाग मिलाकर चने के बराबर गोलियां बनाकर रख लें।
★ इसकी एक गोली दिन में तीन बार सेवन करने से श्वास रोगी को लाभ होता है।
भांगरा :
★ तिल्ली बढ़ी हुई हो, भूख न लग रही हो, लीवर ठीक से कार्य न कर रहा हो, कफ व खांसी भी हो और बुखार भी बना रहे। तब भांगरे का 4-6 मिलीलीटर रस 300 मिलीलीटर दूध में मिलाकर सुबह-शाम के समय सेवन करने से लाभ होता है।
★ टायफाइड से पीड़ित रोगी को भांगरा के रस की 2-2 चम्मच मात्रा को दिन में 2-3 बार सेवन करने से लाभ मिलता है।
★ गोद के बच्चे या नवजात बच्चे को कफ (बलगम) अगर होता है तो 2 बूंदें भांगरे के रस में 8 बूंद शहद मिलाकर उंगली के द्वारा चटाने से कफ (बलगम) निकल जाता है।



*. आंवला
:
आंवला सूखा और मुलहठी को अलग-अलग बारीक करके चूर्ण बना लें और मिलाकर रख लें। इसमें से एक चम्मच चूर्ण दिन में दो बार खाली पेट सुबह-शाम हफ्ते दो बार जरूर लें। इससे छाती में जमा हुआ सारा कफ (बलगम) बाहर आ जायेगा।
*बहेड़ा : 
बहेड़ा की छाल का टुकड़ा मुंह में रखकर चूसते रहने से खांसी मिटती है और कफ (बलगम) आसानी से निकल जाता है और खांसी की गुदगुदी बन्द हो जाती है।
*रूद्राक्ष : 
बच्चे की छाती में अगर ज्यादा कफ (बलगम) जम गया हो और कफ निकलने की कोई आशा नज़र न आ रही हो तो ऐसे में रूद्राक्ष को घिसकर शहद में मिलाकर 5-5 मिनट के बाद चटाने से उल्टी द्वारा कफ (बलगम) निकल जाता है।





Thursday, July 20, 2017

रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाने के आहार // Diet to increase disease resistance





रोग प्रतिरोधक क्षमता हमें कई बीमारियों से सुरक्षित रखती है. छोटी-मोटी ऐसी कई बीमारियां होती हैं जिनसे हमारा शरीर खुद ही निपट लेता है. रोग प्रतिरोधक क्षमता के कमजोर होने पर बीमारियों का असर जल्दी होता है. ऐसे में शरीर कमजोर हो जाता है और हम जल्दी-जल्दी बीमार पड़ने लगते हैं.
हमारा इम्यून सिस्टम हमें कई तरह की बीमारियों से सुरक्ष‍ित रखता है. रोग प्रतिरोधक क्षमता कई तरह के बैक्टीरियल संक्रमण, फंगस संक्रमण से सुरक्षा प्रदान करता है. इन बातों से यह तो स्पष्ट हो जाता है कि इम्यून पावर के कमजोर होने पर बीमार होने की आशंका बढ़ जाती है. ऐसे में ये बहुत जरूरी है कि हम अपनी इम्यून पावर को बनाए रखें.
रोग प्रतिरोधक क्षमता के कमजोर होने के कई कारण हो सकते हैं. कई बार ये खानपान की लापरवाही की वजह से होता है, कई बार नशा करने की गलत आदतों के चलते और कई बार यह जन्मजात कमजोरी की वजह से भी होता है.
अब सवाल ये उठता है कि अगर इम्यून पावर कमजोर हो जाए तो उसे बढ़ाने के लिए क्या उपाय किए जाने चाहिए? यहां ऐसे ही कुछ उपायों का जिक्र है जिन्हें आजमाकर आप एक सप्ताह के भीतर अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकते हैं :
*ओट्स में पर्याप्त मात्रा में फाइबर्स पाए जाते हैं. साथ ही इसमें एंटी-माइक्राबियल गुण भी होता है. हर रोज ओट्स का सेवन करने से इम्यून सिस्टम मजबूत बनता है.


* विटामिन डी हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है. इससे कई रोगों से लड़ने की ताकत मिलती है. साथ ही हड्डियों को मजबूत बनाए रखने के लिए और दिल संबंधी बीमारियों को दूर रखने के लिए भी विटामिन डी लेना बहुत जरूरी है.
* संक्रामक रोगों से सुरक्षा के लिए विटामिन सी का सेवन करना बहुत फायदेमंद होता है. नींबू और आंवले में पर्याप्त मात्रा में विटामिन सी पाया जाता है जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को दुरुस्त रखने में मददगार होता है.
* ग्रीन टी और ब्लैक टी, दोनों ही इम्यून सिस्टम के लिए फायदेमंद होती हैं लेकिन एक दिन में इनके एक से दो कप ही पिएं. ज्यादा मात्रा में इसके सेवन से नुकसान हो सकता है.
*. कच्चा लहसुन खाना भी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बूस्ट करने में सहायक होता है. इसमें पर्याप्त मात्रा में एलिसिन, जिंक, सल्फर, सेलेनियम और विटामिन ए व ई पाए जाते हैं.
*दही के सेवन से भी इम्यून पावर बढ़ती है. इसके साथ ही यह पाचन तंत्र को भी बेहतर रखने में मददगार होती है.





Wednesday, July 19, 2017

फिशर होने के कारण लक्षण और उपचार // Symptoms and Ayurvedic Remedies to treat fissure



क्या होता है फिशर-
आमतौर पर गुदा से संबधित सभी रोगों को बवासीर या पाइल्स ही समझ लिया जाता है, लेकिन इसमें कई और रोग भी हो सकते हैं। जिन्हें हम पाइल्स समझते हैं। ऐसा ही एक रोग है फिशर। इसे आयुर्वेद में गुदचीर या परिकर्तिका भी कहते हैं। इस रोग में गुदा के आसपास के क्षेत्र में एक चीरे या क्रैक जैसी स्थिति बन जाती है, जिसे फिशर कहते हैं।
फिशर होने के कारण -
फिशर होने का मूल कारण मन का कड़ा होना या कब्ज़ का होना है। जिन लोगों में कब्ज़ की समस्या होती है, उनका मल कठोर हो जाता है, जब यह कठोर मल गुदा से निकलता है तो यह चीरा या जख्म बनाता हुआ निकलता है। यह प्रथम बार फिशर बनने की संभावित प्रक्रिया है।




फिशर के लक्षण-
फिशर से पीड़ित रोगी को टॉयलेट जाते समय गुदा द्वार (Anus) बहुत अधिक दर्द होता है, यह दर्द ऐसा होता है जैसे किसी ने काट दिया हो, और यह दर्द काफी देर तक (2-4 घंटों) बना रहता है। कभी कभी तो पूरे दिन ही रोगी दर्द से परेशान रहता है। इस रोग के बढ़ जाने पर रोगी को बैठना भी मुश्किल हो जाता है। दर्द के कारण इससे पीड़ित रोगी टॉयलेट जाने से डरने लगता है।
कभी कभी गुदा में बहुत अधिक जलन होती है, जो कि कई बार तो टॉयलेट जाने के ४-५ घंटे तक बनी रहती है।
गुदा में कभी कभी खुजली भी रहती है।
फिशर के 1 साल से अधिक पुराना होने पर गुदा के ऊपर या नीचे या दोनों तरफ सूजन या उभार सा बन जाता है, जो एक मस्से या जैसे खाल लटक जाती है, ऐसा महसूस होता है। इसे बादी बवासीर या सेंटीनेल टैग (sentinel tag or sentinel piles) कहते हैं। इसको स्थायी रूप से हटाने के लिए सर्जरी या क्षार सूत्र चिकित्सा की जरुरत होती है. यह दवाओं से समाप्त नहीं होता।
टॉयलेट के समय खून कभी कभी बहुत थोडा सा आता है या आता ही नहीं है। यह खून सख्त मल (लेट्रीन) पर लकीर की तरह या कभी कभी बूंदों के रूप में हो सकता है।



किसे होती है फिशर होने की अधिक संभावना? 

फिशर की बीमारी स्त्री, पुरुष, बच्चों, वृद्ध, या युवा किसी भी ऐसे व्यक्ति को हो सकती है, जिसे कब्ज़ रहती हो या मल कठिनाई से निकलता हो। ज़्यादातर निम्न लोगों को ये बीमारी होने की संभावना अधिक होती है : –
ऐसे लोग जिन्हें बाजार का जंक फूड जैसे पिज्जा, बर्गर, नॉन वेज, अत्यधिक मिर्च-मसाले वाला भोजन खाने का शौक होता है
जो पानी कम पीते हैं
जो ज़्यादातर समय बैठे रहते हैं और किसी भी प्रकार का शारीरिक श्रम नहीं करते
महिलाओं मे गर्भावस्था के समय कब्ज़ हो जाती है जिससे, फिशर या पाईल्स हो सकते हैं। फिशर सामान्यतः भी महिलाओं में पुरुषों की अपेक्षा अधिक होता है।
कैसे बचा जा सकता है फिशर से?
चूंकि फिशर होने का मूल कारण कब्ज़ व मल का सख्त होना होता है। अतः इससे बचने के लिए हमें भोजन संबंधी आदतों में ऐसे कुछ बदलाव करने होंगे जिससे पेट साफ रहे व कब्ज़ ना हो। जैसे: –
भोजन में फलों का सेवन
सलाद व सब्जियों का प्रचुर मात्रा में नियमित सेवन करना
पानी और द्रवों का अधिक मात्रा में सेवन करना
हल्के व्यायाम, शारीरिक श्रम, मॉर्निंग वॉक आदि का करना
छाछ (मट्ठे) और दही का नियमित सेवन करना
अत्यधिक मिर्च, मसाले, जंक फूड, मांसाहार का परहेज करना



क्या है फिशर का आयुर्वेद इलाज़? Ayurvedic treatment for Fissure

फिशर की तीव्र अवस्था में जब फिशर हुए ज्यादा समय न हुआ हो और कोई मस्सा या टैग न हो तो आयुर्वेद औषधि चिकित्सा से काफी लाभ मिल सकता है. साथ साथ यदि गर्म पानी में बैठकर सिकाई भी की जाए और खाने- पीने का ध्यान रखा जाये तो फिशर पूरी तरह से ठीक भी हो सकता है. आयुर्वेद में त्रिफला गुग्गुल, सप्तविंशति गुग्गुलु, आरोग्यवर्धिनी वटी, चित्रकादि वटी, अभयारिष्ट, त्रिफला चूर्ण, पंचसकार चूर्ण, हरीतकी चूर्ण आदि औषधियों का प्रयोग रोगी की स्थिति के अनुसार किया जाता है. इसके अतिरिक्त स्थानीय प्रयोग हेतु जात्यादि या कासिसादि तैल का प्रयोग किया जाता है.
पुराने फिशर में यदि सूखा मस्सा या सेंटिनल टैग फिशर के जख्म के ऊपर बन जाता है तो उसे हटाना आवश्यक होता है. तभी फिशर पूरी तरह से ठीक हो पाता है. टैग को हटाने के लिए या तो सीधा औज़ार या ब्लेड से काट देते हैं या क्षार सूत्र से बांधकर छोड़ देते हैं, 5 -7 दिनों में टैग स्वतः कटकर निकल जाता है. एक अन्य विधि जिसे अग्निकर्म कहते हैं, भी टैग को काटने के लिए अच्छा विकल्प हैं. इसमें एक विशेष यंत्र (अग्निकर्म यंत्र) की सहायता से टैग को जड़ से आसानी से अग्नि (heat ) के प्रभाव से काट दिया जाता है.
सेंटिनल टैग के निकलने के बाद चिकित्सक द्वारा गुदा विस्फ़ार (anal dilation ऐनल डाईलेशन) की कुछ सिट्टिंग्स देनी पड़ती हैं तथा कुछ औषधियाँ भी दी जाती हैं. क्षार सूत्र अग्निकर्म चिकित्सा से फिशर को पूरी तरह ठीक होने में लगभग 15 से 20 दिन लग जाते हैं.