Sunday, February 26, 2017

आयुर्वेदिक औषधियाँ और प्रयोग

चन्द्र प्रभावटी-
यह मूत्र रोगों पर और यौन रोगों पर विशेष असर दिखाती है.
बार बार पेशाब को जाना, पेशाब में शक्कर का जाना,
स्त्री को सफ़ेद पानी का जाना, मासिक धर्म की अनियमितताए,
पुरुषो को पेशाब में धातु जाने की समस्या,
पेशाब में जलन होना ऐसे अनेक विकारो पर यह दवा काम करती है.
यह स्नायु और हड्डी को भी मजबूती प्रदान करती है. इसलिए इसका प्रयोग कमजोरी में भी करते है.



योगराज गुग्गुलु

इस दवा का प्रयोग स्नायुओ को मजबूती प्रदान करता है. बुढ़ापे की व्याधियो जैसे पैर की पिंडलियों में दर्द होना, घुटनों में दर्द होना वगैराह उसमे यह दवा अच्छा असर दिखाती है.
इसकी १-१ गोली सुबह शाम नाश्ते या भोजन के बाद पानीसे ले. इसे शहद से या दूध से भी ले सकते है. गोली को दात से तोड़े फिर निगले या पहले ही तोड़कर फिर निगले.
हरिद्रा खंड
यह खुजली की एक जबरदस्त दवा है. शीत पित्त में भी इसे किसी जादू की तरह काम करते हुए देखा है. इसे आधा चम्मच रोजाना पानीसे तीन बार ले सकते है.



सितोपलादी चूर्ण

यह खासी की एक जबरदस्त दवा है. सूखी खासी पर इसे जादू की तरह काम करते हुए देखा गया है. एक चौथाई चम्मच चूर्ण शहद के साथ एक दिन में ३-४ बार ले सकते है.
त्रयोदशांग गुग्गुलु
यह वात विकारो की एक जबरदस्त दवा है. इसके प्रयोग से लकवे (पक्षाघात) में अद्भुत लाभ होता है. लकवा होने के बाद जितने जल्दी इसे प्रयोग में लाया जायेगा लाभ उतना ही जल्द होंगा. यदि लकवा होने के बाद बहोत समय बीत गया है तो एक लम्बे काल के लिए इस दवा का नियमित सेवन करना होगा.सर्वाइकल स्पोंडीलायटिस में भी यह अच्छा काम करती है.
इसकी १-१ गोली सुबह शाम नाश्ते या भोजन के बाद पानी से ले. इसे शहद से या दूध से भी ले सकते है. गोली को दात से तोड़े फिर निगले या पहले ही तोड़कर फिर निगले.

Friday, February 24, 2017

आलू के फायदे,उपचार,प्रयोग


   हर इंसान को आलू खाना पंसद होता है। इसे सभी अपने-अपने तरीके से रेसिपी बनाकर खाते है। लेकिन आप जानते है कि यह हमारी सेहत के लिए कितना फायदेमंद है। इसका सेवन करने से आपको कई बीमारियों से निजात मिल जाता है। इसका इस्तेमाल करने से केवल सेहत ही नहीं बल्कि सौंदर्य के लिए भी किया जाता है। कई लोग मानते है कि आलू खाने से आप मोटे हो जाएगे। जबकि ऐसा कुछ नहीं है |   
*उच्च रक्तचाप के रोगी भी आलू खाएँ तो रक्तचाप को सामान्य बनाने में लाभ करता है।
* आलू को पीसकर त्वचा पर मलें। रंग गोरा हो जाएगा।
* कच्चा आलू पत्थर पर घिसकर सुबह-शाम काजल की तरह लगाने से 5 से 6 वर्ष पुराना जाला और 4 वर्ष तक का फूला 3 मास में साफ हो जाता है।
* आलू का रस दूध पीते बच्चों और बड़े बच्चों को पिलाने से वे मोटे-ताजे हो जाते हैं। आलू के रस में मधु मिलाकर भी पिला सकते हैं।
* आलुओं में मुर्गी के चूजों जितना प्रोटीन होता है, सूखे आलू में 8.5 प्रतिशत प्रोटीन होता है। आलू का प्रोटीन बूढ़ों के लिए बहुत ही शक्ति देने वाला और बुढ़ापे की कमजोरी दूर करने वाला होता है।
भुना हुआ आलू पुरानी कब्ज और अंतड़ियों की सड़ांध दूर करता है। आलू में पोटेशियम साल्ट होता है जो अम्लपित्त को रोकता है।



* चार आलू सेंक लें और फिर उनका छिलका उतार कर नमक, मिर्च डालकर नित्य खाएँ। इससे गठिया ठीक हो जाता है।
* गुर्दे की पथरी में केवल आलू खाते रहने पर बहुत लाभ होता है। पथरी के रोगी को केवल आलू खिलाकर और बार-बार अधिक पानी पिलाते रहने से गुर्दे की पथरियाँ और रेत आसानी से निकल जाती हैं। 

*क्या आप जानते हैं आलू में बहुत अधिक मात्रा में पोटैशियम पाया जाता हैं. जो कि सेहत के लिए फायदेमंद है. ऐसे में आपको कोशिश करनी चाहिए कि जब आप आलू का इस्तेमाल करें तो उसे अच्छे से धोकर बिना छिलका उतारे ही इस्तेमाल करें. ताकि इसमें मौजूद पौटेशियम का पूरा-पूरा फायदा मिल सके|
* रक्तपित्त बीमारी में कच्चा आलू बहुत फायदा करता है।
* कभी-कभी चोट लगने पर नील पड़ जाती है। नील पड़ी जगह पर कच्चा आलू पीसकर लगाएँ ।
* शरीर पर कहीं जल गया हो, तेज धूप से त्वचा झुलस गई हो, त्वचा पर झुर्रियां हों या कोई त्वचा रोग हो तो कच्चे आलू का रस निकालकर लगाने से फायदा होता है।

आलू का रस पीने के फायदे / benefit of potato juice
आलू के जूस को पीने से आप आसानी से अपने कोलेस्ट्रोल के स्तर को नियंत्रण में रख सकते हैं। यह आपके समस्त स्वस्थ्य सम्बन्धी समस्या का हल भी है।
*आलू का जूस आपके बढ़ते हुए वजन को घटा देता है। इसके लिए सुबह अपने नाश्ते से दो घंटे पहले आलू का जूस का सेवन करें। यह भूख को नियंत्रित करता है और वजन को कम कर देता है।
*गठिया के रोग में आलू का जूस बेहद कारगर तरह से काम करता है। आलू के जूस को पीने से यूरिक एसिड शरीर से बाहर निकलता है। और गठिया की सूजन को कम करता है।
*लिवर और गॉल ब्लैडर की गंदगी को निकालने के लिए आलू का जूस काफी मददगार साबित होता है। जापानी लोग हेपेटाइटिस से निजात पाने के लिए आलू के जूस का इस्तमाल करते हैं ।



*आपके बालों को जल्दी बड़ा करने के लिए आलू के जूस का नियमित मास्क काफी मददगार साबित होता है। एक आलू को लेकर इसका छिलका निकाल लें। इसके टुकड़ों में काटकर पीस लें। अब इससे रस निकाल लें और इसमें शहद और अंडे का उजला भाग मिला लें। अब इस पेस्ट को सर और बालों पर लगाएं। इसे दो घंटे तक रखें और उसके बाद शैम्पू से धो लें।
*अगर आप डाइबिटीज के मरीज हैं तो यह आपके लिए बेहद फायदेमंद चीज है। इसका सेवन करने से यह शरीर के खून में शर्करा के स्तर को कम करने में काफी प्रभावकारी साबित होगा।
*अगर आपको एसिडिटी की समस्या है तो आलू का रस काफी फायदेमंद साबित हो सकता है। इसके लिए इसके रस को रोजना आधा कप पिएं। इससे आपको लाभ मिलेगा।
*ह्रदय की बिमारी और स्ट्रोक से बचने और इसे कम करने के लिए आलू सबसे अच्छा उपाय है। यह नब्ज़ के अवरोध, कैंसर, हार्ट अटैक और ट्यूमर को बढ़ने से कम करता है।
*किडनी की बिमारियों का इलाज करने के लिए आलू का जूस पीने की आदत डालें। यह ब्लड प्रेशर और डायबिटीज को नियंत्रण में रखने में भी मदद करता है। आलू का जूस मूत्राशय में कैल्शियम का पत्थर बनने नहीं देता।
*आलू का जूस जोड़ों के दर्द व सूजन को खत्म करता है। अर्थराइटिस से परेशान लोगों को दिन में दो बार आलू का जूस पीना चाहिए। यह दर्द व सूजन में राहत देता है। शरीर में खून के संचार को भी बेहतर बनाता है आलू का जूस।
*अगर आपके चेहरे में दाग, धब्बे और पिपंल है तो आलू का रस काफी फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन सी और बी कॉम्प्लेक्स के साथ पोटेशियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस और जस्त जैसे खनिज पाया जाता है, जोकि हमारी स्किन के लिए फादेमंद है।

मसूड़ों की सूजन के उपचार,उपाय,नुस्खे


    मुंह के अंदर स्वच्छता की खराब स्थिति के कारण दांतों के बीच और मसूढ़ों की रेखा पर प्लेक (plaque) जम जाते हैं जिसके कारण मसूढ़ों में सूजन हो जाती है।मसूड़ों की बीमारी एक तरह का इन्फेक्शन है जो दांतों के नीचे हड्डियों तक फैल जाता है। ये एक आम समस्या है जिसके कारण दांत निकल या टूट जाते हैं। मसूड़ों की बीमारी की दो स्टेज होती हैं। अगर पहली ही स्टेज पर ही इसका पता चल जाए तो इससे होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है।
मसूड़ों में सूजन
  उन का कमजोर पड़ना, ब्रश करने के बाद खून आना और मुंह से लगातार दुर्गंध आना, ये सभी मसूड़ों की समस्या के लक्षण हैं. इन से शुरुआती चरण में नजात पाना आसान है, लेकिन शुरू से अगर इलाज नहीं कराया जाता तो दुष्परिणाम दांत टूटने और कई रोगों के रूप में सामने आ सकता है.
    मसूड़ों में सूजन या खून आने जैसे किसी भी लक्षण को हलके में नहीं लेना चाहिए. ये लक्षण मसूड़ों को नुकसान से बचाने के लिए उपाय करने का संकेत दे रहे होते हैं. यदि इन की अनदेखी की गई तो स्थिति बिगड़ कर पेरियोडोंटाइटिस (मसूड़ों और दांतों की हड्डियों के रोग) तक बढ़ सकती है. यह रोग मसूड़ों की गंभीर तकलीफ से जुड़ा होता है जिस से मसूड़े कमजोर पड़ने लगते हैं और दांतों की जड़ों तक बैक्टीरिया का हमला बढ़ जाता है. मसूड़ों के टिशू जब क्षतिग्रस्त होने लगते हैं तो दांतों को मजबूती देने में असमर्थ हो जाते हैं. तब दांत टूटने लग जाते हैं. यानी इस का अंतिम दुष्परिणाम दांतों के कमजोर हो कर टूटने के रूप में ही सामने आता है.
   कई लोगों को पता नहीं होता कि मसूड़े के रोग से न सिर्फ दांतों को नुकसान पहुंचता है बल्कि इस से कई अन्य गंभीर स्वास्थ्य परेशानियां भी खड़ी हो सकती हैं. मसूड़ों की समस्या के नाम से जाना जाने वाला पेरियोडोंटल रोग कई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है. लिहाजा मसूड़ों की समस्या से संबंधित किसी भी लक्षण की अनदेखी नहीं होनी चाहिए.
   दांतों में पस होने के कारण मसूड़ों की बीमारी मुंह की सफाई ठीक से न करना प्रतिरक्षा प्रणाली कमज़ोर होना टूटा हुआ दांत मसूड़ों में सूजन और जलन दांतों में संक्रमण बैक्टीरिया कार्बोहाइड्रेट युक्त तथा चिपचिपे पदार्थ अधिक मात्रा में खाना
दांतों में पस होने के लक्षण जब भी आप कुछ खाएं तो संक्रमित जगह पर दर्द संवेदनशील दांत मुंह में गंदे स्वाद वाले तरल पदार्थ का स्त्राव साँसों में बदबू मसूड़ों में लालिमा और दर्द अस्वस्थ महसूस करना मुंह खोलने में तकलीफ होना प्रभावित क्षेत्र में सूजन चेहरे पर सूजन दांतों में अनपेक्षित दर्द होना अनिद्रा कुछ निगलने में परेशानी होना बुखार



शरीर में प्रोटीन की कमी दांतों को भी प्रभावित करती है, इसके कारण पेरियोडोंटिस नामक मसूड़ों की बीमारी हो सकती है।
लोबान-
लोबान यानि गुग्गुल का इस्तेमाल बहुत सी आयुर्वेदिक दवाओं में किया जाता है। इसमें एंटी इनफ्लेमेटरी तत्व होते हैं जो कि बैक्टीरियल ग्रोथ और प्लाक जमने को रोकते हैं।
टिप: एक ग्लास पानी में आधा चम्मच लोबान मिलाएं और उसका इस्तेमाल माउथवॉश की तरह करें। दिन में दो से तीन बार इससे कुल्ला करने से आप अपने मसूड़ों को स्वस्थ रख पाएंगे।
लहसुन -
लहसुन बैक्टीरिया को मारने के लिए एक प्राकृतिक हथियार है। कच्चे लहसुन का रस संक्रमण को मारने में मदद करता है। यदि वास्तव में आपके दांत में बहुत अधिक दर्द हो रहा हो तो आप ऐसा कर सकते हैं। कच्चे लहसुन की एक कली लें। इसे पीसें और निचोड़ें तथा इसका रस निकालें। इस रस को प्रभावित क्षेत्र पर लगायें। यह घरेलू उपचार दांत के दर्द में जादू की तरह काम करता है।
नीम-
   नीम की टहनी से दांत ब्रश करना एक बहुत पुराना और प्रभावशाली तरीका है मुंह की सफाई का। इसे दातुन कहा जाता है। नीम के पेड़ में आश्चर्यजनक ऐन्टीमाइक्रोबीअल (antimicrobial) और एंटी फंगल तत्व होते हैं जिन्हें मुंह की समस्या के लिए चिकित्सा जगत में महत्वपूर्ण माना जाता है।
*पानी में कुछ नीम की पत्तियां डाल कर उबालें और उससे दिन में तीन से चार बार कुल्ला करें। ऐसा करने से आपके मसूड़े बीमारियों से दूर रहेंगे।
नमक के पानी से मुंह धोना: -
   मुंह से संबंधित समस्याओं के निदान में नमक का पानी बहुत महत्वपूर्ण होता है। नमक के पानी से कुल्ला करने से मुंह में होने वाले संक्रमण से बचाव होता है जो मसूड़ों में सूजन आने का एक कारण है।
नमक- 
  यदि आप तुरंत आराम पाना चाहते हैं तो नमक से आप तुरंत आराम पा सकते हैं। इसके लिए थोड़ा सा नमक गुनगुने पानी में मिलाएं और इस पानी से गरारे करें। पहले थोड़ा दर्द महसूस होगा परंतु उसके बाद कुछ आराम मिलेगा। इसे कई बार दोहरायें और आपका दर्द लगभग 90% तक कम हो जाएगा
लौंग का तेल- 
  लौंग का तेल भी संक्रमण रोकने में सहायक होता है तथा दांतों के दर्द में तथा मसूड़ों की बीमारी में अच्छा उपचार है। थोड़ा सा लौंग का तेल लें तथा इस तेल से धीरे धीरे ब्रश करें। जब आप प्रभावित क्षेत्र में इसे लगायें तो अतिरिक्त सावधानी रखें। बहुत अधिक दबाव न डालें तथा अपने मसूड़ों पर धीरे धीरे मालिश करें अन्यथा अधिक दर्द होगा। मसूड़ों पर लौंग के तेल की कुछ मात्रा लगायें तथा धीरे धीरे मालिश करें।
टी बैग-



टी बैग एक अन्य घरेलू उपचार है। हर्बल टी बैग को प्रभावित क्षेत्र पर लगायें। इससे पस के कारण होने वाले दर्द से आपको तुरंत आराम मिलेगा।

आईल पुलिंग -
     यह घरेलू उपचार बहुत ही सहायक है। इसमें आपको सिर्फ नारियल के तेल की आवश्यकता होती है। एक टेबलस्पून नारियल का तेल लें और इसे अपने मुंह में चलायें। इसे निगले नहीं, इसे लगभग 30 मिनिट तक अपने मुंह में रखें रहें। फिर इसे थूक दें और मुंह धो लें। आपको निश्चित रूप से आराम मिलेगा।
मसूड़ों की बीमारी की दूसरी स्टेज बहुत गंभीर होती है। इसके कुछ लक्षण इस तरह हैं।मसूड़ों और दांतों के बीच मवाद (puss) बनना
दांतों का गिरना-
दांतों व मसूड़ों के बीच बहुत अंतर होना
खाने को काटते समय सभी दांतों की स्थिति में बदलाव आना
मुलैठी-

मुलैठी यानि लिकोराइस (licorice) की जड़ में लिकोराइसाइडिन और लिकोराइसोफ्लेविन ए होता है जो कि ओरल कैविटी के विकास को रोकते हैं और सांस की बदबू से लड़ते हैं।
टिप: मुलैठी के पाउडर को एक चुटकी में लेकर प्रभावित दांत पर लगाएं या इस पाउडर से रोज़ ब्रश करें। ऐसा करके आप अपनी मसूड़ों की समस्याओं से निजात पा लेंगे।
तुलसी-
सभी जानते हैं कि तुलसी की पत्तियों में कितने औषधीय गुण होते हैं। एक प्राकृतिक एंटीबायोटिक होने के नाते तुलसी मसूड़ों की समस्याओं को रोकने में काफी अहम भूमिका निभाती है। इसके एंटीबैक्टीरियल गुण से प्लाक और सांस की बदबू जैसी समस्याएं भी दूर हो जाती हैं।
* मसूड़ों की समस्याओं से निपटने के लिए हर रोज़ कुछ पत्ते तुलसी के चबाएं।
कार्डियोवैस्क्युलर रोग-
शोध बताते हैं कि पेरियोडोंटल रोग के कारण कार्डियोवैस्क्युलर रोग का खतरा भी बढ़ सकता है. पेरियोडोंटल तथा कार्डियोवैस्क्युलर रोग दोनों में गंभीर सूजन आ जाती है, इसलिए शोधकर्ताओं का मानना है कि सूजन से इन दोनों का ताल्लुक हो सकता है.
डिमेंशिया-
यह रोग किसी व्यक्ति की सोचने समझने की शक्ति और याददाश्त को प्रभावित करता है और यह भी मसूड़े की बीमारी से जुड़ा होता है. यूनिवर्सिटी औफ सैंट्रल लंकाशायर और स्कूल औफ मैडिसिन ऐंड डैंटिस्ट्री का एक अध्ययन बताता है कि ये दोनों बीमारियां एक दूसरे से जुड़ी हो सकती हैं.
रूमेटाइड आर्थ्राराइटिस-
कई अध्ययन बताते हैं कि मसूड़ा रोग से पीडि़त लोगों को रूमेटाइड आर्थ्राराइटिस यानी गठिया होने की आशंका ज्यादा रहती है.
*बबूल की छाल-: 
मसूड़ों की सूजन से छुटकारा पाने का यह दादी मां का नुस्खा है। बबूल के पेड़ की छाल मसूड़ों की सूजन से छुटकारा दिलाने में जादू की तरह काम करती है। आप बबूल की छाल को पानी में उबालकर माउथवॉश भी बना सकते हैं। तुरंत राहत पाने के लिए दिन में दो से तीन बार इस घरेलू माउथवॉश से गरारे करें



कैस्टर ऑइल (एरंड का तेल): -
एरंड के तेल में सूजन विरोधी गुण होता है जो मसूड़ों की सूजन से राहत दिलाने में एक प्रभावी घरेलू उपचार है। दर्द वाले भाग पर इसे लगाने से दर्द तथा सूजन से आराम मिलता है।
क्रौनिक किडनी रोग-
इस के साथ मसूड़ों रोग का संबंध साबित हो चुका है. केस वैस्टर्न रिजर्व यूनिवर्सिटी का एक शोध बताता है कि जिन के असली दांत नहीं रह गए हैं, उन्हें असली दांत वाले व्यक्तियों की तुलना में क्रौनिक किडनी रोग होने का खतरा ज्यादा रहता है.
मुंह का कैंसर-
मसूड़ों की समस्या के गंभीर मामलों में मुंह का कैंसर भी देखा गया है. कई ऐसे उदाहरणों से साबित हो गया है कि मसूड़ों का रोग और मुंह के कैंसर का सीधा ताल्लुक है.
ऐसा कुछ न हो इस के लिए दांतों और मसूड़ों को स्वस्थ रखना जरूरी है. बहुत सारे लोग अभी भी इस बात से नावाकिफ हैं कि मसूड़ा रोग पूरी सेहत पर असर कर सकता है. मुंह की परेशानी के किसी भी लक्षण की अनदेखी नहीं होनी चाहिए, बल्कि बचाव के उपाय करने के लिए कदम उठने चाहिए. साल में 2 बार डैंटिस्ट से परामर्श लेने से मुंह की सेहत दुरुस्त रह सकती है. यह कभी न भूलें कि बचाव ही महत्त्वपूर्ण है.

Thursday, February 23, 2017

सूरजमुखी के बीज हैं स्‍वास्‍थ्‍य का खजाना



    सूरजमुखी के बीचों के तेल में कई लाभदायक तत्व मोजूद होते हैं। इन छोटे से बीजों के तेल के सेवन से पेट के कैंसर, उच्च कोलेस्ट्रॉल के स्तर, उच्च रक्तचाप, दिल के दौरे और स्ट्रोक आदि गंभीर रोगों से बचाव होता है।
सूरजमुखी के बीज भले ही दिखने में आकर्षक न लगें, लेकिन गुणों के मामले में ये कमाल होते हैं। इन बीजों में विटामिन ई और पोली अन-सैचुरेटेड फैट व मैग्नीशियम कफी होता है। इसके तेल के नियमित सेवन से कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम होता है। महिलाओं तथा उम्रदराज लोगों के लिए भी यह काफी लाभदायक होते हैं। तो चलिये जाने सूरजमुखी के बीजों के ऐसे ही कुछ कमाल स्वास्थ्य लाभ।
दिल को रखे स्‍वस्‍थ इनके बीजों में विटामिन सी होता है जो कि दिल की बीमारी को दूर रखने में मदद करता है। साथ ही इसमें मौजूद विटामिन ई कोलेस्‍ट्रॉल को खून की धमनियों में जमने से रोक कर हार्ट अटैक और स्‍ट्रोक का खतरा टालता है। एक चौथाई कप सूरजमुखी बीज 90 प्रतिशत तक का डेली विटामिन ई प्रदान करता हैहार्ट अटैक का मुख्य कारण रक्त की धमनियों में रुकावट, कम-ज्यादा रक्तचाप व मानसिक तनाव व अधिक थकान होते हैं। हृदय रोग विशेषज्ञों का कहना है कि धमनियों में खून का थक्का जमने से हार्ट अटैक का खतरा अधिक होता है।
*रक्त धमनियों में खून के थक्के का नियंत्रण एक एसिड करता है, जिसे ‘लिनोलेइक एसिड’ कहते हैं। यह एक असंतृप्त अम्ल होता है। इसकी पूर्ति वनस्पति तेल से की जाती है। शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि सूरजमुखी (सन फ्लावर) के बीजों में यह एसिड काफी मात्र में पाया जाता है।
*इस कारण इसका तेल हृदय रोगियों के लिए लाभदायक है। यह रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्र को भी नियंत्रण में रखता है। यह अच्छे कोलेस्ट्रॉल (एचडीएल) की मात्र को बढ़ाता है और खराब कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) को कम करता है। शरीर में जमा अतिरिक्त वसा को भी यह कम करता है। साथ ही यह रक्तचाप बढ़ाने वाले रसायन ‘डोपामाइन डी-1’ को भी घटाता है।अस्थमा और पेट के कैंसर से बचाता है : सूरजमुखी के तेल में किसी अन्य खाना पकाने के तेल की तुलना में अधिक Vitamin E होता है। इसलिए आप अपने आहार में इस तेल को शामिल कर के अस्थमा और पेट के कैंसर जैसे बीमारियों से बचे रहा सकते है।
बॉडी को रिपेयर करता है :
 सूरजमुखी का तेल में भी प्रोटीन होता है, जो की हमारे शरीर के निर्माण और मरम्मत तथा हार्मोन और एंजाइमों के उत्पादन करने के लिए मदद करती हैं। हमारे शरीर को उच्च मात्रा के proteins की आवश्यकता होती है। चूंकि शरीर proteins की मात्रा को स्टोर कर के नहीं रख सकता है उसे consume किया जाता है और इस आवश्यकता को पूरा sunflower seed oil करता है।
हड्डी बनाए मजबूत :
 इसमें मैग्नीशियम की भी अधिक मात्रा होती है, जिससे हड्डियों में मजबूती आती है। इसके साथ ही यह हड्डियों के जोड़ों में लचीलापन तथा मजबूती लाता है। गठिया और सूजन के लिये इसमें मौजूद विटामिन ई काफी लाभदायक है।



एक्ने और त्वचा संबन्धित रोग दूर करे :
 सूरजमुखी बीज के तेल में फैटी एसिड होते हैं जो कि त्वचा को बैक्टीरिया से बचा कर एक्ने होने से रोकते हैं। यह भी माना जाता है कि सूरजमुखी तेल एक्जिमा और डर्मेटाइटिस की बीमारी से बचाता है।
दिमाग के लिये अच्छा : यह आपके दिमाग को शांत रखता है। इसमें मौजूद मैग्नीशियम दिमाग की नसों को शांत करता है तथा स्ट्रेस और माइग्रेन से छुटकारा दिलाता है।
हेयर ग्रोथ : 
जिंक से भरे ये बीज आपके बालों को बढाएंगे। हांलाकि अत्यधिक जिंक के सेवन से बाल झड़ने की समस्या काफी ज्यादा बढ़ सकती है। इसमें मौजूद विटामिन ई, सिर में ब्लड सर्कुलेशन कर के बालों की ग्रोथ बढ़ाता है।
गठिया से बचाता है : जो लोग गठिया के बीमारियों से डरते है उनके लिए सूरजमुखी का तेल सबसे बेहतर solution है। सूरजमुखी तेल rheumatoid arthritis को रोकथाम में मदद करता है। इसलिए जिनको भी गठिया की समस्या हो उन्हें सूरजमुखी के तेल उपयोग में लेना चाहिए
*सूरजमुखी के बीजों को खाने से हार्ट अटैक का खतरा कम होता है, कोलेस्ट्रॉल घटता है, त्वचा में निखार आता है तथा बालों की भी ग्रोथ होती है। आइये जानते हैं सूरजमुखी के बीज खाने से क्या-क्या स्वास्थ्य लाभ मिलते हैं।

दिल को रखे स्वस्थ : इनके बीजों में विटामिन सी होता है जो कि दिल की बीमारी को दूर रखने में मदद करता है। साथ ही इसमें मौजूद विटामिन ई कोलेस्ट्रॉल को खून की धमनियों में जमने से रोक कर हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा टालता है। एक चौथाई कप सूरजमुखी बीज 90 प्रतिशत तक का डेली विटामिन ई प्रदान करता है।
कोलेस्ट्रॉल घटाए :
 इनमें मोनो और पोलीसैच्युरेटेड फैट्स होते हैं, जो कि एक अच्छे फैट माने जाते हैं। यह खराब कोलेस्ट्रॉल को घटाने का काम करते हैं। इसके अलावा इनमें ढेर सारा फाइबर भी होता है जो कोलेस्ट्रॉल को घटाता है।
पेट ठीक रखे : 

बीज में काफी सारा फाइबर होता है जिससे कब्ज की समस्या ठीक हो जाती है।
कैं
सर से बचाव :
 इसमें विटामिन ई, सेलियम और कॉपर होता है, जिसमें एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं। रिसर्च दृारा कहा गया है कि यह पेट, प्रोस्ट्रेट और ब्रेस्ट कैंसर से रक्षा करता है।



त्वचा निखारे : सूरजमुखी के बीज का तेल त्वचा की नमी बनाए रखने के रूप में के रूप में अच्छी तरह से यह बैक्टीरिया के खिलाफ की रक्षा में मदद करता है।
जिंक
सूरजमुखी तेल में जिंक प्रचुर मात्रा में है जो कि घावों के जल्द उपचार में मदद करता है। यह स्वस्थ प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाए रखने में भी मददगार होता है।
फोलिक एसिड
सूरजमुखी के तेल में मौजूद फोलिक एसिड वर्तमान नई सैल्स के निर्माण में मदद करता है और मांसपेशियों में ऐंठन को रोकने में में असरदार होता है। जबकि इसमें मौजूद ट्रीप्टोफन मस्तिष्क को आराम पहुंचाता है और गहरी नींद लेने में सहायता करता है।
फैटी एसिड और विटामिन
सूरजमुखी के तेल में व्याप्त ओमेगा फैटी एसिड और विटामिन बालों की चमक और बनावट को बेहतर बनाए रखते हैं। बालों पर नियमित रूप से सूरजमुखी के बीज का तेल लगाने से डेंड्रफ आदि की समस्या भी नहीं होती है।
विटामिन ई
सूरजमुखी के बीजों में मौजूद विटामिन 'ई', संधिशोथ, अस्थमा, पेट के कैंसर, उच्च कोलेस्ट्रॉल के स्तर, उच्च रक्तचाप, दिल के दौरे और स्ट्रोक आदि गंभीर रोगों से बचाव करता है।
विटामिन बी6
सूरजमुखी के बीजों में प्रचुर मात्रा में मौजूद विटामिन बी6 और जिंक शरीर का मेटाबॉलिज्म दुरुस्त रखते हैं और सीबम के निर्माण को भी नियंत्रित करते हैं। इसके सेवन से सिर की त्वचा पर डैंड्रफ भी नहीं होती है।
एंटीऑक्सीडेंट गुण
सूरजमुखी का तेल एक एंटीऑक्सीडेंट के रूप में काम करता है। इसमें विटामिन 'ई' प्रचुर मात्रा में होता है जो इसे यह गुण प्रदान करता है। एक एंटीऑक्सीडेंट के रूप में सूरजमुखी का तेल कैंसर से बचाता है।
त्वचा की नमी
सूरजमुखी के बीज का तेल त्वचा की नमी बनाए रखने में मदद करता है और शरी और त्वचा के बैक्टीरिया के खिलाफ रक्षा करने में भी मदद करता है।



दिल का रखे खयाल-

सूरजमुखी के तेल हृदय रोगियों के लिए फायदेमंद होता है। यह रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्र को नियंत्रण रखता है। साथ ही साथ अच्छे कोलेस्ट्रॉल (एचडीएल) की मात्र को बढ़ाता है और खराब कोलेस्ट्रॉल (एलडीएल) को कम करता है। यह शरीर में जमा अतिरिक्त वसा को कम करता है और रक्तचाप बढ़ाने वाले रसायन ‘डोपामाइन डी-1’ को घटाता है।
सूरजमुखी के बीजों को खाने से हार्ट अटैक का खतरा कम होता है, कोलेस्‍ट्रॉल घटता है, त्‍वचा में निखार आता है तथा बालों की भी ग्रोथ होती है। आइये जानते हैं सूरजमुखी के बीज खाने से क्‍या-क्‍या स्‍वास्‍थ्‍य लाभ मिलते हैं।दिल को रखे स्‍वस्‍थ इनके बीजों में विटामिन सी होता है जो कि दिल की बीमारी को दूर रखने में मदद करता है। साथ ही इसमें मौजूद विटामिन ई कोलेस्‍ट्रॉल को खून की धमनियों में जमने से रोक कर हार्ट अटैक और स्‍ट्रोक का खतरा टालता है। एक चौथाई कप सूरजमुखी बीज 90 प्रतिशत तक का डेली विटामिन ई प्रदान करता है।
*कोलेस्‍ट्रॉल घटाए इनमें मोनो और पोलीसैच्‍युरेटेड फैट्स होते हैं, जो कि एक अच्‍छे फैट माने जाते हैं। यह खराब कोलेस्‍ट्रॉल को घटाने का काम करते हैं। इसके अलावा इनमें ढेर सारा फाइबर भी होता है जो कोलेस्‍ट्रॉल को घटाता है।

हर प्रकार की खांसी और कफ की समस्या के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार



   मौसम के परिवर्तन के कारण संक्रमण से कई बार वाइरल इंफेक्शन के कारण हमारे गले व फेफड़ों में जमने वाली एक श्लेष्मा होती है जो खांसी या खांसने के साथ बाहर आता है।
खांसी चाहे जैसी भी हो, सूखी हो तर हो बलगम वाली हो या फिर तेज़ दवाओ के सेवन के कारण छाती पर कफ जम गया हो तो अपनाने चाहिए ये घरेलु नुस्खे। जो बिलकुल सुरक्षित हैं। और इन परिस्थितियों से आराम मिलता हैं।कसानदायक दोनों है। इसे ही कफ कहा जाता है। 

*आजकल खांसी के ठसके एक आम समस्या है, जो ख़ास तौर पर सुबह शाम नहाने और भोजन के बाद चलते हैं। कभी कभी धुल धुएँ और तेज गंध से भी ये शुरू हो जाते हैं और काफी समय तक गले के भीतर गुदगुदाते रहते हैं
सुखी और तर खांसी- 
*भुनी हुई फिटकरी दस ग्राम और देशी खांड 100 ग्राम, दोनों को बारीक़ पीसकर आपस में मिला ले और बराबर मात्रा में चौदह पुड़िया बना ले। सुखी खांसी में 125 ग्राम गर्म दूध के साथ एक पुड़िया नित्य सोते समय ले। गीली खांसी में 125 ग्राम गर्म पानी के साथ एक पुड़िया नित्य सोते समय ले।
सूखी खाँसी का नुस्खा-
मुलहठी, बीज निकली मुनक्का, सब 10-10 ग्राम बारीक महीन पीसकर चने के बराबर गोलियां बनायें। दो-दो गोली मुंह में डालकर दिन में चूसे। सूखी खांसी में आराम मिलेगा।आमतौर पर खांसी होने का मतलब है कि हमारा श्वासन तंत्र ठीक से काम नहीं कर रहा है। साथ ही खांसी गले में कुछ तकलीफ होने की और भी इशारा करती है।हालांकि यह साबित हो चुका है कि तीन हफ्ते से ज्यादा खांसी होने पर टीबी की जांच करवा लेनी चाहिए क्योंकि लापरवाही बरतने से खांसी बढ़कर टीबी का रूप ले सकती है।खांसी होने पर पानी पीना चाहिए या फिर पीठ को सहलाने से आराम मिलता है।खाना खाते या बोलते समय खांसी आए तो खाने को धीरे-धीरे छोटी-छोटी बाइट में खाना चाहिए।*खांसी होने पर खांसी को रोकने के लिए आमतौर पर मूंगफली,चटपटी व खट्टी चीजें, ठंडा पानी, दही, अचार, खट्टे फल, केला, कोल्ड ड्रिंक, इमली, तली-भुनी चीजों को खाने से मना किया जाता है।
*यदि आप पुरानी खांसी (क्रोनिक ब्रोंकायटिस) से लंबे समय से परेशान हैं। दवा लेने के बाद भी आपको इससे छुटकारा नहीं मिल रहा है। तो अब आपको परेशान होने की जरूरत नहीं है। इस बीमारी का कारगर इलाज अब आयुर्वेद में मिल गया है। आमखो स्थित राष्ट्रीय आयुर्वेद एवं सिद्ध मानव संसाधन विकास अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने इसकी दवा तैयार की है। दवा कितनी असरकारक होगी, इसका शोध शुरू हो गया है। 
एलोपैथी पद्धति में पुरानी खांसी के इलाज के लिए ऐस्टेरॉयड, एंटीबाॅयोटिक्स, शूल हर, श्वास हर आदि दवाओं का उपयोग किया जाता है। लेकिन यह बीमारी जड़ से खत्म नहीं हो पाती है। साथ ही लंबे समय तक इन दवाओं का सेवन करने से साइड इफेक्ट भी होने लगते हैं। पुरानी खांसी के उपचार एवं स्वास्थ्य वर्धन में कूष्माण्डक रसायन हजारों वर्षों से उपयोगी पाया गया है। 

*सूखी खांसी यह खांसी आवाज करती हुई विस्फोटक नि:श्वसन होती है। इसका उद्देश्य श्वांस-प्रणाली या सांस की नली से नि:स्राव या फंसा हुआ कोई बाहरी पदार्थ को निकाल फेंकना होती है। यह स्वत: होनेवाली एक परावर्तक क्रिया के रूप में होती है या स्वेच्छा से की जाती है। खांसी श्वसन व्याधियों का सबसे सामान्य लक्षण है। खांसी होने के निम्नलिखित कारण है-
(क) शोथज या सूजन की स्थितियां 
1. वायु मार्ग की शोथज स्थितियां- फेरिन्जाइटिस, टांसिलाइटिस श्वसन-यंत्र शोथ, श्वसन-प्रणाली शोथ, श्वसनी शोथ एवं श्वसनिका शोथ,
2. फुफ्फुसों की शोथज या सूजन की स्थितियां-न्यूमोनिया एवं ब्रोंकोन्यूमोनिया, फुफ्फुस-विद्रधि, यक्ष्मा, फुफ्फुसों के फंगस रोग।
(ख) यान्त्रिक कारण
1. धूम्रपान करने के कारण, धुंआ, धूल या क्षोभकारी गैसों के सूंघने के कारण,
2. वायु-मार्ग पर किसी अबुर्द (ट्यूमर), ग्रेन्यूलोमा, महाधमनी एन्यूरिज्म या मीडियास्टिनम में स्थित किसी पिण्ड द्वारा पड़ रहे दबाव के कारण,
3. श्वसन नलिका के अन्दर कोई बाहरी वस्तु फंस जाने के कारण,
4. श्वसनी-नलिकाओं की संकीर्णता, श्वसनी दमा, तीव्र या पुराना श्वसनी शोथ तथा
5. पुराना इंफेक्शन।
(ग) ताप उत्तेजना ठंडी या गर्म हवा का झोंका लगना या मौसम में अचानक परिवर्तन होने के कारण भी खांसी या तो सूखी होती है या गीली अर्थात् बलगम के साथ होती है। साधारणत: ऐसी खाँसी ऊपरी वायु मार्ग फेरिंग्स, स्वर यंत्र, श्वास प्रणाली या श्वसनी में हुए क्षोभ के कारण होती है। इसके कई विशिष्ठ प्रकार हैं:
1. धातु ध्वनि खांसी: ऐसी खांसी फैरिंग्स में धूम्रपान से उत्पन्न प्रणाली शोथ या बड़े श्वसनियों में ब्रोंकाइटिस के प्रथम स्टेज में क्षोथ होने के कारण होती है।
2. कर्कश खांसी: ऐसी खांसी गले में कोई विक्षति होने के कारण होती है।
3. घर्घर के साथ खांसी: ऐसी खांसी श्वसन के दौरान आवाज करती हुई प्रश्वसनी कष्ठ-श्वास अर्थात् घर्घर के साथ होती है। ऐसी खांसी स्वरयंत्र में डिफ्थीरिया होने के कारण भी होती है।




4. कूकर-खांसी: ऐसी खांसी छोटी-छोटी तीखी व सांस छोड़ते समय के बाद एक लम्बी, आवाज करती हुई तथा सांस लेने में ‘हूप’ के साथ होती है। ऐसी खांसी कूकर खांसी में होती है।

5. गो-खांसी: इसमें कोई विस्फोटक आवाज नहीं होती। इस खांसी की आवाज कुत्ते के रोने या गाय की डकार जैसी होती है। ऐसी खांसी स्वर-यंत्र रोगग्रस्त में होती है।

6. हल्की, आधी दबी हुई कष्टदायी खांसी: ऐसी खांसी शुष्क प्लूरिसी में होती है।

गीली खांसी गीली खांसी ऐसी खांसी है जिसके होने से बलगम निकलता है जो श्लेष्माभ, सपूय या श्लेष्म-पूयी होती है। श्लेष्माभ बलगम श्लेष्मा का बना होता है जो श्वसनी ग्रंथियों द्वारा सृजित होता है। यह गाढ़ा, लस्सेदार, उजले रंग का होता है। ऐसा बलगम तीव्र श्वसनीय शोथ में, न्यूमोनिया के प्रथम चरण में अथवा यक्ष्मा की प्रारम्भिक अवस्था में निकलता है।
बलगम गाढ़ा या पतला पूय का बना होता है तथा पीला या हरा-पीला रंग का होता है। इस प्रकार का बलगम पुराना श्वसनी शोथ में, पुराना संक्रमी दमा में, श्वसनी-विस्फार, न्यूमोनिया की देर वाले अवस्था में फुफ्फुस विद्रधि (फेफड़े के अंदर फोड़ा) या यक्ष्मा के बढ़े हुए स्वरूप में मिलता है।
श्लेष्म पूयी बलगम हल्के पीले रंग का होता है। ऐसा बलगम सपूय बलगम वाली व्याधियों (जैसा ऊपर बताया गया है) की प्राथमिक अवस्थाओं में निकलता है।
दुर्गंध करता हुआ बलगम फुफ्फुस विद्रधि, फुफ्फुसी गैंग्रीन तथा श्वसनी विस्फार की स्थितियों में निकलता है।
रक्त में सना बलगम रक्तनिष्ठीवन का परिचायक होता है।
झाग वाला, गुलाबी रंग का बलगम फुफ्फुसी शोथ से निकलता है।
हरा रंग का बलगम फुफ्फुसी गैंग्रीन में निकलता है।
काला बलगम कोयला-खदानी फुफ्फुस धूलिमयता में निकलता है।
लोहे पर लगे जंग के रंग का बलगम बिगड़े हुए न्यूमोनिया में,
कत्थे के रंग का या बादामी रंग की चटनी जैसा बलगम फुफ्फुसी अमीबिक रुग्णता में अथवा ऐसे यकृत अमीबी विद्रधि में जो फटकर किसी श्वसनी से सम्पर्क स्थापित कर लिया हो, मिलता है।
सुनहला बलगम ऐस्बेटॉस रुग्णता से निकलता है।
शुद्ध शहद में ऐसे एंजाइम होते हैं जो कफ से राहत दिलाते हैं। सूखी खांसी को दूर करने के लिये आपको दिन में 1 चम्‍मच शहद 3 बार लेना होगा।

आयुर्वेद में खांसी का उपचार
खांसी का उपचार जितनी जल्दी हो जाएं उतना बेहतर है। आयुर्वेद में खांसी का स्थायी इलाज भी मौजूद हैं। आयुर्वेद के अनुसार, जब कफ सूखकर फेफड़ों और श्वसन अंगों पर जम जाता है तो खांसी होती है। आयुर्वेद की औषधिंयां खांसी में इतनी प्रभावशाली होती हैं कि इन्हें कोई भी आसानी से ले सकता है।

कुछ गोलियों को चूसने से भी खांसी में आराम मिलता है। जैसे व्योषादि वटी, लवंगादि वटी, खदिरादि वटी आदि।
चंदामृत रस भी खांसी में अच्छा रहता है।
*हींग, त्रिफला, मुलहठी और मिश्री को नीबू के रस में मिलाकर लेने से खांसी कम करने में मदद मिलती है।



*त्रिफला और शहद बराबर मात्रा में मिलाकर लेने से भी फायदा होता है।
*गले में खराश होने पर कंटकारी अवलेह आधा-आधा चम्मच दो बार पानी से या ऐसे ही लें।
*कनकासव 3 3 चम्मच गर्म जल से भोजन के बाद सेवन तथा वासकासव का भी इसी प्रकार प्रयोग करें।
*पीपली, काली मिर्च, सौंठ और मुलहठी का चूर्ण बनाकर चौथाई चम्मच शहद के साथ लेना अच्छा रहता है।
*पान का पत्ता और थोड़ी-सी अजवायन पानी में चुटकी भर काला नमक व शहद मिलाकर लेना भी खांसी में लाभदायक होता है। खासकर बच्चों के लिए।
बताशे में काली मिर्च डालकर चबाने से भी खांसी में कमी आती है।
खांसी से बचने के सावधानी बरतते हुए फ्रिज में रखी ठंडी चीजों को न खाएं। धुएं और धूल से बचें। 
*आधा कप पानी उबालें, उसमें 1 छोटा चम्‍मच हल्‍दी और 1 छोटा चम्‍मच पिसी काली चिर्म का मिक्‍स करें। आप चाहें तो इसमें दालचीनी की एक छड़ी भी डाल सकते हें। इसे उबालें और फिर इसे धीरे धीरे तब तक पियें जब तक कि आराम ना मिल जाए।
*सर्दी, खांसी, सिरदर्द, जुकाम जैसी कुछ बीमारियां होती हैं जो किसी को भी किसी भी समय हो सकती है। खांसी की समस्या होने पर आप सुकून से कोई काम नहीं कर सकते हैं। खांसी बदलता मौसम, ठंडा-गर्म खाना पीना या फिर धूल या किसी अन्य चीज से एलर्जी के कारण सकती है । खांसी होने पर तकलीफ भी ज्यादा होती है। 
खांसी से बचने के कुछ आसान से उपाय 
निम्न सामग्री लें
काले तिल (Sesame black)
सुखी अदरक (Dry Ginger)
गुड़ (Jaggery)काले तिल को थोड़ा भून कर उसका पाउडर बना लें
सुखी अदरक और गुड़ का भी पाउडर बन लें
फिर इन्हें निम्न अनुपात में मिला लें
अदरक : 1 भाग
गुड : 2 भाग
तिल : 4 भाग
उदहारण के लिए :
1 चम्मच अदरक पाउडर, 2 चम्मच गुड़ पाउडर, 4 चम्मच तिल पाउडर को मिला लेंइस प्रकार बने पाउडर को दिन में २-३ बार गर्म पानी के साथ नियमित रूप से लेने पर 3 -4 दिनों में पुरानी खांसी इत्यादि में आराम मिलता है, यदि सुखी खांसी हो तो इस पाउडर के साथ शहद या घी मिला कर भी ले सकते है
*सौंठ को पीस कर पानी में खूब देर तक उबालें। जब एक चौथाई रह जाए तो इसका सेवन गुनगुना होने पर दिन में तीन चार बार करें। तुरंत फायदा होगा।
*गुनगुने पानी से गरारे करने से गले को भी आराम मिलता है और खांसी भी कम होती है।
*तुलसी पत्ते, 5 काली मिर्च, 5 नग काला मनुक्का, 6 ग्राम गेहूँ के आटे का चोकर , 6 ग्राम मुलहठी, 3 ग्राम बनफशा के फूल लेकर 200 ग्राम पानी में उबालें। 1 /2 रहने पर ठंडा कर छान लें। फिर गर्म करके बताशे डालकर रात सोते समय गरम-गरम पी जाएँ और चादर ओढ़कर सो जाएँ तथा हवा से बचें। कैसी भी खुश्क खाँसी हो, ठीक हो जाएगी।
तुलसी के पत्‍तों को पीस कर रस निकाल लें, फिर उसमें अदरक और शहद मिला कर लें।
*काली मिर्च, हरड़े का चूर्ण, तथा पिप्पली का काढ़ा बना कर दिन में दो बार लेने से खाँसी जल्दी दूर होती है।



*1 चम्मच शहद में पिसी हुई कालीमिर्च मिलाकर पीने से भी खांसी जल्दी ही दूर हो जाती है|
*1 चम्मच अदरक का रस में एक चोथाई शहद एवं चुटकी भर हल्दी मिलाकर लेने से खांसी जल्दी ही दूर हो जाती है।
*मूली का रस और दूध को बराबर मिलाकर 1 -1 चम्मच दिन में छह बार लेने से भी शीघ्र लाभ मिलता है ।
*हींग, काली मिर्च और नागरमोथा को पीसकर गुड़ के साथ मिलाकर गोलियाँ बना लें। प्रतिदिन भोजन के बाद दो गोलियों का सेवन करने से खाँसी और कफ में लाभ मिलता है
*अदरक को पानी में अच्‍छी तरह से उबाल लें। फिर उसमें 2 चम्‍मच शहद मिला कर दिन में तीन पर पियें। हल्‍दी आधा कप पानी उबालें, उसमें 1 छोटा चम्‍मच हल्‍दी और 1 छोटा चम्‍मच पिसी काली चिर्म का मिक्‍स करें। आप चाहें तो इसमें दालचीनी की एक छड़ी भी डाल सकते हें। इसे उबालें और फिर इसे धीरे धीरे तब तक पियें जब तक कि आराम ना मिल जाए।
* नींबू 2 चम्‍मच नींबू के रस में 1 चम्‍मच शहद मिक्‍स करें। इसे दिन में कई बार लें। इससे गले की खराश दूर होगी। लहसुन यह एंटीबैक्‍टीरियल होता है जो गले की खांसी को तुरंत ही गायब करेगी। 1 कप में दो या तीन लहसुन की कलियों को उबालें। जब पानी हल्‍का ठंडा हो जाए तब इसमें शहद मिला कर पियें। प्‍याज आधा चम्‍मच प्‍याज के रस में 1 छोटा चम्‍मच शहद मिक्‍स करें और इसे दिन में दो बार लें।
*1 चम्मच अजवाइन एवं हल्दी मिलाकर गरम कर ले,फिर उसे ठंडा होने के बाद शहद मिलाकर पीने से खांसी जल्दी ही दूर हो जाती है।*खांसी होने पर सेंधा नमक की डली को आग पर अच्छे से गरम कर लीजिए। जब नमक की डली गर्म होकर लाल हो जाए तो तुरंत आधा कप पानी में डालकर निकाल लीजिए। उसके बाद इस नमकीन पानी को पी लीजिए। ऐसा पानी 2-3 दिन सोते वक्त पीने पर खांसी समाप्त हो जाती है।
*शहद, किशमिश और मुनक्के को मिलाकर लेने से खांसी जल्दी ही ठीक हो जाती है।
तुलसी, काली मिर्च और अदरक की चाय खांसी में सबसे अच्‍छी मानी जाती है।
1 तुलसी के पत्ते, 5 काली मिर्च, 5 नग काला मनुक्का, 6 ग्राम चोकर (गेहूँ के आटे का छान), 6 ग्राम मुलहठी, 3 ग्राम बनफशा के फूल लेकर 200 ग्राम पानी में उबालें। 100 ग्राम रहने पर ठंडा कर छान लें। फिर गर्म करें और बताशे डालकर रात सोते समय गरम-गरम पी जाएँ। पीने के बाद ओढ़कर सो जाएँ तथा हवा से बचें। आवश्यकतानुसार 3-4 दिन लें, कैसी भी खुश्क खाँसी हो, ठीक हो जाएगी।
* सेंधा नमक (लाहौरी, पाकिस्तानी नमक) की एक सौ ग्राम जितनी डली खरीदकर घर में रख लें। जब भी किसी को खाँसी हो, इस सेंधा नमक की डली को चिमटे से पकड़कर आग पर, गैस पर या तवे पर अच्छी तरह गर्म कर लें। जब लाल होने लगे तब गर्म डली को तुरंत आधा कप पानी में डुबोकर निकाल लें और नमकीन गर्म पानी को एक ही बार में पी जाएँ। ऐसा नमकीन पानी सोते समय लगातार दो-तीन दिन पीने से खाँसी, विशेषकर बलगमी खाँसी को पूर्ण आराम आ जाता है।
विशेष- (1) एक बार काम लेने के बाद नमक की डली को सुखाकर रख दें। इस प्रकार इसे बार-बार काम में लिया जा सकता है।
* इसी से मिलता-जुलता एक अन्य प्रयोग इस प्रकार है- एक ग्राम सेंधा नमक और पानी में 125 ग्राम को गर्म तवे पर छमक दें। आधा रहे तब पी लें। सुबह-शाम पीने से खाँसी कुछ ही दिन में मिट जाएगी।
*. तीव्र खाँसी अचानक शुरू हो जाती हैं, और सर्दी-ज़ुकाम, फ्लू या सायनस के संक्रमण के कारण होती है। यह आम तौर से दो या तीन हफ़्तों में ठीक हो जाती है।
*. पुरानी या दीर्घकालीन खाँसी दो तीन हफ़्तों से ज़्यादा जारी रहती है।
एक चम्‍मच शहद शुद्ध शहद में ऐसे एंजाइम होते हैं जो कफ से राहत दिलाते हैं। सूखी खांसी को दूर करने के लिये आपको दिन में 1 चम्‍मच शहद 3 बार लेना होगा। गरम पानी से गरारा करना जब आप नमक मिले पानी से गरारा करते हैं तो गले का दर्द और खांसी तुरंत ही गायब हो जाती है। 1 गिलास गरम पानी में 1 चम्‍मच नमक मिला कर सुबह शाम गरारा करने से आराम मिलता है।



योगिक क्रिया खांसी के लिए
मुद्रा- बाएं हाथ का अंगूठा सीधा खडा कर दाहिने हाथ से बाएं हाथ कि अंगुलियों में परस्पर फँसाते हुए दोनों पंजों को ऐसे जोडें कि दाहिना अंगूठा बाएं अंगूठे को बहार से कवर कर ले ,इस प्रकार जो मुद्रा बनेगी उसे अंगुष्ठ मुद्रा कहेंगे।
लाभ - अंगूठे में अग्नि तत्व होता है.इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर में गर्मी बढऩे लगती है. शरीर में जमा कफ तत्व सूखकर नष्ट हो जाता है।सर्दी जुकाम,खांसी इत्यादि रोगों में यह बड़ा लाभदायी होता है, कभी यदि शीत प्रकोप में आ जाए और शरीर में ठण्ड से कपकपाहट होने लगे तो इस मुद्रा का प्रयोग लाभदायक होता है। रोज दस मिनट इस मुद्रा को करने से बहुत कफ होने पर भी राहत मिलती है। कफ शीघ्र ही सुख जाता है। साथ ही जरा सा सेंधा नमक धीरे धीरे चूसने से लाभ होता है। सुबह कोमल सूर्यकिरणों में बैठके दायें नाक से श्वास लेकर सवा मिनट रोकें और बायें से छोड़ें। ऐसा 3-4 बार करें। इससे कफ की शिकायतें दूर होंगी।
सर्दी
*खांसी का रोग अक्सर कब्जियत, तापमान में परिवर्तन, आवश्यकता से अधिक भोजन लेने और कच्ची शक्कर खाने से हो सकता है। अगर यह रोग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो उसे इलाज के साथ-साथ गुनगुना पानी पिलाना चाहिए तथा कब्ज को दूर करने का उपचार करना चाहिए। सर्दी-खांसी का उपचार एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा करने से रोगी को बहुत आराम मिलता है।
एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा सर्दी-खांसी रोग का उपचार- दक्षिण नासा रंध्र के पास तथा कपाल के ऊपर के भाग के वाम में दो बिंदु निर्देशित हैं
(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा द्वारा इलाज करने का चित्र)
सर्दी तथा खांसी से पीड़ित व्यक्ति को एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा प्रेशर देने से व्यक्ति को बहुत आराम मिलता है। इस चिकित्सा के द्वारा यह प्रेशर दिन में 2-3 बार देना चाहिए।
विशिष्ट परामर्श-
   
श्वसन पथ के रोगों मे हर्बल औषधि सर्वाधिक हितकर साबित होती है |वैध्य श्री दामोदर 9826795656 निर्मित हर्बल औषधि श्वास रोग,,दमा,अस्थमा,,सांस मे तकलीफ,श्वास कष्ट ,हाँफना,गीली खाँसी,सुखी खांसी,नजला,जुकाम मे रामबाण की तरह प्रभावकारी है|

Sunday, February 19, 2017

सदाबहार (vinca rosea) पौधा ही नही औषिधि भी है

   


    सदाफूली या सदाबहार या सदा सुहागन  बारहों महीने खिलने वाले फूलों का एक पौधा है। इसकी आठ जातियां हैं। इनमें से सात मेडागास्कर में तथा आठवीं भारतीय उपमहाद्वीप में पायी जाती है। इसका वैज्ञानिक नाम केथारेन्थस है। भारत में पायी जाने वाली प्रजाति का वैज्ञानिक नाम केथारेन्थस रोजस है। इसे पश्चिमी भारत के लोग सदाफूली के नाम से बुलाते है।
    *सदाबहार नाम के अनुसार ही सदाबहार (evergreen) पौधा है जिसको उगाने से आस-पास में सदैव हरियाली बनी रहती है। कसैले स्वाद के कारण तृष्णभोजी जानवर (herbivores) इस पौधे का तिरस्कार करते हैं। सदाबहार पौधों के आस-पास कीट, फतिगें, बिच्छू तथा सर्प आदि नहीं फटकते (शायद सर्पगंधा समूह के क्षारों की उपस्थिति के कारण) जिससे पास-पड़ोस में सफाई बनी रहती है। सदाबहार की पत्तियाँ विघटन के दौरान मृदा में उपस्थित हानिकारक रोगाणुओं को नष्ट कर देती हैं।बवासीर होने की स्थिति में इसके पत्तियों और फूलों को कुचलकर लगाने से बेहद फायदा मिलता है, ऐसा रोज़ाना करें।




*सदाबहार की जड़ों में रक्त शर्करा को कम करने की विशेषता होती है। अतः पौधे का उपयोग मधुमेह के उपचार में किया जा सकता है। दक्षिण अफ्रीका में पौधे का उपयोग घरेलू नुस्खा (folk remedy) के रूप में मधुमेह के उपचार में होता रहा है। पत्तियों के रस का उपयोग हड्डा डंक (wasp sting) के उपचार में होता है। जड़ का उपयोग उदर टानिक के रूप में भी होता है। पत्तियों का सत्व मेनोरेजिया (Menorrhagia) नामक बिमारी के उपचार में दिया जाता है। इस बिमारी में असाधारण रूप से अधिक मासिक धर्म होता है।

*त्वचा पर खुजली, लाल निशान, रशेस या किसी तरह की एलर्जी होने पर सदाबहार (vinca rosea) की पत्तियों के रस को लगाने पर आराम मिलता है।
* त्वचा पर घाव या फोड़े-फुंसी हो जाने पर इसकी पत्तियों का रस दूध में मिला कर लगाते हैं।

*. दो फूल को एक कप उबले पानी या बिना शक्कर की उबली चाय में पीने से मधुमेह में फायदा पहुंचाता है।
*कैंसर ऐसी बीमारी है जिसका पता सामान्यत: रोग बढऩे के बाद ही चल पाता है। इस स्थिति में सर्जरी ही बीमारी के विकल्प के रूप में सामने आती है। आयुर्वेद शोधकर्ताओं ने सफेद फूल वाले सदाबहार पौधे को इस बीमारी में प्रभावी माना है।
इस तरह हैं कैंसर में लाभकारी:
ये पत्तियां कैंसररोधी हैं। ये रोग बढ़ाने वाली कोशिकाओं के विकास को रोकती हैं साथ ही इस दौरान क्षतिग्रस्त हो गई कोशिकाओं को फिर से सेहतमंद बनाने का काम करती हैं। यदि इसकी पत्तियों से बने रस को कैंसर की पहली स्टेज वाले मरीज को दिया जाए तो उसके रोग के बढऩे की आशंका कम हो जाती है। वहीं दूसरी व आखिरी स्टेज के दौरान इसके प्रयोग से मरीज की प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होकर उसके जीवित रहने की अवधि बढ़ सकती है।



*क्षारों में जीवाणुनाशक गुण पाये जाते हैं इसलिए पत्तियों का सत्व का उपयोग ‘स्टेफाइलोकाकल’ (Staphylococcal) तथा ‘स्टेªप्टोकाकल’ (Streptococcal) संक्रमण के उपचार में होता है। आमतौर से ये दोनों प्रकार के संक्रमण मनुष्य में गले (throat) एवं फेफड़ों (lungs) को प्रभावित करते हैं।
*पत्तियों में मौजूद विण्डोलीन नामक क्षार डीप्थिरिया के जीवाणु कारिनेबैक्टिीरियम डिप्थेरी Corynebacterium diptherae) के खिलाफ सक्रिय होता है। अतः पत्तियों के सत्व का उपयोग डिप्थिीरिया रोग के उपचार में किया जा सकता है।

*इसकी पत्तियों को तोड़े जाने पर जो दूध निकलता है, उसे घाव पर लगाने से किसी तरह का संक्रमण नहीं होता, खुजली होने पर भी लगाया जा सकता है।
*सदाबहार के फूलों और पत्तियों के रस को पिम्पल्स पर लगाने से कुछ ही दिनों में इनसे छुटकारा मिल जाता है।
*पौधे के जड़ का उपयोग सर्प, बिच्छू तथा कीट विषनाशक (antidote) के रूप में किया जा सकता है।
उपर्युक्त के अतिरिक्त आज सदाबहार ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है क्योंकि इसमें कैंसररोधी (Anticancer) गुण पाये जाते हैं। सदाबहार से प्राप्त विनक्रिस्टीन तथा विनब्लास्टीन नामक क्षारों का उपयोग रक्त कैंसर (Leukaemia) के उपचार में किया जा रहा है।*सदाबहार की तीन - चार कोमल पत्तियाँ चबाकर रस चूसने से मधुमेह रोग से राहत मिलती है |



* सदाबहार के पौधे के चार पत्तों को साफ़ धोकर सुबह खाली पेट चबाएं और ऊपर से दो घूंट पानी पी लें | इससे मधुमेह ,मिटता है 

| यह प्रयोग कम से कम तीन महीने तक करना चाहिए |
*सदाबहार के फूलों और पत्तियों के रस को पिम्पल्स पर लगाने से कुछ ही दिनों में इनसे छुटकारा मिल जाता है।
प्रयोग का तरीका:
 इसके पत्तों को सुखाकर चूर्ण बना लें व रोजाना नाश्ते के बाद आधा ग्राम चूर्ण को सादा पानी से लें। इसके अलावा रस को भी प्रयोग में लाया जा सकता है। रोजाना पांच ताजा पत्तियों को पानी के साथ पीसकर बारीक कपड़े से छानकर रस निकालें व इसे भोजन करने के बाद पिएं।
* आधे कप गरम पानी में सदाबहार के तीन ताज़े गुलाबी फूल 05 मिनिट तक भिगोकर रखें | उसके बाद फूल निकाल दें और यह पानी सुबह ख़ाली पेट पियें | यह प्रयोग 08 से 10 दिन तक करें | अपनी शुगर की जाँच कराएँ यदि कम आती है तो एक सप्ताह बाद यह प्रयोग पुनः दोहराएँ |विंका फूल का कैंसर के कुछ प्रकार जैसे ल्यूकेमिया (leukemia) और लिम्फोमा (lymphoma) के उपचार में इस्तेमाल किया जाता है। इस फूल से साइटोटोक्सिक (cytotoxic) प्रभाव पड़ता है, जो इसे कैंसर के खिलाफ प्रभावी बनाता है। इसे अन्‍य दवाओं में मिलाकर कीमोथेरेपी (chemotherapy) में भी प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा इसका प्रयोग एंटी-माइक्रोबियल (anti-microbial), एंटी हाइपरटेंसिव (anti-hypertensive) और एंटी डायबिटीक (anti-diabetic) के खिलाफ किया जाता है।
ध्यान रहे: 
कड़वा स्वाद होने के कारण इसे खाली पेट लेने से उल्टी हो सकती है। इसलिए इसका प्रयोग कुछ खाकर ही करें। छोटे बच्चों को इसके रस में शक्कर या चूर्ण में गुड़ मिलाकर गोलियों के रूप में दिया जा सकता है।
साइड इफेक्‍ट
सदाबहार में कई सारे गुण होते हैं, लेकिन इसके साथ कुछ साइड इफेक्‍ट भी होते हैं। इसके उपयोग के बाद कई बार उल्टी, सिर दर्द, मतली, खून बहना और थकान आदि समस्याएं भी हो सकती हैं।

Saturday, February 18, 2017

चिरायता के गुण,लाभ उपयोग

    



     चिरायता (Swertia chirata Ham) यह जेंशियानेसिई (Gentianaceae) कुल का पौधा है, जिसका प्रेग देशी चिकित्सा पद्धति में प्राचीन काल से होता आया है। यह तिक्त, बल्य (bitter tonic), ज्वरहर, मृदु विरेचक एवं कृमिघ्न है, तथा त्वचा के विकारों में भी प्रयुक्त होता है। इस पौधे के सभी भाग (पंचांग), क्वाथ, फांट या चूर्ण के रूप में, अन्य द्रव्यों के साथ प्रयोग में जाए जाते हैं। इसके मूल को जंशियन के प्रतिनिधि रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।चिरायता के बारे में आमतौर पर अधिकांश लोग जानते हैं, क्योंकि प्राचीन समय से इसका उपयोग आयुर्वेदिक व घरेलू उपचारों में होता आया है। चिरायता स्वाद में कड़वा होता है। चिरायता मूल रूप से नेपाल, कश्मीर और हिमाचल में पाया जाता है। इसके फूल बरसात और फल सर्दियों के मौसम में आते हैं।
चिरायता एक एंटीबॉयोटिक औषधि है, जो प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद करता है। इसका रोजाना सेवन करने पर कीटाणु नष्ट हो जाते हैं और बीमारियां दूर रहती हैं।
चिरायता बनाने की विधि (Method of Swertia Chirata)
सूखी तुलसी पत्ते का चूर्ण, नीम की सूखी पत्तियों का चूर्ण, सूखे चिरायते का चूर्ण समान मात्रा (100 ग्राम) मिलाकर एक डिब्बे में भर कर रख लीजिए। मलेरिया, बुखार व अन्य रोगों की स्थिति में दिन में 3 बार दूध से सेवन करने से लाभ होगा।



चिरायता इस्‍तेमाल का तरीका

चिरायता बनाने का आसान और सरल उपाय है कि इसका चाय की तरह सेवन किया जाए। जिस तरह आप चाय बनाते हैं यानी सबसे पहले पानी उबालें। इसके बाद इसमें एक चम्मच चिरायता की जड़ का इस्तेमाल करें। इस मिक्सचर को तकरीबन आधा घंटे तक रखें। इसके बाद इसे छानें और चिरायता चाय का मजा लें।
कैंसर और ट्यूमर से बचाव
तमाम अध्ययनों से पता चला है कि चिरायता के जड़, पत्तों, टहनी, फल में 24 किस्म के तत्व मौजूद होते हैं। ये तमाम तत्व कैंसर को प्राकृतिक रूप से ठीक करने में मदद करते हैं। आस्ट्रेलिया में स्थित यूनिवर्सिटी आफ क्वीन्सलैंड में हुए अध्ययन के मुताबिक चिरायता में पांच किस्म के स्टेराइडल सैपोनिन्स होते हैं। वास्तव में यही सैपोनिन्स कैंसर से लड़ने में सहायक है। इसके अलावा इसमें कई किस्म के एंटीआक्सीडेंट एसिड, एंटी-इन्फ्लेमेटरी, तेल, रसायन आदि होते हैं जो कि इस बीमारी से बचाव के जरूरी है। यही नहीं चिरायता की सेल की हो रही क्षति रोकन में भी महति भूमिका है।
खून साफ करें चिरायता
हजारों सालों से चिरायता नामक जड़ी-बूटी का इस्‍तेमाल त्‍वचा संबंधी रोगों के लिए किया जाता है, क्‍योंकि इसके सेवन से रक्‍त को साफ करने में मदद मिलती है। इसके अलावा चिरायता एक एंटी-बायोटिक औषधि है, जो प्रतिरोधक क्षमता बढ़ान में मदद करती है। इसके रोजाना सेवन करने से कीटाणु नष्‍ट होते हैं और बीमारियां दूर रहती है। आयुर्वेद के अनुसार चिरायता का रस कई किस्म की बीमारियों से लड़ने में सहायक है मसलन कैंसर, ट्यूमर का विकास, सर्दी-जुखाम, रुमेटाइड अर्थराइटिस, दर्द, जोड़ों के दर्द, त्वचा सम्बंधी बीमारी, थकन, कमजोरी, मस्लस में दर्द, सेक्स सम्बंधी समस्याएं, सिरदर्द, गठिया, पाचनतंत्र सम्बंधी समस्या, लिवर सम्बंधी समस्या, संक्रमण आदि। आइए चिरायता के त्‍वचा और स्‍वास्‍थ्‍य लाभों की जानकारी लेते हैं।



लिवर की सुरक्षा

चूंकि चिरायता पेशाब की स्थिति को भी बेहतर करता है। यही नहीं पसीने आने में भी यह मदद करता है। इसका मतलब साफ है कि यह लिवर के लिए लाभकारी तत्व है। यह सूजन और जलन से तो बचाता ही है। साथ पेट में हा रही तमाम किस्म की समस्याओं को भी रोकता है। इससे लिवर की सुरक्षा तो होती है साथ ही कई अन्य समस्याएं आने से पहले ही निपट जाती हैं। यह हमारे रक्त को साफ करता है और रक्त संचार को बेहतर करता है। इसके अलावा चिरायता का एक बड़ा गुण यह भी है कि रक्त से टाक्सिन को निकाल बाहार करता है। इसके अलावा यह टिश्यू को क्षति होने से रोकता है जिससे लिवर के स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
त्वचा सम्बंधी समस्या का निदान
एग्जीमा, फंगस, कील-मुंहासे आदि तमाम त्वचा सम्बंधी समस्याओं को चिरायता से निदान किया जा सकता है। यही नहीं इससे बैक्टीरियल इंफेक्शन को भी दूर किया जा सकता है। जिन महिलाओं को मौसम बदलने से या फिर बरसात के मौसम में मुंहासों की समस्या होती है, उन्हें आवश्यक तौर पर इसका उपयोग करना चाहिए।
सर्दी-जुखाम



यह इसका सबसे आम और सर्वविदित गुण है। तमाम जड़ी बूटियों की तरह चिरायता भी सर्दी-जुखाम से लड़ने में सहायक है। इसका सेवन कोई भी कर सकता है। जिन लोगों को ठंड लगने की शिकायत होती है खासकर उन्हें जिन्हें सर्दी के कारण फ्लू तक हो जाता है, उन्हें चिरायता का सेवन आवश्यक तौरपर करना चाहिए। हालांकि अकसर यह माना जाता है कि जड़ी बूटियां गंभीर बीमारियों को ठीक करने में मददगार नहीं होती। लेकिन चिरायता के साथ ऐसा नहीं है। यह रेसपिरेटरी संक्रमण को न सिर्फ ठीक करता है वरन किसी को यदि परिवार से यह बीमारी मिली है तो भी इसमें सुधार लाया जा सकता है।

कारगर एंटीबॉयोटिक-
बुखार ना होने की स्थिति में भी यदि इसका एक चम्मच सेवन प्रतिदिन करें तो यह चूर्ण किसी भी प्रकार की बीमारी चाहे वह स्वाइन फ्लू ही क्यों ना हो, उसे शरीर से दूर रखता है। इसके सेवन से शरीर के सारे कीटाणु मर जाते हैं। यह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में भी सहायक है। इसके सेवन से खून साफ होता है तथा धमनियों में रक्त प्रवाह सुचारू रूप से संचालित होता है।

Friday, February 17, 2017

कुंदरु के आयुर्वेदिक गुण ,उपयोग




   कुंदरू को तिंदूरी भी कहा जाता है। यह ककड़ी वर्ग यानी कुकुरबिटेसी परिवार की सदस्य है। इसे ग्रीष्मकालीन (मार्च से जून) या बरसाती (जून-जुलाई से अक्टूबर-नवंबर) फसल के रूप में उगाया जा सकता है। इसे पुरानी लताओं की कटिंग से बोया जाता है। एक बार उगाए जाने पर सही देखरेख, पोषण एवं पौध संरक्षण के साथ पाँच-छः साल तक इससे फल प्राप्त किए जा सकते हैं|



*कुंदरू की सब्जी के अलावा फूल और पत्ते भी हेल्थ के लिए बहुत फायदेमंद है। इसमें पानी की मात्रा अधिक होती है। साथ ही यह प्रोटीन, कैल्शियम और कार्बोहाइड्रेट्स का भी बेहतर सोर्स है। कुंदरू खाने से पथरी की संभावना कम होती है। जिन्हें किडनी स्टोन है वो अगर कुंदरू खाते हैं तो स्टोन निकल जाता है। कुंदरू की जड़ों, तनों और पत्तियों में कई गुण हैं। ये चर्म रोगों, जुकाम, फेफड़ों के शोथ तथा डायबिटीज़ में लाभदायक बताया गया है। इसके अलावा अगर आप अपने खान-पान में सुधार करके आंखों से चश्मा हटाना चाहते हैं, तो भी कुंदरू का सेवन लाभ पहुंचाता है। कुंदरू एक स्वादिष्ट सब्जी होने के साथ पौष्टिक भी है। आयुर्वेदिक दृष्टि से इसके मूल (जड़) वमनकारक, रेचक, शोधघ्न (सूजन को कम करने वाले) होते हैं। इसके फल गरिष्ठ, मधुर व शीतल होते हैं।कुंदरू के फायदे भले ही आपको नजर न आते हों लेकिन यह सब्जी ऐसी है जिसके पत्ते और फूल भी उतने ही गुणकारी हैं जितना इसका फल है। हाल में एक शोध में यह माना गया है कि खाने में रोज 50 ग्राम कुंदरू का सेवन करने से हाई बीपी के मरीजों को आराम मिलता है।
*100 ग्राम कुंदरू में 93.5 ग्राम पानी होता है, 1.2 ग्राम प्रोटीन, 18 के कैलोरी ऊर्जा, 40 मिलीग्राम कैल्शियम, 3.1 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 30 मिलीग्राम पोटैशियम, 1.6 ग्राम फाइबर और कई जरूरी पोषक तत्व होते हैं।
*कुंदरू के कडुवे फल साँस रोगों, बुखार एवं कुष्ठ रोग के शमन के लिए उपयोग में लाए जाते हैं। मधुमेह में इसकी पत्तियों का चूर्ण जामुन की गुठली के चूर्ण व गुड़मार के साथ दिया जाना लाभदायक है
चश्मा हटाए कुंदरू का सेवन-
आदिवासियों के अनुसार कुंदरू के फल की अधकच्ची सब्जी लगातार कुछ दिनों तक खाने से आखों से चश्मा तक उतर जाता है। साथ ही माना जाता है कि इसकी सब्जी के निरंतर उपभोग से बाल झड़ने का क्रम बंद हो जाता है। यह गंजेपन से भी बचा जा सकता है|

Thursday, February 16, 2017

प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धान्त Principles of nature cure

    प्राकृतिक चिकित्सा (नेचुरोपैथी / naturopathy) एक सहज चिकित्सा पद्धति है। इस चिकित्सा के द्वारा उपचार के क्रम में रोगी व्यक्ति के शरीर के अंदर रोग प्रतिरोधक क्षमताओं को विकशित किया जाता है जिससे वो रोगाणुओं ले लड़ सके।
प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति के अन्तर्गत निम्न प्रकार की चिकित्सा की जाती है
जल चिकित्सा, सूर्य चिकित्सा, एक्यूपंक्चर, एक्यूप्रेशर, मृदा चिकित्सा आदि। प्राकृतिक चिकित्सा को बढ़ावा देने में विश्व की कई महत्वपूर्ण चिकित्सा पद्धतियों का विशेयोगदान है। जैसे भारतीय आयुर्वेद चिकित्सा और यूरोप का नेचर क्योर।

प्राकृतिक−चिकित्सा−प्रणाली का अर्थ है प्राकृतिक पदार्थों विशेषतः प्रकृति के पाँच मूल तत्वों द्वारा स्वास्थ्य−रक्षा और रोग निवारण का उपाय करना। विचारपूर्वक देखा जाय तो यह कोई गुह्य विषय नहीं है और जब तक मनुष्य स्वाभाविक और सीधा−सादा जीवन व्यतीत करता रहता है तब तक वह बिना अधिक सोचे−विचारे भी प्रकृति की इन शक्तियों का प्रयोग करके लाभान्वित होता रहता है। पर जब मनुष्य स्वाभाविकता को त्याग कर कृत्रिमता की ओर बढ़ता है, अपने रहन−सहन तथा खान−पान को अधिक आकर्षक और दिखावटी बनाने के लिये प्रकृति के सरल मार्ग से हटता जाता है तो उसकी स्वास्थ्य−सम्बन्धी उलझनें बढ़ने लगती हैं और समय−समय पर उसके शरीर में कष्टदायक प्रक्रियाएँ होने लगती हैं, जिनको ‘रोग’ कहा जाता है। इन रोगों को दूर करने के लिये अनेक प्रकार की चिकित्सा−प्रणालियाँ आजकल प्रचलित हो गई हैं जिनमें हजारों तरह की औषधियों, विशेषतः तीव्र विषात्मक द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है। इन तीव्र दवाओं से जहाँ कुछ रोग अच्छे होते हैं वहाँ उन्हीं की प्रतिक्रिया से कुछ अन्य व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और संसार में रोगों के घटने के बजाय नित्य नवीन रोगों की वृद्धि होती जाती है। इस अवस्था को देख कर पिछले सौ−डेढ़−सौ वर्षों के भीतर योरोप अमरीका के अनेक विचारशील सज्जनों का ध्यान प्राकृतिक तत्वों की उपयोगिता की तरफ गया और उन्होंने मिट्टी, जल, वायु, सूर्य−प्रकाश आदि के विधिवत् प्रयोग द्वारा शारीरिक कष्टों, रोगों को दूर करने की एक प्रणाली का प्रचार किया। वही इस समय प्राकृतिक चिकित्सा या ‘नेचर क्योर’ के नाम से प्रसिद्ध है।
प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में भोज्य पदार्थों को विशेषकर दालों और सब्जियों को उनकी प्राकृतिक अवस्था में सेवन करने की सलाह दी जाती है। अपक्वाहार (यानी बिना पकाये हुए भोजन ) प्राकृतिक चिकित्सा का मूलभूत सिद्धान्त है। सब्जियों को कच्चे सलाद के रूप में और दालों को भिंगोंकर अंकुरित खाने की अवधारणा ही प्राकृतिक चिकित्सा है।
पर यह समझना कि प्राकृतिक−चिकित्सा प्रणाली का आविष्कार इन्हीं सौ−दो−सौ वर्षों के भीतर हुआ है, ठीक न होगा। हमारे देश में अति प्राचीन काल से प्राकृतिक पंच−तत्वों की चमत्कारी शक्तियों का ज्ञान था और उनका विधिवत् प्रयोग भी किया जाता था। और तो क्या हमारे वेदों में भी, जिनको अति प्राचीनता के कारण अनादि माना जाता है और जिनका उद्भव वास्तव में वर्तमान मानव सभ्यता के आदि काल में हुआ था प्राकृतिक चिकित्सा के मुख्य−सिद्धान्तों का उल्लेख है।


ऋग्वेद का एक मंत्र देखिये—
आपः इद्वा उ भेषजीरापो अमीवचातनीः।आपः सर्वस्य भेषजीस्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्॥ (10−137−6)
“जल औषधि रूप है, यह सभी रोगों को दूर करने वाली महान औषधि के तुल्य गुणकारी है। यह जल तुमको औषधियों के समस्त गुण (लाभ) प्राप्त करावे।”
इस तरह के वचन ऋग्वेद और अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर मिलते हैं। साथ ही सूर्य−प्रकाश तथा वायु के आरोग्यप्रदायक गुणों का भी उल्लेख मिलता है। तामिल भाषा में वेदों के समान ही पूजनीय माना जाने वाले ‘कुरल’ नामक ग्रन्थ में प्राकृतिक चिकित्सा की विधियों की बड़े उत्तम ढंग से शिक्षा दी गई हैं। यह ग्रन्थ दो हजार वर्ष से अधिक पुराना है। इसी प्रकार योरोप के सर्वप्रथम चिकित्साशास्त्री माने जाने वाले ‘हिप्पोक्रेट्स’ ने मनुष्यों को स्वास्थ्य विषयक उपदेश देते हुये स्पष्ट लिखा है “तेरा आहार ही तेरी औषधि हो और तेरी औषधि तेरा आहार हो।” आजकल भी प्राकृतिक चिकित्सकों का एक बहुत बड़ा सिद्धांत यही है कि आहार ही ऐसा दिया जाय जो औषधि का काम दे और जिससे शरीर के विकार स्वयं दूर हो जायें। हिप्पोक्रेट्स का सिद्धान्त पूर्णतया भारतीय विद्वानों के मत से मिलता हुआ है, और उसे भारतवर्ष की विद्याओं का ज्ञान हो तो कोई आश्चर्य भी नहीं। क्योंकि उस ढाई हजार पुराने युग में भारत की सभ्यता और संस्कृति का संसार के सभी भागों में प्रचार हो चुका था।
इस प्रकार जब तक मनुष्य प्रकृति की गोद में पलते−खेलते थे, उनका रहन−सहन भी प्राकृतिक नियमों के अनुकूल था तो वे अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति प्राकृतिक ढंग से ही करते थे। पर मध्यकाल में जब बड़े−बड़े राज्यों और साम्राज्यों की स्थापना हो गई तो बड़े आदमियों के रहन−सहन में भोग विलास की अधिकता होने लगी और उसकी पूर्ति के लिये भाँति−भाँति के कृत्रिम उपायों का प्रयोग भी बढ़ने लगा। साधारण लोग भी उनकी नकल करके नकली चीजों को अधिक सुन्दर और आकर्षक समझने लगे, जिसके फल से लोगों का स्वास्थ्य निर्बल पड़ने लगा, तभी तरह−तरह के रोगों की वृद्धि होने लगी। जब काल क्रम से यह अवस्था बहुत बिगड़ गई और संसार की जनसंख्या तरह−तरह के भयानक तथा गन्दे रोगों के पंजे में फँस गई तो विचारशील लोगों का ध्यान इसके मूल कारण की तरफ गया और उन्होंने कृत्रिम आहार−बिहार की हानियों को समझ कर “प्रकृति की ओर लौटो” (बैक टू नेचर) का नारा लगाया।
प्राकृतिक चिकित्सा के मूलभूत सिद्धान्त
१) इसे अपनाने से कोई हानि नहीं कोई साइड इफ़ेक्ट नहीं।
२) रोग कर कारण पहचानना और उसका समूल नास।
३) स्वस्थ जीवन जीने की शिक्षा, प्राकृतिक जीवन शैली का अनुपालन शीखाना।
४) व्यक्तिगत उपचार द्वारा रोगी को ठीक करना। प्रत्येक रोक रोगी के प्रकृति के अनुसार अलग अलग उपचार मांगते हैं। एक ही व्याधि अलग अलग व्यक्तियों में अलग अलग उपचार मांगती है।
५) रोग का उपचार तथा इसके रोकथाम पर विशेष ध्यान देना।
६) रोग प्रतिरोधक क्षमता (शरीर की जीवनी शक्ति) को बलवती बनानायदि हम भारतीय धर्म और संस्कृति की दृष्टि से इस चिकित्सा−प्रणाली की व्याख्या करें तो हम कह सकते हैं कि मनुष्य के स्वास्थ्य और रोगों के भीतर भगवान की दैवी शक्ति ही काम कर रही है। व्यवहारिक क्षेत्र में यह रोगों और व्याधियों के निवारण के लिये केवल उन्हीं आहारों तथा पञ्च तत्वों का औषधि रूप में प्रयोग करना बतलाती है जो सर्वथा प्रकृति के अनुकूल हैं। इस प्रकार इस चिकित्सा के छह विभाग हो जाते हैं−मानसिक चिकित्सा, उपवास, सूर्य−प्रकाश−चिकित्सा, वायु चिकित्सा, जल चिकित्सा, आहार अथवा मिट्टी चिकित्सा।



आजकल जिस डाक्टरी चिकित्सा−पद्धति का विशेष प्रचलन है उसका उद्देश्य किसी भी उपाय से रोग में तत्काल लाभ दिखला देना होता है, फिर चाहे वह लाभ क्षण स्थायी−धोखे की टट्टी ही क्यों न हो। हम देखते हैं कि अस्पतालों में एक−एक रोगी को महीनों तक प्रतिदिन तीव्र इंजेक्शन लगते रहते हैं, पर एक शिकायत ठीक होती है तो दूसरी उत्पन्न हो जाती है। पर पीड़ा के कुछ अंशों में मिटते रहने के कारण लोग इस बाह्य चिह्नों की चिकित्सा के फेर में पड़े रहते हैं। इसके विपरीत प्राकृतिक चिकित्सा में रोगों के विभिन्न नामों तथा रूपों की चिन्ता न करके उनके मूल कारण पर ही ध्यान दिया जाता है और उसी को निर्मूल करने का प्रयत्न किया जाता है। इतना ही नहीं इस चिकित्सा का वास्तविक लक्ष्य केवल शारीरिक ही नहीं वरन् मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य प्राप्त कराना भी माना गया है, क्योंकि मानसिक तथा आध्यात्मिक सुधार के बिना शारीरिक स्वास्थ्य स्थायी नहीं हो सकता। इसलिये भारतीय चिकित्सा प्रणाली में जहाँ शुद्ध आहार−बिहार का विधान है वहाँ उच्च और पवित्र जीवन व्यतीत करने पर भी जोर दिया गया है। प्राकृतिक चिकित्सा के तत्व का यथार्थ रूप में हृदयंगम करने वाला व्यक्ति गीता के “कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” वाले वाक्य पर पूर्ण श्रद्धा रखकर ‘सत्य−आचरण’ को ध्यान रखता है और फल को भगवान के ऊपर छोड़ देता है। सत्य−आचरण वाला व्यक्ति प्रथम तो रोगी ही नहीं होगा और यदि किसी गलती या दुर्घटना से हो भी गया तो उसी आचरण के प्रभाव से रोग का निवारण शीघ्र ही हो जायेगा। रोग की अवस्था में यह ‘सत्य−आचरण’ उपवास शुद्ध वायु, प्रकाश, जल स्नान तथा औषधि रूप आहार का प्रयोग करना ही हो सकता है, इन साधनों से हम सब प्रकार के रोगों की सफलतापूर्वक चिकित्सा करने में सक्षम हो सकते हैं।
आगे चलकर जब रोगों के कारण और स्वरूप पर विचार करते हैं तो मालूम होता है कि रोग जीवित शरीर में ही उत्पन्न हो सकता है। जीवित शरीर एक मशीन या यंत्र की तरह है जिसका संचालन एक सूक्ष्मशक्ति (प्राण) द्वारा होता है। यही शक्ति भौतिक पदार्थों का सार ग्रहण करके उससे शरीर का निर्माण कार्य करती रहती है और दूसरी ओर इसी के द्वारा सब प्रकार के आहार से बचे हुये निस्सार मल रूप अंश का निष्कासन किया जाता है। ये दोनों क्रियाऐं एक दूसरे से सम्बन्धित हैं और इन दोनों के बिना ठीक तरह सञ्चालित हुये न तो जीवन और न स्वास्थ्य स्थिर रह सकता है। पर हम देखते हैं कि अधिकाँश लोग ग्रहण करने की—भोजन की क्रिया के महत्व को तो कुछ अंशों में समझते हैं और अपनी बुद्धि तथा सामर्थ्य के अनुसार पौष्टिक, शक्ति प्रदायक, ताजा, रुचिकारक भोजन की व्यवस्था करते हैं, पर निष्कासन की क्रिया के महत्व को समझने वाले और उस पर ध्यान देने वाले व्यक्तियों की संख्या अत्यन्त न्यून है। लोग समझते हैं कि उत्तम भोजन को पेट में डाल लिया जायेगा तो वह लाभ ही करेगा। पर यह भोजन यदि नियमानुसार परिमित मात्रा में पथ्य−अपथ्य का ध्यान रख कर न किया जायेगा तो निष्कासन की क्रिया का बिगड़ जाना अवश्यम्भावी है। उसके परिणामस्वरूप शरीर के भीतर मल और विकार जमा होने लगते हैं और स्वास्थ्य का संतुलन नष्ट हो जाता है।



यह विकार या विजातीय द्रव्य शरीर के स्वाभाविक तत्वों के साथ मिल नहीं पाता और एक प्रकार का संघर्ष अथवा अशान्ति उत्पन्न कर देता है। हमारी जीवनी−शक्ति यह कदापि पसन्द नहीं करती कि उस पर विजातीय द्रव्य का भार लादकर उसके स्वाभाविक देह−रक्षा के कामों में बाधा उपस्थित की जाय। वह हर उपाय से उसे शीघ्र से शीघ्र बाहर निकालने का प्रयत्न करती है। यदि वह उसे पूर्ण रूप से निकाल नहीं पाती तो ऐसे अंगों में डाल देने का प्रयत्न करती है जो सबसे कम उपयोग में आते हैं और जहाँ वह कम हानि पहुँचा कर पड़ा रह सकता है। इस प्रकार जब तक जीवनी−शक्ति विजातीय द्रव्य के कुप्रभाव को मिटाती रहती है तब तक हमें किसी रोग के दर्शन नहीं होते। पर जब हम बराबर गलत मार्ग पर चलते रहते हैं और विजातीय द्रव्य का परिमाण बढ़ता ही जाता है, तो लाचार होकर जीवनी शक्ति को उसे स्वाभाविक मार्गों के बजाय अन्य मार्गों से निकालना पड़ता है। चूँकि यह कार्य नवीन होता है, हमारे नियमित अभ्यास और आदतों के विरुद्ध होता है, इस लिये उससे हमको असुविधा, कष्ट, पीड़ा का अनुभव होता है और हम उसे ‘रोग’ या बीमारी का नाम देते हैं। पर वास्तविक रोग तो वह विजातीय द्रव्य या विकार होता है जिसे हम अनुचित आहार−विहार द्वारा शरीर के भीतर जमा कर देते हैं। ये कष्ट और पीड़ा के ऊपरी चिह्न तो हमारी शारीरिक प्रकृति अथवा जीवनीशक्ति द्वारा उस रोग को मिटाने का उपाय होते हैं। अगर हम इस तथ्य को समझ कर तथा कष्ट और पीड़ा को प्रकृति की चेतावनी के रूप में ग्रहण करके सावधान हो जायें तो रोग हमारा कुछ भी अनिष्ट नहीं कर सकता। उस समय हमारा कर्तव्य यही होना चाहिये कि हम प्रकृति के काम में किसी तरह का विघ्न बाधा न डालें वरन् अपने गलत रहन−सहन को बदलकर प्राकृतिक−जीवन के नियमों का पालन करने लगें। इससे विजातीय द्रव्य के बाहर निकालने के कार्य में सुविधा होगी और हम बिना किसी खतरे के अपेक्षाकृत थोड़े समय में रोग−मुक्त हो जायेंगे। संक्षेप में यही प्राकृतिक चिकित्सा का मूल रूप है, जिसको उपवास, मिट्टी और जल के प्रयोग, धूप−स्नान आदि कितने ही विभागों में बाँट कर सर्वसाधारण को बोधगम्य बनाने का प्रयत्न किया गया है।

Wednesday, February 15, 2017

प्रोस्टेट कैंसर के लिए घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार

   

    घरेलू उपाय जीवनशैली का हिस्‍सा होते हैं। इनकी खास बात यह होती है कि आप इनका सेवन सामान्‍य चिकित्‍सा के साथ भी ले सकते हैं। प्रोस्‍टेट कैंसर में भी घरेलू उपाय चिकित्‍सीय सहायता से प्राप्‍त होने वाले लाभ को तो बढ़ाते ही हैं साथ ही आपके ठीक होने की गति में भी इजाफा करते हैं।
प्रोस्टेट कैंसर के इलाज के लिए घरेलू नुस्खे बहुत कारगर हो सकते हैं। प्रोस्टेट एक ग्रंथि होती है जो पेशाब की नली के ऊपरी भाग के चारों ओर स्थित होती है। यह ग्रंथि अखरोट के आकार जैसी होती है। आमतौर पर प्रोस्टेट कैंसर 50 साल की उम्र के बाद सिर्फ पुरुषों में होने वाली एक बीमारी है। प्रोस्टेट कैंसर की शुरूआती अवस्था में अगर पता चल जाए तो उपचार हो सकता है।
   इसका इलाज रेक्टल एग्जाममिनेशन से होता है। इसके लिए सीरम पीएसए की खून में जांच व यूरीनरी सिस्टम का अल्ट्रासाउंड भी करवाया जाता है। इसके अलावा घरेलू नुस्खों को अपनाकर कुछ हद तक इस प्रकार के कैंसर का इलाज हो सकता है। आइए हम आपको प्रोस्टेट कैंसर के लिए घरेलू उपचार बताते हैं।



प्रोस्टेट कैंसर के लिए घरेलू नुस्खे:

ग्रीन टी-
प्रोस्टेट कैंसर से ग्रस्त आदमी को नियमित रूप से एक से दो कप ग्रीन टी का सेवन करना चाहिए। ग्रीन टी में कैंसर रोधी तत्वे पाये जाते हैं।
व्हीटग्रास-
प्रोस्टेट कैंसर के उपचार के लिए व्हीटग्रास बहुत लाभकारी होता है। व्हीसट ग्रास कैंसर युक्त कोशिकाओं को कम करता है। इसके अलावा व्हीटग्रास खाने से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और शरीर से विषैले तत्व भी हटते हैं।
एलोवेरा-
अलोवेरा को प्रोस्टेट कैंसर के उपचार के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। प्रोस्टेट कैंसर से ग्रस्त मरीजों को नियमित रूप से एलोवेरा का सेवन करना चाहिए। एलोवेरा में कैंसररोधी तत्व पाये जाते हैं जो कि कैंसर की कोशिकाओं को बढ़ने से रोकते हैं।
ब्रोकोली-
ब्रोकोली के अंकुरों में मौजूद फायटोकेमिकल कैंसर की कोशाणुओं से लड़ने में सहायता करते हैं। यह एंटी ऑक्सीडेंट का भी काम करते हैं और खून को शुद्ध भी करते हैं। प्रोस्टेंट कैंसर होने पर ब्रोकोली का सेवन करना चाहिए।
अंगूर-



प्रोस्टे़ट कैंसर के उपचार के लिए अंगूर भी कारगर माना जाता है। अंगूर में पोरंथोसाइनिडीस की भरपूर मात्रा होती है, जिससे एस्ट्रोजेन के निर्माण में कमी होती है। इसके कारण प्रोस्टेट कैंसर के इलाज में मदद मिलती है।

सोयाबीन-
सोयाबीन से भी प्रोस्टेट कैंसर के उपचार में सहायता मिलती है। प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों को रोज के खानपान के साथ सोयाबीन के अंकुर या पकाए हुए सोयाबीन का सेवन करना चाहिए। सोयाबीन में कुछ ऐसे एंजाइम पाये जाते हैं जो हर प्रकार के कैंसर से बचाव करते हैं।
लहसुन-
लहसुन में औषधीय गुण होते हैं। लहसुन में बहुत ही शक्तिशाली एंटी-ऑक्सीडेंट होते हैं जैसे - एलीसिन, सेलेनियम, विटामिन सी, विटामिन बी। इसके कारण कैंसर से बचाव होता है और कैंसर होने पर लहसुन का प्रयोग करने से कैंसर बढ़ता नही है।



अमरूद और तरबूज-

प्रोस्टेट कैंसर के उपचार के लिए अमरूद और तरबूज भी बहुत कारगर हैं। अमरूद और तरबूज में लाइकोपीन तत्व ज्यादा मात्रा में पाया जाता है जो कि कैंसररोधी है। इसलिए प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों को इन फलों का ज्यादा मात्रा में सेवन करना चाहिए।
इसके अलावा प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों को ताजे फलों और सब्जियों  का भी सेवन भरपूर मात्रा में करना चाहिए। प्रोस्टेट कैंसर के ये घरेलू उपाय चिकित्सीय सहायता के साथ साथ चल सकते हैं। कैंसर के लक्षण नजर आते ही आपको डॉक्टर से मिलना चाहिए। हां इन उपायों को आप अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना सकते हैं|
 विशिष्ट परामर्श-
प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ने मे हर्बल औषधि सर्वाधिक कारगर साबित हुई हैं| यहाँ तक कि लंबे समय से केथेटर नली लगी हुई मरीज को भी केथेटर मुक्त होकर स्वाभाविक तौर पर खुलकर पेशाब आने लगता है| प्रोस्टेट के विभिन्न रोगों मे  रामबाण औषधि|आपरेशन की जरूरत नहीं होती | जड़ी -बूटियों से निर्मित औषधि हेतु वैध्य श्री दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क कर सकते हैं|

रोजाना कच्‍चा अंडा खाने के स्‍वास्‍थ्‍य लाभ:health benefits of eating raw egg




   पहले लोग अंडे को माँसाहारी खाना मानते थे, वैसे अभी भी कुछ लोग मानते है. लेकिन अंडे खाने वालों का एक अलग वर्ग बन गया है, जहाँ पहले सिर्फ वेजिटेरियन व् नॉन वेजिटेरियन वर्ग होता था, अब एक तीसरा वर्ग भी है एग्गिटेरियन मतलब जो लोग मांस नहीं खाते लेकिन अंडे खाते है. अंडे में मौजूद पोषक तत्व के कारण इसे कोई नज़रअंदाज नहीं कर पाता. डॉक्टर सभी को इसे खाने की सलाह देते है.क्या आपने कभी अंडे को बिना पकाए खाने की बात सोची है? अगर नहीं, तो आपको बता दें कि अंडे को उसके नेचुरल रूप में उसी तरह खाने के ढ़ेरों फायदे हैं. अंडे को बिना पकाए खाने से उसमें मौजूद विटामिन, ओमेगा 3, जिंक, प्रोटीन और दूसरे पोषक तत्व नष्ट नहीं होते हैं जो कई बार पकाने के दौरान या तो नष्ट हो जाते हैं या फिर उस मात्रा में नहीं मिल पाते हैं जिस रूप में मिलना चाहिए.
   अंडे को उसके मूल रूप में खाना थोड़ा अलग हो सकता है और अगर ये आपके लिए पहला मौका है तो आपको खराब भी लग सकता है. पर अगर आपने कच्चा अंडा खाने का फैसला कर लिया है तो सबसे पहले अंडे को अच्छी तरह, साबुन से धो लीजिए. इससे उसकी खोल पर जमी गंदगी साफ हो जाएगी.खाने-पीने की किसी भी चीज को आजमाने के दौरान इस बात का विशेष ख्याल रखना चाहिए कि आप जो कुछ भी खाएं वो नियंत्रित मात्रा में हो. अति किसी भी चीज की बुरी हो सकती है.
अंडे को उबालकर (boil egg), या किसी रेसिपी के रूप में उपयोग किया जाता है. एक उबले हुए अंडे में मौजूद पोषक तत्व व् उनकी मात्रा इस प्रकार है –




अंडे में मौजूद पोषक तत्व (Egg/ Ande ingredients list) व् उसके फायदे इस प्रकार है –

आयरन
एनीमिया को दूर करता है, ओक्सीजन का प्रवाह पुरे शरीर में करवाता है. अंडे में मौजूद आयरन आसानी से शरीर में घुल जाता है.
विटामिन A
त्वचा को हेल्थी रखता है, व् आँखों की रौशनी को बढाता है.
विटामिन डी
हड्डी व् दांत मजबूत होते है, साथ ही कैंसर व् इम्यून सिस्टम से जुड़ी परेशानी दूर करता है.
विटामिन E
इसमें मौजूद एंटीओक्सिडेंट रोगों से बचाता है, व् स्वास्थ्य अच्छा रखता है.
विटामिन B12
दिल की सुरक्षा करता है.
फोलेट
पुरानी कोशिकाओं की रक्षा करता है, साथ ही नई कोशिकाओं का निर्माण करता है. एनीमिया से भी बचाता है.
प्रोटीन
मसल, स्किन, ऑर्गन, बाल को सुरक्षित रखता है. अंडे में प्रोटीन की अधिकता बहुत होती है, जो वजन बढ़ाने में भी करिगर है, ये शरीर में आसानी से घुल जाती है.
कॉलिन
दिमाग के विकास व् कार्य में यह अहम भूमिका निभाता है

;*अंडे में एंटी-ऑक्सीडेंट की भरपूर मात्रा होती है. साथ ही शरीर के लिए आवश्यक अमीनो एसिड की मात्रा की पूर्ति भी इससे हो जाती है. अगर आपके घर में कोई बुजुर्ग है तो आप उसे कच्चा अंडा दे सकते हैं. इससे मांस पेशियों को ताकत मिलती है.
* कोलेस्ट्रॉल दो प्रकार के होते हैं. एक वो जो शरीर के लिए बेहतर होता है और दूसरा वो जो शरीर को नुकसान पहुंचाता है. को‍शिकाओं और हॉर्मोन के निर्माण के लिए कोलेस्ट्रॉल की आवश्यकता होती है. अंडे से मिलने वाला कोलेस्ट्रॉल शरीर के लिए अच्छा होता है.
आपको ये जानकर आश्चर्य हो सकता है कि कच्चा अंडा, पकाए गए अंडे की तुलना में कम संक्रमित होता है. कई बार ऐसा होता है कि पकाने के दौरान अंडे में मौजूद प्रोटीन की मूल संरचना बदल जाती है. जिससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है.
* कच्चा अंडा विटामिन का खजाना होता है. इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन बी-12 मौजूद होता है. कच्चा अंडा खाने से एनीमिया की समस्या दूर हो जाती है और इससे दिमाग भी तेज होता है.
*अंडे के पीले भाग में बायोटिन मिलता है जो बाल और त्वचा को मजबूती देने का काम करता है. अंडे के पीले भाग को बालों में लगाने से बाल कोमल-मुलायम होते हैं.
अंडे से स्वास्थ्य व् स्किन/बालों दोनों में फायदा होता है. इसे खाने के साथ साथ स्किन व् बालों में लगाने से भी फायदा मिलता है. नीचे आपको इन फायदों को डिटेल में बताया गया है-
प्रोटीन का मुख्य स्त्रोत –
 अंडे में सबसे प्रमुख प्रोटीन होता है. प्रोटीन के उपयोग से शरीर में सारे टिश्यू बनते है, साथ ही पुराने की देखभाल की जाती है. प्रोटीन से अमीनो एसिड बनता है, लेकिन ये शरीर में नहीं बनता, हमें इसके लिए ऐसा भोज्य पदार्थ लेना होगा. एक अच्छे प्रोटीन से युक्त भोजन में बराबर मात्रा में अमीनो एसिड भी होता है, जिसकी हमारे शरीर को जरुरत होती है. अंडा प्रोटीन का खजाना है.

हड्डी मजबूत करे –
 कैल्शियम की कमी से हड्डी, दांत, नाख़ून कमजोर हो जाते है. फिर हड्डी मजबूत करने के लिए हमें तरह तरह की दवाइयों का सहारा लेना पड़ता है. दवाई से अच्छा है कि हम प्राकतिक रूप से अंडे का प्रयोग करें, इससे हड्डी दांत धीरे-धीरे मजबूत होने लगेंगें.
एग्ग वाइट के फायदे (egg white benefits) –

 अंडे की सफेदी में 0 कोलेस्ट्रोल होता है, इसमें 52 कैलोरी व् प्रोटीन 11 ग्राम होता है. अंडे की सफेदी में, उसके पीले भाग से ज्यदा प्रोटीन होता है. इसमें 0 कोलेस्ट्रोल होता है, जिससे इसे कोई भी आसानी से खा सकता है. इसमें फैट भी बहुत कम होता है.
एग्ग योल्क के फायदे (egg yolk benefits) – अंडे की सफेदी से ज्यादा पोषक तत्व उसके पीले भाग में होते है. इसमें विटामिन, मिनिरल्स सब अधिक होता है, जिससे ये स्किन, बालों के लिए बेस्ट होता है.
अंडे को दूध के फायदे (egg with milk benefits ) – 

अंडे को दूध के साथ मिला कर पीने से भी यह सेहत के लिए बहुत फायदे मंद होता है.
आयरन की कमी दूर करे – कई लोगों को शरीर में आयरन की कमी होती है, जिससे उन्हें सर दर्द, चिड़चिड़ापन, बदन दर्द, खून की कमी की शिकायत होती है. अंडे के पीले भाग में आयरन की अधिकता होती है, जिसे खाने से खून बढ़ता है, मेटापोलिस्म बढ़ता है. गर्भवती महिलाओं को अक्सर इसकी शिकायत होती है, इसलिए उन्हें अंडे खाने के लिए मुख्य रूप से बोला जाता है.

बालों व् आँखों की सुरक्षा (Egg benefits for hair)– 

इसमें विटामिन A होता है, जो बालों व् आँखों के लिए अच्छा होता है. कहते है जो बच्चे बचपन से ही अंडा का सेवन करते है, उनकी आई साईट (eye sight) जो अंडे का सेवन नहीं करते है उनके मुकाबले अधिक होती है. इससे बालों को भी मजबूती मिलती है. अंडा खाने के अलावा लगाने से बाल में अच्छा कंडीशनर होता है. अंडे को बालों में लगाने के लिए उसे हिना के साथ मिलाकर भी लगा सकते है, या इसके अलावा आप उसकी सफेदी को कुछ देर बालों में लगाकर छोड़ दे फिर धोएं. बाल सॉफ्ट चमकदार हो जायेंगें.
प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाये – इसमें मौजूद विटामिन डी शरीर के अंदर रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाता है.
वजन कम करने वालों के लिए –

 आप अगर अपना वजन कम कर रहे है तो आप अंडे को जरुर अपनी डाइट में शामिल करें. लेकिन आपको सिर्फ इसका सफ़ेद वाला हिस्सा खाना है, इसमें कैलोरी बस 17 (1 अंडे) होती है, जिसे खाने से हमें बाकि पोषक तत्व मिल जाते है.
दिमाग मजबूत करे – 

अंडे में कॉलिन दिमाग के विकास के लिए बहुत जरुरी है. कॉलिन एक ऐसा पोषक तत्व है, जो दिमाग को तेज बनाने व् विकास के लिए बहुत जरुरी होता है. छोटे बच्चे से लेकर बड़े बूढों तक के दिमाग को इसकी जरुरत पड़ती है. इसकी कमी से याददाश्त कम होती है. इसी की कमी से बच्चे मंद बुद्धि पैदा होते है. गर्भकाल के समय कॉलिन महिलाओं के लिए बहुत जरुरी पोषक तत्व है. ऐसे में अंडे से अच्छा कुछ नहीं जो एक साथ इतने फायदे देता है.
स्टेमिना बढ़ाये –

 एक अंडा खाने से आपको 6 gm प्रोटीन मिलती है, साथ ही एक बड़ी मात्रा में नुट्रीशियन मिलते है. बस इसमें विटामिन C नहीं होता है. अंडे को नीम्बू या संतरे के जूस के साथ सुबह के नाश्ते में खाना चाहिए, जिससे आपके शरीर में विटामिन C की भी पूर्ति हो जाये. इससे स्टेमिना बढ़ता है.
अंडे से फायदे तो बहुत है, लेकिन इससे कुछ नुकसान भी है, जिसका जानकारी आपको होना बहुत जरुरी है, ताकि आप इसे एक निर्धारित मात्रा में ही अपनी डाइट में शामिल करें.
अंडे से होने वाले नुकसान (Egg harmful effects)–

फ़ूड पोइजनिंग व् पेट से जुड़ी तकलीफ – अंडे को खाने से पहले ये जरुर देख ले कि वो अच्छे से पका है कि नहीं. कच्चा या आधा पका अंडा स्वास्थ्य के लिए हानि कारक होता है, इससे फ़ूड पोइजनिंग होती है. आधा पका अंडा खाने से उलटी, पेट दर्द, पेट ख़राब होना जैसी शिकायतें होती है.
सोडियम की अधिकता –

 अंडे की सफेदी में बहुत अधिक सोडियम होता है. जिस किसी इन्सान को सोडियम न खाने की सलाह दी जाती है, उन्हें अंडा सोच समझकर अपनी डाइट में शामिल करना चाहिए.

कोलेस्ट्रोल रिस्क – 

जिस किसी को ब्लडप्रेशर, डायबटीज व् हाई कोलेस्ट्रोल की परेशानी हो, उन्हें अंडा सोच समझकर खाना चाइये, हफ्ते में 2 से ज्यादा ना खाएं, क्यूंकि इसमें कोलेस्ट्रोल की अधिकता होती है.
कुछ ध्यान देने वाली बातें-
वैसे तो आप अंडा करी बनाकर या उबालकर या फ्राई करके किसी भी तरह दिन में एक या दो बार खा सकते हैं लेकिन हेल्दी तरीके से खाने पर ही यह शरीर के लिए उपयोगी सिद्ध होता है।
• ऑमलेट बनाकर या स्क्रैब्लड रूप में अंडा कभी भी न खायें क्योंकि यह वज़न घटाने के प्रक्रिया पर पानी फेर देता है। इसको बनाने में बहुत तेल की ज़रूरत होती है, इसलिए यह उतना हेल्दी नहीं होता है।
• उबला हुआ अंडा वज़न घटाने की प्रक्रिया में सहायता करता है। फैट कम और पौष्टिकता से भरपूर होता है। लेकिन हजम आसानी से हो जाता है, सिर्फ अंडे की जर्दी का सेवन रोज न करें।
• अगर आप होलसम ब्रेकफास्ट करना चाहते हैं तो होल ग्रेन ब्रेड के साथ उबला हुआ अंडा या पोच्ड अंडा खा सकते हैं। इसमें फाइबर होता है और प्रोटीन पूरे दिन के लिए आपको ऊर्जा से भरपूर कर देता है।
*लोगों की यह धारणा गलत है कि अंडा में फैट उच्च मात्रा में होता है, इसलिए इसको रोज खाने से वज़न बढ़ने का भय होता है। लेकिन आहार विशेषज्ञों का मानना है कि जो लोग हेल्दी तरीके से वज़न घटाना चाहते हैं, वे ज़रूर अंडा को अपने डायट में शामिल करें।