Saturday, December 31, 2016

साईटिका (गृधसी) रोग के अचूक उपचार


साईटिका (गृधसी)
  मानव  शरीर में एक साईटिका नाड़ी होती है जिसका ऊपरी सिरा एक  इंच मोटा होता है। यह साईटिका नाड़ी शरीर में प्रत्येक नितम्ब के नीचे से शुरू होकर टांग के पीछे के भाग से होती हुई पैर की एड़ी पर खत्म होती है। इस साईटिका नाड़ी को साइटिका नर्व भी कहते हैं।
इस नाड़ी में जब सूजन तथा दर्द होने लगता है तो इसे साईटिका या फिर वात-शूल कहते हैं। जब यह रोग होता है तो व्यक्ति के पैर में अचानक तेज दर्द होने लगता है। यह रोग अधिकतर 30 से 50 वर्ष की आयु के लोगों को होता है। साईटिका का दर्द एक समय में एक ही पैर में होता है। जब यह दर्द सर्दियों में होता है तो यह रोगी व्यक्ति को और भी परेशान करता है। इस रोग में किसी-किसी रोगी को कफ प्रकोप भी हो जाता है। इस रोग के कारण रोगी को चलने में परेशानी होती है। रोगी व्यक्ति जब उठता-बैठता या सोता है तो उसकी टांगों की पूरी नसें खिंच जाती हैं और उसे बहुत कष्ट होता है।
साईटिका रोग होने के लक्षण:-
जब किसी व्यक्ति को साईटिका रोग हो जाता है तो उसके पैर के निचले भाग से होते हुए ऊपर के भागों तक तेज दर्द होता है। इस रोग के कारण रोगी व्यक्ति अपने पैर को सीधा नहीं कर पाता है तथा सीधा खड़ा भी नहीं हो पाता है। रोगी व्यक्ति को चक्कर आने लगते हैं। रोगी व्यक्ति को कभी-कभी धीरे-धीरे दर्द होता है तो कभी बहुत तेज दर्द होता है। इस दर्द के कारण रोगी व्यक्ति को बुखार भी हो जाता है।
साईटिका रोग होने का कारण:-
*जब किसी व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी में चोट लग जाती है तो उसे यह रोग हो जाता है।
यदि साईटिका नाड़ी के पास विजातीय द्रव (दूषित द्रव) जमा हो जाता है तो नाड़ी दब जाती है जिसके कारण साईटिका रोग हो जाता है।
*रीढ़ की हड्डी के निचले भाग में आर्थराइटिस रोग हो जाने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
*असंतुलित भोजन का सेवन करने तथा गलत तरीके के खान-पान से भी यह रोग हो जाता है।
*रात के समय में अधिक जागने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
*अधिक समय तक एक ही अवस्था में बैठने या खड़े रहने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
*अपनी कार्य करने की क्षमता से अधिक परिश्रम करने के कारण या अधिक सहवास करने के कारण भी यह रोग हो सकता है।



साईटिका रोग का घरेलू और कुदरती पदार्थों से इलाज-
*100 ग्राम नेगड़ के बीजों को कूटकर पीस लें। फिर इसके 10 भाग करके 10  पुड़ियां बना लें। इसके बाद शुद्ध घी में सूजी या आटे का हलवा बना लें और जितना हलवा खा सकते हैं उसको अलग निकाल लें। इस हलवे में एक पुड़िया नेगड़ के चूर्ण की डालकर इसे खा लें और मुंह धो लें। लेकिन रोगी व्यक्ति को पानी नहीं पीना चाहिए। इस हलवे का कम से कम 10 दिनों तक सेवन करने से यह रोग ठीक हो जाता है।
*20 ग्राम आंवला, 20 ग्राम मेथी दाना, 20 ग्राम काला नमक, 10 ग्राम अजवाइन और 5 ग्राम नमक को एक साथ पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 1 चम्मच प्रतिदिन सेवन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*प्रतिदिन 2 लहसुन की कली तथा थोड़ी-सी अदरक खाने के साथ लेने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*तुलसी की 5 पत्तियां प्रतिदिन सुबह के समय में खाने से रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
*इस रोग से पीड़ित रोगी को उपचार कराते समय क्रोध तथा चिंता को बिल्कुल छोड़ देना चाहिए।
*रोगी को प्रतिदिन अपने पैरों पर सरसों के तेल से नीचे से ऊपर की ओर मालिश करनी चाहिए। इससे यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*इस रोग से पीड़ित रोगी को गर्म पानी में आधे घण्टे के लिए अपने पैरों को डालकर बैठ जाना चाहिए। इससे रोगी व्यक्ति को तुरंत आराम मिल जाता है। यह  क्रिया प्रतिदिन करने से यह रोग पूरी तरह से ठीक हो सकता है।
*साईटिका रोग को ठीक करने के लिए आधी बाल्टी पानी में 40-50 नीम की पत्तियां डाल दें और पानी को उबालें। फिर उबलते हुए पानी में थोड़े से मेथी के दाने तथा काला नमक डाल दें। फिर इस पानी को छान लें। इसके बाद गर्म पानी को बाल्टी में दुबारा डाल दें और पानी को गुनगुना होने दे। जब पानी गुनगुना हो जाए तो उस पानी में अपने दोनों पैरों को डालकर बैठ जाएं तथा अपने शरीर के चारों ओर कंबल लपेट लें। रोगी व्यक्ति को कम से कम 15 मिनट के लिए इसी अवस्था में बैठना चाहिए। इसके बाद अपने पैरों को बाहर निकालकर पोंछ लें। इस प्रकार से 1 सप्ताह तक उपचार करने से यह रोग ठीक हो जाता है।
*लगभग 250 ग्राम पारिजात (हारसिंगार) के पत्तों को 1 लीटर पानी में अच्छी तरह से उबाल लें और जब उबलते-उबलते पानी 700 मिलीलीटर बच जाए तब उसे छान लें। इस पानी में 1 ग्राम केसर पीसकर डाल दें और फिर इस पानी को ठंडा करके बोतल में भर दें। इस पानी को रोजाना 50-50 मिलीलीटर सुबह तथा शाम के समय पीने से यह रोग 30 दिनों में ठीक हो जाता है। अगर यह पानी खत्म हो जाए तो दुबारा बना लें।
*5 कालीमिर्चों को तवे पर सेंककर कर सुबह के समय में खाली पेट मक्खन के साथ सेवन करना चाहिए। इस प्रयोग को प्रतिदिन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
करेला, लौकी, टिण्डे, पालक, बथुआ तथा हरी मेथी का अधिक सेवन करने से साईटिका रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
*इस रोग से पीड़ित रोगी को पपीते तथा अंगूर का अधिक सेवन करना चाहिए। इससे यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*सूखे मेवों में किशमिश, अखरोट, अंजीर, मुनक्का का सेवन करने से भी यह रोग कुछ दिनों में ठीक हो जाता है।
*फलों का रस दिन में 3 बार तथा आंवला का रस शहद के साथ मिलाकर पीने से साईटिका रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*इस रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को सबसे पहले एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए। इसके बाद रोगी को अपने पैरों पर मिट्टी की पट्टी का लेप करना चाहिए। इसके बाद रोगी को कटिस्नान करना चाहिए और फिर इसके बाद मेहनस्नान करना चाहिए। इसके बाद कुछ समय के लिए पैरों पर गर्म सिंकाई करनी चाहिए और गर्म पाद स्नान करना चाहिए। इस प्रकार से उपचार करने से साईटिका रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*सुबह के समय में सूर्यस्नान करने तथा इसके बाद पैरों पर तेल से मालिश करने और कुछ समय के बाद रीढ़ स्नान करने तथा शरीर पर गीली चादर लपेटने से साईटिका रोग ठीक हो जाता है।
*सूर्यतप्त लाल रंग की बोतल के तेल की मालिश करने से तथा नारंगी रंग की बोतल का पानी कुछ दिनों तक पीने से साईटिका रोग ठीक हो जाता है।
*तुलसी के पत्तों को पीसकर पानी में मिलाकर प्रतिदिन सेवन करने से यह रोग ठीक हो जाता है।
*हार-सिंगार के पत्तों का काढ़ा सुबह के समय में प्रतिदिन खाली पेट पीने से साईटिका रोग ठीक हो जाता है।
*सुबह तथा शाम के समय में अपने पैरों पर प्रतिदिन 2 मिनट के लिए ताली बजाने से भी यह रोग कुछ दिनों में ठीक हो जाता है।
*साईटिका रोग को ठीक करने के लिए कई प्रकार के व्यायाम तथा योगासन हैं जिनको करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
ये आसन तथा योगासन इस प्रकार हैं-
इस रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी को पीठ के बल सीधे लेट जाना चाहिए। फिर रोगी को अपने पैरों को बिना मोड़े ऊपर की ओर उठाना चाहिए। इस क्रिया को कम से कम 20 बार दोहराएं। इस प्रकार से प्रतिदिन कुछ दिनों तक व्यायाम करने से साईटिका रोग ठीक हो जाता है।
*रोगी व्यक्ति को अपने दोनों पैरों को मोड़कर, अपने घुटने से नाभि को दबाना चाहिए। इस क्रिया को कई बार दोहराएं। इस प्रकार से प्रतिदिन कुछ दिनों तक व्यायाम करने से साईटिका रोग में बहुत लाभ मिलता है।



*साईटिका रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को पीठ के बल सीधे लेटकर अपने घुटने को मोड़ते हुए पैरों को साइकिल की तरह चलाना चाहिए। इस व्यायाम को प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में करने से साईटिका रोग में आराम मिलता है।
*साईटिका रोग को ठीक करने के लिए कई प्रकार के आसन हैं जिनको प्रतिदिन सुबह तथा शाम के समय में करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है, ये आसन इस प्रकार हैं- उत्तानपादासन, नौकासन, शवसान, वज्रासन तथा भुजंगासन आदि।
साईटिका रोग के व्यक्ति को प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करते समय कुछ परहेज भी करने चाहिए जो इस प्रकार हैं-
*इस रोग से पीड़ित रोगी को खटाई, मिठाई, अचार, राजमा, छोले, दही तथा तेल आदि का भोजन में सेवन नहीं करना चाहिए।
*रोगी व्यक्ति को तली हुई चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
*रोगी व्यक्ति को दालों का सेवन नहीं करना चाहिए तथा यदि दाल खाने की आवश्यकता भी है तो छिलके वाली दाल थोड़ी मात्रा में खा सकते हैं।
*साईटिका रोग से पीड़ित रोगी को ठंडे पेय पदार्थों का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए।
*इस रोग से पीड़ित रोगी को जमीन या तख्त पर सोना चाहिए तथा अधिक से अधिक आराम करना चाहिए।
सावधानी-
इस प्रकार से रोगी का उपचार प्राकृतिक चिकित्सा से करने से यह रोग कुछ दिनों में ठीक हो जाता है लेकिन रोगी को कुछ चीजों का परहेज भी करना चाहिए तभी यह रोग पूरी तरह से ठीक हो सकता है।
विशिष्ट परामर्श-
साईटिका रोग मे वैध्य श्री दामोदर 98267-95656 निर्मित हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल साबित होती है| जड़ी बूटियों की औषधि से पुराना साईटिका रोग भी समाप्त  हो जाता है|स्नायुशूल,संधिवात,कमर दर्द घुटनो की पीड़ा मे  भी यह रामबाण औषधि  है| 

निर्गुंडी (नेगड़) के फायदे उपयोग लाभ


निर्गुन्डी (Vitex negundo) शेफाली,सम्मालू, सिंदुवार आदि नाम से भी जानी -पहचानी जाती है. इसके पेड़ १० फीट तक ऊंचे पाए जाते हैं. इसे संस्कृत में इन्द्राणी, नीलपुष्पा, श्वेत सुरसा,सुबाहा कहते हैं.बंगाली में निशिन्दा, सेमालू, मराठी में- कटारी, लिगुर, शिवारी पंजाबी में- बनकाहू, मरवा, बिन्ना, मावा, मोरों, खारा, सनक फारसी में- बजानगश्त, सिस्बन, गुजराती में-नगोड़, नागोरम, निर्गारा,तेलगू में- नल्लाहा बिली,मिन्दुवरम तमिल में-निकुंडी, नोची कहा जाता है|
निर्गुंडी में उड़नशील तेल,विटामिन-सी, केरोटीन, फलेवोन, टैनिक एसिड, निर्गुन्दीन, हाइड्रोकोटिलोन, हाइड्रोक्सीबेन्जोईक एसिड, मैलिक एसिड और राल पाए जाते हैं|
*निर्गुंडी अनेक बीमारियों में काम आती है. सबसे बड़ी बात क़ि स्लीप डिस्क की ये एकलौती दवा है. सर्वाइकल, मस्कुलर पेन में इसके पत्तो का काढा रामबाण की तरह काम करता है|
अस्थमा मे इसकी जड़ और अश्वगंधा की जड़ का काढा ३ माह तक पीना चाहिए|
*गले के अन्दर सूजन हो गयी हो तो निर्गुंडी के पत्ते, छोटी पीपर और चन्दन का काढा पीजिये, ११ दिनों में सूजन ख़त्म हो जायेगी|
कामशक्ति बढाने के लिए निर्गुन्डी और सोंठ का चूर्ण दूध के साथ लेना चाहिए.
*निर्गुंडी सर्दी जनित रोगों में बहुत फायदा करती है |
* निर्गुंडी के काढ़े से रोगी के शरीर को धोने पर सभी तरह की बदबू, दुर्गन्ध ख़त्म हो जाती है|
*भैषज्य रत्नावली के अनुसार निर्गुंडी रसायन शरीर का कायाकल्प करने में सक्षम है यह लम्बे समय तक मनुष्य को जवान बनाए रखता है , इसे बनने में पूरे एक माह लगते हैं,इसे किसी अनुभवी वैद्य से ही बनवाना चाहिए|
* निर्गुंडी के तेल से बालो का सफ़ेद होना ,बालो का गिरना , नाडी के घाव और खुजली जैसी बीमारियों में बहुत लाभ पहुंचता है किन्तु इसे भी किसी जानकार वैद्य से ही बनवाना उचित रहता है|
* अगर डिलीवरी पेन शुरू हो गया है और आप सरलता पूर्वक प्रसव कराना चाहते हैं तो निर्गुंडी के पत्तो की चटनी को महिला की नाभि के आस-पास लेप कर दीजिये|
*सूतिका ज्वर में निर्गुंडी का काढा देने से गर्भाशय का संकोचन होता है और भीतर की सारी गंदगी बाहर निकल जाती है. गर्भाशय के अंदरूनी भाग की सूजन ख़त्म हो जाती है और वह पूर्व स्थिति में आ जाता है ,जिससे प्रसूता को बुखार से मुक्ति मिल जाती है और दर्द ख़त्म हो जाता है. बच्चा जनने के बाद निर्गुंडी के पत्तो का काढा हर महिला को दिया जाना चाहिए और एबार्शन के बाद भी यह काढा जरूर पिलाना चाहिए क्योंकि गर्भ में अगर कोई भी मांस का टुकड़ा छूट जाएगा तो वह बाद में यूट्रस कैंसर का कारण बनेगा|
*मुंह के छाले ख़त्म करने के लिए निर्गुंडी के पत्तो के रस में शहद मिलाकर उस मिश्रण को ३-४ मिनट मुंह में रखें फिर कुल्ला कर दीजिये.दो ही दिन में छाले ख़त्म हो जायेंगे|
* निर्गुंडी और शिलाजीत का मिश्रण शरीर के लिए अमृत का काम करता है||

* निर्गुंडी और पुनर्नवा का काढा शरीर के सारे दर्द ख़त्म करता है|
*कमर को सही आकार में रखने के लिए निर्गुंडी के पत्तो के काढ़े में २ ग्राम पीपली का चूर्ण मिला कर एक महीने पीजिये|

साईटिका रोग मे
*100 ग्राम नेगड़ के बीजों को कूटकर पीस लें। फिर इसके 10 भाग करके 1-1 पर्ची में पैक करके पुड़ियां बना लें। इसके बाद शुद्ध घी में सूजी या आटे का हलवा बना लें और जितना हलवा खा सकते हैं उसको अलग निकाल लें। इस हलवे में एक पुड़िया नेगड़ के चूर्ण की डालकर इसे खा लें और मुंह धो लें। लेकिन रोगी व्यक्ति को पानी नहीं पीना चाहिए। इस हलवे का कम से कम 10 दिनों तक सेवन करने से यह रोग ठीक हो जाता है।


* स्मरण शक्ति बढाने के लिए निर्गुंडी की जड़ का ३ ग्राम चूर्ण इतने ही देशी घी के साथ मिलाकर रोज चाटिये 
.* साइटिका में निर्गुंडी के पत्तो क़ि चटनी को गरम करके सुबह शाम बांधना चाहिए या फिर इसका काढा पीना चाहिए.
* श्वास रोग में नेगड़ के पत्तो का रस शहद मिलाकर दिन में चार बार एक -एक चम्मच पीना चाहिए|
* निर्गुंडी के बीजों का चूर्ण दर्द निवारक औषधि है लेकिन हर दर्द में इसकी मात्रा अलग-अलग होती है|

विशिष्ट परामर्श-


गठिया , संधिवात , कटिवात,साईटिका ,घुटनो की पीड़ा जैसे वात रोगों मे वैध्य श्री दामोदर 98267-95656 की जड़ी- बूटी निर्मित औषधि सर्वाधिक असरदार साबित होती है| बिस्तर पकड़े रोगी भी इस औषधि  से दर्द मुक्त होकर  चलने फिरने योग्य हो जाते हैं| 


Monday, December 26, 2016

लकवा (पेरेलिसिस) के असरदार उपचार



लकवा को आयुर्वेद में पक्षाघात रोग भी कहते हैं। इस रोग में रोगी के एक तरफ के सभी अंग काम करना बंद कर देते हैं जैसे बांए पैर या बाएं हाथ का कार्य न कर पाना। साथ ही इन अंगों की दिमाग तक चेतना पहुंचाना भी निष्क्रिय हो जाता है। और इस रोग की वजह से अंगों का टेढापनए शरीर में गरमी की कमीए और कुछ याद रखने की क्रिया भी नष्ट हो जाती है। लकवा रोग में इंसान असहाय सा हो जाता है। और दूसरों पर हर काम के लिए निर्भर होना पड़ता है। इस रोग मे मस्तिष्क की कोई रक्त वाहिका फट जाती है और मस्तिष्क की कोशिकाओं के आस-पास की जगह में खून भर जाता है। जिस तरह किसी व्यक्ति के हृदय में जब रक्त आपूर्ति का आभाव होता तो कहा जाता है कि उसे दिल का दौरा पड़ गया है उसी तरह जब मस्तिष्क में रक्त प्रवाह कम हो जाता है या मस्तिष्क में अचानक रक्तस्राव होने लगता है तो कहा जाता है कि आदमी को मस्तिष्क का दौरा पड़ गया है।
शरीर की सभी मांस पेशियों का नियंत्रण केंद्रीय तंत्रिकाकेंद्र (मस्तिष्क और मेरुरज्जु) की प्रेरक तंत्रिकाओं से, जो पेशियों तक जाकर उनमें प्रविष्ट होती हैं,से होता है। अत: स्पष्ट है कि मस्तिष्क से पेशी तक के नियंत्रणकारी अक्ष के किसी भाग में, या पेशी में हो, रोग हो जाने से पक्षाघात हो सकता है। सामान्य रूप में चोट, अबुद की दाब और नियंत्रणकारी अक्ष के किसी भाग के अपकर्ष आदि, किसी भी कारण से उत्पन्न प्रदाह का परिणाम आंशिक या पूर्ण पक्षाघात होता है।
लकवा की बीमारी के लक्षण
लकवा रोग में शरीर की नसों को पूरी तरह से सुखा देता है। जिसकी वजह से शरीर के अंगों पर खून नहीं पहुचं पाता है। और शरीर का अंग किसी काम का नहीं रह जाता है।
इसके अलावा शरीर के मुख्य अंग जैसे नाक, आंख और कान सभी टेढ़े हो जाते हैं। इस रोग का सबसे बड़ा लक्षण हैं होठों का एक तरफ लटक जाना।
लकवा-पक्षाघात-फालिज के प्रकार
अर्दित - सिर्फ चेहरे पर लकवे का असर होने को अर्दित (फेशियल पेरेलिसिस) कहते हैं। अर्थात सिर, नाक, होठ, ढोड़ी, माथा तथा नेत्र सन्धियों में कुपित वायु स्थिर होकर मुख को पीड़ित कर अर्दित रोग पैदा करती है।
एकांगघात - इसे एकांगवात भी कहते हैं। इस रोग में मस्तिष्क के बाह्यभाग में विकृति होने से एक हाथ या एक पैर कड़ा हो जाता है और उसमें लकवा हो जाता है। यह विकृति सुषुम्ना नाड़ी में भी हो सकती है। इस रोग को एकांगघात (मोनोप्लेजिया) कहते हैं।
सर्वांगघात - इसे सर्वांगवात रोग भी कहते हैं। इस रोग में लकवे का असर शरीर के दोनों भागों पर यानी दोनों हाथ व पैरों, चेहरे और पूरे शरीर पर होता है, इसलिए इसे सर्वांगघात (डायप्लेजिया) कहते हैं।
अधरांगघात - इस रोग में कमर से नीचे का भाग यानी दोनों पैर लकवाग्रस्त हो जाते हैं। यह रोग सुषुम्ना नाड़ी में विकृति आ जाने से होता है। यदि यह विकृति सुषुम्ना के ग्रीवा खंड में होती है, तो दोनों हाथों को भी लकवा हो सकता है। जब लकवा 'अपर मोटर न्यूरॉन' प्रकार का होता है, तब शरीर के दोनों भाग में लकवा होता है।





बाल पक्षाघात - बच्चे को होने वाला पक्षाघात एक तीव्र संक्रामक रोग है। जब एक प्रकार का विशेष कृमि सुषुम्ना नाड़ी में प्रविष्ट होकर वहाँ खाने लगता है, तब सूक्ष्म नाड़ियाँ और माँसपेशियां आघात पाती हैं, जिसके कारण उनके अधीनस्थ शाखा क्रियाहीन हो जाती है। इस रोग का आक्रमण अचानक होता है और प्रायः 6-7 माह की आयु से ले कर 3-4 वर्ष की आयु के बीच बच्चों को होता है।
लकवा के असरदार उपचार-
*कुछ दिनों तो रोज छुहारों को दूध में भिगोकर रोगी को देते रहने से लकवा ठीक होने लगता है।
*सौंठ और उड़द को पानी में मिलाकर हल्की आंच में गरम करके रोगी को नित्य पिलाने से लकावा ठीक हो जाता है।नाशपाती, सेब और अंगूर का रस बराबर मात्रा में एक ग्लिास में मिला लें। और रोगी को देते रहें। कुछ समय तक यह उपाय नित्य करना है तभी फायदा मिलेगा।
*1 चम्मच काली मिर्च को पीसकर उसे 3 चम्मच देशी घी में मिलाकर लेप बना लें और लकवाग्रसित अंगों पर इसकी मालिश करें। एैसा करने से लकवा ग्रस्त अंगों का रोग दूर हो जाएगा।
*करेले की सब्जी या करेले का रस को नित्य खाने अथवा पीने से लकवा से प्रभावित अंगों में सुधार होने लगता है। यह उपाय रोज करना है।
*प्याज खाते रहने से और प्याज का रस का सेवन करते रहने से लकवा रोगी ठीक हो जाता है।
*6 कली लहसुन को पीसकर उसे 1 चम्मच मक्खन में मिला लें और रोज इसका सेवन करें। लकवा ठीक हो जाएगा।
लहसुन आधारित औषधि नं-1
औषधि के लिये लहसुन बड़ी गांठ वाला जिसमें से अधिक रस निकाल सकें ले।
विधि- लहसुन की आठ कली लेकर छील लें फिर इसे बारीक चटनी की तरह पीस लें फिर गाय का दूध लेकर उबाल लें, अब थोड़ा सा दूध अलग कर लें उसमें शक्कर मिला दें, जब यह दूध हल्का गरम रह जाय तो इस दूध में लहसुन मिलाकर पी जायें, ऊपर से इच्छा अनुसार जितना चाहें दूध पियें। परंतु ध्यान रखें लहसुन कभी खौलते दूध में न मिलावें वरना उसके गुण नष्ट हो जायेंगे। दिन में दो बार ये विधि करें। इस प्रकार दिन में दो बार इसका सेवन करें। तीन दिन तक दोनों समय लेने के बाद इसकी मात्रा बढ़ाकर 9 या 10 कलियां कर दें। एक हफ्ते बाद कम से कम 20 कली लहसुन लें। इसी तरह तीन बाद फिर बढ़ाकर 40 कली का रस दूध से लें। इसके बाद अब इनकी मात्रा घटाने का समय है जैसे-जैसे बढ़ाया वैसे-वैसे ही घटाते जाना है तीन-तीन दिन पर यानी-
*पहली बार – 8 कली लहसुन की लें लेत रहें
* तीन दिन बाद-10 कली लहसुन की लें लेते रहें
* 1 सप्ताह बाद – 20 कली लहसुन की लें लेते रहें
  उसके  बाद- 40 कली लहसुन की लें लेते रहें
लहसुन आधारित औषधि नं-2
मोटी पोथी वाला 1 मोटा दाना लहसुन का लेकर छीलकर पीस लें बारीक और इसे चाट लें ऊपर से गाय का दूध हल्का गर्म चीनी डालकर पी जायें। अब दूसरे दिन 2 लहसुन की चटनी चाट कर दूध पी जायें। तीसरे दिन तीन लहसुन, चौथे दिन चार कली इसी तरह से ग्यारह दिन तक 11 लहसुन पीसकर चाटें व दूध पी जायें। अब बारहवें दिन से 1-1 कली लहसुन की घटाती जायें तथा सेवन की विधि वहीं होगी। एक लहसुन की संख्या आ जाने पर बंद कर दें पीना। इससे हाई ब्लड प्रेशर का असर कम होगा। पक्षाघात का प्रभाव कम होगा। सर का भारी पन ठीक होगा। नींद अच्छी आयेगी। दस्त खुलकर होगा। भूख अच्छी लगेगी। (अगर आप सामान्य तरीके से रोज लहसुन खायें तो इसका खतरा ही नहीं होगा।)
औषधि नं-3
लहसुन व शतावर- 7-8 कली लहसुन, शतावर का चूर्ण 1 तोला दोनों को खरल में डालकर घोंट लें, आधा किलो दूध में शक्कर मिलाकर लहसुन शतावर पिसा हुआ मिलाकर पी जायें इसे लेने पर हल्का सुपाच्य भोजन लें। शरीर के हर अंग का भारी पन ठीक होगा साथ पक्षाघात में फायदा होगा। इसे 31 दिन लगातार लें।




औषधि नं-4
लहसुन,शतावर चूर्ण, असगंध चूर्ण- 1 चाय का बड़ा चशतावर चूर्ण, उतनी ही मात्रा में असगंध चूर्ण दोनों चूर्ण को दूध में मिलाकर पियें साथ दोपहर के भोजन के साथ लहसुन लें। लहसुन की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाते जायें, रोटी, आंवला, लहसुन का प्रयोग भोजन में अवश्य करें। शरीर की मालिश भी करें इन सभी विधियों से पक्षाघात में जल्दी व सरलता से मरीज ठीक होता है।
औषधि नं-5
लहसुन छीलकर पीस लें 3-4 कली, फिर उसमें उतनी ही मात्रा में शहद मिला कर चाटें। धीरे-धीरे लहसुन की मात्रा बढ़ाते जायें 1-1 कली करके कम से कम 11-11 कली तक पहुंचे साथ बराबर मात्रा में शहद भी मिलाकर चाटें। साथ लहसुन का रस किसी तेल में मिलाकर उस प्रभावित हिस्से पर लेप, मालिश हल्के हाथ से करें। लहसुन के रस को थोड़ा गरम करके लगायें धीरे-धीरे काफी फायदा पहुंचेगा लहसुन से रक्त संचार ठीक तरह से होता है।
इसका सेवन करने से और भी लाभ है पेशाब खुलकर होगा।
दस्त साफ होने लगेगी शरीर की चेतना शक्ति बढ़ने लगेगी तथा पक्षाघात का असर धीरे-धीरे कम होने लगेगा।
तुलसी के पत्तोंए दही और सेंधा नमक को अच्छे से मिलाकर उसका लेप करने से लकावा ठीक हो जाता है। ये उपाय लंबे समय तक करना होगा।
गरम पानी में तुलसी के पत्तों को उबालें और उसका भाप लकवा ग्रस्ति अंगों को देते रहने से लकवा ठीक होने लगता है।
लकवा के लिए मालिश का तेल-आधा लीटर सरसों के तेल में 50 ग्राम लहसुन डालकर लोहे की कड़ाही में पका लें। जब पानी जल जाए उसे ठंडा होने दें फिर इस तेल को छानकर किसी डिब्बे में डाल लें। और इस तेल से लकवा वाले अंगों पर मालिश करें।
*निर्गुण्डी का तेल आदि की मालिश करनी चाहिए।
मक्खन और लहसुन
मक्खन और लहसुन भी लकवा की बीमारी में राहत देते हैं। आप मक्खन के साथ लहसुन की चार कलियों को पीसकर सेवन करें।
सोंठ व दालचीनी
एक गिलास दूध में थोड़ी सी दालचीनी और एक चम्मच अदरक का पाउडर यानि कि सोंठ को मिलाकर उबाल लें। और नियमित इसका सेवन करें। इस कारगर उपाय से लकवा रोग में आराम मिलता है।
सरसों
धतूरे के बीजों को सरसों के तेल में मंदी आंच में पका लें और इसे छानकर लकवा से ग्रसित अंग पर मालिश करें।
तेल
लकवा से ग्रसित हिस्से पर बादाम के तेल की मालिश करें|




लकवा में क्या खाएं क्या ना खाएं-
क्या ना खाएं
तली हुई चीजें
बेसन
चना
दही
चावल
लकवा होने पर इन चीजों का सेवन जरूर करें
इन फलों का सेवन करें
आम
चीकू
पपीता और
अंजीर।
परवल
करेला
गेहूं की रोटी
लहसुन
बाजरे की रोटी
तरोई
फली।
इसके अलावा सुबह और शाम दूध का सेवन करें।
*त्रिफला का सेवन करने से भी लकवा ठीक हो सकता है।
लकवा का सही समय पर इलाज न होने से रोगी एक अपाहिज की जिंदगी जीने को मजबूर हो जाता है इसलिए समय रहते लकवा का उपचार कराना जरूरी है। आयुवेर्दिक तरीकों से लकवा पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है। ये उपाय लंबे समय तक लगातार करने से ही फायदा देगें।

Sunday, December 25, 2016

फटी एड़ियों के उपचार कैसे करे?



पैर की समस्या सभी को किसी न किसी वक़्त होती है।ये सौंदर्य समस्याओं से दर्द भरी समस्याओं तक कुछ भी हो सकते हैं। फटी एड़ियों और होंठों की सबसे ज़्यादा समस्या ठण्ड के महीने में होती है। फटी एड़ियों को हील फिस्शर्स भी कहते हैं और ये एक या दोनों पैरों पर हो सकती है।
अगर पैरों की देखभाल अच्छे तरीके से न किया जाए तो पैर फट जाते हैं। नंगे पैर चलने के कारण या फिर खून की कमी से पैर फटते हैं। अगर आप पैरों की सफाई पर ध्यान नहीं देते हैं तो एड़ियां फट जाती हैं और उनमें दरारे आ जाती हैं। उसे बिवाई भी कहते हैं। अगर किसी के पैर फट जाते हैं तो वह बहुत गंदा लगता है। अक्सर लोगों को फटे पैरों के कारण शर्मिंदा भी होना पड़ता है। एड़ियां फटने के बाद उनकी देखभाल न की जाए तो खून निकलने लगता और बहुत दर्द होता है।





आइए जानें, इस दर्द भरी समस्या से राहत देने वाले  घरेलू उपायों के बारे में...
*एड़ियों के फटने पर आम के कोमल और ताजे पत्तों को तोडने से निकलने वाले द्रव को घावों पर लगा दीजिए। ऐसा करने से बहुत जल्दी फायदा होता है और फटी एड़ियां ठीक हो जाती हैं।
*गेंदे के पत्तों के रस को वैसलीन में मिलाकर लगाने से फटी एड़ियां ठीक हो जाती हैं।
कच्चा प्याज पीसकर एड़ियों पर बांधने से बिवाईयां ठीक हो जाती हैं।
*पैरों को गर्म पानी से धुलकर उसमे एरंड का तेल लगाने से फटी एड़ियां ठीक हो जाती हैं।
*मोम और सेंधानमक मिलाकर फटी एड़ियों पर मलने से बिवाईयां ठीक हो जाती हैं।
*पपीते के छिलकों को सुखाकर और पीसकर चूर्ण बना लीजिए। इस चूर्ण में ग्लिसीरीन मिलाकर दिन में दो बार फटी हुई एड़ियों में लगाने से बहुत जल्दी फायदा होता है।
*जब एड़ियों से खून निकल रहा हो तो उनको रात में गर्म पानी से धुलकर उनमें गुनगुना मोम लगाने से खून निकलना बंद हो जाता है और फटी एड़ियां ठीक हो जाती हैं।
*देशी घी और नमक को मिलाकर फटी एड़ियों पर लगाएं। ऐसा करने से फटी एड़ियां ठीक हो जाती हैं और पैरों की त्वचा भी कोमल रहती है।
*त्रिफला चूर्ण को खाने के तेल में तलकर मलहम जैसा गाढ़ा कर लीजिए। रात में सोते वक्त इस पेस्ट को फटे पैरों पर लगा लीजिए। कुछ दिनों तक इस लेप को लगाने से फटी एड़ियां ठीक हो जाएंगी और पैर कोमल होंगे।
*रात में सोने से पहले पैरों को अच्छी तरह से साफ कर लीजिए। उसके बाद कच्चे घी में बोरिक पाउडर मिलाकर दरारों में भर दीजिए। उसके बाद मोजे पहनकर सो जाइए। ऐसा 3-4 दिन करने पर फटी हुई एड़ियां ठीक हो जाएंगी।





*स्क्रबिंग करेगी कमाल
फटी एड़ियों को स्क्रबिंग की मदद से मुलायम बनाया जा सकता हैं. ऐसा करने से डेड स्किन हट जाती है और एड़ियां मुलायम हो जाती है. स्क्रबिंग करने से पहले अपने पैर को थोड़ी देर के लिए गुनगुने पानी में डुबोकर रखें|
एड़ी फटना – चावल का आटा (Rice Flour)
यह उत्पाद फटी त्वचा (fati edi) से मृत कोशिकाएं निकालने के लिए एक्सफ़ोलिएटिंग स्क्रब की तरह प्रयोग में लाया जा सकता है। इस स्क्रब को बनाना काफी आसान है , इसके लिए आपको 1 मुट्ठी चावल,सेब का सिरका और जैतून के तेल की आवश्यकता होती है। पैरों को गरम पानी में 10 मिनट तक डुबोकर रखें और उसके बाद पैरों में चावल का पेस्ट लगाएं।
* नारियल तेल फटी और बेजान एड़ियों के लिए नारियल तेल एक अच्छा घरेलू उपाय है. ये एड़ी की नमी को बनाए रखता है. इसके अलावा ये फंगस जैसे बैक्टीरिया संक्रमण से भी एड़ी को सुरक्षित रखता है|
* रोज लगाएं ग्लि‍सरीन
फटी एड़ियों के लिए ग्लि‍सरीन किसी वरदान से कम नहीं. आप इस हर रात सोने से पहले लगा लें. ऐसा नियमित करते रहने से एड़ी जल्दी ठीक हो जाएगी. नींबू में अम्लीय गुण मौजूद होता है, जो डेड स्किन को हटाने का काम करता है. साथ ही ये त्वचा को कोमल-मुलायम बनाता है|
*जब एड़ियां फट गई हो तो नंगे पैर जमीन पर चलने से परहेज करना चाहिए और पानी में ज्यादा देर तक पैरों को नहीं भिगोना चाहिए। अगर इन नुस्खों (Gharelu Nuskhe) को आजमाने के बाद भी फायदा न हो तो चिकित्सक से संपर्क कीजिए।


Friday, December 23, 2016

आयुर्वेद के त्रिदोष सिद्धान्त के अनुकूल आहार विहार

    

 शरीर की रचना, खानपान की पसंद और प्रकृति के मामले में हर इंसान अपने आप में अलग है। एक ही परिवार के अलग-अलग सदस्यों में ऐसी विविधताएं अक्सर नजर आती हैं। उदाहरण के लिए एक ही घर में कोई मोटा होता है तो कोई दुबला। किसी को ठंड से परेशानी होती है तो किसी को गर्मी से। कोई काफी फुर्तीला होता है तो कोई एकदम आलसी। यह होता है उनकी प्रकृति के अलग होने के कारण। कठिनाई की बात यह है कि शरीर की प्रकृति और खान-पान संबंधी जरूरत अलग-अलग होने के बावजूद घर में सबके लिए हमेशा एक जैसा खाना ही बनता है।
दरअसल, आज के दौर में अपने शरीर को स्वस्थ रखना सबसे बड़ी चुनौती है। चिकित्सा विज्ञान की विभिन्न शाखाएं इस बात पर जोर देती हैं कि हमारा आहार शरीर की बुनियादी संरचना के मुताबिक होना चाहिए। इस बात को तार्किक रूप से स्पष्ट करता है आयुर्वेद में मौजूद त्रिदोष सिद्धांत। आयुर्वेद के इस आधारभूत दर्शन के मुताबिक वात, पित्त, कफ त्रिदोष हैं। आयुर्वेद में त्रिदोष का मतलब क्षति या हानि नहीं है। वात का अर्थ है गति, पित्त का अर्थ है गर्म करना तथा यह शरीर का मेटाबोलिज्म बताता है और कफ का अर्थ है जो जल से विकास पाता है या जल से लाभ प्राप्त करता हो।आकाश, वायु, अग्रि, जल और पृथ्वी, यह पंच महाभूत सारे ब्रह्माण्डको तो बनाते ही हैं हमारे शरीर की भी रचना करते हैं। इनके अलग-अलग संयोजन हमारे शरीर में वात पित्त और कफ के रूप में रहते हैं। जैसे आकाश और वायु के संयोजन को वात कहा जाता है, तो पृथ्वी व जल के योग को कफ कहा जाएगा। उसी प्रकार अग्रि की उपस्थिति को पित्त कहा जाता है।
शरीर को स्वस्थ रखने वाले घटकों के रूप में इनका प्रयोग किया गया है। दोष वे द्रव्य हैं जो शरीर के घटक हैं। सुश्रुत के अनुसार त्रिदोष मानव शरीर की उत्पत्ति के कारक भी हैं। त्रिदोष की दो दशाएं होती हैं- शरीर संबंधी धातुरूप और रोग संबंधी रोग रूप।
दोष जब संतुलित अवस्था में रहते हैं तब वे अच्छी सेहत का आधार बनते हैं। यदि उसका क्रम बिगड़े यानी शरीर में उनकी मात्रा में असंतुलन हो तो शरीर रोगग्रस्त हो जाएगा।
आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार तीन प्रकृतियाँ बताई गई हैं— १. वात प्रकृति, २. पित्त प्रकृति, ३. कफ प्रकृति,
* वात प्रकृति के लक्षण—
(१) बहुत जागने वाला
(२) सर पर कम बाल ,
(३) हाथ पैरों में फटापन,
(४) शीघ्रगामी,
(५) अधिक बोलने रूप प्रवृत्ति एवं स्वप्न में आकाश में चलने वाला व्यक्ति होता है।




पित्त प्रकृति के लक्षण—
(१) बिना समय के श्वेतबाल होना,
(२) गौर वर्ण,
(३) बहुत पसीना आने वाला,
(४) क्रोधी स्वभाव,
(५) बहुत भोजन करने वाला,
(६) बुद्धिमान
(७) स्वप्नोें में भी तेजों को देखने वाला व्यक्ति होता है।
३. कफ प्रकृति के लक्षण —
(१) श्याम केशों वाला,
(२) अति वीर्यमान,
(३) क्षमा करने वाला,
(४) बलिष्ठ और स्वप्न में जलाशयों को देखने वाला व्यक्ति होता है।
शरीर में इनका अनुपात कम-ज्यादा होने पर रोग उत्पन्न होते हैं। ऐसे में जरूरी है कि हमारे शरीर का पोषण उसकी वात, पित्त या कफ प्रकृति को ध्यान में रख कर किया जाए, तभी हम स्वस्थ रह सकते हैं। यानी जो खाना हमारे शरीर के विकास में सहायक होता है, वही खाना हमारी बीमारियों का भी प्रमुख कारण बन सकता है। जिसमें दो दोषों के लक्षण हों वह संसर्ग और तीन दोषों के लक्षण हों उसे त्रिदोष जन्य जानना चाहिए।
त्रिदोष असंतुलन की स्थिति में वात बढऩे से 80, पित्त से 40 और कफ से 20 किस्म की बीमारियां हो सकती हैं। इसलिए शरीर की बनावट और उसकी भिन्नता के अनुसार खाना खाया जाए तो न केवल शरीर स्वस्थ रहेगा, बल्कि भविष्य में बीमारियों से लडऩे की ताकत भी मिलेगी। इसीलिए आधुनिक जीवन शैली में हमें अपने आप को पहचानना बहुत जरूरी है।
त्रिदोष सिद्धान्त:
आयुर्वेद की हमारे रोजमर्रा के जीवन, खान-पान तथा रहन-सहन पर आज भी गहरी छाप दिखाई देती है । आयुर्वेद की अद्भूत खोज है - ‘त्रिदोष सिद्धान्त’ जो कि एक पूर्ण वैज्ञानिक सिद्धान्त है और जिसका सहारा लिए बिना कोई भी चिकित्सा पूर्ण नहीं हो सकती । इसके द्वारा रोग का शीघ्र निदान और उपचार के अलावा रोगी की प्रकृति को समझने में भी सहायता मिलती है ।
आयुर्वेद का मूलाधार है- ‘त्रिदोष सिद्धान्त’ और ये तीन दोष है- वात, पित्त और कफ ।
त्रिदोष अर्थात् वात, पित्त, कफ की दो अवस्थाएं होती है -
1. समावस्था (न कम, न अधिक, न प्रकुपित, यानि संतुलित, स्वाभाविक, प्राकृत)
2. विषमावस्था (हीन, अति, प्रकुपित, यानि दुषित, बिगड़ी हुर्इ, असंतुलित, विकृत) ।
वास्तव में वात, पित्त, कफ, (समावस्था) में दोष नहीं है बल्कि धातुएं है जो शरीर को धारण करती है तभी ये दोष कहलाती है । इस प्रकार रोगों का कारण वात, पित्त, कफ का असंतुलन या दोष नहीं है बल्कि धातुएं है जो शरीर को धारण करती है और उसे स्वस्थ रखती है । जब यही धातुएं दूषित या विषम होकर रोग पैदा करती है, तभी ये दोष कहलाती है । इस प्रकार रोगों का कारण वात, पित्त, कफ का असंतुलन या दोषों की विषमता या प्रकुपित होना ‘रोगस्तु दोष वैषम्यम्’ । अत: रोग हो जाने पर अस्वस्थ शरीर को पुन: स्वस्थ बनाने के लिए त्रिदोष का संतुलन अथवा समावस्था में लाना पड़ता है ।
प्रकृति के लक्षण-
प्रत्येक प्रकृति के अपने लक्षण होते हैं। मनुष्य में तीनों प्रकार के दोष होते हैं किन्तु दो प्रधान दोषों के आधार पर उन्हें द्विंदज मान लिया जाता है। यह दो दोष कफ-पित्त, पित्त-वात, कफ-वात, पित्त-कफ, वात-पित्त और वात-कफ हैं। इन दो दोषों के लक्षण मनुष्य में पाए जाते हैं और इसी के आधार पर उसे सावधानी रखनी चाहिए।



1. वात प्रकोप के लक्षण
त्वचा का सूखा और खुरदुरा बनना, हमेशा थका हुआ महसूस करना, शरीर में दर्द व मांसपेशियों में जकडऩ, गहरी नींद न आना, पेट में गैस अधिक बनना, कब्ज रहना।
2. पित्त प्रकोप के लक्षण
शरीर में जलन महसूस होना, चक्कर आना व थकावट महसूस करना, मुंह का स्वाद कड़वा रहना व पेट में जलन महसूस होना, आंखों, मूत्र एवं त्वचा में पीलापन, ठंडे आहार की इच्छा बढऩा, सही या गलत में चुनाव न कर पाना, हमेशा चिड़चिड़ा रहना व किसी की बात न मानना, दूसरों से ईष्र्या रखना।
3. कफ प्रकोप के लक्षण
शरीर में भारीपन व जकडऩ रहना, शरीर भार का बढऩा, शरीर के अंगों में सूजन रहना, त्वचा व बालों का अधिक तैलीय रहना, मुंह में मीठापन बने रहना, कभी-कभी उल्टी आने जैसा होना, नींद का अधिक आना, हमेशा आलस्य में रहना, मुंह में कफ का उत्पादन अधिक खासकर सुबह के समय, श्वास विकारों की अधिक उत्पत्ति होना, सुबह के समय भारीपन व आलस्य प्रतीत होना।
कैसा हो आहार-विहार?
कफ, पित्त व वात के लिए आहार-विहार पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। अपनी प्रकृति के अनुसार आहार लेने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है और संभावित रोगों से बच सकता है।
वात प्रकृति के लिए आहार-विहार-
वात प्रकृति के लोग हर समय तनाव में रहते हैं और ज्यादा बोलते हैं। पाचन क्रिया कमजोर होने की वजह से इनके खाने की क्षमता भी कम होती है। ऐसे लोगों के लिए जरूरी है कि वे अपने खाने और सोने का समय निर्धारित करें और उसका कड़ाई से पालन करें। वात प्रकृति के लोगों को वात संबंधी रोगों से बचने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए।
*भोजन में चिकनाहट, भारीपन हो व हमेशा गरम ही खाएं।
*भोजन में मधुर, अम्ल (खट्टा) और लवण (नमक) प्रधान रस होने चाहिए।
*दूध और दूध से बने पदार्थ अच्छे विकल्प हैं।
*थोड़ा-थोड़ा भोजन समय-समय पर खाते रहें। एक साथ न बहुत सारा भोजन न करें और न ही बिल्कुल भूखे रहें।
*भोजन में कटु, तिक्त, कवाय रस का प्रयोग कम करें।
*प्याज, शलगम, गाजर, फली, सीताफल, नीबू पालक व कद्दू वात प्रकृति के लिए अनुकूल हैं।
सभी प्रकार के मीठे व खट्टे फलों- जैसे केला, स्ट्रॉबेरी, सेब, अनानास, पपीता, गन्ना, नारियल, आम व अनार का सेवन करें। 
पित्त प्रकृति के लिए आहार
इस प्रकृति वाले लोग आमतौर पर बहुत ही आकर्षक और तेज दिमाग वाले होते हैं। इस प्रकृति के लोगों के अंदर बहुत गर्मी होती है, इसलिए इन्हें गर्म चीजों को खाने से बचना चाहिए। इनके लिए ठंडी चीजें शरीर में सही संतुलन को बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं। इन्हें सूर्य की सीधी किरणों से बचना चाहिए। ऐसे लोग रोज सुबह दौडऩे जाएं या जिम करें। दरअसल इस प्रकृति के लोगों में कॉम्पिटिशन की भावना बहुत अधिक होती है, जो कभी-कभी खतरनाक भी हो सकती है। पित्त प्रकृति के लोगों को निम्नलिखित आहार का सेवन करना चाहिए।
पैत्तिक पुरूष की अग्नि अत्याधिक बलवान व तीव्र होती है। अत: इसीलिए हर दो घंटे में आपको कुछ न कुछ खाते रहना चाहिए किन्तु ऐसा आहार करना चाहिए जो आपकी प्रकृति के लिए हितकर हो।
गाजर, पालक, खीरा, पत्ता गोभी, हरी फली, मटर, घीया, तोरई, आलू, शकरकंदी, ब्रोकली जैसी सब्जियों का सेवन।
रसभरी व मीठे फलों का सेवन अधिक करें। शुष्क फलों का सेवन भी कर सकते हैं। खरबूजा, अंगूर, पपीता, केला, लीची, किशमिश, सेब, खजूर, पका हुआ आम, नारियल, गन्ना आदि का सेवन लाभकारी है।
इमली, जामुन, नींबू, संतरा व अनानास आदि का सेवन कम करें।




कफ प्रकृति के व्यक्तियों लिए आहार -
कफ प्रकृति के लोगों के लिए व्यायाम काफी महत्वपूर्ण है। कफ बढऩे के अनेक कारणों में एक कारण हमारा खानपान है। मिठाइयां, मक्खन, खजूर, नारियल, उड़द की दाल, केला, आदि का अधिक सेवन शरीर में कफ प्रवृत्ति को बढ़ाता है। दिन में सोने और फास्ट फूड के अधिक सेवन से भी शरीर में कफ बढ़ता है। इसके अलावा निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए।
*अत्यधिक ठण्डे, भारी व बांसी आहार का सेवन न करें।
*दूध और दूध से बने पदार्थ जैसे दही, पनीर, मक्खन आदि कम ग्रहण करें।
*अपने आहार में फलों के रस, कोल्ड ड्रिंक, आइस क्रीम, मिठाई की मात्रा कम रखें।
*रात का खाना जल्दी खाएं व बार-बार खाने की आदत को त्याग दें।
*अदरक, लहसून, शलगम, मटर, पत्तागोभी, गाजर, फली, पालक, मेथी, तोरी, घीया आदि का सेवन करें।
*ऐसे फलों का सेवन करें जो अधिक जूस वाले व मीठे या खट्टे न हो।
*कफ प्रधान प्रकृति वाले व्यक्तियों का वसंत ऋतु, कफजन्य रोग होने पर और बाल्यावस्था में विशेष रूप से ख्याल रखा जाना चाहिए। कफ प्रधान वालों को प्रतिवर्ष वसंत ऋतु में पंचकर्म के माध्यम से शरीर की शुद्धि करनी चाहिए। ऐसा करने से पूरे वर्ष कफ की समस्या नहीं होती। यह सब उपचार किसी आयुर्वेदाचार्य के निर्देशन में करने चाहिए।
अत: अगर हम अपनी प्रकृति को समझें और उसके अनुसार अपने खान-पान और रहन-सहन को निर्धारित करें तो लंबी और सेहतमंद जीवन जी सकते हैं।
*मीठे, खट्टे, और नमकीन जितने पदार्थ हैं वे कफ को बढ़ाते हैं ।
*कफ-प्रकृति के व्यक्ति को मीठे, खट्टे, नमकीन चीजों को कम मात्रा में लेना चाहिए और कड़वी चरपरी और कसैली चीजों को अधिक मात्रा में खाना चाहिए ताकि कफ बढ़ने न पाए ।

Sunday, December 18, 2016

अंजीर के पत्तों से बनी चाय के यह फायदे जानते हो आप ?



अंजीर के पत्ते
अंजीर का नाम तो आपने सुना ही होगा |अंजीर एक बहुत ही गुणकारी सूखा हुआ फल होता है |अंजीर के फल के साथ -साथ इसके पत्ते भी बहुत ही उपयोगी होते है|
अंजीर के वृक्ष अधिकतर गर्म देशों में होते है |अंजीर के वृक्ष 10 हाथ ऊँचे होते है और इसके पत्ते बड़े होते है| चूने वाली भूमि पर इसकी पैदावार अच्छी होती है |अंजीर दो तरह होते है |एक तो बोया हुआ ,जिसके फल और पत्ते बड़े होते है और दूसरा जंगली ,जिसके फल और पत्ते पहले वाले से अपेक्षाकृत छोटे होते है |अंजीर को इंग्लिश में Fig कहते है इसका लेटिन नाम फाइकस कैरिका है
अंजीर के पत्तो से बनने वाली चाय डाइटरी फाइबर , एंटीऑक्सीडेंट्स , टीथ एंड बोन बिल्डिंग कैल्शियम , पोटैशियम , सोडियम , फोलिक एसिड , जिंक , मैंगनीज , कॉपर , मैग्नीशियम और विटामिन्स K, C, B और A से भरपूर है |
अब आपको अपनी सेहत (Health) पर और पैसे खराब करने की जरूरत नहीं है | आपको करना बस इतना है ..जो नुस्खा आज हम आपको इस आर्टिकल में बताने जा रहे है उसे अपने घर में तयार करना है और उसका लाभ उठाना है |

अंजीर के पत्तों में कुछ ऐसे रसायन होते हैं जो इंसुलिन को  को ज्यादा असरदार तरीके से इस्तेमाल करते हैं जिस कारण ये मधुमेह की बिमारी में काम आ सकते हैं ।
आप अंजीर के पत्तों को पानी में उबाल कर चाय की तरह पी सकते हैं। सुबह सुबह खाली पेट अंजीर के पत्तों को आप चबा कर खा भी सकते हैं।
अब आपको अपनी सेहत (Health) पर और पैसे खराब करने की जरूरत नहीं है | आपको करना बस इतना है ..जो नुस्खा आज हम आपको यहाँ  बताने जा रहे है उसे अपने घर में तैयार करना है और उसका लाभ उठाना है |



आज हम बात कर रहे है अंजीर के पत्तों से बनी चाय की | हम आपको बता दें अंजीर के पत्तो में कई गुण होते है जो आपके शरीर को तंदरुस्त बनाये रखते है |
तो आये जानते है कैसे करें तयार अंजीर के पत्तो की चाय |
थोड़े से अंजीर के पत्ते लें और  पानी में डाल कर 15 मिनटों तक उबालें |
अब इस मिश्रण को 5 मिनटों तक धीमी आंच  पर रखें |
इस मिश्रण के ठंडा होने का इंतज़ार करें |
ठंडा होने के बाद अगर आप चाहें तो इसमें थोडा सा शहद डाल सकते हो |
आपकी चाय तयार है |
इस चाय के सेवन से आप कई बीमारियों से मुकत हो जाओगे जिन में मधुमेह  और खराब वाला कोलेस्ट्रॉल प्रामुख है |
पके हुए फल
पके हुए फल या अंगोरा कुछ कुछ संतरे जैसे  लगते हैं, लेकिन इनका अन्दरूनी भाग लाल रंग का होता है । ये मधुमेह से पीड़ित लोगों के लिए या मधुमेह की संभावना के साथ रह रहे लोगों के लिए एक शानदार दवाई है। यह आपको वज़न घटाने में मदद करता है।
 अपने शूगर लेवल को जांचते रहे और लेवल बनाये रखने के लिए दिन में 3 बार ये फल लें 


Saturday, December 17, 2016

किडनी अकर्मण्यता रोगी के लिए डाईट चार्ट एवं हितकारी उपचार

   हमारे शरीर के हानिकारक पदार्थो को शरीर से छानकर बाहर निकालने का काम किडनी का ही होता है! किडनी हमारे शरीर के लिए रक्त शोधक का काम करती है, दुख की बात तो ये है के इस बीमारी का बहुत देर से पता चलता है जब तक किडनी 60-65% तक ख़राब हो चुकी होती है!
क्यों होती है किडनी फेल-ब्लड प्रेशर किडनी फेल होने का सबसे बड़ा कारण है, इसलिए नियमित रूप से ब्लड प्रेशर की जांच करवाते रहना आवश्यक है। 
लक्षण:
हाथ-पैरों और आंखों के नीचे सूजन,
* सांस फूलना, 
*भूख न लगना और हाजमा ठीक न रहना, 
*खून की कमी से शरीर पीला पड़ना,
* कमजोरी, थकान, 
*बार-बार पेशाब आना,
 *उल्टी व जी मिचलाना, 
*पैरों की पिंडलियों में खिंचाव होना,
 *शरीर में खुजली होना आदि लक्षण यह बताते हैं कि किडनियां ठीक से काम नहीं कर रही हैं।
किडनी निष्क्रियता रोगी  के लिए डाईट चार्ट एवं हितकारी उपचार :
*प्रोटीन, नमक, और सोडियम कम मात्र में खाए!
* नियमित व्यायाम करे, अपने वजन को बढ़ने न दे, खाना समय पर और जितनी भूख हो उतनी ही खायें, बाहर का खाना ना ही खाए तो बेहतर है, सफाई का विशेष ध्यान रखे, तथा पौषक तत्वों से भरपूर भोजन करें!
*अंडे के सफ़ेद वाले भाग को ही खाए उसमे किडनी को सुरक्षित रखने वाले तत्व जैसे के फोस्फोरस और एमिनो एसिड होते है|
*मछली (Fish) खाए इसमे ओमेगा 3 फैटी एसिड किडनी को बीमारी से रक्षा करता है!
*किडनी रोग मे प्याज, स्ट्राबेरी, जामुन, लहसुन इत्यादी फायेदेमंद होते है ये मूत्र के संक्रमण से भी  बचाते है | 

किडनी के रोग में परहेज-किडनी के रोगी को नमकीन चटपटी खट्टी चीजे तली हुई चीजें बेकरी आइटम जैसे पाव, ब्रेड, बटर, खारी बिस्कुट, नान खटाई, सूप, जूस, कोल्ड ड्रिंक सभी प्रकार की दाले, करेला, भिन्डी, बैंगन, टमाटर, शिमला मिर्ची, पत्ते वाली सब्जी जैसे पालक, चौलाई, मेथी, फलो का रस, सूखे मेवे,बेसन, पापड़, आचार, चटनी, बेकिंग पाउडर एवं सोडा लेने की मनाही है।




किडनी के रोगी के लिए चाय-अदरक और तुलसी के पत्ते वाली काली चाय मे थोड़ा सा काली मिर्च, सोंठ, दालचीनी, छोटी इलायची, बड़ी इलायची, तेजपत्ता, अजवायन और लवंग का चूर्ण डालकर बनाए, सुबह शाम 100- 150 ग्राम चाय दे, ध्यान रखे, इसमें चाय पत्ती ना डाले।
किडनी के रोगी के लिए नाश्ता-उपमा, पोहा, कुरमुरा दलिया, इडली, सफेद ढोकला, साबुदाना, रवा, साबुदाना खिचड़ी बिना मूँगफली नारियल के।
किडनी के रोगी के लिए रोटी-किडनी के रोगी के लिए रोटी सूखी होनी चाहिए, मतलब बिना घी, तेल लगाये, मक्का, जवार, बाजरी की हो तो उत्तम, नही तो गेहू थोड़ा मोटा पिसा हुआ ले मैदे या बारीक पिसे आटे की ना बनवाए।इसके आलावा अंकुरित मूंग थोड़ी मात्रा मे उबालने के बाद खाना उपकारी होता है|
किडनी के रोगी के लिए सब्जी -:हमेशा दो तरह की सब्जी ले एक जमीन के नीचे होने वाली जैसे आलू, मूली ,गाजर अरुई चुकंदर,शकरकन्द| दूसरी जमीन के उपर वाली लौकी भोपला गोभी पत्ते वाली ,सेम ,सहजन ,नेनुआ ,तुरई, कूनरू, परवल, रायता आदि।
किडनी के रोगी के लिए सलाद-ककड़ी, खीरा, गाजर, बीट रूट, पत्ते वाली गोभी, मूली, प्याज लेकिन मूली का सेवन रात्रि मे ना करे।
किडनी के रोगी के लिए दूध दही पनीर :-गाय का दूध मलाई निकालकर 100 – 150 मिली नाश्ते के समय,दही एक  कटोरी दोपहर भोजन के समय और पनीर 30 ग्राम डिनर के साथ ले।
किडनी के रोगी के लिए फल:-सेब बिना छिलके के, बेर, अमरूद, पपीता और पाईनेपल  मे से कोई एक फल।

किडनी अकर्णयता रोगी के लिए हितकारी उपचार-





*किडनी फेल्योर रोगी के लिए  हर्बल मेडिसीन(वैध्य दामोदर 98267-95656) बहुत फायदेमंद रहती है|यह औषधि 10 मिली  की मात्रा मे दिन मे 3 बार खाली पेट सेवन करना चाहिए|इससे क्रिएटीनिन  और यूरिया लेविल नीचे लाने मे मदद  मिलती है| 
*गेंहू के जवारों का रस 50 ग्राम और गिलोय (अमृता की एक फ़ीट लम्बी व् एक अंगुली मोटी डंडी) का रस निकालकर – दोनों का मिश्रण दिन में एक बार रोज़ाना सुबह खाली पेट निरंतर लेते रहने से डायलिसिस द्वारा रक्त चढ़ाये जाने की अवस्था में आशातीत लाभ होता है।
 *इसके आलावा किडनी  रोगी को छोटे गोखरू का काढ़ा बनाकर भी  उपयोग करना लाभप्रद रहता है||
सामग्री - छोटा गोखरू  250 ग्राम लें| इसे 4 लीटर पानी मे  तब तक उबालें  की एक लीटर  शेष रह जाये|ठंडा होने पर छानकर एक बोतल मे भर लें| 
खुराक : यह औषधि सुबह -शाम 100 मिली की मात्रा मे दिन मे 2 बार खाली पेट लेना चाहिए |पीने के वक्त औषधि की 100 मिली मात्रा मामूली गरम कर लेना चाहिए| काढ़ा पीने के एक घंटे के बाद ही कुछ खाइए और अपनी पहले की दवाई ख़ान पान का रूटीन पूर्ववत ही रखिए।औषधि समाप्त होने पर फिर बना लेना चाहिए|जैसे जैसे आपके अंदर सुधार होगा काढे की मात्रा कम कर सकते है या दो बार की बजाए एक बार भी कर सकते है।
यह भी आज़माएँ-
किडनी के रोगी चाहे उनका डायलासिस चल रहा हो या अभी शुरू होने वाला हो चाहे उनका क्रिएटिनिन या यूरिया कितना भी बढ़ा हुआ हो और डाक्टर ने भी उनको किडनी ट्रांसप्लांट के लिए परामर्श दिया हो ऐसे में उन रोगियों के लिए एक  असरदार प्रयोग है जो इस रोग से छुटकारा दिला सकता है
उपचार :-
* नीम और पीपल की छाल का काढ़ा :-
3 गिलास पानी में 10 ग्राम नीम की छाल और 10 ग्राम पीपल की छाल लेकर आधा रहने तक उबाल कर काढ़ा बना ले इस काढ़े को 3-4 भाग में बांटकर दिन में सेवन करते रहे इस प्रयोग से मात्र 7 दिन में क्रिएटिनिन का स्तर व्यवस्थित हो सकता है या वांछित लेवल तक आ सकता है
*खून मे क्रिएटीनिन की नियमित जांच करवाते रहें| जरूरत पड़ने पर डायलिसिस करवाना चाहिए||योग्य चिकित्सक से संपर्क बनाए रखें|
विशिष्ट परामर्श-

किडनी फेल रोगी के बढे हुए क्रिएटनिन के लेविल को नीचे लाने और गुर्दे की क्षमता  बढ़ाने  में हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल होती हैं| इस हेतु वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क किया जा सकता है| दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित यह औषधि कितनी आश्चर्यजनक रूप से फलदायी है ,इसकी एक केस रिपोर्ट पाठकों की सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ -






नाम रोगी --  श्रीमती  तारा देवी गुप्ता W/O डॉ.अरविंद कुमार गुप्ता ,MBBS / बलिया  उत्तर प्रदेश
1)  जांच की रिपोर्ट  दिनांक  1/6/2015
सीरम  क्रीएटनिन    11.5/ mg/dl
2) जांच  की रिपोर्ट  दिनांक 18/6/2015
सीरम क्रेयटनिन   7.8 / mg/dl
3)  जांच की रिपोर्ट  दिनांक   22/7/2015
सीरम  क्रीएटनिन   4.09 mg/dl 







Tuesday, December 13, 2016

सुहागा के उपयोग,प्रयोग,उपचार फायदे



नाम : 
सौभाग्य, टंकण,सुहागाचौकी, रसघ्न, कनक क्षार, धातु द्रावक आदि सुहागा के नाम है।
गुण : सुहागा पेट की जलन, बलगम, वायु तथा पित्त को नष्ट करता है और धातुओं को द्रवित करता है।

जुकाम-नजला : सुहागा की डली को लोहे के तवे पर सेंक कर पीस ले। इस में से चुटकी भर 1 घूंट गर्म पानी में घोलकर रोजाना 4 बार पीने से जुकाम ठीक हो जाता है। आधा ग्राम गर्म पानी से सुबह-शाम लेने से नजला भी ठीक हो जाता है।
पसीना : 1 चम्मच पिसा हुआ सुहागा एक बाल्टी पानी में मिलाकर नहाने से अधिक पसीना आना और शरीर से दुर्गन्ध आना बंद हो जाती है।
बाल रोग : लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग शुद्ध सुहागा शहद के साथ बच्चों को दिन में 2-3 बार देने से बच्चों की खांसी और सांस के रोग दूर होते हैं।
अंडकोष की वृद्धि : 6 ग्राम भुने सुहागे को गुड़ में मिलाकर इसकी 3 गोलियां बनाकर 1-1 गोली 3 दिन सुबह हल्के गर्म घी के साथ सेवन करने से अंडकोष की वृद्धि रुक जाती है।
कर्णरोग : लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग सुहागा कान में दिन में 2-3 बार डालने से कान के रोग ठीक हो जाते हैं।
अंडकोष की खुजली : लगभग 116 ग्राम पानी में 4 ग्राम सुहागा को घोलकर रोजाना 2-3 बार अंडकोष धोने से खुजली मिट जाती है
अजीर्ण : बच्चा सोते-सोते रोने लगे, दही की तरह जमे दूध की उल्टी करे, हरे रंग का अतिसार (दस्त) हो तो समझे कि बच्चे को खाया हुआ पचता नहीं है। बच्चे की पाचन शक्ति (भोजन पचाने की क्रिया) ठीक करने के लिए भुना सुहागा चुटकी भर दूध में घोलकर 2 बार पिलाने से लाभ होता है।
स्वरभंग : सुहागा को पीसकर चुटकी भर चूसने से बैठी हुई आवाज खुल जाती है।
पेट फूलना, दूध उलटना : तवे पर सुहागे को सेंक कर बच्चों को चटाने से पेट फूलना और दूध पीकर वापिस निकाल देने का रोग दूर हो जाता है।
आंख आना : आंख आने पर सुहागा और फिटकरी को एक साथ पानी में घोल बनाकर आंख को धोने और बीच-बीच में बूंद-बूंद (आई डरोप्स) की तरह आंखों मे डालने से बहुत जल्दी लाभ होता है।
खांसी :5-5 ग्राम भूना हुआ सुहागा और कालीमिर्च को पीसकर कंवार गंदल के रस में मिलाकर कालीमिर्च के बराबर की गोलियां बनाकर छाया में सुखा लें। 1 या आधी गोली को मां के दूध के साथ बच्चों को देने से खांसी के रोग मे आराम आता है।
बलगम वाली खांसी और बुखार वाली खांसी में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लगभग 1 ग्राम सुहागे की खील (लावा) को सुबह-शाम शहद के साथ देने से लाभ मिलता है।
सुहागे को तवे पर गर्म करके फुलायें फिर उसका चूर्ण बनाकर पीसे। इसमें से 1 चुटकी चूर्ण लेकर शहद के साथ चाटने से खांसी बंद हो जाती है।
दमा :लगभग 75 ग्राम भुना हुआ सुहागा 100 ग्राम शहद में मिला ले इसे सोते समय 1 चम्मच की मात्रा में लेकर चाटने से श्वास रोग (दमा) में बहुत लाभ होता है।
लगभग 30 ग्राम पिसे हुए सुहागे को 60 ग्राम शहद में मिलाकर रख दें। कुछ दिनों तक 3 अंगुली भर चाटते रहने से श्वास रोग (दमा) खत्म हो जाता है।



सुहागे का फूला और मुलहठी को अलग-अलग पकाकर या पीसकर कपड़े में छानकर बारीक चूर्ण बना लें और फिर इन दोनों औषधियों को बराबर मात्रा में मिलाकर किसी शीशी में सुरक्षित रख लें। आधा ग्राम से 1 ग्राम तक इस चूर्ण को दिन में 2-3 बार शहद के साथ चाटने से या गर्म पानी के साथ लेने से दमा के रोग में लाभ मिलता है। बच्चों के लिए लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा या आयु के अनुसार कुछ अधिक दें। इसका सेवन करने से श्वास (दमा), खांसी तथा जुकाम नष्ट हो जाता है। इस औषधि का सेवन करते समय दही, केला चावल तथा ठंडे पदाथों का सेवन नहीं करना चाहिए।
फरास : 50 ग्राम सुहागे को तवे पर भूनकर पीस लें। 1 चम्मच सुहागा, 1 चम्मच नारियल का तेल और 1 चम्मच दही को मिलाकर सिर में मलने और आधे घंटे के बाद सिर को धोने से सिर की फरास समाप्त हो जाती है।
तिल्ली-Spleen : 30 ग्राम भुना हुआ सुहागा और 100 ग्राम राई को पीसकर मैदा की छलनी से छान लें। इसे आधा चम्मच रोजाना 7 सप्ताह तक 2 बार पानी से फंकी लें। तिल्ली सिकुड कर अपनी सामान्य अवस्था में आ जायेगी, भूख अच्छी लगेगी और शरीर में शक्ति का संचार होगा।
आंखों का दर्द : भुने हुए सुहागे को पीसकर कपडे़ में छानकर सलाई से सुबह और शाम आंखों में लगाने से आराम आता है।
दांतों को साफ और मजूबत बनाने के लियें :
सुहागा को फुलाकर उसमें मिश्री मिलाकर बारीक पीस कर रोजाना मंजन करने से दांत साफ और मजबूत होते हैं।
लकड़ी के कोयले में सुहागा मिलाकर बारीक पाउडर बना लें तथा बांस या नीम के दांतुन पर लगाकर मंजन करें। इससे दांत साफ और मजबूत होते हैं।
सुहागा, कलमी शोरा, फिटकरी, कालानमक और यवक्षार को पीसकर चूर्ण तैयार कर इसे तवे पर भूनकर 2-2 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ मिलाकर बच्चों को चटाने से काली खांसी ठीक हो जाती है।
तवे पर भुना हुआ सुहागा व वंशलोचन को मिलाकर शहद के साथ रोगी बच्चे को चटाने से काली खांसी दूर हो जाती है।
बालों के रोग : 20 ग्राम सुहागा और 10 ग्राम कपूर को 50 ग्राम उबले पानी में मिलाकर हल्के गर्म पानी के साथ धोने से बाल मुलायम तथा काले हो जाते हैं।
5 ग्राम सुहागा और 10 ग्राम कच्चे सुहागे को 250 ग्राम पानी में डालकर उबाल लें। इसके ठंडा होने पर बालों को धोने सें बाल मजबूत बनते हैं।
पायरिया -सुहागा एवं बोल (हीराबोल) को मिलाकर रोजाना 2 से 3 बार मसूढ़ों पर धीरे-धीरे मलें। इससे दांतों व मसूढ़ों के सभी रोग ठीक होकर पायरिया रोग दूर होता है।
5-5 ग्राम भूना सुहागा, समुन्दर झाग 8-8 ग्राम त्रिफला पिसा, सेंधा नमक, 0.12 ग्राम सतपोदीना, सतअजवायन को पीसकर और छानकर 50 ग्राम पिसी खड़िया मिलाकर कपडे में छानकर सुबह-शाम मंजन
करने से पायरिया ठीक हो जाता है।
चर्मरोग : सुहागे के तेल को चमड़ी पर लगाने से चमड़ी के सारे रोग ठीक हो जाते हैं
बालों का झड़ना (गंजेपन का रोग) : 20 ग्राम सुहागा और 20 ग्राम कपूर को बारीक पीसकर पानी में घोलकर बाल धोने से बालों का गिरना कम हो जाता है।
जुओं का पड़ना : 20 ग्राम सुहागा और 20 ग्राम फिटकरी को 250 ग्राम पानी में मिलाकर सिर पर मालिश करने से सिर की जूएं मर जाती है।
जीभ की प्रदाह और सूजन : सुहागा की टिकीया चूसते रहने से जीभ की जलन और सूजन का रोग ठीक होता है।
मसूढ़ों का फोंड़ा : मसूढ़ों के फोड़े में सुहागा एवं हीरा बोल को मिलाकर मसूढ़ों पर मलें। इससे मसूढ़ों का दर्द व फोड़ों से पीप का निकलना बंद होता है।
मसूढ़ों की सूजन : हीरा बोल और सुहागा को मिलाकर मसूढ़ों पर पर धीरे-धीरे मलने से मसूढ़ों की सूजन मिट जाती है।
दांत निकलना :भुना हुआ सुहागा और शहद को मिलाकर बच्चे के मसूढ़ों पर धीरे-धीरे मलें। इससे दांत आसानी से निकल आते हैं तथा मसूड़ों का दर्द कम होता है।
सुहागा को शहद के साथ पीसकर बच्चों के मसूढ़ो पर मलें। इससे बच्चों के नये दांत आसानी से निकल आते हैं और दर्द में आराम मिलता है।
लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग भुनी सुहागा को शहद में मिलाकर बच्चों के मसूडें पर मलने से दांत आसानी से निकल आते हैं।



10 ग्राम भुना सुहागा और 10 ग्राम पिसी हुई मुलहठी लेकर चूर्ण बना लें। इसमें से लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग चूर्ण में शहद मिलाकर मसूड़ों पर मलें। इससे बच्चों के दांत निकलते समय दर्द नहीं होता तथा बार-बार दस्त आना बंद हो जाता है।
मुंह के छाले : सुहागा के टुकड़े को शहद के साथ मिलाकर रोजाना 3 से 4 बार मुंह में लगायें। इससे मुंह की जलन, मुंह के दाने तथा मुंह के छाले आदि रोग खत्म होते हैं। इसका प्रयोग छोटे बच्चों के मुंह में होने वाले छालों में भी कर सकते हैं।
शहद में सुहागा मिला कर घोल तैयार करें। इसके घोल में साफ रूई को भिगोकर मुंह के छाले पर लगाने से तथा मुंह से निकलने वाले लार को नीचे टपकाने से मुंह की गंदगी खत्म होकर छाले दूर होते हैं।
2 ग्राम भुना सुहागा के बारीक चूर्ण को 15 ग्राम ग्लिीसरीन में मिलाकर रखें। इस मिश्रण को दिन में 2 से 4 बार मुंह के छालों पर लगाने से आराम मिलता है।
भुना हुआ सुहागा 1 चुटकी बारीक पीसकर ग्लिसरीन या देशी घी में मिलाकर मुंह के छालों पर लगाने से छाले ठीक हो जाते हैं।
निमोनिया
3 ग्राम सुहागा भुना और नीला थोथा भुना हुआ पीसकर अदरक के रस में बाजरे के बराबर आकार की गोलियां बनाकर छाया में सुखा लेते हैं। इसमें से 1-1 गोली मां के दूध के साथ सेवन करने से निमोनिया रोग ठीक हो जाता है।
1 चुटकी फूला सुहागा, 1 चुटकी फूली फिटकरी, 1 चम्मच तुलसी का रस, 1 चम्मच अदरक का रस, आधा चम्मच पान के पत्तों के रस को एक साथ मिलाकर शहद के साथ सुबह-शाम सेवन करने से निमोनिया के रोग मे लाभ होता है।
नपुंसकता : सुहागा, कूट और मैनसिल को बराबर मिलाकर चूर्ण बनाकर चमेली के रस और तिल के तेल में पका कर लिंग पर मलने से लिंग का टेढ़ापन दूर होता है।
दस्त के लिए : लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लेकर लगभग 1 ग्राम सुहागे की खील (लावा) को रोजाना सुबह और शाम देने से बच्चों के आने वाले दस्त बंद हो जाते हैं।
मुंह की दुर्गंध : 116 ग्राम पानी में 4 ग्राम सुहागा घोलकर कुल्ला करने व गरारे करने से मुंह की दुर्गंध मिटती है तथा मुंह के अन्य रोग भी खत्म होते हैं।
सुहागा की खील (लावा) लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लगभग 1 ग्राम में शहद मिलाकर दिन में 2 से 3 बार खाने से मुंह की दुर्गंध चली जाती है।
मूत्र के साथ खून आना : 0.24 से 0.96 ग्राम सुहागे की खील को शहद मिले हुए पानी में घोंटकर सुबह-शाम पीने से पेशाब के साथ खून आना बंद हो जाता है।
मुंह का रोग : 3 ग्राम भुना सुहागा आधा ग्राम कपूर चूरा को शहद में मिलाकर मुंह में लगाने से मुंह के सभी रोग खत्म होते हैं।
10 ग्राम भुना सुहागा और 10 ग्राम बड़ी इलायची के दाने तथा 10 ग्राम तबासीर को मिलाकर चूर्ण बना लें। रोजाना सुबह-शाम भोजन करने के बाद 4-4 ग्राम चूर्ण पानी के साथ खायें और इसके चूर्ण को जीभ पर छिरकने से जीभ व मुंह के छाले खत्म होते हैं।
3 ग्राम भुना सुहागा को पीसकर शहद या ग्लिसरीन 25 ग्राम में मिला लें। रोजाना सुबह-शाम इस मिश्रण को साफ रूई से मुंह के सफेद घाव पर लगाने से मुंह के जख्म ठीक हो जाते हैं।
3 ग्राम भुना सुहागा को पीसकर 25 ग्राम शहद या ग्लिसरीन में मिला लें। रोजाना सुबह-शाम इस मिश्रण को साफ रूई से मुंह के घाव पर लगाने से मुंह के जख्म ठीक हो जाते हैं।
फूला सुहागा शहद में मिलाकर जीभ पर लगाने से जीभ साफ होती है तथा दाने खत्म होते हैं।
सुहागा का लावा तैयार कर शहद में मिलाकर दिन में 3 से 4 बार छाले में लगाने से छाले ठीक हो जाते हैं।
भगन्दर : 4 ग्राम सुहागा को 58 ग्राम पानी मे घोल कर पीने से गुदकण्डु (खुजली) नष्ट होती है और नासूर में लाभ होता है।
घाव : सुहागे को पानी में घोलकर उसमें कपड़ा भिगोकर घाव पर बांधने से खून रुक जाता है।
10 ग्राम सुहागे को 200 ग्राम पानी में मिलाकर घाव को धोने से घाव ठीक हो जाता है।
अग्निमांद्यता (अपच) के लिए : लगभग आधा ग्राम से लगभग 1 ग्राम सुहागे का चूर्ण खाना खाने के एक घंटे बाद खाने से अपच (भोजन का ना पचना) रोग में लाभ होता है।
पथरी : 5-5 ग्राम सुहागा, जौंखार तथा कलमी शोरा को मिलाकर पीसकर चूर्ण बना लें। इस 1-1 ग्राम चूर्ण को रोजाना सुबह-शाम मूली के रस या कुल्थी के जुसांदे में मिलाकर पीने से गुर्दे व मूत्राशय की पथरी घुलकर निकल जाती है।
प्रदर रोग : 2.5 प्रतिशत सुहागे के घोल की पिचकारी जननेन्द्रिय में देने से सफेद प्रदर दूर हो जाता है।
गिल्टी (ट्यूमर) : सुहागे की खील को गिल्टी (ट्यूमर) में लगाने से लाभ होता है।
धनुष्टंकार (टिटनेस) : लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लगभग 1 ग्राम सुहागा सुबह-शाम शहद के साथ चाटने से धनुष्टंकार(टिटनेस) का रोगी जल्दी ठीक हो जाता है।



नाक के रोग : 3 ग्राम सुहागे को पानी के साथ पीसकर नाक के नथुनों (छेदों) में लगाने से नकसीर (नाक से खून बहना) आना रूक जाता है।
मासिक धर्म की अनियमितता :
10 ग्राम सुहागा, 10 ग्राम हीरा कसीस, 10 ग्राम मुसब्बर तथा 10 ग्राम हींग को पानी के साथ पीसकर लगभग 0.24 ग्राम की गोली बनाकर 1 गोली सुबह और शाम अजवायन के साथ सेवन करना चाहिए। इसे कुछ दिनों तक लगातार सेवन करने से मासिक धर्म ठीक समय पर आने लगता है।
बवासीर (अर्श) : 1 चम्मच सुहागा, 1 चम्मच हल्दी, 1 चम्मच चीता (चित्रक) की जड़, थोड़े-से इमली के पत्ते तथा 10 ग्राम गुड़ को पीसकर मलहम बना लें। इसके मलहम को बवासीर के मस्सों पर लगाने से मस्से जल्द सूख कर गिर जाते हैं।
कान के कीड़े : सुहागे को सिरके में मिलाकर गर्म करके कान में डालने से कान के कीड़े खत्म हो जाते है।
गुर्दे के रोग : 1-1 ग्राम सुहागा भुना, नौसादर, कलमी शोरा को पीसकर गुर्दे मे दर्द के समय आधा ग्राम की मात्रा में नींबू के रस के साथ 2-3 चम्मच लेने से आराम आता है।
कान की पुरानी सूजन : ढाई प्रतिशत सुहागे के घोल को कान में बूंद-बूंद करके हर 2-3 घंटे के बाद डालने से कान की पुरानी सूजन दूर होती है।
स्त्रियों को द्रवित (संतुष्ट) करना : भूने हुऐ सुहागे को 5 ग्राम की मात्रा में लेकर शहद या नींबू के रस में मिलाकर पुरुष अपने शिश्न (लिंग) पर सुपारी (आगे के भाग) पर लगाकर सूखने के बाद ही सहवास (संभोग) करें। इससे स्त्रियां बहुत जल्द संतुष्ट हो जाती है।
सुहागा चौकिया, समुद्र झाग, आधा ग्राम दूध, चाय या सब्जी के साथ स्त्री को खिलाने से स्त्रियां बहुत जल्द संतुष्ट हो जाती है।
चेहरे की झाई होने पर : 25 ग्राम चमेली के तेल या बादाम रोगन में 1 ग्राम पिसा हुआ भुना सुहागा मिलाकर चेहरे पर लगाने से चेहरे की झाई दूर हो जाती है।
फोड़ा (सिर का फोड़ा) : सुहागे के पानी से फोड़े और फुंसियों को धोने से फोड़े और फुंसी समाप्त हो जाते हैं।
खाज-खुजली : सुहागे को तवे पर भूनकर उसका पानी शरीर पर मलने से खाज-खुजली दूर हो जाती है।
त्वचा के लिए : सतातू के ताजे पत्ते, सुहागे का चूर्ण और नील को मिलाकर बहुत बारीक पीसकर त्वचा पर लगाने से बहुत भयानक चमड़ी का रोग, एक्जिमा, बदबू वाला कोढ़ और दूसरे प्रकार के चमड़ी के रोग समाप्त हो जाते हैं।
खुजली के लिए : सुहागा को फुलाकर नारियल के तेल में मिलाकर शरीर पर मालिश करनी से खुजली दूर होती है।
दाद के लिए :
सुहागा, गन्धक और मिश्री को बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। यह मिश्रण 40 ग्राम की मात्रा में लेकर 5 गुने पानी में डालकर घोल तैयार करके 24 घंटे तक रख दें। 24 घंटे के बाद इसे एक दिन में 2 बार दाद पर मलने से 2 से 3 दिन में ही दाद मिट जाता है।
सुहागा, आमलासार गन्धक और राल को बराबर मात्रा में लेकर बारीक पीस लें तथा इन तीनों के बराबर इसमें घी डालकर हल्की आग पर पका लें। जब यह पकते हुयें ठीक प्रकार से मिल कर एक हो जायें तो इसे उतार कर एक बर्तन में डालकर उस बर्तन में पानी डाल दें जिससें की पानी उस बर्तन में ऊपर ही रहें। ठंडा होने के बाद पानी ऊपर आ जायेगा और जो मिश्रण इसमें डाला था वो जम जायेगा। अब उस पानी को फैंक दें ओर मिश्रण को दाद, खाज और फोड़े-फुंसियो पर लगाने से फायदा होगा |



सुहागा को पीसकर नींबू के रस के साथ मिलाकर लगाने से दाद ठीक हो जाता है।
पीलिया का रोग : 10-10 ग्राम सुहागा भुना, फिटकरी भुनी, शोराकलमी और नौसादर को पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को रोजाना 1-1 ग्राम की मात्रा में भोजन करने के बाद सुबह और शाम पानी से लेने से पीलिया रोग समाप्त हो जाता है।
मिर्गी (अपस्मार) : सुहागे की लावा (खील) 0.24 ग्राम से 0.96 ग्राम शहद के साथ सुबह और शाम को खाने से मिर्गी रोग दूर हो जाता है।
10 प्रतिशत सुहागे की खील के घोल को शुद्ध पानी में मिलाकर किसी नली के द्वारा 2 से 5 मिलीलीटर हफ्ते में 1 बार देने से मिर्गी रोग में बहुत लाभ मिलता है।
गला बैठना : 5 से 10 ग्राम ऊंटकटोर का मूल स्वरस (जड़ का रस) अकेले या सुहागे की खील (लावा) के साथ मिलाकर सुबह और शाम सेवन कराने से स्वरभंग (बैठा हुआ गला) ठीक हो जाता है।
स्वरभंग (गला बैठने पर) होने पर सुहागे की टिकिया चूसते रहने से बैठे हुए गले में जल्दी आराम आता है।
भुना हुआ चौकिया सुहागा और लौंग बराबर मात्रा में लेकर पीस लें और फिर तुलसी के पत्तों के रस में मिलाकर चने के बराबर की गोलियां बनाकर सुबह और शाम 2-2 गोलियां ताजे पानी के साथ खाने से बैठा हुआ गला खुल जाता है।
यदि ज्यादा तेज बोलने के कारण गला बैठ गया हो तो थोड़ा सा कच्चा सुहागा मुंह में रखकर चूसने से आराम आता है।
जिन लोगों का गला ज्यादा जोर से बोलने के कारण बैठ गया हो उन्हे आधा ग्राम कच्चा सुहागा मुंह में रखने और चूसते रहने से स्वरभंग (बैठा हुआ गला) 2 से 3 घंटो में ही खुल जाता है।
जलने पर : 1 ग्राम सफेद सुहागें को 20 ग्राम पानी में मिला लें। इस पानी से शरीर के जले हुए भागों को धोने से घाव बिल्कुल ठीक हो जाता है।
लिंगोद्रेक (चोरदी) : लिंग की उत्तेजना दूर करने के लिए लगभग 240 से 960 मिलीग्राम सुहागे की खीर रोजाना सुबह-शाम खाने से लाभ मिलता है।
डब्बा रोग :10-10 ग्राम अपामार्ग, क्षार, नागरमोथा, अतीस, सुहागा और बड़ी हरड़ को थोड़े पानी में मिलाकर बच्चों को चटाने से डब्बा रोग (पसली चलना) समाप्त हो जाता है।
3 ग्राम भुना हुआ हीरा-कसीस और 3 ग्राम आधा भुना हुआ सुहागा लेकर बकरी के दूध में पीसकर बाजरे के बराबर छोटी-छोटी गोलियां बना लें। इस 1-2 गोली को मां के दूध के साथ बच्चे को देने से पसली चलना रुक जाती है।

    Saturday, December 3, 2016

    छिपकली भगाने के टिप्स

       

     घर की किसी भी दीवार पर छिपकली घूमती है तो हमें दिक्‍कत होती है कि कहीं नीचे न गिर जाएं, खाने में न गिर जाएं आदि। हालांकि, घर में छिपकली के होने से कीड़े-मकोड़े, पंतगी, झिंगुर आदि नहीं रहते है लेकिन छिपकली के शरीर पर गिरने का भय ज्‍यादा बड़ा होता है।
    मार्केट में छिपकली को भगाने वाले कई विषैले लिक्विड आते है, लेकिन ये लिक्विड आपके बच्‍चों या पालतू जानवरों को भी नुकसान पंहुचा सकते है। ऐसे में बेहतर होगा कि छिपकलियों को भगाने के लिए कोई घरेलू उपाय किया जाये। इस आर्टिकल में छिपकलियों को भगाने के कुछ ईको-फ्रैंडली घरेलू उपाय बताएं जा रहे है जो निम्‍म प्रकार है |
    मोरपंख
    छिपकलियों को मोर का पंख देखकर भ्रम हो जाता है कि यहां कहीं सांप है जो उन्‍हे खा जाएगा, इसलिए उसे देखकर वह भाग जाती है। मोरपंख को घर में किसी गुलदस्‍ते आदि में लगाकर रख दें, इससे छिपकलियां भाग जाएगी।
    कॉफी पाउडर
    कॉफी पाउडर को तम्‍बाकू पाउडर के साथ मिला लें और इसकी छोटी-छोटी गोलियां बनाकर वहां-वहां रख दें जहां छिपकलियां आती है। अगर छिपकलियां इस मिश्रण को खा लेगी तो वह मर जाएगी, वरना वह भाग अवश्‍य जाएगी।
    नेफ्थलीन गोलियां-
    नेफ्थलीन की गोलियां, एक अच्‍छी कीटनाशक होती है, इसे वार्डरोब, वॉशवेसिन आदि में डाला जाता है। इसे जहां भी रख देगें, वहां छिपकली नहीं आएगी।
    लहसून-
    एक स्‍प्रे बॉटल लें। इसमें प्‍याज का रस और पानी भर लें। इसमें कुछ बूंद लहसून के रस की मिला लें और अच्‍छे से मिला लें। अब इसे घर के हर कोने में छिड़क दें, जहां-जहां छिपकली सबसे ज्‍यादा आती है वहां भी छिड़क दें। आप चाहें तो लहसून की कली भी रख सकते है, इससे भी छिपकलियां दूर भाग जाती है
    अंडे के छिलके-
    अंडे के छिलके में कोई भी महक नहीं होती है जो छिपकली वो जगह छोड़ दें, लेकिन छिपकली मानसिक रूप से सोचती है कि इस क्षेत्र में कोई और बड़ा जीव आकर रहने लगा है, इसलिए वह उस स्‍थान को छोड़ देती है। अंडे के छिलके को तीन-चार सप्‍ताह में बदलते रहें।
    फेनाइल की गोली
    अक्सर हम कपड़ों को कीड़ों से बचाने के लिए फेनाइल की गोलियों को कपड़ों के बीच में रखते हैं। ठीक इसी तरह से ये फेनाइल की गोलियां छिपकलियों को दूर भगाती हैं। जहां पर आपको छिपकली दिखती हो वहां पर दो गोलियां फेनाइल की रख दें। इसकी गंध छिपकलियों को आपके घर से दूर कर देगी।
    प्‍याज-
    प्‍याज को स्‍लाइस में काटकर उसे धागे में बांधकर लाइट्स आदि के पास लटका दें, इससे वहां आने वाली छिपकली भाग जाएगी। प्‍याज में सल्‍फर ज्‍यादा मात्रा में होता है जिससे बुरी दुर्गंध निकलती है और छिपकली भाग जाती है।




    लाल मिर्च पाउडर
    बेहद तीखी होने की वजह से छिपकलियों को लाल मिर्च का सहना मुश्किल हो जाता है। यदि आप घर के या दरवाजों के कोनों में लाल मिर्च की स्प्रे करते हैं तो इससे जल्द ही छिपकलियां घर से दूर चली जाएंगी।
    आइये जानते हैं कैसे बनाएं लाल मिर्च का स्प्रे :
    आधे गिलास पानी में लाल मिर्च पाउडर एक से दो चम्मच मिलाकर घोल बना लें। और अब आप इसका छिड़काव कर सकते हैं
    बर्फ वाला ठंडा पानी-
    बर्फीले पानी को छिपकली पर स्‍प्रे कर दं, इससे उसको ठंडा लगेगा और वह भाग जाएगी। ऐसा कई दिन तक लगातार करें, ताकि वह घर ही छोड़ दें। पानी डालने के बाद छिपकली गिर जाएं तो उसे डस्‍टबीन में भरकर बाहर फेंक दें।
    पिपर पेस्टीसाइड स्‍प्रे-
    पानी और काली मिर्च के पाउडर को मिला लें और एक पेस्‍टीसाइड तैयार कर लें। इसे अपनी किचेन, कमरों और बाथरूम अदि जगहों पर छिड़क दें। इससे छिपकलियां भाग जाती है क्‍योंकि काली मिर्च की तीखी गंध उन्‍हे अच्‍छी नहीं लगती है।


    Friday, December 2, 2016

    वेरिकोस वेन्स(सूजे हुए नस) के घरेलू उपचार Home Remedies For Varicose Veins spider veins





    क्‍या है वैरिकोज वेन्स ?
    पैर की नसों में मौजूद वाल्‍व, पैरों से रक्त नीचे से ऊपर हृदय की ओर ले जाने में मदद करते है। लेकिन इन वॉल्‍व के खराब होने पर रक्त ऊपर की ओर सही तरीके से नहीं चढ़ पाता और पैरों में ही जमा होता जाता है। इससे पैरों की नसें कमजोर होकर फैलने लगती हैं या फिर मुड़ जाती हैं, इसे वैरिकोज वेन्‍स की समस्‍या कहते हैं। इससे पैरों में दर्द, सूजन, बेचैनी, खुजली, भारीपन, थकान या छाले जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं। आइये जाने इस के आयुर्वेदिक घरेलु नुस्खे-
     जैतून का तेल : –
    जैतून के तेल और विटामिन ई तेल को बराबर मात्रा में मिलाकर उसे थोड़ा सा गर्म कर लें। इस गर्म तेल से नसों की मालिश कई मिनट तक एक से दो महीने के लिए करें।
     लहसुन :-
    छह लहसुन की कली लेकर उसे एक साफ जार में डाल लें। तीन संतरे का रस लेकर उसे जार में मिलाये। फिर इसमें जैतून के तेल मिलायें। इस मिश्रण को 12 घंटे के लिए रख दें। फिर इस मिश्रण से कुछ बूंदों को हाथों पर लेकर 15 मिनट के लिए सूजन वाली नसों पर मालिश करें। इस पर सूती कपड़ा लपेट कर रातभर के लिए छोड़ दें। इस उपाय को कुछ महीनों के लिए नियमित रूप से करे |
    सेब साइडर सिरका :-
    सेब साइडर सिरका वैरिकोज वेन्‍स के लिए एक अद्भुत उपचार है। यह शरीर की सफाई करने वाला प्राकृतिक उत्‍पाद है और रक्त प्रवाह और रक्‍त परिसंचरण में सुधार करने में मदद करता है। समस्‍या होने पर सेब साइडर सिरके को लगाकर उस हिस्‍से की मालिश करें। इस उपाय को नियमित रूप से रात को बिस्‍तर पर जाने से पहले और अगले सुबह फिर से करें। कुछ दिन ऐसा करने से कुछ ही महीनों में वैरिकोज वेन्‍स का आकार कम होने लगता है। या फिर एक गिलास पानी में दो चम्‍मच सेब साइडर सिरके को मिलाकर पीये। अच्‍छे परिणाम पाने के लिए इस मिश्रण का एक महीने में दिन में दो बार सेवन करें।
     बुचर ब्रूम :-




    बुचर ब्रूम वैरिकोज वेन्‍स की असुविधा से राहत देने में बहुत ही उपयोगी होता है। इस जड़ी बूटी में रुसोगेनिन्स नामक गुण सूजन को कम करने में मदद करता है और एंटी-इफ्लेमेंटरी और एंटी-इलास्‍टेज गुण नसों की बाधा को कम करता है। यह पोषक तत्‍वों को मजबूत बनाने और नसों की सूजन को कम करने के साथ ही पैरों के रक्‍त प्रवाह में सुधार करने में मदद करते हैं। लेकिन उच्‍च रक्तचाप वाले लोग इस जड़ी-बूटी के सेवन से पहले चिकित्‍सक से परामर्श अवश्‍य ले लें।
     अखरोट : –
    अखरोट के तेल में एक साफ कपड़े को डूबाकर प्रभावित क्षेत्र पर लगाये। ऐसा एक या दो महीने के लिए दिन में दो से तीन बार करें।
    अजमोद :- (अजवायन)
    एक मुठ्ठी ताजा अजमोद की एक मुठ्ठी लेकर उसे एक कप पानी में पांच मिनट के लिए उबाल लें। फिर इसे मिश्रण को ठंडा होने के लिए रख दें। फिर इस मिश्रण में गुलाब और गेंदे की तेल की एक-एक बूंद मिला लें। अब इस मिश्रण को कुछ देर के लिए फ्रिज में रख दें। इस मिश्रण को कॉटन पर लगाकर प्रभावित क्षेत्र पर लगायें। अच्‍छे परिणाम पाने के लिए इस उपाय को कुछ महीनों तक करें।
     लाल शिमला मिर्च :-
    लाल शिमला मिर्च को वैरिकोज वेन्‍स के इलाज लिए एक चमत्‍कार की तरह माना जाता है। विटामिन सी और बायोफ्लेवोनॉयड्स का समृद्ध स्रोत होने के कारण यह रक्त परिसंचरण को बढ़ाने और संकुलित और सूजी हुई नसों के दर्द को आसान बनाता है। गर्म पानी में एक चम्‍मच लाल शिमला मिर्च के पाउडर को मिलाकर, इस मिश्रण का एक से दो महीने के लिए दिन में तीन बार सेवन करें।
     अर्जुन की छाल :





    अर्जुन की छाल वेरीकोस वेन्स के लिए बहुत बढ़िया दवा हैं, अगर आप इस समस्या से परेशान हैं तो आप रात को सोते समय गाय के दूध में या साधारण पानी में अर्जुन की चाल को चाय की तरह उबाले और आधा रहने पर इसको छान कर पी ले।
    ये सब प्रयोग आपको एक दिन में आराम नहीं देंगे, मगर 4 से 6 महीने में चमत्कारिक परिणाम मिलेंगे।
    वेरीकोस वेन्स में महत्वपूर्ण.
    अगर शारीर में रक्त परिसंचरण सही रूप से हो तो यह अनेक समस्याएँ उत्पन्न नहीं होती, इसके लिए हर रोज़ सुबह शौच जाने के बाद 10 मिनट आँखे बंद करके शीर्षासन या सर्वांगासन करें… समस्या चाहे जितनी भी भयंकर हो उसमे आराम आएगा

    अगर आप इस बिमारी का शिकार हो चुके हो तो घबराने की बात नहीं है | हम आपको एक ऐसा घरेलू नुस्खा बताएंगे जिससे आपके नसों तथा varicose veins की समस्या दूर हो जायेगी सिर्फ कुछ ही दिनों में |
    सामग्री- 

    1 गिलास भेड का दूध
    नहाने का साबुन आधा टुकड़ा
    विधि :-
    पहले दूध में साबुन को पीस कर डाल दें और इस मिश्रण को प्लास्टिक कंटेनर में डाल कर फ्रिज में स्टोर करके रखें |
    इस मिश्रण को दिन में तीन बार प्रभावित जगह पर रगड़ने से बहुत जल्द अच्छे नतीजे सामने आयगे |