Saturday, April 29, 2017

बुखार के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार



  शरीर का एक सामान्य तापक्रम होता है, जिससे ताप बढ़े तो ज्वर का होना कहा जाता है।ज्वर के प्रभाव से शरीर बिना परिश्रम किए ही कमजोर हो जाता है। बेहोशी-सी छाई रहती है और भोजन में अरुचि हो जाती है।   बुखार संक्रमण के खिलाफ शरीर की एक सुरक्षात्मक प्रक्रिया का हिस्सा है | सामान्यत: मानव शरीर का तापमान 37° सेल्सियस या 98.6° फारेनहाइट होता है | बुखार खुद कोई बीमारी नहीं है बल्कि एक लक्षण है जो यह दर्शाती है कि शरीर किसी संक्रमण (infection) से ग्रस्त है | दूसरे शब्दों में यह रोग प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा किसी सक्रमण से लड़ने का लक्षण है | हालांकि बुखार खुद कोई बीमारी नहीं है लेकिन यदि तापमान 40° सेल्सियस या 104° फारेनहाइट से ज्यादा हो जाये तो यह काफी खतरनाक हो सकता है | 
   आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार अधिकांश बुखार बैक्टीरियल या वायरल इन्फेक्शन्स यानी संक्रमण होने पर होते हैं, जैसे टायफाइड, टांसिलाइटिस, इन्फुएन्जा या मीजल्स आदि बुखार हैं। वैसे बिना संक्रमण के भी बुखार होता है, जैसे जलीयांश की कमी या थायरोटाक्सीकोसिस, मायोकार्डियल इन्फार्कशन और लिम्फोमा आदि।  
बुखार ठीक  करने के कुछ घरेलू नुस्खे नीचे लिख देता हूँ-
ठन्डे पानी से स्नान करें:
 बुखार होने पर ठन्डे पानी का स्नान करने से काफी राहत मिलती है, और यह बुखार को ठीक करने बहुत मददगार होता है | स्नान करने के लिए बाल्टी, फब्बारा (शॉवर) या टब कोई भी तरीका बुखार में लाभकारी होता है |
ठन्डे पानी से स्नान करें: बुखार होने पर ठन्डे पानी का स्नान करने से काफी राहत मिलती है, और यह बुखार को ठीक करने बहुत मददगार होता है | स्नान करने के लिए बाल्टी, फब्बारा (शॉवर) या टब कोई भी तरीका बुखार में लाभकारी होता है |
भीगे कपड़े से पोछना: 
अगर बुखार में स्नान करना अच्छा नहीं लगता तो भीगे कपड़े से बदन को पोछा जा सकता है | इसके लिए किसी साफ़ कपड़े या तौलिया को लेकर उसे ठन्डे पानी से गीला करके निचोड़ लें फिर उससे बदन पोछें और ऐसा कई बार करें | ऐसा करने से शरीर का तापमान कम करने में काफी मदद मिलती है | भीगे कपड़े की पट्टी माथे पर रखना भी बुखार में फायदा पहुंचाता है 
ठन्डे कमरे में रहे: 
बुखार से राहत पाने के लिए यह भी आवश्यक है कि आप जिस कमरे या घर में हों वो ठंडा हो | इसके लिए आप पंखा चला लें | घर ठंडा रखने से अच्छा महसूस होता है और इससे शरीर को भी ठंडा रखने में मदद मिलती है |
ज्यादा कपड़े न पहने: 
अक्सर ऐसा देखा गया है कि बुखार आने पर मोटे-मोटे कपडे पहन लिए जाते हैं जो बुखार में फायदे की जगह नुकसानदायक है | ऐसा करने से शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती और बुखार जल्दी ठीक नहीं होता | इसलिए इस समय हल्के कपड़े पहने जिससे शरीर को ठंडक पहुंचे और बुखार जल्दी ठीक हो सके | यदि कभी ठण्ड या कंपकंपी लगे तो उस समय कम्बल या मोटी चादर ओढ़ लेना ठीक रहता है | जब ठण्ड या कंपकंपी न लगे तो कम्बल या मोटी चादर हटा दें, और सोते समय एक चादर ओढ़कर सोयें 
अपनी नाक साफ़ रखें: 
अगर नाक साफ़ न हो तो गले में भी खराश पैदा होने की संभावना बनी रहती है जो आपकी तकलीफ को और बढ़ा सकती है | इसलिए इसका विशेष ध्यान रखें और अपने पास कुछ टिश्यू पेपर ज़रूर रखें
ज्यादा कपड़े न पहने: 
अक्सर ऐसा देखा गया है कि बुखार आने पर मोटे-मोटे कपडे पहन लिए जाते हैं जो बुखार में फायदे की जगह नुकसानदायक है | ऐसा करने से शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती और बुखार जल्दी ठीक नहीं होता | इसलिए इस समय हल्के कपड़े पहने जिससे शरीर को ठंडक पहुंचे और बुखार जल्दी ठीक हो सके | यदि कभी ठण्ड या कंपकंपी लगे तो उस समय कम्बल या मोटी चादर ओढ़ लेना ठीक रहता है | जब ठण्ड या कंपकंपी न लगे तो कम्बल या मोटी चादर हटा दें, और सोते समय एक चादर ओढ़कर सोयें 
भीगे कपड़े से पोछना: 
अगर बुखार में स्नान करना अच्छा नहीं लगता तो भीगे कपड़े से बदन को पोछा जा सकता है | इसके लिए किसी साफ़ कपड़े या तौलिया को लेकर उसे ठन्डे पानी से गीला करके निचोड़ लें फिर उससे बदन पोछें और ऐसा कई बार करें | ऐसा करने से शरीर का तापमान कम करने में काफी मदद मिलती है | भीगे कपड़े की पट्टी माथे पर रखना भी बुखार में फायदा पहुंचाता है |
तरल भोजन करें:
 फलों में एंटीऑक्सीडेन्ट्स अच्छी मात्रा में होते हैं इसलिए फलों का खूब सेवन करें | गरिष्ठ खाने से परहेज़ करें और हल्का-फुल्का खाएं जो आसानी से पच जाए | ऐसा करना बुखार से लड़ने में काफी मददगार साबित होता हैशरीर को आराम दें: 
ध्यान रखें कि बुखार का मतलब है कि आप का शरीर किसी बीमारी से लड़ रहा है और ऐसे में आपके शरीर को काफी ऊर्जा की ज़रुरत होती है | इसलिए अपने शरीर को आराम दें और खूब सोयें | बेवज़ह इधर-उधर घूमना फिरना छोड़ कर और अगर आवश्यक हो तो छुट्टी लेकर आराम करें |
ठन्डे कमरे में रहे: 
बुखार से राहत पाने के लिए यह भी आवश्यक है कि आप जिस कमरे या घर में हों वो ठंडा हो | इसके लिए आप पंखा चला लें | घर ठंडा रखने से अच्छा महसूस होता है और इससे शरीर को भी ठंडा रखने में मदद मिलती है |
घर में रहें: 
घर के अन्दर का तापमान प्रायः स्थिर ही होता है जो शरीर को अपना तापमान स्थिर रखने में मदद करता है | इसलिए जहां तक हो सके घर में रहें और अगर बाहर जाना ही पड़े तो छाँव में रहें और शारीरिक गतिविधियाँ कम-से-कम रखें
खूब पानी पियें: 
बीमारी से लड़ने के लिए शरीर को आराम और हल्के-फुल्के खान-पान के साथ-साथ खूब पानी पीने की भी ज़रुरत होती है | इसलिए दिन में कई बार पानी, फलों का रस सूप या दाल का पानी (ख़ासतौर पर मूँग दाल का पानी) लेना फायदेमंद होता है |
ठंडक देने वाले पदार्थों का इस्तेमाल करें: अपने शरीर को बाहर से ठंडा करने के साथ-साथ उसे अन्दर से भी ठंडक पहुँचाना तापमान को कम कर बुखार में राहत देता है | दही, फल एवं फलों का रस बहुत लाभकारी होता है | कभी-कभी बर्फ की चुस्की भी फायदा पहुंचाती है |
हर्बल चाय बना कर पियें: 
आपके रसोई या बागीचे में उपलब्ध जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल न सिर्फ खाना बनाने बल्कि आपके बुखार को कम करने में भी होता है जैसे पुदीना, अदरक, शहद, निम्बू, तुलसी, बड़ी का फूल, मीठी पत्ती, दालचीनी, मुलेठी और ऐसी कई और | इनमे से कोई एक या अगर आप चाहें तो कुछेक को मिलाकर किसी बर्तन में उबाल लेवें और उसके बाद उसमे शहद मिला दें | ठंडा होने के बाद दिन में कई बार पियें
किशमिश का जूस भी बना सकते हैं:
 इसको बनाने का तरीका थोडा अलग है | इसे बनाने के लिए तीन चौथाई कप (115 ग्राम) किशमिश को साढ़े सात कप (1.75 लीटर) पानी में मिलकर उबाल लेवें फिर ठंडा होने दें के बाद छान लेवें | इस जूस को दिन में 5-6 बार पियें
सेब का पानी बनाकर पियें: एक मध्यम आकार के सेब को डेढ़ कप पानी (350 मि.ली.) में तब तक उबालें जब तक सेब मुलायम न हो जाये | इसके बाद घोल को छान ले और स्वादानुसार शहद मिलाकर पियें |
तुलसी की चाय पियें | 
इसे बनाने के लिए एक छोटा चम्मच तुलसी और 3-4 दाने काली मिर्च का पाउडर डेढ़ कप पानी में मिलाकर पांच मिनट तक उबालें | इसके बाद घोल को एक कप में छानकर पियें
बुखार कम करने के लिए दवा लें: 
ऐसी कई दवाएं है जो बुखार में राहत पहुंचाती हैं जैसे: पैरासिटामॅाल, आइबुप्रोफेन, एस्पिरिन इत्यादि | ये दवाएं किसी भी मेडिकल स्टोर पर आसानी से उपलब्ध होती हैं और बुखार कम करने में मददगार होती हैं
अदरक, तुलसी का काढ़ा पिए: 
इसे बनाने के लिए अदरक का एक चम्मच कुटी हुई अदरक, एक चम्मच तुलसी, 3-4 काली मिर्च के दाने और स्वादानुसार शहद या चीनी को डेढ़ कप पानी में मिलाकर कुछ देर उबालें फिर उसे छान लेवें | इसे गरम रहते ही धीरे-धीरे पिए | इस काढ़े से बंद नाक और गले की खराश के साथ-साथ बुखार में भी आराम मिलेगा
लहसुन का पानी पियें:
 इसे बनाने के लिए एक कच्चे लहसुन को एक कप पानी (225 मि.ली.) में मिलाकर उबाल लेवें फिर उसे छानकर धीरे-धीरे पियें | यह बुखार दुबारा होने से बचाता है और बुखार के लक्षणों से भी आराम दिलाता हैसूती कपडा या तौलिया भिगोकर माथे पर रखे और आराम करें |
*कुछ रोगी डरतें हैं कि कहीं बुखार से दिमाग पर असर न हो | यदि तापमान 106° फारेनहाइट या 41° सेल्सियस से नीचे रखा जाए तो सामान्यतौर पर दिमाग पर असर नहीं होता | वैसे अगर बुखार 104° फारेनहाइट या 40° सेल्सियस से ज्यादा है तो खतरनाक माना जाता है 
परामर्श-
*यदि आपको बुखार है तो कसरत न करें |
*अगर बुखार 104° फारेनहाइट या 40° सेल्सियस से ज्यादा है तो डॉक्टर से सलाह लें |
अपनी नाक साफ़ रखें |
*यदि तापमान 106° फारेनहाइट या 41° सेल्सियस से ऊपर है तो दिमाग पर असर हो सकता है |
पथ्य : मूँग की दाल और दाल का पानी, परवल, लौकी, अनार, मौसम्बी का रस, दूध, पपीता आदि हल्के पदार्थों का सेवन करना चाहिए।
अपथ्य : भारी अन्न, तेज मिर्च-मसालेदार, तले हुए पदार्थ, खटाई, अधिक परिश्रम, ठण्डे
पानी से स्नान, मैथुन, ठण्डा कच्चा पानी पीना, हवा में घूमना और क्रोध करना यह सब वर्जित है।

Thursday, April 27, 2017

बेहोश होने के कारण और उपचार


मनुष्य की समस्त शारीरिक और मानसिक गतिविधियाँ उसकी चैतन्यता के कारण होती हैं। यदि व्यक्ति अचेत हो जाए तो उसकी सारी गतिविधियाँ ठप हो जाती हैं। मनुष्य की चैतन्यता के तार उसके दिमाग से जुड़े होते हैं। जब उसका मस्तिष्क निष्क्रिय हो जाता है तो व्यक्ति बेहोश हो जाता है। आखिर यह स्थिति क्यों बनती है और क्या है इसका उपचार, आइए देखते हैं-
लक्षण पहचानें
इससे पहले की आपको पूरी तरह चक्कर आए, आपको ऐसा महसूस होगा जैसे रोशनी कम हो रही है, शरीर हल्का हो रहा है और आस पास की ध्वनियां कम और ज्यादा महसूस होना शुरू हो जाती हैं। अगर आप इनमें से कोई भी लक्षण महसूस करते हैं तो जितने जल्दी हो सके नीचे बैठ जायें जिससे आप अपने आप को चोटिल होने से बचा सकें।
*कुछ लोगों को चक्कर आने से पहले आँखों के आगे अँधेरा छा जाता है, रंग धुंधले दिखने लगते हैं, और मितली जैसा अनुभव होने लगता है । कुछ लोगों को अपनी नज़र एवं सुनने की क्षमता मैं अंतर भी समझ मैं आता है ।

तुरंत लेट जाएँ: बेहोश होने पर सबसे ज्यादा डर गिरने पर चोटिल होने का रहता है, सामान्यतः यह ज्यादा गंभीर नहीं होता बशर्ते यह किसी बड़ी घटना के कारण न हो । । बेहोशी जैसी लगने पर अपने पैर थोड़े ऊपर (तकिये का इस्तेमाल कर सकते हैं) की ओर करके लेटें जिससे आपके पैर, हृदय की तुलना में थोड़े ऊपर हों । यह पोजीशन आपके हृदय और दिमाग की तरफ रक्त संचार बढाती है जिसकी आपको उस वक़्त जरूरत है ।
याद रखें की लेटी हुई अवस्था में भी आप बेहोश हो सकते हैं, और इस अवस्था में आप चोटिल होने से बच सकते हैं ।
*अगर किसी वजह से लेटना संभव न हो पाए तो अपना सिर घुटनों के बीच में करें जिससे दिमाग में रक्त संचार बड़ सके । ऐसा करने से आपको कुछ वक़्त मिल सकता है जिसमें आप अपनी मदद के लिए अपने आसपास के लोगों को बुला सकते हैं और खुली हवादार जगह पर ले जाने के लिए कह सकते हैं ।
अगर संभव हो तो किसी से कहिये की आप बेहोश होने वाले हैं : अचानक से बेहोश हो जाना कभी कभी सचमुच खतरनाक हो सकता है, इसलिए बेहतर यही है कि ऐसा होने से पहले किसी की मदद ले लें । जैसे ही थोड़े बहुत लक्षण महसूस होना शुरू हों, उन्हें समझें और अपने आसपास के लोगों को मदद के लिए कहैं फिर चाहे वो कोई अज़नबी ही क्यों न हो ।
*भीड़ भरे एरिया मैं अपने आप को सम्हालना थोड़ा मुश्किल हो जाता है । इस स्थिति में सबसे पहले उस क्षेत्र से बाहर निकलें । लेकिन ज्यादा दूर नहीं जाएँ क्योंकि आपको किसी की मदद की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन दूसरी तरफ, आप नहीं चाहेंगे कि जब आप बेहोश हों या नीचे गिरें तो चारों तरफ लोग आपको घेरकर खड़े हों जायें । अगर संभव हो तो चक्कर जैसा महसूस होने पर लोगों को थोड़ा दूर होने को कहें, ऐसा करने पर वे न केवल आपको जगह देंगे बल्कि आपको चक्कर आने पर संभाल भी सकते हैं जिससे आप आगे होने वाली चोट को टाल सकते हैं ।
*अगर बेहोश होने की स्थिति को टाल नहीं सकते तो दीवाल का सहारा लें: अगर ऐसी स्थिति बनती है जहाँ आपको कोई सँभालने वाला न हो और आपको लगने लगा हो कि आप खड़े खड़े बेहोश हो जाएंगे तो दीवाल का सहारा ढूंढने की कोशिश करें । ऐसा करने से कम से कम आप अपने आप को घायल होने से बचा पाएंगे ।
या, फिर कुछ मुलायम चीज़ अपने आस पास देखें जिससे गिरने पर चोट न लगे ।
अगर आप सीढ़ियों पर बीच मैं है तो अंदर की तरफ से रेलिंग पकड़ने की कोशिश करें: ऐसा करने से आप अपना बैलेंस बना पाएंगे और उसे पकड़कर धीरे धीरे ऊपर या नीचे भी जा सकते हैं ।
लेकिन, आप जहाँ कहीं भी हैं (सीढ़ी पर या कहीं और ), जल्द से जल्द सतह पर आने की कोशिश करें ।

मनोवैज्ञानिक कारण
मनुष्य में किसी चीज का डर भी बेहोशी का कारण हो सकता है, जैसे अपने सामने कोई भयानक दुर्घटना होते देखना उसकी बेहोशी का कारण बन सकता है। कई बार किसी डरावनी चीज को देखकर भी व्यक्ति बेहोशी की स्थिति में पहुँच जाता है। किसी दुखद समाचार या सदमे की वजह से भी बेहोशी हो सकती है। ऐसा प्रायः तब होता है, जब किसी प्रियजन की आकस्मिक मौत हो जाए है यदि यह दुर्घटना नजरों के सामने हुई हो तो व्यक्ति अपने होश खो देता है। ये सभी मनोवैज्ञानिक कारण हैं।



*भोजन मनुष्य की मूल आवश्यकता है। इससे शरीर क्रियाशील रहता है। लेकिन जो लोग लंबे व्रत उपवास करते हैं या समय पर भोजन नहीं लेते, वे भी बेहोशी का शिकार बन सकते हैं। मधुमेह के रोगी यदि अधिक समय तक भूखे रहें तो उनकी रक्त शर्करा का स्तर काफी गिर जाता है और वे बेहोश हो सकते हैं। तेज धूप में अधिक देर तक खड़े रहने से भी व्यक्ति बेहोश हो सकता है। यह बेहोशी स्कूली बच्चों में अधिक देखी गई है, जबकि किसी रैली या नेता के भाषण की वजह से उन्हें तेज धूप में घंटों खड़ा रहना पड़ता है, वहीं सिर पर लगी चोट बेहोशी का एक बड़ा कारण है। इसके अलावा जब किसी भी वजह से मस्तिष्क में रक्त पहुँचने में बाधा आ जाती है तो वह काम करना बंद देता है, जिससे व्यक्ति चेतना खो देता है। मस्तिष्क के अंदर रक्त का अभाव होना ही बेहोशी का मूल कारण है।
शारीरिक कारण
चिकित्सा शास्त्र की दृष्टि से व्यक्ति के बेहोश होने के कारण कुछ भिन्न हैं। इसके अनुसार जब किसी वजह से शरीर में निर्जलीकरण की स्थिति हो जाए, जिसे डिहाइड्रेशन कहते हैं तो व्यक्ति बेहोश हो सकता है। इसमें उल्टी-दस्त होना या लू लगना भी शामिल है। जब शरीर में पानी और खनिज लवणों का क्षरण गंभीर रूप से हो जाता है तो व्यक्ति बेहोशी की हालत में आ जाता है। साथ ही शुद्ध वायु का न मिलना भी बेहोशी का एक कारण हो सकता है, क्योंकि इससे व्यक्ति का दम घुट सकता है। ऐसा प्रायः बंद कमरे में रहने की वजह से होता है, जहाँ खिड़कियाँ, रोशनदान, दरवाजे सभी पूरी तरह से बंदहों। फिर अत्यधिक थकान की वजह से भी व्यक्ति बेहोश हो सकता है।
    कुछ लोग हिस्टीरिया की बीमारी से ग्रस्त रहते हैं। कभी भी उन्हें दौरा पड़ जाता है जिससे वे अपना होश खो बैठते हैं। मिरगी के दौरे की वजह से भी व्यक्ति कुछ समय तक बेहोशी की स्थिति में पहुँच जाता है। हालाँकि यह बेहोशी अल्पकाल की होती है। कई बार ब्रेन ट्यूमर की वजह से भी व्यक्ति को बेहोशी का सामना करना पड़ता है। दिमाग में आई सूजन भी बेहोशी का कारण बन सकती है। इसके अलावा मस्तिष्क में आई किसी तरह की अन्य विकृति भी इसका कारण बन सकती है। जब किसी व्यक्ति का रक्तचाप तेजी से गिर जाए और वह खतरनाक स्तर पर आ जाए तो भी व्यक्ति बेहोश हो जाता है।
बेहोशी की स्थिति से कैसे बचें
यदि आपको लगता है कि आप बेहोश होने वाले हैं तो खड़े रहने की बजाय तुरंत जमीन पर लेट जाएँ। अपने सिर को नीचा करके टाँगों को थोड़ा ऊपर उठाएँ। इससे मस्तिष्क की ओर रक्त प्रवाह बढ़ जाएगा तथा बेहोशी रुक जाएगी। यदि फिर भी बेहोशी आ गई तो जमीन पर लेटे रहने से आप चोट लगने से बच जाएँगे।
बेहोशी का प्राथमिक उपचार
यदि कोई व्यक्ति बेहोश हो गया है तो सबसे पहले उसके कपड़े ढीले कर दें ताकि उसके फेफड़ों को ऑक्सीजन लेने की पर्याप्त जगह मिल सके। उसे साँस लेने में परेशानी हो रही हो तो उसे सीधा लिटाकर उसके दोनों ओर घुटने रखकर झुक जाएँ। रोगी की नाभि पर अपना एक हाथ रखें तथा अपना दूसरा हाथ उसके हाथ पर रखें। हथेली के निचले भाग से व्यक्ति की नाभि के ऊपर की ओर तीन से पाँच बार जोर लगाएँ। यदि इससे भी कोई लाभ न हो तो रोगी को करवट दिलाकर उसके कंधों के बीच कई बार हल्के से हाथ मारें। यदि कोई व्यक्ति लू की चपेट में आकर बेहोश हो गया है तो उसे तुरंत ठंडे स्थान पर ले जाएँ तथा संभव हो तो कूलर या एसी चला दें तथा अतिरिक्त कपड़े उतार दें। उसकी साँस गति एवं नब्ज जाँचें। जरूरी हो तो कृत्रिम साँस दें।



यदि बिजली का करंट लगने से व्यक्ति बेहोश हो गया है तो होश में लाने का प्रयास करें। उसे तुरंत कृत्रिम साँस देने का प्रयास करें। यदि कोई व्यक्ति अचानक बेहोश हो गया है तो उसके चेहरे पर ठंडे पानी के छींटें मारें और उसे हिलाएँ।
नीम बेहोशी
अल्पकालीन बेहोशी को सामान्य बेहोशी कहा जाता है, जो कुछ मिनटों या घंटों में ठीक हो जाती है तथा व्यक्ति की चेतना लौट आती है, लेकिन कई बार किसी दुर्घटना, दिमागी चोट या ब्रेन हेमरेज की वजह से व्यक्ति नीम बेहोशी, जिसे कोमा कहते हैं, में चला जाता है। यह स्थिति कुछ दिनों से लेकर कई वर्षों तक की हो सकती है। कई बार इसी स्थिति में उसकी मृत्यु भी हो जाती है।
बेहोशी के घरेलू उपचार
कायफल
कायफल हिमालय पर्वत पर उत्पन्न होने वाली एक विशेष औषधि हैं. जिसका प्रयोग कर आप बेहोश व्यक्ति की बेहोशी को दूर कर सकते हैं. बेहोशी को दूर करने के लिए एक कायफल लें और उसे पीस लें. अब इस चुर्ण को अपनी उंगली पर रखें और बेहोश व्यक्ति की नाक के पास लेजाकर फूंक मारें. कायफल के चुर्ण को फूंकने से व्यक्ति को छींक आएगी तथा बेहोश व्यक्ति की बेहोशी दूर हो जायेगी
हिस्टीरिया रोग से ग्रस्त महिला की बेहोशी को दूर करने के लिए कुछ प्याज लें और उन्हें छीलकर उसका रस निकाल लें. अब इस रस को बेहोश महिला को सुन्घायें. प्याज के रस को सुंघाने के बाद महिला की बेहोशी तुरंत ही गायब हो जायेगी.
समान्य बेहोशी की अवस्था की भांति ही आप हिस्टीरिया रोग से पीड़ित महिला की बेहोशी को दूर करने के लिए पुदीने के पत्तों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
तुलसी के पत्ते तथा नमक
* बेहोश व्यक्ति की बेहोशी दूर करने के लिए कुछ तुलसी के पत्ते लें और थोडा नमक लें.
* अब तुलसी के पत्तों को धोने के बाद अच्छी तरह से पीस लें और इसका रस निकाल लें. अब तुलसी के पत्तों के रस में थोडा नमक मिलाएं. अब इस रस की दो – दो बुंदें बेहोश व्यक्ति की नाक में डालें.



तुलसी के पत्तों के रस में नमक मिलाकर डालने से व्यक्ति की बेहोशी बिल्कुल खत्म हो जायेगी. बेहोशी को दूर भगाने के लिए आप तुलसी के रस का ही एक और तरीके से इस्तेमाल कर सकते हैं. इस उपाय को अपनाने के लिए तुलसी के पत्तों के रस से आराम – आराम से व्यक्ति के माथे पर मालिश करें तथा मालिश करने के बाद तुलसी के पत्तों के रस की 2 या 4 बूंदों को बेहोश पड़े व्यक्ति की नाक में डाल दें. इस उपाय को करने से व्यक्ति को बेहोशी की हालत से उठने के बाद किसी प्रकार की शारीरिक कमजोरी भी महसूस नहीं होगी.
पुदीना
बेहोशी को दूर भगाने का एक बहुत ही सरल और आसान उपाय पुदीने का प्रयोग करना हैं. आप बेहोश व्यक्ति को पुदीने की पत्तियों की खुशबु भी सुंघा सकते हैं. पुदीना की सुगंध से व्यक्ति की मूर्छा बिल्कुल खत्म हो जायेगी.
प्याज का रस
अगर कोई महिला या लड़की हिस्टीरिया रोग के जैसे मानसिक रोग से पीड़ित हैं और इस रोग के कारण ही वह बेहोश हो जाती हैं. तो इस रोग से तथा बेहोशी से मुक्ति पाने के लिए वह प्याज के रस का इस्तेमाल कर सकती हैं.
घी और सरसों का तेल
यदि कोई महिला गर्भवती हैं और उसे अचानक ही चोट लग जाती हैं और उसके घाव से अधिक खून बह रहा तो खून का बहाव अत्यधिक तेज होने के कारण महिला बेहोश हो जाती हैं. जिससे उसकी आँखें पलट जाती हैं और उनके गले से कफ के कारण गडगडाहट की आवाज आती हैं और वह बेहोश हो जाती हैं.ऐसे समय में आप गर्भवती महिला को बेहोशी की स्थिति से बाहर लाने के लिए घी और सरसों के तेल का प्रयोग कर सकते हैं. यदि गर्भवती महिला बेहोश हो जाती हैं तो पहले उसके शरीर की सरसों के तेल से मालिश करें और जब उसकी बेहोशी दूर हो जाए तो उसे घी पिलायें.
अदरक और मिश्री
1. बेहोशी को दूर करने के लिए अदरक लें और उसे पीसकर उसका रस निकाल लें.
2. अब कुछ मिश्री के दाने लेकर पीस लें.
3. इसके बाद अदरक के रस में पीसी हुई मिश्री मिला दें.
4. अब एक कप ठंडा पानी लें और उसमें अदरक के रस को मिला लें.


सांस फूलने के प्रभावी घरेलू उपचार

    

अक्‍सर ऐसा होता है कि बिना किसी बीमारी के भी काम करते हुए सांस फूलने लगती है या सीढ़ियां चढ़ने से सांस फूल जाती है। कई लोग सोचते हैं कि मोटे लोगों की सांस जल्दी फूलती है, लेकिन ऐसा नहीं है। कई बार पतले लोगों की सांस भी थोड़ा चलने पर ही फूलने लगती है। दिल्ली जैसे शहर में जहां हर तरह का प्रदूषण है, सांस फूलने की समस्या गंभीर रूप ले चुकी है।फेफड़ों से संबंधित प्रणाली को प्रभावित करने वाली स्थितियों के कारण भी सांस की समस्या होती है। वहीं फेफड़ों और ब्रोंकाइल ट्यूब्स में सूजन होना सांस फूलने के आम कारण होते हैं।
सांस फूलना या सांस ठीक से न ले पाना
सांस फूलना या सांस ठीक से न ले पाना एलर्जी, संक्रमण, सूजन, चोट या मेटाबोलिक स्थितियों की वजह से हो सकता है। अकसर सांस तब फूलती है जब मस्तिष्क के संकेत फेफड़ों को सांस की रफ्तार बढ़ाने का निर्देश देते हैं। फेफड़ों से संबंधित प्रणाली को प्रभावित करने वाली स्थितियों के कारण भी सांस की समस्या होती है। वहीं फेफड़ों और ब्रोंकाइल ट्यूब्स में सूजन होना सांस फूलने के आम कारण होते हैं। इसी तरह सिगरेट पीने या अन्य टॉक्सिंस के कारण श्वसन क्षेत्र (रेस्पिरेट्री ट्रैक) में लगी चोट की वजह से भी सांस लेने में दिक्कत पैदा हो सकती है। वहीं दिल की बीमारियों या खून में ऑक्सीजन का स्तर कम होने के कारण भी सांस फूलती है।
तुलसी का रस
बेहद गुणकारी तुलसी सांस फूलने की समस्या में भी बेहद लाभदायक होती है। तुलसी का रस और शहद चाटने से अस्‍थमा रोगियों को व सांस फूलने की समस्या वाले लोगों को आराम मिलता है। इससे सांस की बंद नलियां तुरंत ही खुल जाती हैं।
शहद



शहद एक बेहद आम घरेलू उपचार है, जो अस्‍थमा के इलाज के लिये भी प्रयोग किया जाता है। अस्‍थमा अटैक आने पर शहद वाले पानी से भाप लेने से पर जल्द ही समस्या से राहत मिलती है। इसके अलावा दिन में तीन बार एक ग्‍लास पानी के साथ शहद मिला कर पीने से बीमारी भ ी आराम मिलता है। शहद बलगम को भी ठीक करता है, जो अस्‍थमा व सांस की परेशानी पैदा करता है।
कॉफी है लाभदायक 
अगर आपको अस्थमा का अटैक आया है तो आप तुरंत गरम कॉफी पी सकते हैं। यह श्वांस नलिकाओं में रूकी हुई हवा को तुरंत ही खोल देगी। अगर कॉफी नहीं पी सकते तो कॉफी की महक सूंघने से भी लाभ होता है।
गरम जगह में जाएं
ठंडी जगह में सांस फूले तो गरम जगह पर चले जाएं, जहां पर ऐसी या कूलर न हो। इसके अलावा अगर गरम शॉवर ले सकते हैं तो भी आपको राहत मिलती है। साथ ही जब भी आपकी सांस फूलने लगे तो भींड भाड़ और धूल भरी जगह छोड़ दें और किसी खुली जगह पर चले जाएं।
यूकेलिप्‍टस तेल



यदि सांस फूलने की समस्या है को घर में यूकेलिप्‍टस का तेल जरूर रखें। जब कभी सांस फूले तो यूकेलिप्‍टस का तेल सूंघ लें, इसको सूंघने से आपको तुरंत फायदा होगा और समस्या धीरे-धीरे ठीक होने लगेगी। अम्ल बनाने वाले पदार्थ न लें
सांस फूलने की समस्या होने पर आहार में कार्बोहाइड्रेट चिकनाई एवं प्रोटीन जैसे एसिड बनाने वाले पदार्थ सीमित मात्रा में लें और ताज़े फल, हरी सब्जियां तथा अंकुरित चने जैसे क्षारीय खाद्य पदार्थों का भरपूर मात्रा में सेवन करें।
दमा होता है बड़ा कारण



श्वास नलिकाएं फेफड़े से हवा को अंदर व बाहर करती हैं। दमा होने पर इन नलिकाओं के अंदर की दीवार में सूजन हो जाती है। यह सूजन नलिकाओं को बेहद संवेदनशील बना देता है और किसी भी संवेदनशील चीज के स्पर्श से यह तीखी प्रतिक्रिया करता है। जब नलिकाएं प्रतिक्रिया करती हैं, तो उनमें संकुचन होता है और फेफड़े में हवा की कम मात्रा जाती है और सांस फूलने लगती है।
बदलता मौसम भी है कारण
एलर्जी से होने वाले अस्थमा (दमा) की वजह से भी सांस फूल जाती है। यह स्थिति जीवन के लिए खतरा भी बन सकती है। बदलता मौसम इसे और बढ़ाता है। फरीदाबाद के सर्वोदय अस्पताल और रिसर्च सेंटर के रेस्पिरेट्री के विभागाध्यक्ष डॉ. दानिश जमाल के अनुसार, ‘वसंत की गुनगुनी धूप की जगह गर्म हवाएं चलने लगी हैं। अधिकांश मरीज मौसमी दमे के शिकार हो जाते हैं। जो इसके मरीज हैं उन्हें इसके अटैक पड़ने लगते हैं। दिल्ली जैसे महानगर में तनाव भी इसकी बड़ी वजह है।’

Tuesday, April 25, 2017

हृदय की धड़कन बढ़ने का आयुर्वेदिक उपचार



वास्तव में दिल की धड़कन कोई रोग नहीं है| किन्तु जब दिल तेजी से धड़कने लगता है तो मनुष्य के शरीर में कमजोरी आ जाती है, माथे पर हल्का पसीना उभर आता है तथा पैर लड़खड़ाने लगते हैं|धड़कन बढ़ने के कारण
हृदय में एक निश्चित लय के साथ धड़कन होती है। यही धड़कन यदि किसी कारणवश बढ़ जाती है, तो यह दिल धड़कने की बीमारी बन जाती है। इसके कारण बड़ी बेचैनी रहने लगती है। दिल धड़कने की बीमारी, मानसिक उत्तेजना, स्नायु में किसी प्रकार की बीमारी, उत्तेजित पदार्थों को खाने, डर, बहुत ज्यादा परिश्रम, शोक, हस्त मैथुन, स्त्री से अधिक संभोग आदि के कारण हो जाती है।
प्रत्येक स्त्री, पुरुष और बच्चे का दिल एक निश्चित गति में धड़कता रहता है| यह धड़कन मनुष्य के स्वस्थ तथा जीवित होने का लक्षण है| लेकिन किसी आशंका, भय या चिन्ता के कारण दिल की धड़कन बढ़ जाती है| यदि यह बार-बार होने लगे तो समझना चाहिए कि यह दिल की धड़कन का रोग है| यह रोग प्राय: उन लोगों को बहुत जल्दी होता है जो शरीर तथा हृदय दोनों से दुर्बल होते हैं| वैसे अधिक मानसिक उत्तेजना, दुःख, कष्ट, संकट, क्षुब्धता, स्नायुमंडल का कोई रोग, उत्तेजित पदार्थों का सेवन, भय, अधिक परिश्रम, दौड़ - धूप, हस्तमैथुन, स्त्री-प्रसंग आदि कारणों से यह रोग बड़ी जल्दी हो जाता है|
दिल की कमजोरी के लक्षण

इस रोग में दिल बड़ी तेजी से धड़कने लगता है। इसके कारण शरीर में रूखापन, प्यास अधिक लगना, अजीर्ण, भूख की कमी, दिल जैसे बैठा जा रहा हो आदि लक्षण दिखाई देने लगते हैं। हाथ-पांव ठंडे से हो जाते हैं तथा श्वास लेने में परेशानी होती है।
हृदय की धड़कन बढ़ने का घरेलू उपचार 

*पके हुए बेल का गूदा लगभग 100 ग्राम प्रतिदिन सुबह के समय मलाई के साथ खाना चाहिए।
*बेल-पत्र का 10 ग्राम रस लेकर गाय या भैंस के शुद्ध घी में मिलाकर सेवन करें।
*आंवले का चूर्ण आधा चम्मच लेकर उसमें थोड़ी-सी मिसरी का चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम सेवन करें।
*पपीते का गूदा लेकर उसे मथ लें। 100 ग्राम गूदे में दो लौंगों का चूर्ण मिलाकर सेवन करें।
*गाजर का रस आधा कप नित्य सुबह के समय सेवन करें।
*यदि दिल की धड़कन तेज मालूम पड़े और घबराहट बढ़ जाए, तो सूखा धनिया एक चम्मच और मिसरी एक चम्मच । दोनों को मिलाकर सेवन करें। इसके सेवन से धड़कन सामान्य हो जाएगी।



*सेब के मुरब्बे पर चांदी का वर्क लगाकर खाने से हृदय को बल मिलता है।
*यदि धड़कन बढ़ने की वजह से कुछ बेचैनी-सी अनुभव होती हो, तो एक गिलास पानी में नीबू निचोड़ कर पी जाएं।
*टमाटर का सूप बीज निकालकर 250 ग्राम लें और अर्जुन के पेड़ की छाल का चूर्ण 2 ग्राम लेकर दोनों को अच्छी तरह मिलाकर सुबह के समय सेवन करें।
*100 ग्राम सेब के रस में 10 ग्राम शहद मिलाकर पी जाएं।
*सफेद इलायची का 3 ग्राम चूर्ण लेकर गाय के दूध के साथ सेवन करें।
*यदि दिल तेजी से धड़कता हुआ मालूम पड़े, तो थोड़ा-सा कपूर सेवन करें।
*आंवले का मुरब्बा या शरबत दिल की तेज धड़कन को सामान्य बनाता है।
*एक गुलाब के फूल को बासी मुंह चबाकर खा जाएं।
*अनार के चार-पांच पत्तों को धोकर पीस लें। फिर इसकी चटनी बनाकर थोड़ा-सा काला नमक डालकर सेवन करें।
नित्य 25 ग्राम अंगूर का रस पिएं।
एक चम्मच प्याज के रस में जरा-सा नमक डालकर सेवन करें।
पिस्ते की लौज लगभग 30 दिन तक खाने से हृदय की धड़कन का रोग कम हो जाता है।
*50 ग्राम किशमिश गर्म पानी में मथकर या उबालकर सेवन करें। किशमिश हृदय को बल देती है।
हृदय की धड़कन बढ़ने का आयुर्वेदिक उपचार 

*बहेड़े के पेड़ की छाल का चूर्ण दो चुटकी प्रतिदिन घी या गाय के दूध के साथ सेवन करें।
*हरड़ की छाल, खुरासानी बच, रास्ना, पीपल, सोंठ, कचूर, पुष्कर मूल। सभी दवाओं को लेकर बारीक-बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से 10 माशे की मात्रा में रोज ताजे पानी से सेवन करें।
गंगरेन की छाल, काहू के पेड़ का बकला, खरैटी तथा मुलेठी बराबर की मात्रा में लेकर महीन-महीन पीस लें। उसमें से दो चुटकी चूर्ण नित्य शहद के साथ सेवन करें।
*हरड़ की छाल, बच, रास्ना, पीपल, सोंठ, कचूर तथा पुष्कर। इन सबको बराबर की मात्रा में लेकर बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से आधा चम्मच चूर्ण नित्य पानी के साथ सेवन करें। हृदय रोग तथा दिल की तेज धड़कन के लिए यह रामबाण दवा है। यह प्रसिद्ध आयुर्वेदिक कंपनी की दवा है, जो हरीतक्यादि के नाम से मिलती है।
*भुनी हुई हींग, बच, कूट, जवाखार, सौंफ, पीपल, हरड़ की छाल, चिमक, जवाखार, पुष्करमूल तथा काला नमक। सब बराबर की मात्रा में लेकर पीसकर चूर्ण बना लें। फिर उसमें से दो चुटकी चूर्ण शहद के साथ सुबह के समय सेवन करें।




गुलाब, धनिया और दूध
गुलाब की पंखुड़ियों को सुखाकर पीस लें| फिर इसमें धनिया का चूर्ण समभाग में मिलाएं| एक चम्मच चूर्ण खाकर ऊपर से आधा लीटर दूध पिएं|
अनार
अनार के कोमल कलियों की चटनी बनाकर एक चम्मच की मात्रा में सुबह के समय निहार मुंह खाएं| लगभग एक सप्ताह सेवन करने से दिल की धड़कन सही रास्ते पर आ जाती है|
बेल और मक्खन
बेल का गूदा लेकर उसे भून लें| फिर उसमें थोड़ा-सा मक्खन या मलाई मिलाकर सहता-सहता लार सहित गले के नीचे उतारें|
सेब, पानी और मिश्री
200 ग्राम सेब को छिलके सहित छोटे-छोटे टुकड़े करके आधा लीटर पानी में डाल दें| फिर इस पानी को आंच पर रखें| जब पानी जलकर एक कप रह जाए तो मिश्री डालकर सेवन करें| यह दिल को मजबूत करता है|
आंवला और मिश्री
आंवले के चूर्ण में मिश्री मिलाकर एक चम्मच की मात्रा में भोजन के बाद खाएं| यह दिल की धड़कन सामान्य करता है| इससे रक्तचाप में भी लाभ होता है क्योंकि दिल की धड़कन तेज होने पर रक्तचाप भी बढ़/घट जाता है|
अर्जुनारिष्ट
20 मि. ली. और 20 मि. ली. पानी मिलाकर सुबह-शाम भोजनोपरान्त लें।

टेबलेट अर्जुननिन 1-1 गोली सुबह-शाम पानी से लें।
जवाहर मोहरा पिष्टी 125 मि. ग्रा. की मात्रा में दो बार सुबह-शाम लें।

Monday, April 24, 2017

अण्डकोष की सूजन के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार


   अंडकोष को अँग्रेजी  में Scrotum कहा जाता है जो की एक पतली थैली के रूप में आदमी के लिंग के नीचे स्थित होती है| इस थैली में दो बहुत ही जरुरी अंग पाए जाते हैं जिन्हें हम testicles कहते हैं और जिनमें वीर्य का उत्पादन होता है| वैसे तो अंडकोष मोटी और मजबूत त्वचा का बना होता है लेकिन फिर भी कई प्रकार के रोग या बीमारी इसे ग्रसित कर सकते हैं और उनमें से सबसे ज्यादा पुरुषों को अंडकोष में दर्द और सूजन का सामना करना पड़ता है| अंडकोष में दर्द और सूजन दायें या बाएँ  अथवा दोनों और हो सकता है| पुरुष को अपने जीवन की किसी भी अवस्था में इस दर्द और सुजन का सामना करना पड़ सकता है|>अंडकोष का दर्द धीरे और लम्बे समय तक भी हो सकता है और कई लोगों में ये दर्द बहुत जयादा तेज भी हो सकता है| सही समय पर इस समस्या का निदान न होने पर गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं| इसलिए यदि आपके अंडकोष में तेज दर्द और सूजन है तो आपको तुरंत किसी अच्छे urologist से मिलकर उसका इलाज करवा लेना चाहिए| लेकिन यदि आपकी प्रॉब्लम जयादा सीरियस नहीं है तो आप कुछ घरेलु नुस्खे अपनाकर pain और सूजन  को कम कर सकते हैं| लेकिन सबसे पहले अंडकोष में दर्द और सूजन करने वाले कारणों के बारे में थोड़ी जानकारी बढ़ा ली जाये|




 वो कारण जो अंडकोष में दर्द और सुजन के लिए जिम्मेदार होते हैं-
अंडकोष में दर्द और सूजन के कुछ प्रचलित कारणों में से कुछ नीचे दिए गये हैं | जरुरी नहीं की आपकी बीमारी के लिए ये ही कारण जिमेदार हों| इसलिए सही कारण का पता लगाने के लिए डॉक्टर से मिलना अनिवार्य हैं|
Inguinal hernia – इसे groin hernia भी कहते हैं| इसमें छोटी आंत या fatty tissue का कुछ भाग आपके अंडकोष में आकर दर्द और सूजन पैदा करता है| यह हर्निया अकसर भारी बोझ उठाने के कारण होता है| अकसर लोग gym में सीधे ही भारी भरकम बोझ उठा लेते हैं और हर्निया का शिकार हो जाते हैं|
*Torsion – इस कंडीशन में आपकी स्पेर्मटिक कोर्ड मुड जाती है या ट्विस्ट हो जाती है और जिसके कारण आपके testes की और जाने वाला रक्त प्रवाह बाधित हो जाता है| इसमें रोगी को बहुत तेज दर्द होता है| समय रहते इसका इलाज न हो तो permanent damageभी हो सकता है| यह एक आपातकालीन स्तिथि होती है|



Epididymitis – इसमें आपकी epididymis में inflammation या सोअज हो जाती है| Epididymis एक तुबे जैसी संरचना होती है जो की आपके दोनों testes के पीछे की और स्थित होती है| Epididymitis में रोगी को अंडकोष में असहनीय दर्द होता है| epididymis में inflammation होने के कई कारण हो सकते हैं जैसे चोट लग जाना, बैक्टीरिया द्वारा संक्रमण. sexually transmitted disease जैसे chlamydia and gonorrhea आदि| *Epididymitis ज्यादातर 18 से 36 वर्ष के लोगों में ज्यादा देखने को मिलता है|
*Orchitis – इस रोग में आपके testes में inflammation हो जाता है जो की बैक्टीरियल या वायरल संक्रमण के कारण होता है| ये inflammation एक ओर या दोनों ओर हो सकता है| इसमें अंडकोष में सुजन और दर्द रहने लगता है| यह ज्यादातर 45 या उससे बड़ी उम्र के पुरषों में अधिक देखने को मिलता है|
*इनके अलावा अंडकोष में सूजन, दर्द और irritation के कई और कारन होते हैं जैसे अंडकोष में पानी भरना, हर्निया सर्जरी के बाद भी दर्द कुछ महीनों तक रहता है| इनके अलावा prostatitis, गांठ का होना, पथरी और मम्प्स होना भी दर्द और सूजन के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं|
अंडकोष में सूजन और दर्द का इलाज / निदान
* यह पुरषों की बहुत ही sensitive स्थान होता है| यदि आपको लगता है की आपकी प्रॉब्लम सीरियस नहीं है और बस हल्का फुल्का दर्द महसूस हो रहा है तो आपको कुछ घेरलू नुस्खे और सावधानियाँ अपनाकर उस दर्द से मुक्ति पा सकते हैं| नीचे कुछ जरुरी बातें बताई गयी हैं|अंडकोष में दर्द और सुजन से ग्रसित लोगों को डॉक्टर सबसे पहले आराम लेने की सलाह जरूर देता हैं| आपको सभी कार्य छोड़कर कुछ दिन bed rest लेना चाहिए| कोई ऐसा काम न करें जिससे आपके अंडकोष पर दवाब पड़े|



सामान्य दर्द और सुजन को आप बर्फ की सहायता से ख़तम कर सकते हैं| आपको बर्फ का टुकड़ा रुमाल या तौलिए में लपेटना है और दर्द वाली जगह पर कुछ मिनट्स के लिए लगाना है| ऐसा आपको हर 2 घंटे के अन्तराल में करना है|
   डॉक्टर या किसी जानकार की सलाह के अनुसार सही नाप का supporter या लंगोट का इस्तेमाल करें| इससे आपके अंडकोष को  सहारा मिलेगा और दर्द में राहत|
कभी भी भारी भरकम बोझ न उठाएं और यदि जरुरी हो तो अपने फॅमिली members की मदद लें|
खेलों में चोट से बचने के लिए protective कप और supporter जरुर पहने|
*Epididymitis, पथरी, और संक्रमण की स्तिथि में अपने डॉक्टर से जरुरी दर्द निवारक दवा जैसे brufen, aspirin, paracetamol आदि और एंटीबायोटिक्स लिखवाकर नियमित रूप से लें|
*कम कोलेस्ट्रॉल वाला खाना खाइए और दिन भर में ढेर सारा पानी पीजिये|
*STD से बचने के लिए संभोग से पहले जरुरी सावधानियाँ बरतें|
*हल्दी का लेप अंडकोष के बढ़ने यानि सूजन को कम करने में आपकी मदद कर सकता है|
*अदरक के रस में शहद मिलकर पिने से लाभ मिलता है इसी प्रकार टमाटर, सेंधा नामक और अदरक का सलाद के रूप में सेवन करने से भी फायदा होता है|

अंडकोष प्रदाह/Orchitis Homeopathic remedies


   चोट लग जाने, सूजाक आदि के कारण अण्डकोष की थैली की त्वचा फूल जाती है और उनमें दर्द, जलन, सूजन आदि लक्षण रहते हैं । इसी स्थिति को अण्डकोष-प्रदाह कहते हैं । यहाँ पर हाइड्रोसिल का भ्रम नहीं होना चाहिये
*एपिस मेल 30- दर्द, जलन, सूजन, लालिमा, डंक मारने जैसा दर्द इन लक्षणों में लाभ करती है ।
*क्रोटन टिग 30- अण्डकोष-प्रदाह के साथ-साथ उन पर एक्जिमा जैसे दाने निकल आयें, खारिश हो, खुजलाने की इच्छा हो पर खुजलाने से कष्ट बढ़े, दर्द से नोंद न आती हो- इन लक्षणों में दें ।
*ग्रेफाइटिस 30- खाजयुक्त तर दाने निकल आयें जिनसे गाढ़ा मवाद भी आता हो तो लाभ करती है ।
*आर्सेनिक एल्ब 30– दर्द में सेंकने से आराम मिले, रोगी व्याकुल हो, प्यास लगे- इन लक्षणों में देनी चाहिये ।
*एसिड फॉस 30– कमजोरी, अत्यधिक विलासिता का इतिहास हो, प्रदाह भी हो- इन लक्षणों में लाभप्रद रहती है

Tuesday, April 18, 2017

होम्योपैथी मे दर्द के उपचार

  

 पुराना दर्द का आमतौर पर अच्छे तरिके से पारंपरिक दवा से उपचार नहीं हो सकता और इफेक्टिव पारंपरिक दवाओं का प्रयोग करके कई तरह से गंभीर साइड इफेक्ट से बचा जा सकता है। एलोपैथिक दवाओं के बजाय उपचार के कई तौर तरीके खोजे गए हैं। पुराने दर्द वाले लोगों का होम्योपैथी इलाज ढूढने का आम कारण है लगातार दर्द होना। पारंपरिक दवाओं के साइड इफेक्ट के बारे में जानकारी और अधिक प्राकृतिक की इच्छा करना जो कि शरीर की क्षमता को बढ़ा देता है ।दर्द के कुछ आम कारणों के इलाज नीचे दिए गए हैं।
ऑस्टियोआर्थराइटिस के उपचार का मुख्य उद्देश्य दर्द से आराम दिलाना और बिमारियों को नियंत्रण करना। वैसे होम्योपैथी उपचार ऑस्टियोआर्थराइटिस के लिए इफेक्टिव पांरपरिक उपचार है। होम्योपैथी जॅल जिसमें कोमफ्रे(सेमफीटूम ऑफिसिनल), पोइजन आईवी(रुस टोक्कॉडेनड्रॉन) और मार्श टी( लेडूम पालूस्टर) होता है। आर टॉक्सीकॉडेनड्रॉन, अर्निका मोनटाना(अर्निका) सोलानुम डुलकैमरा( कलाइम्बिंग नाइट शेड), संगगुऊनारा केनेडेनसिस( ब्लड रूट) और सल्फऱ का मिश्रित तरल पदार्थ। होम्योपैथी तरल फोर्मूला जिसमें आर टोक्सीकॉडेनड्रॉन, कॉस्टीकुम( पोटेशियम हाइड्रेट) और लाक वेकीनम( गाय का दूध) होता है।





   केवल अर्निका क्रीम या केलनडुला ऑफिसिनसीड, हेममेलीज विरजीनियना, अकोनीटुम नपेलुस और बेलाडोना असुविधा को कम करने में सहायता करता है। यह क्रीम दिन में 3 से 6 बार प्रयोग करना चाहिए। रोगियों को गंभीर चोट में अर्निका क्रीम को प्रयोग करना चाहिए। ब्रीयोनिया दर्द में प्रयोग की जाती है जब दर्द धीरे धीरे ज्यादा बढ़ता है। साइटोलका, आर टोक्सीकॉडेनड्रॉन अन्य होम्योपैथिक उपचार है जो कि दर्द को कम करने में सहायता करता है।
होम्योपैथी दवाएं कानों में दर्द के लिए बहुत ही इफेक्टिव होती हैं। अगर आपको कान में दर्द है विशेषकर जब यह कुछ ज्यादा गंभीर हो तो किसी प्रोफेशेनल होम्योपैथी से सलाह लें। जो कान के दर्द में इफैक्टिव दवाएं पुलसाटिला( वाइनफ्लोवर), अकोनीटुम(मोनकशूड), बेलडोन्ना(डेडली नाइटशेड) हैं। बेलडोन्ना नाक के दर्द में इफैक्टिव है जो कि अचानक विशेष धड़कन के साथ शुरू होता है।

होम्योपैथी दवा जो कि सर दर्द को ठीक करती वे हैं ब्रोनिया, इयूफ्रेसिया, हाइपेरीकुम, काली बिच, काली फोस, लाइकोपोडियम, नटमुर, नुक्सवोम, पुलसटील्ला, सिलीसिया और थुजा। गठिया के उपचार में प्रयोग होने वाली दवाएं एपिस मेल, अर्निका, ब्रयोनिया, कोस्टिकम, पलसेटिला, रस टॉक्स, रुटा ग्रेव हैं। चोट के बाद होने वाले दर्द के उपचार के लिए अर्निका, ब्रयोनिया, रस टॉक्स, रुटा ग्रेव जैसे होम्योपैथ दवाओं का प्रयोग किया जाता है। कुछ होम्योपैथिक दवाएं दांतों के इलाज के इफेक्टिव होती हैं जैसे अर्निका, एकोनाइट, कोफिया, मर्कसोल

Saturday, April 15, 2017

ब्रायोनिया (Bryonia) होम्योपैथिक दवा के लाभ उपयोग


व्यापक-लक्षण तथा मुख्य-रोग प्रकृति
लक्षणों में कमी
जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में ब्रायोनिया की गति, धीमी, एकोनाइट तथा बेलाडोना की जोरों से और एकाएक होती है।
दर्द वाली जगह को दबाने से रोग में कमी होना
हरकत से रोग की वृद्धि और विश्राम से रोग में कमी
ठडी हवा से आराम
जिस तरफ दर्द हो उस तरफ लेटे रहने से आराम (जैसे, प्लुरिसी में)
आराम से रोग में कमी
श्लैष्मिक-झिल्ली का खुश्क होना और इसलिये देर-देर में, बार-बार अधिक मात्रा में पानी पीना
गठिये में सूजन पर गर्म सेक से और हरकत से रोगी को आराम मिलना
रजोधर्म बन्द होने पर नाक या मुँह से खून गिरना या ऐसा होने से सिर-दर्द होना
लक्षणों में वृद्धि
सूर्योदय के साथ सिर-दर्द शुरू होना सूर्यास्त के साथ बन्द हो
(1) जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में ब्रायोनिया की गति धीमी, एकोनाइट तथा बेलाडोना की तेज, जोरों की, और एकाएक होती है – प्राय: लोग जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में एकोनाइट या बेलाडोना दे देते है, और समझते हैं कि उन्होंने ठीक दवा दी। परन्तु चिकित्सक को समझना चाहिये कि जैसे रोग के आने और जाने की गति होती है, वैसे ही औषधि के लक्षणों में भी रोग के आने और जाने की गति होती है। इस गति को ध्यान में रखकर ही औषधि का निर्वाचन करना चाहिये, अन्यथा कुछ लक्षण दूर हो सकते हैं, रोग दूर नहीं हो सकता। उदाहरणार्थ, एकोनाइट का रोगी हिष्ट-पुष्ट होता है, ठंड में जाने से उसे बड़ी जोर का जुकाम, खांसी या बुखार चढ़ जाता है। शाम को सैर को निकला और आधी रात को ही तेज बुखार चढ़ गया। बेलाडोना में भी ऐसा ही पाया जाता है, परन्तु उसमें सिर-दर्द आदि मस्तिष्क के लक्षण विशेष होते हैं। ब्रायोनिया में ऐसा नहीं होता। रोगी ठंड खा गया, तो उसके लक्षण धीरे-धीरे प्रकट होंगे। पहले दिन कुछ छींके आयेंगी, दूसरे दिन नाक बहने लगेगा, तीसरे दिन बुखार चढ़ जायगा। बुखार, जैसे धीरे-धीरे आय वैसे धीरे-धीरे ही जायेगा। इसीलिये टाइफॉयड में एकोनाइट या बेलाडोना नहीं दिया जाता, उसके लक्षण ब्रायोनिया से मिलते हैं। औषधि देते हुए औषधि की गति और प्रकृति को समझ लेना जरूरी है।



 रोग के लक्षणों और औषधि की गति तथा प्रकृति के लक्षणों में साम्य होना जरूरी है, तभी औषधि लाभ करेगी। रोग दो तरह के हो सकते हैं-स्थायी तथा अस्थायी। स्थायी-रोग में स्थायी-प्रकृति की औषधि ही लाभ करेगी, अस्थायी-रोग में अस्थायी-प्रकृति की औषधि लाभ करेगी। एकोनाइट और बेलाडोना के रोग तेजी से और एकाएक आते हैं, और एकाएक ही चले जाते हैं। ऐसे रोगों में ही ये दवायें लाभप्रद हैं। ब्रायोनिया, पल्सेटिला के रोग शनै: शनै: आते हैं, और कुछ दिन टिकते हैं। इसलिये शनै: शनै: आनेवाले और कुछ दिन टिकने वाले रोगों में इन दवाओं की तरफ ध्यान जाना चाहिये। थूजा, साइलीशिया, सल्फर आदि के रोग स्थायी-प्रकृति के होते हैं, अत: चिर-स्थायी रोगों के इलाज के लिये इन औषधियों का प्रयोग करना चाहिये। इसीलिये जब रोग बार-बार अच्छा हो-हो कर लौटता है तब समझना चाहिये कि यह स्थायी-रोग है, तब एकोनाइट से लाभ नहीं होगा, तब सल्फर आदि देना होगा क्योंकि एकोनाइट की प्रकृति ‘अस्थायी’ (Acute) है, और सल्फर की प्रकृति ‘स्थायी’ (Chronic) है जाना
हरकत से रोग बढ़ जाना
क्रोध आदि मानसिक-लक्षणों से रोग
खाने के बाद रोग में वृद्धि
गठिये में गर्मी और हरकत से आराम
क्रोध से वृद्धि

    होम्योपैथी मे बेलाडोना के गुण फायदे उपयोग

    बेलाडोना होम्योपैथी की एक औषधि है। जो कई तरह के कष्टदायी रोगों को ठीक करती है। बेलाडोना के इस्तेमाल से कई तरह की बीमारियों को ठीक किया जा सकता है। सबसे पहले जानते हैं बेलाडोना क्या है। बेलाडोना को कई वनस्पतियों के जरिए तैयार किया जाता है। इसे सोलेनम मैनियेकम आदि के नाम से भी जाना जाता है। बेलाडोना का पौधा यूरोपीय देशों में उगता है। लेकिन इसकी औषधि आपको किसी भी होम्योपैथी की दुकान में आसानी से मिल सकती है। कौन-कौन सी बीमारियों में बेलाडोना फायदा करता है
    किसी भी तरह का दर्द
    शरीर में यदि किसी भी तरह का दर्द हो रहा हो और वह शांत न हो रहा हो तो बेलाडोना सेवन करने से दर्द ठीक हो जाता है।
    बुखार
    यदि बुखार की वजह से चेहरा और आंख लाल हो गए हों। तो बेलाडोना का सेवन करने से ठीक हो जाता है।
    जीभ की सूजन
    जीभ का लाल होना, मसूड़ों में दर्द और जीभ की सूजन होने पर बेलाडोना का सेवन करें।
    मासिक धर्म
    महिलाओं को मासिक धर्म में अधिक परेशानी हो रही हो या रक्तस्राव अधिक हो रहा हो तो वे बेलाडोना का सेवन करें।
    पेट दर्द में



    यदि पेट में भंयकर दर्द हो रहा हो या पेट फूल गया हो। तो बेलाडोना लेने से आपको राहत मिलेगी।
    सिर व गर्दन दर्द
    यदि गर्दन उठाने व झुकाने में दर्द हो रहा हो तो बेलाडोना का सेवन करने से आपकी ये समस्या ठीक हो जाती है।
    सूखी खांसी
    सूखी खांसी में यदि खांसते-खांसते एैसा लग रहा हो कि दम निकल रहा है और चेहरा लाल हो गया हो तो आप बेलाडोना का सेवन करें। इससे आपकी सूखी खांसी की समस्या ठीक हो जाएगी।
    गले की सूजन
    यदि गले में सूजन हो गई हो या गले में संकुचन हो रहा हो तो बेलाडोना के सेवन से लाभ मिलता है।
    कमर दर्द और गर्दन की अकड़न में बेलाडोना का सेवन करें।
    सलाह- इस दवा का उपयोग  किसी होम्योपथिक चिकित्सक  के मार्गदर्शन मे करें|

    Wednesday, April 12, 2017

    आयुर्वेदिक भस्म व पिष्टी :गुण ,कर्म

    अकीक भस्म : हृदय की निर्बलता, नेत्र विकार, रक्त पित्त, रक्त प्रदर आदि रोग दूर करती है। (नाक-मुंह से खून आना) मात्र 1 से 3 रत्ती।
    अकीक पिष्टी : हृदय और मस्तिष्क को बल देने वाली तथा वात, पित्त नाशक, बल वर्धक
    और सौम्य है।
    अभ्रक भस्म (साधारण) : हृदय, फेफड़े, यकृत, स्नायु और मंदाग्नि से उत्पन्न रोगों की सुप्रसिद्ध दवा है। श्वास, खांसी, पुराना बुखार, क्षय, अम्लपित्त, संग्रहणी, पांडू, खून की कमी, धातु दौर्बल्य, कफ रोग, मानसिक दुर्बलता, कमजोरी आदि में लाभकारी है। मात्रा 3 से 6 रत्ती शहद, अदरक या दूध से।
    अभ्रक भस्म (शतपुटी पुटी) (100 पुटी) : इसमें उपर्युक्त गुण विशेष मात्रा है। मात्रा 1 से 2 रत्ती।
    अभ्रक भस्म (सहस्त्र पुटी) (1000 पुटी) : इसमें साधारण भस्म की अपेक्षा अत्यधिक गुण मौजूद रहते हैं। मात्रा 1/4 से 1 रत्ती।
    कपर्दक (कौड़ी, वराटिका, चराचर) भस्म : पेट का दर्द, शूूल रोग, परिणाम शूल अम्लपित्त, अग्निमांद्य व फेफड़ों के जख्मों में लाभकारी। मात्रा 2 रत्ती शहद अदरक के साथ सुबह व शाम को।
    कसीस भस्म : रक्ताल्पता में अत्यधिक कमी, पांडू, तिल्ली, जिगर का बढ़ जाना, आम विकार, गुल्म आदि रोगों में भी लाभकारी। मात्रा 2 से 8 रत्ती।
    कहरवा पिष्टी (तृणकांतमणि) : पित्त विकार, रक्त पित्त, सिर दर्द, हृदय रोग, मानसिक विकार, चक्कर आना व सब प्रकार के रक्त स्राव आदि में उपयोगी। मात्रा 2 रत्ती मक्खन के साथ।
    कांतिसार (कांत लौह फौलाद भस्म) : खून को बढ़ाकर सभी धातुओं को बढ़ाना इसका मुख्य गुण है। खांसी, दमा, कामला, लीवर, प्लीहा, पांडू, उदर रोग, मंदाग्नि, धातुक्षय, चक्कर, कृमिरोग, शोथ रोगों में लाभकारी तथा शक्ति वर्द्धक। मात्रा 1/2 से 1 रत्ती।
    गोदन्ती हरताल (तालक) भस्म : ज्वर, सर्दी, खांसी, जुकाम, सिर दर्द, मलेरिया, बुखार आदि में विशेष लाभकारी। मात्रा 1 से 4 रत्ती सुबह व शाम को शहद व तुलसी के रस में।
    जहर मोहरा खताई भस्म : शारीरिक एवं मानसिक बल को बढ़ाती है तथा विषनाशक है। अजीर्ण, कै, उल्टी, अतिसार, यकृत विकार, घबराहट, जीर्ण ज्वर, बालकों के हरे-पीले दस्त एवं सूखा रोग में लाभकारी। मात्रा 1 से 3 रत्ती शहद में।
    जहर खताई पिष्टी : गुण, जहर मोहरा खताई भस्म के समान, किंतु अधिक शीतल, घबराहट व जी मिचलाने में विशेष उपयोगी। मात्रा 1 से 3 रत्ती शर्बत अनार से।
    टंकण (सुहागा) भस्म : सर्दी, खांसी में कफ को बाहर लाती है। मात्रा 1 से 3 रत्ती शहद से।
    ताम्र (तांबा) भस्म : पांडू रोग, यकृत, उदर रोग, शूल रोग, मंदाग्नि, शोथ कुष्ट, रक्त विकार, गुर्दे के रोगों को नष्ट करती है तथा त्रिदोष नाशक है। मात्रा 1/2 रत्ती शहद व पीपल के साथ।
    प्रवाल (मूंगा) भस्म : पित्त की अधिकता (गर्मी) से होने वाले रोग, पुराना बुखार, क्षय, रक्तपित्त, कास, श्वास, प्रमेह, हृदय की कमजोरी आदि रोगों में लाभकारी। मात्रा 1 से 2 रत्ती शहद अथवा शर्बत अनार के साथ।
    प्रवाल पिष्टी : भस्म की अपेक्षा सौम्य होने के कारण यह अधिक पित्त शामक है। पित्तयुक्त, कास, रक्त, रक्त स्राव, दाह, रक्त प्रदर, मूत्र विकार, अम्लपित्त, आंखों की जलन, मनोविकार और वमन आदि में विशेष 
    लाभकारी है। मात्रा 1 से 2 रत्ती शहद अथवा शर्बत अनार से।



    शंख (कंबू) भस्म : कोष्ठ शूल, संग्रहणी, उदर विकार, पेट दर्द आदि रोगों में विशेष उपयोगी है। मात्रा 1 से 2 रत्ती प्रातः व सायं शहद से।
    पन्ना पिष्टी : रक्त संचार की गति को सीमित करके विषदोष को नष्ट करने में उपयोगी है। ओज वर्द्धक है तथा अग्निप्रदीप्त कर भूख बढ़ाती है। शारीरिक क्षीणता, पुराना बुखार, खांसी, श्वास और दिमागी कमजोरी में गुणकारी है। मात्रा 1/2 रत्ती शहद से।

    मुक्ता (मोती) भस्म : शारीरिक और मानसिक पुष्टि प्रदान करने वाली प्रसिद्ध दवा है। चित्त भ्रम, घबराहट, धड़कन, स्मृति भंग, अनिद्रा, दिल-दिमाग में कमजोरी, रक्त पित्त, अम्ल पित्त, राजयक्षमा, जीर्ण ज्वर,उरुःक्षत, हिचकी आदि की श्रेष्ठ औषधि। मात्रा 1/2 से 1 रत्ती
    तक।  
    मुक्ता (मोती) पिष्टी : मुक्ता भस्म के समान गुण वाली तथा शीतल मात्रा। 1/2 से 1 रत्ती शहद या अनार के साथ।  
    मुक्ता शुक्ति पिष्टी : मुक्ता शुक्ति भस्म के समान गुणकारी तथा प्रदर पर लाभकारी।  
    वंग भस्म : धातु विकार, प्रमेह, स्वप्न दोष, कास, श्वास, क्षय, अग्निमांद्य आदि पर बल वीर्य बढ़ाती है। अग्निप्रदीप्त कर भूख बढ़ाती है तथा मूत्राशय की दुर्बलता को नष्ट करती है। मात्रा 1 से 2 रत्ती सुबह व शाम शहद या मक्खन से।
    मण्डूर भस्म : जिगर, तिल्ली, शोथ, पीलिया, मंदाग्नि व रक्ताल्पता की उत्तम औषधि। मात्रा 2 रत्ती शहद से। मयूर चन्द्रिका भस्म : हिचकी और श्वास (दमा) में अत्यंत गुणकारी है। वमन (उल्टी) व चक्कर आदि में लाभकारी। मात्रा 1 से 3 रत्ती शहद से।
    माणिक्य पिष्टी : समस्त शारीरिक और मानसिक विकारों को नष्ट कर शरीर की सब धातुओं को पुष्ट करती है और बुद्धि को बढ़ाती है। मात्रा 1/2 रत्ती से 2 रत्ती तक।




    स्वर्ण माक्षिक भस्म : पित्त, कफ नाशक, नेत्रविकार, प्रदर, पांडू, मानसिक व दिमागी कमजोरी, सिर दर्द, नींद न आना, मूत्रविकार तथा खून की कमी में लाभदायक। मात्रा 1 से 2 रत्ती प्रातः व सायं शहद से।  
    यशद भस्म : कफ पित्तनाशक है। पांडू, श्वास, खांसी, जीर्णज्वर, नेत्ररोग, अतिसार, संग्रहणी आदि रोगों में लाभदायक। मात्रा 1 रत्ती शहद से।  
    रजत (रौप्य, चांदी) भस्म : शारीरिक व मानसिक दुर्बलता में लाभदायक है। वात, पित्तनाशक, नसों की कमजोरी, नपुंसकता, प्रमेह, धारुत दौर्बल्य, क्षय आदि नाशक तथा बल और आयु को बढ़ाने वाली है। मात्रा 1 रत्तीl प्रातः व सायं शहद या मक्खन से।    
    लौह भस्म : खून को बढ़ाती है। पीलिया, मंदाग्नि, प्रदर, पित्तविकार, प्रमेह, उदर रोग, लीवर, प्लीहा, कृमि रोग आदि नाशक है। व शक्ति वर्द्धक है। मात्रा 1 रत्ती प्रातः व सायं शहद और मक्खन के साथ।   
    लौह भस्म (शतपुटी) : यह साधारण भस्म से अधिक गुणकारी है।  
    संगेयशव पिष्टी : दिल व मेदे को ताकत देती है। पागलपन नष्ट करती है तथा अंदरूनी जख्मों को भरती है। मात्रा 2 से 8 रत्ती शर्बत अनार के साथ।  

    स्वर्ण भस्म : इसके सेवन से रोगनाशक शक्ति का शरीर में संचार होता है। यह शारीरिक और मानसिक ताकत को बढ़ाकर पुराने से पुराने रोगों को नष्ट करता है। जीर्णज्वर, राजयक्षमा, कास, श्वास, मनोविकार, भ्रम , अनिद्रा, संग्रहणी व त्रिदोष नाशक है तथा वाजीकर व ओजवर्द्धक है। इसके सेवन से बूढ़ापा दूर होता है और शक्ति एवं स्फूर्ति बनी रहती है। मात्रा 1/8 से 1/2 रत्ती तक।
    हजरूल यहूद भस्म : पथरी रोग की प्रारंभिक अवस्था में देने से पथरी को गलाकर बहा देती है। पेशाब साफ लाती है और मूत्र कृच्छ, पेशाब की जलन आदि को दूर करती है। मात्रा 1 से 4 रत्ती दूध की लस्सी अथवा शहद से।  
    हजरूल यहूद पिष्टी : अश्मीर (पथरी) में लाभकारी तथा मूत्रल।  
    त्रिवंग भस्म : प्रमेह, प्रदर व धातु विकारों पर। गदला गंदे द्रव्ययुक्त और अधिक मात्रा में बार-बार पेशाब होने पर इसका उपयोग विशेष लाभदायक है। धातुवर्द्धक तथा पौष्टिक है। मात्रा 1 से 3 रत्ती।  
      

    वृहत् वात चिंतामणि रस के लाभ उपयोग

       वात कुपित होने से शरीर में कई प्रकार के रोग और कष्ट पैदा होते हैं। वात कुपित होने के कई कारण होते हैं। कुछ कारण आगंतुक होते हैं और कुछ कारण निजी होते हैं।
    आयुर्वेद शास्त्र ने वात प्रकोप का शमन करने वाले एक से बढ़कर एक उत्तम योग प्रस्तुत किए हैं। उन्हीं योगों में से एक उत्तम योग है वृहत् वात चिंतामणि रस।
    घटक द्रव्य : स्वर्ण भस्म 1 ग्राम, चाँदी भस्म 2 ग्राम, अभ्रम भस्म 2 ग्राम, मोती भस्म 3 ग्राम, प्रवाल भस्म 3 ग्राम, लोह भस्म 5 ग्राम, रस सिंदूर 7 ग्राम।
    निर्माण विधि : पहले रस सिंदूर को खूब अच्छी तरह.महीन पीस लें फिर सभी द्रव्य मिलाकर ग्वारपाठे के रस में घुटाई करके, 1-1 रत्ती की गोलियाँ बनाकर, सुखा लें और शीशी में भर लें।
    मात्रा और सेवन विधि : 1-1 गोली दिन में 3 या 4 बार आवश्यकता के अनुसार शहद के साथ लेना चाहिए।
    लाभ : यह योग वातप्रकोप का शमन कर वातजन्य कष्टों और व्याधियों को दूर करने के अलावा और भी लाभ करता है। यह.पित्त प्रधान वात विकार की उत्तम औषधि है, जो तत्काल असर दिखाती है।
       यह योग नए और पुराने, दोनों प्रकार के रोगों पर विशेष रूप से बराबर लाभ करता है। वात प्रकोप को शांत करने के अलावा यह शरीर में चुस्ती-फुर्ती और शक्ति पैदा करता है। वात रोगों को नष्ट करने की क्षमता होने के कारण आयुर्वेद ने इस योग की बहुत प्रशंसा की है।



        नींद न आना, हिस्टीरिया और मस्तिष्क की ज्ञानवाहिनी नाड़ियों के दोष से उत्पन्न होने वाली बीमारी में इसके सेवन से बड़ा लाभ होता है। जब वात प्रकोप के कारण हृदय में घबराहट, बचैनी, मस्तिष्क में गर्मी और मुंह. मे छाले हों, तब पित्तवर्द्धक ताम्र भस्म, मल्ल या कुचला प्रदान औषधि के सेवन से लाभ नहीं होता। ऐसी स्थिति में इस योग के सेवन से लाभ होता है।
       प्रसव के बाद आई कमजोरी को दूर करने और सूतिका रोग नष्ट करने में यह योग शीघ्र लाभ करता है। वृद्धावस्था में वात प्रकोप होने और शरीर के कमजोर होने पर इस योग के सेवन से स्त्री-पुरुषों को जादू की तरह लाभ होता है और शक्ति प्राप्त होती है। 

       वात जन्य व्याधियों के अलावा यह योग अन्य व्याधियों को भी दूर करता है। हृदय रोग में अर्जुन छाल का चूर्ण एक चम्मच और इस योग का सेवन करने से उत्तम लाभ होता है। कठिन वात रोग जैसे पक्षाघात (लकवा), अर्दित, धनुर्वात, अपतानक आदि में भी इस योग का सेवन, रसोन सिद्ध घृत के साथ, करने से विशेष लाभ होता है।
    * रक्त की कमी (एनीमिया) होने तथा वात नाड़ी संस्थान में कमजोरी होने पर बार-बार चक्कर आना, मानसिक स्थिति बिगड़ना, स्मरणशक्ति कमजोर होना, प्रलाप करना, भूल जाने की आदत पड़ना आदि लक्षणों के पैदा होने पर इस योग का सेवन करने से थोड़े ही दिनों में लाभ हो जाता है।
    * शराब पीने के आदी लोगों के जीर्णवात रोग और जीर्ण पक्षाघात (पुराना लकवा) की स्तिति में अन्य औषधियों की अपेक्षा यह रोग और योगेन्द्र रस विशेष लाभप्रद सिद्ध होते हैं। इस योग में चांदी की भस्म होने से यह.योग वृक्क स्थान और मस्तिष्क पर विशेष रूप से शामक कार्य करता है, क्योंकि योगेन्द्र रस रक्त को शुद्ध करने तथा हृदय को बल देने की क्षमता का विशेष गुण रखता है।
    * मानसिक श्रम के बल पर आजीविका अर्जित करने वाले स्त्री-पुरुषों के लिए यह योग अमृत के समान है, क्योंकि इससे याददाश्त अच्छी हो जाती है। इस योग का सेवन 2 चम्मच सारस्वतारिष्ट के साथ लाभ न होने तक सुबह-शाम करना चाहिए।
       वृहत् वात चिंतामणि रस एक उत्तम और शरीर को कई प्रकारसे शक्ति देने वाला और वात प्रकोप को शांत कर समस्त वातजन्य विकारों को नष्ट कर शरीर और स्वास्थ्य कीरक्षा व वृद्धि करने वाला श्रेष्ठ आयुर्वेदिक योग है। यह योग इसी नाम से बना-बनाय आयुर्वेदिक औषधि विक्रेता की दुकान पर मिलता है।

    Tuesday, April 11, 2017

    चंद्रप्रभा वटी 100 रोगों मे फायदेमंद

       चंद्रप्रभा वटी, को 37 पदार्थों के योग से बनाया जाता है। यह एक बहुत ही लोकप्रिय और प्रभावी दवा है जो कि बहुत से रोगों में दी जाती है। ‘चंद्र’ का मतलब है चंद्रमा और ‘प्रभा’ का मतलब है चमक। तो इसका शाब्दिक अर्थ है वो दवा या गोली  जो शरीर में चमक लाए। ये दवा कई बड़ी आयुर्वेदिक कंपनियों द्वारा निर्मित की जाती है।
    चंद्रप्रभा वटी को मधुमेह और मूत्र रोगों में प्रयोग किया जाता है। यह मूत्रेंद्रिय और वीर्य-विकारों की सुप्रसिद्ध औषधी है। इसका उपयोग शरीर में चमक लाता है और बल, ताकत और शक्ति बढती है।
     चंद्रप्रभा वटी के गुण,लाभ
       इस का प्रयोग स्त्री रोगों gynecological problems में भी होता है। यह गर्भाशय uterus को शक्ति देती है और उसकी वकृति को दूर करती है। सुजाक, उपदंश आदि में यह प्रभावी है। स्त्रियों में होने वाले अन्य समस्यों जैसे की पूरे शरीर में दर्द full body pain, मासिक में दर्द painful menstruation, १०-१२ दिनों का मासिक धर्म periods for 10-12 days आदि में यह दवा अशोक घृत के साथ दी जाती है।
    मूत्र रोगों में जैसे की बहुमूत्र, मूत्रकृच्छ, मूत्राघात urine retention, मूत्राशय में किसी तरह की विकृति, पेशाब में जलन burning sensation while urination, पेशाब का लाल रंग, पेशाब में दुर्गन्ध, पेशाबी में चीनी sugar in urine, श्वेत प्रदर, किडनी की पथरी kidney stones , पेशाब में एल्ब्यूमिन, रुक रुक के पेशाब आना, मूत्राशय की सूजन inflammation of urinary bladder, आदि में ये बहुत ही अच्छा प्रभाव दिखाती है।
        चंद्रप्रभा वटी सूजाक के कारण होने वाली दिक्कतों को नष्ट करती है। पुराने सूजाक में इसका उपयोग होता है। सूजाक के कारण होने वाले फोड़े, फुंसी, खुजली आदि में इस दवा को चन्दनासव या सारिवाद्यासव के साथ दिया जाता है। यह दवा शरीर से विष को निकालती है और धातुओं का शोधन करती है।
    वात के अधिक होने पर कब्ज़ और मन्दाग्नि हो जाती है जो ज्यादा दिन रहने पर भूख न लगना, अपच, ज्यादा प्यास, कमजोरी आदि दिक्कतें पैदा करती हैं। इसमें में भी इस दवा का प्रयोग अच्छा असर दिखाता है।
    यह दवा बलवर्धक, पोषक, कांतिवर्धक, और मूत्रल है।
       किसी कारण से जब शुक्रवाहिनी और वातवाहिनी नाड़ियाँ कमज़ोर हो जाती हैं तब इस स्थिति में वीर्य अपने आप ही निकल जाता है जैसे की स्वप्नदोष nocturnal discharge/night fall, पेशाब के साथ वीर्य जाना discharge of semen with urine , premature ejaculation. ऐसे में इस दवा को गिलोय के काढ़े giloy decoction के साथ दिया जाना चाहिए। यह दवा पुरुष जननेंद्रिय विकारों male reproductive system related diseases में अच्छा प्रभाव दिखाती है।
    जब मूत्र कम मात्रा में बने और मूत्राघात हो तो इसका प्रयोग पुनर्नवासव या लोध्रासव के साथ किया जाता है।
    नीचे इस दवा के घटक, गुण, सेवनविधि, और मात्रा के बारे में जानकारी दी गयी है।
     चिकित्सीय उपयोग :
    मूत्र रोग, अनाह (Distension of abdomen due to obstruction to passage of urine and stools), मुत्रक्रिछा (Dysuria), प्रमेह (Urinary disorders), अश्मरी (Calculus), मूत्रघात (Urinary obstruction)
    अर्श (Haemorrhoids), भगंदर (Fistula-in-ano),
    स्त्रीरोग (Gynaecological disorders), आर्तव रज (Dysmenorrhoea)
    वीर्य सम्बन्धी दोष, शुक्र दोष (Vitiation of semen), दुर्बल्य (Weakness)
    Natural safe effective diuretic मूत्रल
    विबंध (Constipation), शूल (Colicky Pain)
    अरुचि (Tastelessness), मन्दाग्नि (Impaired digestive fire)
    ग्रंथि (Cyst), पांडू (Anemia), कमाला (Jaundice), प्लीहोदर (Disorder of Spleen, Ascites associated with splenomegaly)
    अर्बुद (Tumor), कटी शूल (Lower backache)
    कुष्ठ (Diseases of skin), कंडू (Itching)
    आंत्र वृद्धि (Hernia), अंड वृद्धि (prostate)
    दांत रोग (Dental disease), नेत्र रोग (Eye disorder)
     घटक Complete list of ingredients :
    1. Candraprabha (Karpura)
    Sublimated Extract 3 g
    2. Vaca Rhizome 3 g
    3. Musta Rhizome 3 g
    4. Bhunimba (Kiratatikta)
    Plant 3 g
    5. Amrita (Guduci) Stem 3 g
    6. Daruka (Devadaru) Heart Wood 3 g
    7. Haridra Rhizome 3 g
    8. Ativisha Root 3 g
    9. Darvi (Daruharidra) Stem 3 g
    10. Pippalimula (Pippali)
    Root 3 g
    11. Citraka Root 3 g
    12. Dhanyaka Fruit 3 g
    13. Haritaki Pericarp 3 g
    14. Bibhitaka Pericarp 3 g
    15. Amalaki Pericarp 3 g
    16. Cavya Stem 3 g
    17. Vidang Fruit 3 g
    18. Gajapippali Fruit 3 g
    19. Sunthi Rhizome 3 g
    20. Marica Fruit 3 g
    21. Pippali Fruit 3 g
    22. Makshika dhatu bhasma (Makshika)
    Mineral 3 g
    23. Yava kshara (Yava) Plant (Whole) 3 g
    24. Sarji Kshara Svarjikshara Alkalli preparation
    3 g
    25. Saindhava lavan Salt 3 g
    26. Sauvarcala lavan Salt 3 g
    27. Vida lavan Salt 3 g
    28. Trivrit Root 12 g
    29. Danti Root 12 g
    30. Patraka (Tejapatra) Leaf 12 g
    31. Tvak Stem bark 12 g
    32. Ela (Sukshmaila) Seed 12 g
    33. Vanshlochan Silicacious Concretion
    12 g
    34. loha (Lauha) bhasma
    24 g
    35. Sita 48 g
    36. Shilajeet 96 g
    37. Guggulu (Exd.) 96 g
    सेवन विधि और मात्रा How to take and dosage :
    1-2 tablets/250mg to 500mg, पानी/दूध/गिलोय काढ़ा/दारुहल्दी रस/बेल की पत्ती का रस/ गोखरू काढ़ा या केवल शहद के साथ लें

    त्रिफला चूर्ण के गुण फायदे उपयोग



      त्रिफला आयुर्वेद में कई रोगों का सटीक इलाज करता है। यह 3 औषधियों से बनता है। बेहड, आंवला और हरड इन तीनों के मिश्रण से बना चूर्ण त्रिफला कहा जाता है। ये प्रकृति का इंसान के लिए रोगनाशक और आरोग्य देने वाली महत्वपूर्ण दवाई है। जिसके बारे में हर इंसान को पता होना चाहिए। ये एक तरह की एन्टिबायोटिक है। त्रिफला आपको किसी भी आयुर्वेदिक दुकान पर मिल सकता है। लेकिन आपको त्रिफला का सेवन कैसे करना है और कितनी मात्रा में करना है ये भी आपको पता होना चाहिए। हाल में हुए एक नए शोध में इस बात का खुलासा हुआ है की त्रिफला के सेवन से कैंसर के सेल नहीं बढ़ते । त्रिफला के नियमित सेवन से चर्म रोग, मूत्र रोग और सिर से संबन्धित बीमारियां जड़ से ख़त्म करती है।
    त्रिफला के फायदे
    * त्रिफला चूर्ण को पानी में डालकर कुल्ला करने से मुंह के छाले दूर होते है।
    *सुबह शाम 5-5 ग्राम त्रिफला चूर्ण को लेने से दाद, खाज, खुजली और चर्म रोग में लाभ मिलता है।
    * नियमित त्रिफला खाने से आखों की ज्योति बढ़ती है।
    * कब्ज दूर करने के लिए ईसबगोल की 2 चम्मच को त्रिफला के चूर्ण के साथ मिलाकर गुनगुने पानी में डालकर सेवन करें या फिर सोने से पहले 5 ग्राम त्रिफला के चूर्ण को गुनगुने पानी या गरम दूध के साथ लेने से भी कब्ज से राहत मिलती है।
    *त्रिफला का काढा बनाकर पीने से चोट के घाव जल्दी भर जातें हैं क्योंकी त्रिफला एंटिसेप्टिक होता है।
    * मोटापा कम करने के लिए त्रिफला बेहद असरकारी होता है। गुनगुने पानी में त्रिफला और शहद को मिलाकर सेवन करने से पेट की चर्बी कम होती है।
    *जिन लोगों को अजीर्ण की दिक्कत होती हो वे 5 ग्राम त्रिफला का सेवन करें।
    * शहद में त्रिफला का चूर्ण मिक्स करके इसका सेवन करने से त्वचा संबंधी रोग जैसे चकते पड़ना आदि ठीक हो जातें हैं।
    *त्रिफला के पानी से  गरारे करने से टॉन्सिल्स से राहत मिलती है
    * त्रिफला के चूर्ण को पानी में डालकर आखों को धोने से आखों की परेशानी दूर होती है। मोतियाबिंद, आखों की जलन, आखों का दोष और लंबे समय तक आखों की रोशनी को बढ़ाए रखने के लिए 10 ग्राम गाय के घी में 1 चम्मच त्रिफला का चूर्ण और 5 ग्राम शहद को मिलाकर सेवन करें।
    त्रिफला बनाने का आयुर्वेदिक  नियम
    त्रिफला बनाने के लिए हरदए बहेड़ा और आंवले को इस अनुपात में लें
    1:2:3
    यानि कि एक हरदए दो बहेड़ा और तीन आंवला।
    त्रिफला लेने के आयुवेर्दिक नियम क्या हैं?
    हमेशा कभी भी रात के समय में त्रिफला चूर्ण को गर्म दूध के साथ ही लेना चाहिए।
    सुबह के समय में गुड के साथ त्रिफला का सेवन करना चाहिए।
    दोपहर के खाने के बाद दो से तीन ग्राम की मात्रा में गुनगुने पानी के साथ त्रिफला का सेवन करें।
    डायबिटीज और पेशाब संबधी रोगों में त्रिफला को गुनगुने पानी के साथ रात के समय में सेवन करें।
    रेडिएशन के खतरे से भी त्रिफला बचाता है।
    *त्रिफला प्राकृति और आयुर्वेद का एैसा वरदान है जिसे यदि आप नियमित सेवन करते हो तो आप जीवन भर स्वस्थ और जंवान बने रहोगे।

    *सुबह पानी में 5 ग्राम त्रिफला चूर्ण भिगो कर रख दें, शाम को छानकर पी लें। शाम को उसी त्रिफला चूर्ण में पानी मिलाकर रखें, और सुबह उसी पानी से आँखो पर छींटे लगाए ऐसा करने से मुँह के छाले और आंखों की जलन, कुछ ही समय में ठीक हो जायेंगे
    *रात को सोते वक्त 5 ग्राम त्रिफला चुर्ण हल्के गर्म दूध अथवा गर्म पानी के साथ लेने से कब्ज में बहुत फायदा होता है
    *एक चम्मच त्रिफला को एक गिलास पानी में दो- तीन घंटे के लिए भिगो दें, फिर इसके निकाले हुए पानी को छानकर मुँह में भरकर थोड़ी देर घुमाए इससे आप के मुँह के छाले ठीक हो जायेंगे
    *ईसबगोल की भूसी व त्रिफला को बराबर मात्रा में मिलाकर गुनगुने पानी से लेने से भी कब्ज में राहत मिलती है
    *त्रिफला के सेवन से बालों को भी बहुत फायदा होता है जिन लोगो के बाल जरुरत से ज्यादा झड़ते है वह अगर सुबह शाम एक -एक चमच्च त्रिफला का सेवन करे तो ये समस्या बहुत कम हो जाती है
    त्रिफला के सेवन से बाल मजबूत, घने व मुलायम व लम्बे हो जाते है
    *अगर आप को ज्यादा थकान महसूस होती है तो त्रिफला का चूर्ण लेने से यह समस्या समाप्त हो जाती है और आप अपने आप को पहले से ज्यादा फुर्तीला महसूस करेंगे
    साथ ही त्रिफला भूख बढानें और ब्लड सर्कुलेशन सही करने तथा खून बढ़ाने में भी सहायक होता है
    *त्रिफला, शरीर में एंटीबॉडी के उत्पादन को बढ़ावा देता है जो शरीर में एंटीजन के खिलाफ लड़ते है और शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है
    *त्रिफला में भरपूर मात्रा में एंटी ऑक्सीडेंट होते है जो कि सेल्स के मेटाबोल्जिम को नियमित रखते है और उनकी प्रक्रिया को बनाएं रखते है। त्रिफला से उम्र बढ़ाने वाले कारक भी कम होते है, इसी कारण त्रिफला का सेवन करने वाले लोगो की उम्र कम दिखाई देती है

    त्रिफला के नुकसान
    ब्लड प्रेशर
    त्रिफला का अधिक सेवन से ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव होने लगता है। और ब्लड प्रेशर के मरीजों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
    दस्त-

    यदि आप त्रिफला का प्रयोग बिना डाक्टर के परामर्श के करते हैं तो इससे डायरिया हो सकता है। क्योंकि यह शरीर में पानी की कमी करता है। और इंसान को डायरिया हो जाता है।
    अनिंद्रा और बेचैनी-
    कई बार कुछ लोग पेट साफ करने के लिए त्रिफला का सेवन करने लगते हैं लेकिन ऐसे में वे नियमित रूप से त्रिफला का सेवन करने लगते हैं जिस वजह से उन्हें अनिंद्राऔर बेचैनी की समस्या हो सकती है।
    इसमें कोइे दो राय नहीं है कि त्रिफला सेहत के लिए बेहद असरकारी और फायदेमंद दवा है। लेकिन इसके लिए इस बात का ध्यान रखना भी जरूरी है की कितनी मात्रा में त्रिफला का सेवन करना चाहिए।

    Saturday, March 25, 2017

    तालीस पत्र के गुण फायदे उपयोग


    तालीस का वृक्ष बहुत बड़ा होता है जो अधिकतर जंगलों में ही मिलता है ।
    इसकी लकड़ी फर्नीचर बनाने के काम आती है |इसकी तासीर थोड़ी गर्म है । यह प्राकृतिक रूप से जन्म लेने वाला वृक्ष दूर से ही अपने लंबे पत्तों के कारण पहचाना जाता है ।
    गुण तथा लाभ
    तालीस पत्र लघु-तीक्ष्ण-गरम है । इससे खांसी, वात, अरुचि, गल्म, मंदाग्नि और क्षय रोग का नाश होता है । हृदय रोगियों के लिए यह अतिगुणकारी है ।
    विभिन्न रोगों मे उपयोग-
    ज्वर होना-चन्दन की लकड़ी और तालीस पत्र को पानी मे पीसकर लेप करने से बुखार,खांसी,सिरदर्द,जुकाम मे लाभ होता है|
    ब्रोंकाईटीज़,सांस की नली की सूजन-
    पुरानी श्वास नली की सूजन को ठीक करने के लिए तालीस पत्र का काढ़ा बानाकर उपयोग करें|
    सभी रोगों मे-
    10 ग्राम तालीस पत्र ,20 ग्राम काली मिर्च,30ग्राम सोंठ,40 ग्राम पीपल,50 ग्राम वंश लोचन,60 ग्राम इलायची तथा 300 ग्राम मिश्री इन सबको लेकर बारीक चूर्ण बना लें |इसे शहद के साथ लेने से सभी रोगों मे फायदा होता है|बुखार ,काँसी,हिचकी,,श्वास रोग,पेचिश रोग दूर होते हैं|
    गर्भ निरोध-
    तालीस पत्र और गेरू 10-10 मात्रा मे लेकर बारीक चूर्ण तैयार करें| मासी धर्म हो चुकने के बाद इस मिश्रण को लगातार 2 दिन लेने से गर्भ धारण नहीं होता| सुबह शाम दोनों वक्त लेना है|




    Monday, March 20, 2017

    गटटे्, कोर्न्स, आटन, गोरखूल :घरेलू चिकित्सा


      कॉर्न या गोखरू देखने में हैं छोटा लेकिन दर्द बहुत. देता है| यह सख्त स्किन पर पैच जैसा होता है जो दर्द भरा होता है.| कॉर्न जोड़ों पर या विशेषकर पैर के तलवे पर निकलता है|कॉर्न में दर्द होने के कारण चलने-फिरने में दर्द होता है. गौरतलब है की जब आप पैर के किसी अंग पर जोर देकर चलते हैं या गलत जूतें पहनते हैं तो इसका असर आपके पैरों में पड़ता है और इसी कारण कॉर्न बन जाते हैं. लेकिन आपके इस दर्द  के आसान उपचार लिख देता हूँ- 
    कच्चा पपीता-
    कच्चा पपीता स्किन के लिए बहुत फायदेमंद होता है. पपीते का रस कॉर्न के कष्ट से आराम दिलाने में बहुत काम करता है. विधि- कच्चे पपीते के स्लाइस काट कर उनका रस निचोड़ लें. अब उस रस को कॉर्न पर लगाकर रात भर यूं ही रख दें. 
    मूलेठी-
    जब कॉर्न बनना शुरू होता है तब मूलेठी इसके दर्द को कम करने में असरदार रूप में काम करता है. मूलेठी में ग्लीसेरइज़ेन नामक तत्व होता है जो दर्द को कम करने और कड़क त्वचा को मुलायम बनाने में प्रभावकारी रूप से काम करता है.
    विधि- मूलेठी के तीन-चार स्टिक ले लें और इनको ग्राइन्ड करके पेस्ट बना लें. इस पेस्ट में तिल का तेल या सरसों का तेल मिलायें. अब इस पेस्ट को सोने के पहले कॉर्न पर धीरे-धीरे रगड़ें. रात भर इसको काम करने दें, इससे स्किन नरम हो जाएगा और ये आकार में छोटा होने लगेगा.



    नींबू-

    नींबू का एन्टीफंगल और एन्टीबैक्टिरीयल गुण कॉर्न के उपचार में काम आता है. इन गुणों के अलावा नींबू का एसिडीक गुण हार्ड स्किन को सॉफ्ट और हिल-अप करने में बहुत मदद करता है.
    विधि - ताजे नींबू का स्लाइस लेकर कॉर्न के ऊपर रखकर कपड़ा या गॉज से अच्छी तरह से बांधकर रातभर रख दें. रोज़ाना इस्तेमाल करने के बाद दो हफ़्ते के बाद आपको इसका असर दिखने लगेगा.
    बेकिंग सोडा -
    बेकिंग सोडा के एसिडिक नेचर के कारण ये कॉर्न के आस-पास के रफ स्किन को सॉफ्ट बनाने में बहुत मदद करता है. बेकिंग सोडा में नींबू का रस मिलाने से और भी वह प्रभावकारी बन जाता है.
    विधि- ज़रूरत के अनुसार बेकिंग सोडा लें और उसमें पेस्ट बन जायें इतना नींबू का रस मिलायें. अब इस पेस्ट को कॉर्न पर अच्छी तरह से लगाकर रात भर कपड़ा या गॉज से बांधकर रखें. लेकिन कॉर्न का मुँह अगर खुल गया है या इंफेक्शन हो गया है तो कभी भी इस उपचार को प्रयोग में न लायें, इससे जलन होगा और कॉर्न की अवस्था और भी बदतर हो जायेगी.
    जंगली प्याज़-
    प्याज़ का बल्ब या कंद कॉर्न के सूजन और त्वचा में जो कड़ापन आ जाता है उसको कम करने में असरदार रूप से काम करती है. प्याज़ का एन्टीफंगल गुण इंफेक्शन से भी बचाता है और कॉर्न को कम करने में मदद करता
    विधि -प्याज़ के कंद को भून लें और कॉर्न पर रखकर अच्छी तरह से बांध लें. रात भर इसको बांधे रहने दें. 



    लहसुन-

    लहसुन का एन्टीबैक्टिरीयल और एन्टीफंगल गुण कॉर्न के त्वचा को नरम करने में बहुत मदद करता है. 
    विधि- ज़रूरत के अनुसार लहसुन के कुछ फांक ले लें और उनको अच्छी तरह से पिसकर पेस्ट बना लें. अब उस पेस्ट को कॉर्न पर लगाकर अच्छी तरह से रात भर बांधकर रखें. यह कार्न का आसान उपचार है|
    फुट कॉर्न  ठीक करने का नुस्खा -
     1 भाग सफेद सिरके और एक तिहाई पानी के घोल को कॉर्न पर लगाएं। फिर उस एरिया को बैंडेज लगा कर रातभर छोड़ दें।जरूर आराम होगा|

    Sunday, March 12, 2017

    किडनी फेल,गुर्दे खराब रोग की जानकारी और उपचार :: Kidney failure, information and treatment


    किडनी कैसे काम करती है?
    किडनी एक बेहद स्पेशियलाइज्ड अंग है. इसकी रचना में लगभग तीस तरह की विभिन्न कोशिकाएं लगती हैं. यह बेहद ही पतली नलियों का अत्यंत जटिल फिल्टर है जो हमारे रक्त से निरंतर ही पानी, सोडियम, पोटैशियम तथा ऐसे अनगिनत पदार्थों को साफ करके पेशाब के जरिए बाहर करता रहता है।
    यह फिल्टर इस मामले में अद्भुत है कि यहां से जो भी छनकर नली में नीचे आता है उसे किडनी आवश्यकतानुसार वापस रक्त में खींचता भी रहता है, और ऐसी पतली फिल्ट्रेशन नलियों की तादाद होती है? एक गुर्दे में ढाई लाख से लगाकर नौ लाख तक नेफ्रान या नलियां रहती हैं. हर मिनट लगभग एक लीटर खून इनसे प्रभावित होता है ताकि किडनी इस खून को साफ कर सके. दिन में लगभग डेढ़ हजार लीटर खून की सफाई चल रही है. और गुर्दे केवल यही काम नहीं करते बल्कि यह तो उसके काम का केवल एक पक्ष है, जिसके बारे में थोड़ा-थोड़ा पता सामान्यजनों को भी है परंतु क्या आपको ज्ञात है कि किडनी का बहुत बड़ा रोल प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेड (शक्कर आदि) तथा फैट (चर्बी) की मेटाबोलिज्म (पाचन/ चय-अपचय) में भी है. इसलिए किडनी खराब होने पर कुपोषण के लक्षण हो सकते हैं बल्कि वे ही प्रमुख लक्षण बनकर सामने आ सकते हैं. हार्मोंस के प्रभाव में भी गुर्दों का अहम रोल है. इंसुलिन, विटामिन डी, पेराथायरायड आदि के प्रभाव को गुर्दे की बीमारी बिगाड़ सकती है।
    शरीर में रक्त बनाने की सारी प्रक्रिया में गुर्दों का बेहद अहम किरदार है. गुर्दे में बनने वाला इरिथ्रोपोइरिन नामक पदार्थ खून बनाने वाली बोनमैरो को (बोनमैरो को आप हड्डियों में खून पैदा करने वाली फैक्टरी कह सकते हैं) खून बनाने के लिए स्टीम्यूलेट करता है. यह न हो तो शरीर में खून बनना बंद या कम हो जाता है. इनमें बहुत-सी बातों से स्वयं डॉक्टर भी परिचित नहीं होंगे या उन्होंने कभी पढ़ा तो था पर अब याद नहीं. नतीजा कई डाक्टरों का भी इस महत्वपूर्ण तथ्य की ओर ध्यान नहीं जाता है कि किडनी फेल होने वाला मरीज पेशाब की शिकायत या सूजन आदि के अलावा और भी कई तरह से सामने आ सकता है.
    सवाल यह है कि हमें कब सतर्क होकर Kidney का टेस्ट कराना चाहिए. कौन-से लक्षण हैं जो किडनी फेल्योर की ओर इंगित कर सकते हैं?
    हमारी किडनी शरीर में संतुलन बने रखने के कई कार्यों का निष्पादन करती हैं। वे अपशिष्ट उत्पादों को फिल्टर करके पेशाब से बहार निकालते हैं एवं निष्कासन करते हैं। वे शरीर में पानी की मात्रा, सोडियम, पोटेशियम और कैल्शियम की मात्रा (इलेक्ट्रोलाइट्स) को संतुलित करते हैं। वह अतिरिक्त अम्ल एवं क्षार निकालने में मदद करते हैं जिससे शरीर में एसिड एवं क्षार का संतुलन बना रहता है।
    शरीर में किडनी का मुख्य कार्य खून का शुद्धीकरण करना है। जब बीमारी के कारण दोनों किडनी अपना सामान्य कार्य नहीं कर सके, तो किडनी की कार्यक्षमता कम हो जाती है, जिसे हम किडनी फेल्योर कहते हैं।

    खून में क्रीएटिनिन और यूरिया की मात्रा की जाँच से किडनी की कार्यक्षमता की जानकारी मिलती है। चूंकि किडनी की कार्यक्षमता शरीर की आवश्यकता से अधिक होती है। इसलिए यदि किडनी की बीमारी से थोड़ा नुकसान हो जाए, तो भी खून के परीक्षण में कई त्रुटि देखने को नहीं मिलती है। परन्तु जब रोगों के कारण दोनों किडनी 50 प्रतिशत से अधिक ख़राब हो गई हो, तभी खून में क्रीएटिनिन और यूरिया की मात्रा सामान्य से अधिक पाई जाती है।
    क्या एक किडनी खराब होने से किडनी फेल्योर हो सकता है नहीं, यदि किसी व्यक्ति की दोनों स्वस्थ किडनी में से एक किडनी खराब हो गई हो या उसे शरीर से किसी कारणवश निकाल दिया गया हो, तो भी दूसरी किडनी अपनी कार्यक्षमता को बढ़ाते हुए शरीर का कार्य पूर्ण रूप से कर सकती है।
    *किडनी फेल्योर के दो मुख्य प्रकार है :
    एक्यूट किडनी फेल्योर और क्रोनिक किडनी फेल्योर। इन दो प्रकार के किडनी फेल्योर के बीच का अंतर स्पष्ट मालूम होना चाहिए।
    एक्यूट किडनी फेल्योर : एक्यूट किडनी फेल्योर में सामान्य रूप से काम करती दोनों किडनी विभिन्न रोगों के कारण नुकसान होने के बाद अल्प अवधि में ही काम करना कम या बंद कर देती है| यदि इस रोग का तुरन्त उचित उपचार किया जाए, तो थोड़े समय में ही किडनी संपूर्ण रूप से पुन: काम करने लगती है और बाद में मरीज को दवाइ या परहेज की बिलकुल जरूरत नहीं रहती| एक्यूट किडनी फेल्योर के सभी मरीजों का उपचार दवा और परहेज द्वारा किया जाता है |कुछ मरीजों में अल्प (कुछ दिन के लिए) डायालिसिस की आवश्यकता होती है|
    क्रोनिक किडनी फेल्योर : 
    क्रोनिक किडनी फेल्योर (क्रोनिक किडनी डिजीज – CKD) में अनेक प्रकार के रोगों के कारण किडनी की कार्यक्षमता क्रमशः महीनों या वर्षों में कम होने लगती है और दोनों किडनी धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती हैं| वर्तमान चिकित्सा विज्ञान में क्रोनिक किडनी फेल्योर को ठीक या संपूर्ण नियंत्रण करने की कोई दवा उपलब्ध नहीं है| क्रोनिक किडनी फेल्योर के सभी मरीजों का उपचार दवा, परहेज और नियमित परीक्षण द्वारा किया जाता है| शुरू में उपचार का हेतु कमजोर किडनी की कार्यक्षमता को बचाए रखना, किडनी फेल्योर के लक्षणों को काबू में रखना और संभावित खतरों की रोकथाम करना है| इस उपचार का उद्देश्य मरीज के स्वास्थ्य को संतोषजनक रखते हुए, डायालिसिस की अवस्था को यथासंभव टालना है| किडनी ज्यादा खराब होने पर सही उपचार के बावजूद रोग के लक्षण बढ़ते जाते हैं और खून की जाँच में क्रीएटिनिन और यूरिया की मात्रा अधिक बढ़ जाती है, ऐसे मरीजों में सफल उपचार के विकल्प सिर्फ डायालिसिस और किडनी प्रत्यारोपण है|
    * नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम :
    नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम एक आम किडनी की बीमारी है। पेशाब में प्रोटीन का जाना, रक्त में प्रोटीन की मात्रा में कमी, कोलेस्ट्रॉल का उच्च स्तर और शरीर में सूजन इस बीमारी के लक्षण हैं।
    किडनी के इस रोग की वजह से किसी भी उम्र में शरीर में सूजन हो सकती है, परन्तु मुख्यतः यह रोग बच्चों में देखा जाता है। उचित उपचार से रोग पर नियंत्रण होना और बाद में पुनः सूजन दिखाई देना, यह सिलसिला सालों तक चलते रहना यह नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की विशेषता है। लम्बे समय तक बार-बार सूजन होने की वजह से यह रोग मरीज और उसके पारिवारिक सदस्यों के लिए एक चिन्ताजनक रोग है।
    नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में किडनी पर क्या कुप्रभाव पडता है? सरल भाषा में यह कहा जा सकता है की किडनी शरीर में छन्नी का काम करती है, जिसके द्वारा शरीर के अनावश्यक उत्सर्जी पदार्थ अतिरिक्त पानी पेशाब द्वारा बाहर निकल जाता है।
    नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में किडनी के छन्नी जैसे छेद बड़े हो जाने के कारण अतिरिक्त पानी और उत्सर्जी पदार्थों के साथ-साथ शरीर के लिए आवश्यक प्रोटीन भी पेशाब के साथ निकल जाता है, जिससे शरीर में प्रोटीन की मात्रा कम हो जाती है और शरीर में सूजन आने लगती है।
    पेशाब में जानेवाले प्रोटीन की मात्रा के अनुसार रोगी के शरीर में सूजन में कमी या वृध्दि होती है। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में सूजन होने के बाद भी किडनी की अनावश्यक पदार्थों को दूर करने की कार्यक्षमता यथावत बनी रहती है अर्थात किडनी ख़राब होने की संभावना बहुत कम रहती है।
    * नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम किस कारण से होता है?
    नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम होने का कोई निश्चित कारण नहीं मिल पाया है। श्वेतकणों में लिम्फोसाइट्स के कार्य की खामी (Auto Immune Disease) के कारण यह रोग होता है ऐसी मान्यता है। आहार में परिवर्तन या दवाइँ को इस रोग के लिए जिम्मेदार मानना बिलकुल गलत मान्यता है।
    इस बीमारी के 90% मरीज बच्चे होते हैं जिनमें नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का कोई निश्चित कारण नहीं मिल पाता है। इसे प्राथमिक या इडीओपैथिक नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम भी कहते हैं। (सामान्यतः नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम दो से आठ साल की उम्र के बच्चों में ज्यादा पाया जाता है।)प्राथमिक नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम चार महत्वपूर्ण पैथोलाजिकल रोगों के कारण हो सकता है। मिनीमल चेन्ज डिजीज (MCD), फोकल सेग्मेंन्टल ग्लोमेरुलोस्केलेरोसिस (FSGS), मेम्ब्रेनस नेफ्रोपेथी और मेम्ब्रेनोप्रोलिफरेटिव ग्लोमेंरुलो नेफ्राइटिस (MPGN)। प्राथमिक नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम एक विशेष निदान है जिससे सेकेंडरी करणों के एक-एक कर हटाने के बाद ही इनका निदान होता है।
    इसके 10 % से भी कम मामलों में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम वयस्कों में अलग-अलग बीमारियों/करणों की वजह से हो सकता है। जैसे संक्रमण, किसी दवाई से हुआ नुकसान, कैंसर, वंशानुगत रोग, मधुमेह, एस. एल. ई. और एमाइलॉयडोसिस आदि में यह सिंड्रोम उपरोक्त बीमारियों के कारण हो सकता है।
    एम. सी. डी. अर्थात् मिनीमल चेन्ज डिजीज, बच्चों में नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का सबसे आम कारण है। यह रोग 35 प्रतिशत छोटे बच्चों में (छः साल की उम्र तक) और 65 % मामलों में बड़े बच्चों में इडियोपैथिक (बिना किसी कारण) नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में होता है।
    एम. सी. डी. (मिनीमल चेन्ज डिजीज) के रोगी में रक्तचाप सामान्य रहता है, लाल रक्त कोशिकाएं, पेशाब में अनुपस्थित रहती है और सीरम क्रीएटिनिन और कॉम्प्लीमेंट C3 / C4 के मूल्य सामान्य रहते हैं। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के सभी कारणों में एम. सी. डी सबसे कम खराब बीमारी है। 90 % रोगी स्टेरॉयड उपचार से ही ठीक हो जाते हैं।
    * नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मुख्य लक्षण :
    यह रोग मुख्यतः दो से छः साल के बच्चों में दिखाई देता है। अन्य उम्र के व्यक्तियों में इस रोग की संख्या बच्चों की तुलना में बहुत कम दिखाई देती है।
    आमतौर पर इस रोग की शुरुआत बुखार और खाँसी के बाद होती है।
    रोग की शुरुआत के खास लक्षणों में आँखों के नीचे एवं चेहरे पर सूजन दिखाई देती है। आँखों पर सूजन होने के कारण कई बार मरीज सबसे पहले आँख के डॉक्टर के पास जाँच के लिए जाते हैं।
    यह सूजन जब मरीज सोकर सुबह उठता है तब ज्यादा दिखती है, जो इस रोग की पहचान है। यह सूजन दिन के बढ़ने के साथ धीरे-धीरे कम होने लगती है और शाम तक बिलकुल कम हो जाती है।
    रोग के बढ़ने पर पेट फूल जाता है, पेशाब कम होता है, पुरे शरीर में सूजन आने लगती है और वजन बड़ जाता है।
    कई बार पेशाब में झाग आने और जिस जगह पर पेशाब किया हो, वहाँ सफेद दाग दिखाई देने की शिकायत होती है।
    इस रोग में लाल पेशाब होना, साँस फूलना अथवा खून का दबाव बढ़ना जैसे कोई लक्षण नहीं दिखाई देते हैं।
    नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में कौन से गंभीर खतरे उत्पन्न हो सकते हैं?
    नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में जो संभावित जटिलताएं होती है, जल्दी संक्रमण होना, नस में रक्त के थक्के जमना (डीप वेन थ्रोम्बोसिस), रक्ताल्पता, बढ़े हुए कोलेस्ट्रोल और ट्राइग्लिसराइड्स के कारण ह्रदय रोग होना, किडनी खराब होना आदि महत्वपूर्ण है।



    नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का निदान :

    उन रोगियों में, जिन्हें शरीर में सूजन है उनके लिए पहला चरण है नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का निदान करना। प्रयोगशाला परीक्षण से इसकी पुष्टि करनी चाहिए।
    पेशाब में अधिक मात्रा में प्रोटीन जाना।
    रक्त में प्रोटीन स्तर कम होना।
    कोलेस्ट्रोल के स्तर का बढ़ा होना।
    * पेशाब की जाँच :
    पेशाब में अधिक मात्रा में प्रोटीन जाना यह नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के निदान की सबसे महत्वपूर्ण निशानी है।
    पेशाब में श्वेतकणों, रक्तकणों या खून का नहीं जाना इस रोग के निदान की महत्वपूर्ण निशानी है।
    24 घण्टों में पेशाब में जानेवाले प्रोटीन की कुल मात्रा 3 ग्राम से अधिक होती है।
    24 घंटे में शरीर से जो प्रोटीन कम हुआ है, उसका अनुमान 24 घंटे का पेशाब का संग्रह करके लगाया जा सकता है। इससे भी ज्यादा सरल है स्पॉट प्रोटीन/क्रीएटिनिन रेश्यो। इन परीक्षणों से प्रोटीन के नुकसान की मात्रा का सटीक माप प्राप्त होता है। इन परीक्षणों से पता चलता है की प्रोटीन का नुकसान हल्की, मध्यम या भारी मात्रा में हुआ है। इसके निदान के अलावा 24 घंटे की पेशाब में संभावित प्रोटीन की जाँच से इस बीमारी में उपचार के पश्चात् कितना सुधार हुआ है, यह भी जाना जा सकता है। उपचार के लिए इस पर नजर रखना अति उपयोगी है।पेशाब की जाँच सिर्फ रोग के निदान के लिए नहीं परन्तु रोग के उपचार कर नियमन के लिए भी विशेष महत्वपूर्ण है। पेशाब में जानेवाला प्रोटीन यदि बंद हो जाए, तो यह उपचार की सफलता दर्शाता है।
    * खून की जाँच :
    सामान्य जाँच : अधिकांश मरीजों में हीमोग्लोबिन, श्वेतकणों की मात्रा इत्यादि की जाँच आवश्कतानुसार की जाती है। निदान के लिए जरुरी जाँच: नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के निदान के लिये खून की जाँच में प्रोटीन (एल्ब्यूमिन) कम होना और कोलेस्ट्रोल बढ़ जाना आवश्यक है। सामान्यतः खून की जाँच क्रीएटिनिन की मात्रा सामान्य पाई जाती है। अन्य विशिष्ट जाँच: डॉक्टर द्वारा आवश्कतानुसार कई बार करायी जानेवाली खून की विशिष्ट जाँचों में कोम्पलीमेंट, ए. एस. ओ. टाइटर, ए. एन. ए. टेस्ट, एड्स की जाँच, हिपेटाइटिस – बी की जाँच वगैरह का समावेश होता है। 2. रेडियोलॉजिकल जाँच : एस परीक्षण में पेट और किडनी की सोनोग्राफी, छाती का एक्सरे वगैरह शामिल होते हैं। किडनी की बायोप्सीनेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के सही कारण और अंर्तनिहित प्रकार को पहचानने में किडनी की बायोप्सी सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण है। किडनी बायोप्सी में किडनी के ऊतक का एक छोटा सा नमूना लिया जाता है और प्रयोगशाला में इसकी माइक्रोस्कोप द्वारा जाँच की जाती है|
    नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का उपचार :
    नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में उपचार का लक्ष्य है मरीज को लक्षणों से राहत दिलवाना, पेशाब में जो प्रोटीन का नुकसान हो रहा है, उसमें सुधार लाना, जटिलताओं को रोकना और उनका इलाज करना और किडनी को बचाना है। इस रोग का उपचार आमतौर पर एक लंबी अवधि या कई वर्षों तक चलता है।
    शरीर में सूजन, पेशाब में प्रोटीन, खून में कम प्रोटीन और कोलेस्ट्रोल का बढ़ जाना नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम की निशानी है।पेशाब की जाँच नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के निदान और उपचार के नियमन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।संक्रमण की वजह से नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में सूजन बार-बार हो सकती है, इसलिए संक्रमण न होने की सावधानी महत्वपूर्ण है
    आहार में परहेज करना : 
    सुजन हो और पेशाब कम आ रहा हो, तो मरीज को कम पानी और कम नमक लेने की सलाह दी जाती है। अधिकांश बच्चों को प्रोटीन सामान्य मात्रा में लेने की सलाह दी जाती है।
    आहार में सलाह : मरीज के लिए आहार में सलाह या प्रतिबंध लगाते जाते हैं वो विभिन्न प्रकार के होते हैं। प्रभावी उपचार एवं उचित आहार से सूजन खत्म हो जाती है।
    सूजन की मौजुदगी में :
     उन मरीजों को जिन्हें शरीर में सूजन है, उन्हें आहार में नमक में कमी और टेबल नमक में प्रतिबंध और वह भोज्य सामग्री जिसमें सोडियम की मात्रा अधिक हो, उन पर प्रतिबंध लगाना चाहिए जिससे शरीर में सूजन और तरल पदार्थों को शरीर में जमा होने से रोका जा सके। वैसे इस बीमारी में तरल पदार्थों पर प्रतिबंध की आवश्यकता नहीं ह
    सूजन न होने वाले मरीज : 
    जिन रोगियों को प्रतिदिन स्टेरॉयड की उच्च मात्रा की खुराक मिलती है, उन्हें नमक की मात्रा सिमित करनी चाहिए जिससे रक्तचाप बढ़ने का जोखिम न हो । जिन मरीजों को सूजन है उन्हें पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन दिया जाना चाहिए जिससे प्रोटीन का जो नुकसान होता है उसकी भरपाई हो सके और कुपोषण से बचाया जा सके। पर्याप्त मात्रा में कैलोरी और विटामिन्स भी मरीजों को देना चाहिए
    *लक्षण मुक्त मरीज (Remission) :
    लक्षण मुक्त अवधि के दौरान सामान्य, स्वस्थ आहार लेने की सलाह दी जाती है।
    आहार पर अनावश्यक प्रतिबंध हटाना चाहिए। नमक और तरल पदार्थ का प्रतिबंध न रखें। मरीज को पर्याप्त मात्रा में प्रोटीन दें।
    अगर किडनी डिजीज है तो प्रोटीन की मात्रा को सीमित रखें। रक्त कोलेस्ट्रॉल के स्तर को नियंत्रित करने के लिए आहार में वसा का सेवन कम करें।
    * संक्रमण का उपचार एवं रोकथाम :
    नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम का विशेष उपचार शुरू करने से पहले बच्चे को यदि किसी संक्रमण की तकलीफ हो, तो ऐसे संक्रमण पर नियंत्रण स्थापित करना बहुत ही आवश्यक है।
    नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम से पीड़ित बच्चों को सर्दी, बुखार एवं अन्य प्रकार के संक्रमण होने की संभावना अधिक रहती है।
    उपचार के दौरान संक्रमण होने से रोग बढ़ सकता है। इसलिए उपचार के दौरान संक्रमण न हो इसके लिए पूरी सावधानी रखना तथा संक्रमण होने पर तुरंत सघन उपचार कराना अत्यंत आवश्यक है।



    *दवाइँ द्वारा उपचार : विशिष्ट दवा द्वारा इलाज

    स्टेरॉयड चिकित्सा : 
    नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में लक्षण मुक्त करने के लिए प्रेडनिसोलोन एक मानक उपचार है। अधिकांश बच्चों पर इस दवा का अनुकूल प्रभाव पड़ता है। 1 से 4 हफ्ते में सूजन और पेशाब में प्रोटीन दोनों गायब हो जाते हैं। पेशाब जब प्रोटीन से मुक्त हो जाये तो उस स्थिति को रेमिषन कहते हैं।
    वैकल्पिक चिकित्सा : बच्चों का एक छोटा समूह जिन पर स्टेरॉयड चिकित्सा का अनुकूल प्रभाव नहीं हो पाता, उनकी पेशाब में प्रोटीन की मात्रा लगातार बढ़ती रहती है। ऐसे में किडनी की आगे की जाँच की आवश्यकता होती है जैसे – किडनी की बायोप्सी। उन्हें लीवामिजोल, साइक्लोफॉस्फेमाइड, साइक्लोस्पेरिन, टेक्रोलीमस, माइकोफिनाइलेट आदि वैकल्पिक दवा दी जाती है। स्टेरॉयड के साथ-साथ वैकल्पिक दवा भी दी जाती है। जब स्टेरॉयड की मात्रा कम कर दी जाती है तो ये दवा रेमिषन को बनाये रखने में सहायक होती है।
    नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम के मरीज बच्चे अन्य संक्रमणों से ग्रस्त हो सकते हैं। नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम में संक्रमण की रोकथाम, उसका जल्दी पता लगाना और उनका उपचार करना अत्यंत आवश्यक है। क्योंकि संक्रमण, नियंत्रित बीमारी को बढ़ा सकती है (तब भी जब मरीज का इलाज चल रहा हो)।
    संक्रमण से बचने के लिए परिवार और बच्चे को साफ पानी पिने की और पूरी सफाई से साथ धोने की आदत डालनी चाहिए। भीड़ भरे इलाके संक्रामक रोगियों के संपर्क में आने से बचना चाहिए।
    जब स्टेराइड का कोर्स पूरा हो चूका हो तब नियमित टीकाकरण की सलाह देनी चाहिए।
    * निगरानी और जाँच करना :
    संभवतः नेफ्रोटिक सिन्ड्रोम एक लम्बे समय तक (कई वर्षों) तक रहता है। इसलिए यह आवश्यक है की डॉक्टर की सलाह के अनुसार इसकी नियमित जाँच पड़ताल होनी चाहिए। जाँच के दौरान डॉक्टर के द्वारा मरीज के पेशाब में प्रोटीन की हानि, वजन रक्तचाप, दवा के दुष्प्रभाव और किसी भी प्रकार की जटिलता का मूल्यांकन किया जाता है।
    10 आम आदतें, जो किडनी खराब करती हैं:
    1. पेशाब आने पर करने न जाना
    2. रोज 7-8 गिलास से कम पानी पीना
    3. बहुत ज्यादा नमक खाना
    4. हाई बीपी के इलाज में लापरवाही बरतना
    5. शुगर के इलाज में कोताही करना
    6. बहुत ज्यादा मीट खाना
    7. ज्यादा मात्रा में पेनकिलर लेना
    8. बहुत ज्यादा शराब पीना
    9. पर्याप्त आराम न करना
    10. सॉफ्ट ड्रिंक्स और सोडा ज्यादा लेना
    नोट: किसी को भी दवाओं को लेकर एक्सपेरिमेंट नहीं करना चाहिए। बहुत-सी दवाएं, खासकर आयुर्वेदिक और यूनानी दवाओं में लेड और पोटैशियम ज्यादा मात्रा में होता है, जो किडनी के लिए बेहद नुकसानदेह साबित होता है।

    किडनी की बीमारी से बचने के उपाय - 
    रोज 8-10 गिलास पानी पीएं। - फल और कच्ची सब्जियां ज्यादा खाएं। - अंगूर खाएं क्योंकि ये किडनी से फालतू यूरिक एसिड निकालते हैं। - मैग्नीशियम किडनी को सही काम करने में मदद करता है, इसलिए ज्यादा मैग्नीशियम वाली चीजें जैसे कि गहरे रंग की सब्जियां खाएं। - खाने में नमक, सोडियम और प्रोटीन की मात्रा घटा दें। - 35 साल के बाद साल में कम-से-कम एक बार ब्लड प्रेशर और शुगर की जांच जरूर कराएं। - ब्लड प्रेशर या डायबीटीज के लक्षण मिलने पर हर छह महीने में पेशाब और खून की जांच कराएं। - न्यूट्रिशन से भरपूर खाना, रेग्युलर एक्सरसाइज और वजन पर कंट्रोल रखने से भी किडनी की बीमारी की आशंका को काफी कम किया जा सकता है।
    किडनी के मरीज खाने में रखें ख्याल किसी शख्स की किडनी कितना फीसदी काम कर रही है, उसी के हिसाब से उसे खाना दिया जाए तो किडनी की आगे और खराब होने से रोका जा सकता है :
    1. प्रोटीन : 1 ग्राम प्रोटीन/किलो मरीज के वजन के हिसाब से लिया जा सकता है। नॉनवेज खानेवाले 1 अंडा, 30 ग्राम मछली, 30 ग्राम चिकन और वेज लोग 30 ग्राम पनीर, 1 कप दूध, 1/2 कप दही, 30 ग्राम दाल और 30 ग्राम टोफू रोजाना ले सकते हैं।
    2. कैलरी : दिन भर में 7-10 सर्विंग कार्बोहाइड्रेट्स की ले सकते हैं। 1 सर्विंग बराबर होती है - 1 स्लाइस ब्रेड, 1/2 कप चावल या 1/2 कप पास्ता।
    3. विटामिन : दिन भर में 2 फल और 1 कप सब्जी लें।
    4. सोडियम : एक दिन में 1/4 छोटे चम्मच से ज्यादा नमक न लें। अगर खाने में नमक कम लगे तो नीबू, इलाइची, तुलसी आदि का इस्तेमाल स्वाद बढ़ाने के लिए करें। पैकेटबंद चीजें जैसे कि सॉस, आचार, चीज़, चिप्स, नमकीन आदि न लें।
    5. फॉसफोरस : दूध, दूध से बनी चीजें, मछली, अंडा, मीट, बीन्स, नट्स आदि फॉसफोरस से भरपूर होते हैं इसलिए इन्हें सीमित मात्रा में ही लें। डॉक्टर फॉसफोरस बाइंडर्स देते हैं, जिन्हें लेना न भूलें।
    6. कैल्शियम : दूध, दही, पनीर, टोफू, फल और सब्जियां उचित मात्रा में लें। ज्यादा कैल्शियम किडनी में पथरी का कारण बन सकता है।
    7. पोटैशियम : फल, सब्जियां, दूध, दही, मछली, अंडा, मीट में पोटैशियम काफी होता है। इनकी ज्यादा मात्रा किडनी पर बुरा असर डालती है। इसके लिए केला, संतरा, पपीता, अनार, किशमिश, भिंडी, पालक, टमाटर, मटर न लें। सेब, अंगूर, अनन्नास, तरबूज़, गोभी ,खीरा , मूली, गाजर ले सकते हैं।
    8. फैट : खाना बनाने के लिए वेजिटबल या ऑलिव ऑयस का ही इस्तेमाल करें। बटर, घी और तली -भुनी चीजें न लें। फुल क्रीम दूध की जगह स्किम्ड दूध ही लें।

    9. तरल चीजें : शुरू में जब किडनी थोड़ी ही खराब होती है तब सामान्य मात्रा में तरल चीजें ली जा सकती हैं, पर जब किडनी काम करना कम कर दे तो तरल चीजों की मात्रा का ध्यान रखें। सोडा, जूस, शराब आदि न लें। किडनी की हालत देखते हुए पूरे दिन में 5-7 कप तरल चीजें ले सकते हैं।
    10. सही समय पर उचित मात्रा में जितना खाएं, पौष्टिक खाएं।
    खाने में इनसे करें परहेज -
     फलों का रस, कोल्ड ड्रिंक्स, चाय-कॉफी, नीबू पानी, नारियल पानी, शर्बत आदि। - सोडा, केक और पेस्ट्री जैसे बेकरी प्रॉडक्ट्स और खट्ट‌ी चीजें। - केला, आम, नीबू, मौसमी, संतरा, आडू, खुमानी आदि। - मूंगफली, बादाम, खजूर, किशमिश और काजू जैसे सूखे मेवे। - चौड़ी सेम, कमलककड़ी, मशरूम, अंकुरित मूंग आदि। - अचार, पापड़, चटनी, केचप, सत्तू, अंकुरित मूंग और चना। - मार्केट के पनीर के सेवन से बचें। बाजार में मिलने वाले पनीर में नींबू, सिरका या टाटरी का इस्तेमाल होता है। इसमें मिलावट की भी गुंजाइश रहती है।
    कैसे तैयार करें खाना- 
     वेजिटेबल ऑयल और घी आदि बदल-बदल कर इस्तेमाल करें। - घर पर ही नीबू के बजाय दही से डबल टोंड दूध फाड़कर पनीर बनाएं। - खाना पकाने से पहले दाल को कम-से-कम दो घंटे और सब्जियों को एक घंटे तक गुनगुने पानी में रखें। इससे उनमें पेस्टिसाइड्स का असर कम किया जा सकता है। -महीने में एकाध बार लीचिंग प्रक्रिया अपनाकर घर में छोले और राजमा भी खा सकते हैं, पर इसकी तरी के सेवन से बचें। -नॉनवेज खानेवाले रेड मीट का सेवन नहीं करें। चिकन और मछली भी एक सीमित मात्रा में ही खाएं। -रोजाना कम-से-कम दो अंडों का सफेद हिस्सा खाने से जरूरी मात्रा में प्रोटीन मिलता है।
    शुरुआती लक्षण - 
    पैरों और आंखों के नीचे सूजन - चलने पर जल्दी थकान और सांस फूलना - रात में बार-बार पेशाब के लिए उठना - भूख न लगना और हाजमा ठीक न रहना - खून की कमी से शरीर पीला पड़ना
    नोट: इनमें से कुछ या सारे लक्षण दिख सकते हैं।
    देर से पता लगती है बीमारी
    पहली स्टेज:
     पेशाब में कुछ गड़बड़ी पता चलती है लेकिन क्रिएटनिन और ईजीएफआर (ग्लोमेरुलर फिल्टरेशन रेट) सामान्य होता है। ईजीएफआर से पता चलता है कि किडनी कितना फिल्टर कर पा रही है।



    दूसरी स्टेज:
     ईजीएफआर 90-60 के बीच में होता है लेकिन क्रिएटनिन सामान्य ही रहता है। इस स्टेज में भी पेशाब की जांच में प्रोटीन ज्यादा होने के संकेत मिलने लगते हैं। शुगर या हाई बीपी रहने लगता है।
    तीसरी स्टेज: 
    ईजीएफआर 60-30 के बीच में होने लगता है, वहीं क्रिएटनिन भी बढ़ने लगता है। इसी स्टेज में किडनी की बीमारी के लक्षण सामने आने लगते हैं। अनीमिया हो सकता है, ब्लड टेस्ट में यूरिया ज्यादा आ सकता है। शरीर में खुजली होती है। यहां मरीज को डॉक्टर से सलाह लेकर अपना लाइफस्टाइल सुधारना चाहिए।
    चौथी स्टेज: 
    ईजीएफआर 30-15 के बीच होता है और क्रिएटनिन भी 2-4 के बीच होने लगता है। यह वह स्टेज है, जब मरीज को अपनी डायट और लाइफस्टाइल में जबरदस्त सुधार लाना चाहिए नहीं तो डायलिसिस या ट्रांसप्लांट की स्टेज जल्दी आ सकती है। इसमें मरीज जल्दी थकने लगता है। शरीर में कहीं सूजन आ सकती है।
    पांचवीं स्टेज :
     ईजीएफआर 15 से कम हो जाता है और क्रिएटनिन 4-5 या उससे ज्यादा हो जाता है। फिर मरीज के लिए डायैलसिस या ट्रांसप्लांट जरूरी हो जाता है।
    विशेष- शुरुआती स्टेज में किडनी की बीमारी को पकड़ना बहुत मुश्किल है क्योंकि दोनों किडनी के करीब 60 फीसदी खराब होने के बाद ही खून मे क्रिएटनिन बढ़ना शुरू होता है।
    क्या है इलाज
    इस बीमारी के इलाज को मेडिकल भाषा में रीनल रिप्लेसमेंट थेरपी (RRT) कहते हैं। किडनी खराब होने पर फाइनल इलाज तो ट्रांसप्लांट ही है, लेकिन इसके लिए किडनी डोनर मिलना मुश्किल है, इसलिए इसका टेंपररी हल डायलिसिस है। यह लगातार चलनेवाले प्रोसेस है और काफी महंगा है।
    क्या है डायलिसिस
    खून को साफ करने और इसमें बढ़ रहे जहरीले पदार्थों को मशीन के जरिए बाहर निकालना ही डायैलसिस है। डायैलसिस दो तरह की होती है:
    1. हीमोडायलिसिस : 
    सिर्फ अस्पतालों में ही होती है। तय मानकों के तहत अस्पताल में किसी मरीज की हीमोडायैलसिस में चार घंटे लगते हैं और हफ्ते में कम-से-कम दो बार इसे कराना चाहिए। इसे बढ़ाने या घटाने का फैसला डॉक्टर ही कर सकते हैं।
    2. पेरीटोनियल :
     पानी से डायलिसिस घर पर की जा सकती है। इसके लिए पेट में सर्जरी करके वॉल्व जैसी चीज डाली जाती है। इसका पानी भी अलग से आता है। डॉक्टर घर में किसी को करना सिखा देते हैं। यह थोड़ी कम खर्चीली है लेकिन इसमें सफाई का बहुत ज्यादा ध्यान रखना होता है, वरना इन्फेक्शन हो सकता है।
    कैसे होती है हीमोडायलिसिस
     इमरजेंसी में मरीज की गर्दन के निचले हिस्से में कैथेटर डालकर या फिर जांघ की ब्लड वेसल्स में फेमोरल प्रक्रिया से डायैलसिस की जाती है। रेग्युलर डायलिसिस के लिए मरीज की बाजू में सर्जरी करके 'एवी फिस्टुला' बनाया जाता है ताकि बगैर किसी परेशानी के डायलिसिस की जा सके। एवी फिस्टुला में आर्टरी को नाड़ी से जोड़ा जाता है। इस तरह से बनाए गए फिस्टुला को काम करने लायक होने में 8 हफ्ते लगते हैं। फिस्टुला डायलिसिस कराने वाले मरीजों की लाइफलाइन है, इसलिए इसकी हिफाजत बहुत जरूरी है। ध्यान रखें कि जिस हाथ में फिस्टुला बना है, उससे न तो बीपी नापा जाए और न ही जांच के लिए खून निकाला जाए। इस हाथ में इंजेक्शन भी नहीं लगवाना चाहिए। यह हाथ न तो दबना चाहिए और न ही इससे भारी सामान उठाना चाहिए। अगर एवी फिस्टुला सही समय पर बन जाए तो मरीज के लंबे समय तक जीवित रहने की संभावना बढ़ जाती है।
    किडनी की समस्या से जूझ रहे मरीज की हफ्ते में 8 से 12 घंटे डायैलसिस होनी चाहिए। चूंकि आमतौर पर एक बार में चार घंटे की डायैलसिस होती है, इसलिए मरीज की सेहत को ध्यान में रखते हुए डॉक्टर उसे हफ्ते में दो बार या हर तीसरे/ दूसरे दिन डालसिसिस कराने की सलाह देते हैं। मरीज को अपनी मर्जी से दो डायलिसिस के बीच का फर्क नहीं बढ़ाना चाहिए क्योंकि ऐसा करने पर कभी-कभी बड़ी परेशानी पैदा हो जाती है और मरीज आईसीयू तक में पहुंच जाता है।
    खून की नियमित जांच जरूरी
    * डायलिसिस कराने वाले मरीजों को महीने में कम-से-कम एक बार खून की जांच (KFT) करानी चाहिए। इस जांच से मरीज के शरीर में हीमोग्लोबीन, ब्लड यूरिया, क्रिएटनिन, पोटैशियम, फॉस्फोरस और सोडियम की मात्रा का पता लगता है।
    *हालात के अनुसार समय-समय पर डॉक्टर मरीज के खून की जांच के जरिए शरीर में पीटीएच, आयरन और बी-12 आदि की भी जांच करते हैं। - हर डायैलसिस यूनिट अपने मरीजों से हर छह महीने पर एचआईवी, हैपेटाइटिस बी और सी के लिए खून की जांच कराने का अनुरोध करती है।
    * अगर किसी मरीज की रिपोर्ट से उसके एचआईवी, हैपेटाइटिस बी या सी से प्रभावित होने का संकेत मिलता है तो उसकी डायैलसिस में खास सावधानी बरती जाती है। ऐसे मरीज की डायैलसिस में हर बार नए डायैलजर का इस्तेमाल होता है ताकि कोई दूसरा मरीज इस इन्फेक्शन की चपेट में न आ सके।
    बरतें ये सावधानियां
    *डायलिसिस कराने वालों को लिक्विड चीजें कम लेनी चाहिए। किडनी खराब होने पर खून की सफाई के प्रॉसेस में रुकावट आती है और आमतौर पर मरीज को पेशाब भी कम आने लगता है, इसलिए उन्हें सीमित मात्रा में लिक्विड चीजें लेनी चाहिए।
    *लिक्विड चीजों में पानी के अलावा दूध, दही, चाय, कॉफी, आइसक्रीम, बर्फ और दाल-सब्जियों की तरी भी शामिल हैं। यही नहीं, रोटी, चावल और ब्रेड आदि में भी पानी होता है।
    *लिक्विड पर कंट्रोल रखने से दो डायलिसिस के बीच में मरीज का वजन (जिसे वेट गेन या वॉटर रिटेंशन भी कहते हैं) अधिक नहीं बढ़ता। दो डायलिसिस के बीच में ज्यादा वजन बढ़ने से डायलिसिस का प्रॉसेस पूरा होने पर कई बार कमजोरी या चक्कर आने की शिकायत भी होने लगती है।
    * किडनी के मरीज को डायटीशियन से भी जरूर मिलना चाहिए क्योंकि इस बीमारी में खानपान पर कंट्रोल बहुत जरूरी है।
    * किडनी के जो मरीज डायलसिस पर नहीं हैं, उन्हें कम प्रोटीन और डायलसिस कराने वाले मरीजों को ज्यादा प्रोटीन की जरूरत होती है। लेकिन खानपान की पूरी जानकारी डायट एक्सपर्ट ही दे सकते हैं।
    *डायलिसिस कराने वाले रोगी को  कोई भी दवा लेने से पहले अपने किडनी एक्सपर्ट (नेफ्रॉलजिस्ट) से सलाह जरूरी है। नोट: किडनी की बीमारी सुनकर जिंदगी खत्म होने की बात सोचना गलत है क्योंकि अगर खानपान और रुटीन में सावधानी बरती जाए तो डायलसिस कराते हुए भी लंबी जिंदगी का आनंद लिया जा सकता है। मरीज को घर-परिवार, रिश्तेदारों और दोस्तों का पूरा साथ मिलना जरूरी है ताकि वह उलट परिस्थितियों का ज्यादा संयम के साथ सामना कर सके।
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    क्विड का सेवन ऐसे कम करें
    डायलिसिस कराने वाला रोगी  नीचे लिखे तरीकों से लिक्विड का सेवन कम कर सकता है:
    *गर्मियों में 500 एमएल की कोल्ड ड्रिंक की बोतल में पानी भरके उसे फ्रीजर में रख लें। यह बर्फ बन जाएगा और फिर इसका धीरे-धीरे सेवन करें।
    *फ्रिज में बर्फ जमा लें और प्यास लगने पर एक टुकडा मुंह में रखकर घुमाएं और फिर उसे फेंक दें।
    * गर्मियों में रुमाल भिगोकर गर्दन पर रखने से भी प्यास पर काबू पाया जा सकता है।
    *घर में छोटा कप रखें और उसी में पानी लेकर पीएं।
    *खाना खाते समय दाल और सब्जियों की तरी का सेवन कम-से-कम करने की कोशिश करें।



    आयुर्वेद

    बीमारी की वजह के आधार पर ही जरूरी दवा खाने की सलाह दी जाती है:
    *चूंकि किडनी का काम शरीर में खून की सफाई करना और जहरीली चीजों को बाहर निकालना होता है। इलाज के दौरान मरीज के खानपान को सुधारने के साथ ही उसके बीपी और शुगर को कंट्रोल में रखने पर खास ध्यान दिया जाता है।
    *वरुण, पुनर्नवा, अर्जुन, वसा, कातुकी, शतावरी, निशोध, कांचनार, बाला, नागरमोथा, भबमिआमलकी, सारिवा, अश्वगंधा और पंचरत्नमूल आदि दवाओं का इस्तेमाल किडनी के इलाज में किया जाता है।
    * किडनी की बीमारी का लगातार इलाज जरूरी है और यह ताउम्र चलता है। किडनी की बीमारी का इलाज से ज्यादा मैनेजमेंट होता है।
    होम्यॉपथी
    लक्षणों के आधार पर कॉलि-कार्ब 200, एपिस-मेल-30, एसिड बेंजोक, टेरीबिंथ,बर्बेरिस वल्गरीस, लेसीथिन, फेरम मेट और चाइना जैसी दवाएं दी जाती हैं। थकान और कमजोरी दूर करने के लिए अल्फाल्फा टॉनिक भी दिया जाता है।
    नोट: होम्यॉपथी डायैलसिस बंद कराने में सक्षम नहीं है लेकिन यह ऐसे मरीजों की सहायक जरूर है। ऐलोपैथी दवाओं के साथ ही होम्योपैथी दवाओं के सेवन से मरीज ज्यादा सेहतमंद रह सकता है।
    नेचरॉपथी
    * किडनी की क्षमता बढ़ाने के लिए नेचरोपैथी में मरीज को सलाद, फल आदि कुदरती चीजें लेने को कहा जाता है। इससे किडनी की सफाई शुरू होती है और उसे आराम भी मिलता है।
    * किडनी की जगह पर सूती कपड़े की पट्टी को ताजे पानी में भिगोकर रोजाना आधे घंटे लगाते हैं। ऐसा करने से किडनी की तरफ के शरीर का तापमान कम होता है और उस ओर खून का दौरा बढ़ता है।
    * इसी तरह किडनी की जगह पर गर्म और ठंडे पानी से सिकाई करते हैं। इसे भी रोजाना आधे घंटे के लिए कर सकते हैं। इससे किडनी में खून का दौरा बढ़ता है।

    * धूप स्नान के जरिए सुबह-सुबह किडनी पर सूरज की सीधी किरणों से इलाज किया जाता है और किडनी की सफाई होती है।
    *मरीज को एक टब में बिठाकर उसकी नाभि तक पानी रखा जाता है। यह क्रिया आधे घंटे तक की जाती है। कटिस्नान से भी किडनी की ओर खून का दौरा बढ़ता है।
    योग
    *रोजाना कम-से-कम 20 मिनट तक अनुलोम-विलोम करना चाहिए।
    * गलत लाइफस्टाइल और बुरी आदतों को छोड़ दें तो किडनी के साथ-साथ दूसरी बीमारियों से भी बचने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
    विशिष्ट परामर्श- 
       
    किडनी फेल रोगी मे बढे हुए क्रिएटनिनऔर यूरिया के लेविल को नीचे लाने और गुर्दे की कार्य क्षमता बढ़ाने में हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल होती हैं| इस हेतु वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क किया जा सकता है| दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित यह औषधि कितनी आश्चर्यजनक रूप से फलदायी है ,इसकी एक केस रिपोर्ट पाठकों की सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ -



    रोगी का नाम - Awdhesh 
    निवासी - कानपुर 
    ईलाज से पूर्व की सोनोग्राफी  रिपोर्ट




    दिनांक - 26/4/2016
    Urea- 55.14 mg/dl

    creatinine-13.5 mg/dl













    हर्बल औषधि प्रयोग करने के 23 दिन बाद 

    17/5/2016 की सोनोग्राफी  रिपोर्ट  यूरिया और क्रेयटिनिन  नार्मल -






    creatinine 1.34
    mg/dl

    urea 22 mg/dl